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 15 / 01 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *संपूरण निर्विकारी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *आत्माओं को बाप से मिलाया ?*

 

➢➢ *साइलेंस की शक्ति द्वारा हर सेकंड में हर समस्या का हल किया ?*

 

➢➢ *व्यर्थ संकल्प व विकल्प से किनारा कर आत्मिक स्थिति में स्थित रहे ?*

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*अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे शक्तियों के जड़ चित्रों में वरदान देने का स्थूल रूप हस्तों के रूप में दिखाया है, हस्त भी एकाग्र रूप दिखाते हैं। *वरदान का पोज हस्त, दृष्टि और संकल्प एकाग्र दिखाते हैं, ऐसे चैतन्य रूप में एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ, तब रूह, रूह का आह्वान करके रुहानी सेवा कर सकेगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं पद्मापद्म भाग्यशाली आत्मा हूँ"*

 

   अपने को सदा पद्मापद्म भाग्यशाली आत्मायें समझते हो? हर समय कितनी कमाई जमा करते हो? हिसाब निकाल सकते हो? सारे कल्प के अन्दर ऐसा कोई बिजनेसमैन होगा जो इतनी कमाई करे! सदा यह खुशी की याद रहती है कि हम ही कल्प-कल्प ऐसे श्रेष्ठ आत्मा बने हैं? *तो सदा यही समझो कि इतने बड़े बिजनेसमैन हैं और इतनी ही कमाई में बिजी रहो। सदा बिजी रहने से किसी भी प्रकार की माया वार नहीं करेगी क्योंकि बिजी होंगे तो माया बिजी देखकर लौट जायेगी, वार नहीं करेगी।*

 

  सहज मायाजीत बनने का यही साधन है कि सदा कमाई करते रहो और कराते रहो। *जैसे-जैसे माया के अनेक प्रकारों के नालेजफुल होते जायेंगे तो माया किनारा करती जायेगी। दूसरी बात एक सेकण्ड भी अकेले नहीं हो, सदा बाप के साथ रहो तो बाप के साथ को देखते हुए माया आ नहीं सकती क्योंकि माया पहले बाप से अकेला करती है तब आती है।* तो जब अकेले होंगे ही नहीं फिर माया क्या करेगी?

 

  बाप अति प्रिय है, यह तो अनुभव है ना? तो प्यारी चीज भूल कैसे सकती! तो सदा यह स्मृति में रखो कि प्यारे ते प्यारा कौन? जहाँ मन होगा वहाँ तन और धन स्वत: होगा। तो 'मन्मनाभव' का मन्त्र याद है ना! *जहाँ भी मन जाए तो पहले यह चेक करो कि इससे बिढ़या, इससे श्रेष्ठ और कोई चीज है या जहाँ मन जाता है वही श्रेष्ठ है! उसी घड़ी चेक करो तो चेक करने से चेंज हो जायेंगे। हर कर्म, हर संकल्प करने के पहले चेक करो।* करने के बाद नहीं। पहले चेकिंग पीछे प्रैक्टिकल।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  21वीं सदी तो आप लोगों ने चैलेन्ज की है, ढिंढोरा पीटा है, याद है? चैलेन्ज किया है - गोल्डन एजड दुनिया आयेगी या वातावरण बनायेंगे। चैलेन्ज किया है ना! तो इतने तक तो बहुत टाइम है। *जितना स्व पर अटेन्शन दे सको, दे सको भी नहीं, देना ही है।*

 

✧  जैसे देह-भान में आने में कितना टाइम लगता है? दो सेकण्ड? *जब चाहते भी नहीं हो लेकिन देह भान में आ जाते हो, तो कितना टाइम लगता है?* एक सेकण्ड या उससे भी कम लगता है? *पता ही नहीं पडता है कि देह भान में आ भी गये हैं।*

 

✧  ऐसे ही यह अभ्यास करो - कुछ भी हो, क्या भी कर रहे हो लेकिन यह भी पता ही नहीं पडे कि मैं सोल-कान्सेस, पॉवरफुल स्थिति में नेचुरल हो गया हूँ। *फरिश्ता स्थिति भी नेचुरल होनी चाहिए।* जितनी अपनी नेचर फरिश्ते-पन की बनायेंगे तो नेचर स्थिति

को नेचुरल कर देगी। तो बापदादा कितने समय के बाद पूछे? कितना समय चाहिए?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *आप क्या समझते हो, देह के अभिमान से भी सम्पूर्ण समर्पण बने हो ?* मर गये हो व मरते रहते हो देह के सम्बन्ध और मन के संकल्पों से भी? तुम देही हो ? *यह देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाए, तब कहा जाए सर्व समर्पणमय जीवन।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पढाई से देवी-देवता बनना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा कितनी ही तकदीरवान हूँ जो की स्वयं परमपिता परमात्मा, भाग्यविधाता बन मेरी सोई हुई तकदीर को जगाने परमधाम से आये हैं... *अविनाशी बेहद बाबा अविनाशी ज्ञान देकर इस एक जन्म में मुझे पढ़ाकर, 21 जन्मों के लिए मेरी ऊँची तकदीर बना रहे हैं...* यह पढ़ाई ही सोर्स ऑफ़ इनकम है... *मैं रूहानी आत्मा, रूहानी बाबा से, रूहानी पढ़ाई पढने चल पड़ती हूँ रूहानी कालेज सेंटर में...*  

 

  *पुरुषोत्तम संगम युग की पढाई से उत्तम ते उत्तम पुरुष बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता की बाँहो में झूलने वाला खुबसूरत समय जो हाथ आया है तो इस वरदानी युग में पिता से अथाह खजाने लूट लो... 21 जनमो के मीठे सुखो से अपना दामन सजा लो...* ईश्वरीय पढ़ाई से उत्तम पुरुष बन विश्व धरा के मालिक हो मुस्करा उठो...

 

_ ➳  *बाबा की मीठी मुरली की मधुर तान पर फिदा होते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा अपने महान भाग्य को देख देख निहाल हो गई हूँ... *मेरा मीठा भाग्य मुझे ईश्वर पिता की फूलो सी गोद लिए वरदानी संगम पर ले आया है... ईश्वरीय पढ़ाई से मै आत्मा मालामाल होती जा रही हूँ...*

 

  *ज्ञान रत्नों के सरगम से मेरे मन मधुबन को सुरीला बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... इस महान मीठे समय का भरपूर फायदा उठाओ... *ईश्वरीय ज्ञान रत्नों से जीवन में खुशियो की फुलवारी सी लगाओ... जिस ईश्वर को दर दर खोजते थे कभी... आज सम्मुख पाकर ज्ञान खजाने से भरपूर हो जाओ... और 21 जनमो के सुखो की तकदीर बनाओ...*

 

_ ➳  *दिव्यता से सजधज कर सतयुगी सुखों की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा मीठे बाबा संग ज्ञान और योग के पंख लिए असीम आनन्द में खो गयी हूँ... *ईश्वर पिता के सारे खजाने को बुद्धि तिजोरी में भरकर और दिव्य गुणो की धारणा से उत्तम पुरुष आत्मा सी सज रही हूँ...*

 

  *इस संगमयुग में मेरे संग-संग चलते हुए सत्य ज्ञान की राह दिखाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *मीठे बाबा के साथ का संगम कितना मीठा प्यारा और सुहावना है...* सत्य के बिना असत्य गलियो में किस कदर भटके हुए थे... आज पिता की गोद में बैठे फूल से खिल रहे हो... *ईश्वरीय मिलन के इन मीठे पलों की सुनहरी यादो को रोम रोम में प्रवाहित कर देवता से सज जाओ...*

 

_ ➳  *ईश्वरीय राहों पर चलकर ओजस्वी बन दमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा मीठे बाबा की गोद में ईश्वरीय पढ़ाई पढ़कर श्रेष्ठ भाग्य को पा रही हूँ... इस वरदानी संगम युग में ईश्वर को शिक्षक रूप में पाकर अपने मीठे से भाग्य पर बलिहार हूँ...* और प्यारा सा देवताई भाग्य सजा रही हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सम्पूर्ण निर्विकरी जरूर बनना है*"

 

_ ➳  कितनी पदमा पदम सौभाग्यशाली हूँ मैं ब्राह्मण आत्मा जिसे स्वयं भगवान ने ब्रह्मा मुख कमल द्वारा रचा है, *मन ही मन स्वयं से यह बातें करती, अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना करते हुए, मैं अपने तीनो कालों औऱ आदि से लेकर अंत तक के अपने 84 जन्मों के सर्वश्रेष्ठ पार्ट के बारे में जैसे ही विचार करती हूँ उन 84 जन्मो में मुझ आत्मा द्वारा बजाए अलग - अलग पार्ट अलग - अलग स्वरुप में मेरी आँखों के सामने एक सिनेमा की भांति स्पष्ट होने लगते हैं*। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे सामने एक बहुत बड़ी स्क्रीन है जिस पर मैं अपने पास्ट, प्रेजेंट और भविष्य को देख रही हूँ। 84 जन्मो में अपने अलग -अलग स्वरूप में बजाए हर पार्ट में मैं अपना सम्पूर्ण निर्विकारी स्वरूप देख रही हूँ।

 

_ ➳  सबसे पहले मैं देख रही हूँ अपने आपको अपने वास्तविक अनादि निराकार स्वरूप में अपने घर परमधाम में अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के पास। *झिलमिल करती आत्माओं की इस निराकारी खूबसूरत दुनिया में, एक चमकता हुआ सितारा मैं आत्मा सच्चे सोने के समान अपनी आभा चारों और बिखेरती हुई, सातों गुणों और अष्ट शक्तियों के अनन्त प्रकाश से प्रदीप्तमय हूँ*। अपने इस सम्पूर्ण निर्विकारी अनन्त ज्योतिर्मय स्वरूप को देख मैं गहन आनन्द का अनुभव कर रहती हूँ। मेरा यह सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप मुझे मेरे अंदर निहित गुणों और शक्तियों की महसूसता करवाकर, असीम सुख की अनुभूति करवा रहा है। 

 

_ ➳  अपने इस वास्तविक अनादि स्वरूप का सुखमय अनुभव करके, अब मैं अपना अगला सम्पूर्ण निर्विकारी देवताई स्वरूप देख रही हूँ। *अपने शिव पिता द्वारा बनाई, प्रकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण एक खूबसूरत स्वर्णिम दुनिया में मैं स्वयं को 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम स्वदर्शन चक्रधारी विष्णु के रूप में देख रही हूँ*। मेरा यह स्वरूप मुझे मेरे विश्व महाराजन स्वरूप की स्मृति दिलाकर गहन खुशी का अनुभव करवा रहा है। इस स्वरूप में अपने मुख मण्डल पर फैली दिव्य आभा और सम्पूर्ण पवित्रता के तेज को देख मैं मन ही मन हर्षित हो रही हूँ। 

 

_ ➳  अपने इस डबल ताजधारी सम्पूर्ण निर्विकारी स्वरूप को देख आनन्दविभोर होकर अब मैं अपने परम पवित्र पूज्य स्वरूप को देख रही हूँ। *अष्ट भुजाधारी दुर्गा के रूप में मंदिर में प्रतिस्थापित प्रतिमा मुझे मेरे पूज्य स्वरूप की स्मृति दिला रही हूँ। देख रही हूँ मैं अपने सामने लम्बी - लम्बी कतारों में खड़े अपने भक्तों को जो केवल मेरे एक दर्शन के प्यासे हैं*। अपनी मनोकामना पूर्ण करवाने के लिए घण्टों भूखे प्यासे लाइनों में खड़े तपस्या कर रहें हैं। मुख पर दिव्य मुस्कराहट और नयनों में दया भाव लिए मैं अपना वरदानी हाथ ऊपर उठाए उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर रही हूँ। 

 

_ ➳  बड़े श्रद्धा भाव के साथ अपने मस्तक को झुका कर अपनी वन्दना करते, अपने भक्तों की आश को पूर्ण करते, अपने इस परम पूज्य स्वरूप को आनन्दमग्न होकर देखते हुए *अब मैं फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप की स्मृति में लौटती हूँ और अपने प्यारे शिव पिता द्वारा मिली उन अविनाशी प्राप्तियों को याद करती हूँ जो ब्राह्मण बनते ही मेरे मीठे प्यारे बाबा ने मुझे गिफ्ट के रूप में दी हैं। उन्हें याद कर, अपने भाग्य पर मैं नाज करती हूँ कि कितनी सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा, जिस भगवान की महिमा के दुनिया गीत गाती हैं वो स्वयं मेरे सामने आकर मेरे गीत गाता है*। बाप बन मेरी पालना करता है, टीचर बन हर रोज मुझे पढ़ाने आता है और सतगुरु बन मुझे श्रेष्ठ कर्म करना सिखलाता है। 

 

_ ➳  ऐसे अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य के गीत गाते हुए अब मैं कर्मयोगी बन अपने कार्य मे लग जाती हूँ। किन्तु कर्म करते - करते भी अब मैं इन अखुट प्राप्तियों औऱ अपने प्यारे प्रभु से मिलने वाले निस्वार्थ औऱ निष्काम प्यार को सदा स्मृति में रखते हुए, तथा *अपने तीनों कालों में बजाने वाले अपने सर्वश्रेष्ठ सम्पूर्ण निर्विकारी पार्ट को मन बुद्धि से सदा अपने सामने इमर्ज रखते हुए, सम्पूर्ण निर्विकारी बन सच्चा ब्राह्मण बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्र बनने का पुरुषार्थ अब मैं पूरी लगन के साथ कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं साइलेंस की शक्त्ति द्वारा सेकण्ड में हर समस्या का हल करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं एकान्तवासी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा व्यर्थ संकल्प वा विकल्प से किनारा करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव आत्मिक स्थिति में रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव योगयुक्त हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा आज से सभी बच्चों कोचाहे यहाँ बैठे हैंचाहे सेन्टर्स पर बैठे हैंचाहे देश में हैंचाहे विदेश में हैं लेकिन रहमदिल भावना से इशारा दे रहे हैं - *बापदादा हर बच्चे की हद की बातेंहद के स्वभाव-संस्कारनटखट वा चतुराई के संस्कारअलबेलेपन के संस्कार बहुत समय से देख रहे हैंकई बच्चे समझते हैं सब चल रहा हैकौन देखता हैकौन जानता है लेकिन अभी तक बापदादा रहमदिल हैइसलिए देखते हुए भीसुनते हुए भी रहम कर रहा है। लेकिन बापदादा पूछते है आखिर भी रहमदिल कब तक?* कब तक? क्या और टाइम चाहिएबाप से समय भी पूछता हैआखिर कब तकप्रकृति भी पूछती है। जवाब दो आप। जवाब दो। *अभी तो सिर्फ बाप का रूप चल रहा हैशिक्षक और सतगुरु तो है ही। लेकिन बाप का रूप चल रहा है। क्षमा के सागर का पार्ट चल रहा है।*

 

 _ ➳  *लेकिन धर्मराज का पार्ट चला तो?* क्या करेंगे?  *बापदादा यही चाहते हैं कि धर्मराज के पार्ट में भी वाह! बच्चे वाह! का आवाज कानों में गूँजे।* फिर बाप को उलहना नहीं देना। बाबाआपने सुनाया नहींहम तैयार हो जाते थे ना! इसलिए *अभी हद की छोटी-छोटी बातों मेंस्वभाव मेंसंस्कारों में समय नहीं गँवाओ।* चल रहे हैंचलता हैनहींजमा होता जाता है। दुगुनातीनगुनासौगुना जमा होता जाता हैचलता है नहीं। इसलिए इस *दृढ़ संकल्प का दिल में दीप जगाओ। हद से बेहद में वृत्तिदृष्टिकृति बनानी है। इसीलिए बापदादा कहते हैं बनानी पड़ेगी।* आज यह कह रहे हैं बनानी पड़ेगी फिर क्या कहेंगेटू लेट। समय को देखोसेवा को देखोसेवा बढ़ रही हैसमय आगे दौड़ रहा है। लेकिन स्वयं हद में हैं या बेहद में हैं?  *हद की बातों के पीछे आप नहीं दौड़ो। तो बेहद की वृत्तिस्वमान की स्थिति आपके पीछे दौड़ेगी।*  

 

✺   *ड्रिल :-  "बेहद की वृत्ति, दृष्टि, कृति से हद की बातों से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा याद और सेवा की रस्सियों में झूलते हुए पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन... वतन में बापदादा के पास बैठ जाती हूँ... *पारलौकिक बाप अलौकिक बाप के मस्तक पर विराजमान होकर मुझे भी अलौकिक बना रहें हैं... बापदादा मुझ आत्मा को अपनी शक्तियों से भरपूर कर रहें हैं... मैं आत्मा अपनी साधारणता को छोड़ विशेष आत्मा होने का अनुभव कर रही हूँ...*

 

 _ ➳  प्यारे बाबा मुझ आत्मा को आदि मध्य अंत का सत्य ज्ञान सुना रहें हैं... हद और बेहद के बारे में बता रहें हैं... मैं आत्मा अपने असली स्वरूप को... असली घर को... और इस सृष्टि रंगमंच पर अपने पार्ट को समझ गई हूँ... *मैं आत्मा बेहद बाबा के साथ की अनुभूति में रह... अपनी दृष्टि... वृति... कृति को हद से निकाल बेहद की बना रही हूँ...*

 

 _ ➳  मुझ आत्मा की वृति... दृष्टि... कृति... बेहद की हो गई है... मैं आत्मा हद की बातों से मुक्त हो गई हूँ... मैं... मेरा... मेरी देह... मेरे सम्बन्धी... अब मेरा किसी में मोह नहीं फंसता... अब ऐसा लगता है कि ये सब आत्माऐं भगवान के बच्चे हैं...जो भी मनुष्य सम्पर्क में आता है... उसे आत्मिक दृष्टि से देखती हूँ... सबका कल्याण हो... सब सुख पाएं... बस यही चिंतन चलता है... इससे मन बहुत हल्का रहता है...

 

 _ ➳  *मैं आत्मा दृढ़ संकल्प की चाबी लगा कर अपनी  दृष्टि, वृति, कृति को ब्रह्मा बाप समान पवित्र बना रही हूँ... हर कर्म को विशाल हृदय से... बेहद की दृष्टि द्वारा कर रही हूँ... ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रख  फॉलो फादर कर बाप समान बन रही हूँ...* अब मैं उड़ता पंछी... आजाद पंछी... मुक्त गगन में फरिश्ता बन उड़ती रहती हूँ...

  

 _ ➳  मैं आत्मा अपने हर कर्म को चेक करती हूँ कि जो कर्म मैं कर रही हूँ... वह बाप समान... बेहद का है या नहीं... *मैं आत्मा बाबा द्वारा दी गई हर श्रीमत... हर मर्यादा का पालन कर रही हूँ*, मैं आत्मा बाप समान रहमदिल... मास्टर प्यार का सागर बन अपने स्वमान में स्थित रहती हूँ... *मैं... मेरा... तेरा से उपराम... हद की बातों से उपराम हो गई हूँ... अब मैं आत्मा स्वयं के बारे में नही सोचती... मेरी दृष्टि... वृति... कृति बेहद की हो गयी है...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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