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 15 / 02 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सिर्फ इ बाप को याद किया ?*

 

➢➢ *मृत्युलोक का कुछ भी याद तो नहीं रखा ?*

 

➢➢ *अतीन्द्रिय सुखमय स्थिति द्वारा अनेक आत्माओं का आह्वान किया ?*

 

➢➢ *हर एक की विशेषताओं को स्मृति में रखा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  मन्सा सेवा के लिए मन, बुद्धि व्यर्थ सोचने से मुक्त होना चाहिए। मनमनाभव के मन्त्र का सहज स्वरूप होना चाहिए। *जिन श्रेष्ठ आत्माओं की श्रेष्ठ मन्सा अर्थात् संकल्प शक्तिशाली है, शुभ-भावना, शुभ-कामना वाले हैं वह मन्सा द्वारा शक्तियों का दान दे सकते हैं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ"*

 

✧  सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान अनुभव करते हो? *इस स्वरूप की स्मृति में रहने से हर परिस्थिति ऐसे अनुभव होगी जैसे परिस्थिति नहीं लेकिन एक साइडसीन है। परिस्थिति समझने से घबरा जाते लेकिन साइडसीन अर्थात् रास्ते के नजारे हैं तो सहज ही पार कर लेते।*

 

  क्योंकि नजारों को देख खुशी होती है, घबराते नहीं। *तो विघ्न, विघ्न नहीं हैं लेकिन विघ्न आगे बढ़ने का साधन है। परीक्षा क्लास आगे बढ़ाता है।*

 

  तो यह विघ्न, परिस्थिति, परीक्षा आगे बढ़ाने के लिए आते हैं ऐसे समझते हो ना! कभी कोई बात सोचते यह क्या हुआ, क्यों हुआ? तो सोचने में भी टाइम जाता है। *सोचना अर्थात् रुकना। मास्टर सर्वशक्तिवान कभी रुकते नहीं। सदा अपने जीवन में उड़ती कला का अनुभव करते हैं।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *शिव बाप समान बनना अर्थात निराकार स्थिति में स्थित होना। मुश्किल है क्या?* बाप और दादा से प्यार है ना! तो जिससे प्यार है उस जैसा बनना, जब संकल्प भी है - बाप समान बनना ही है, तो कोई मुश्किल नहीं है।

 

✧  सिर्फ बार-बार अटेन्शन। साधारण जीवन नहीं। साधारण जीवन वाले बहुत हैं। बडे-बडे कार्य करने वाले बहुत हैं। लेकिन आप जैसा कार्य, आप ब्राह्मण आत्माओं के सिवाए और कोई नहीं कर सकता है। *तो आज स्मृति दिवस पर बापदादा समानता में समीप आओ, समीप आओ, समीप आओ का वरदान दे रहे हैं।*

 

✧  सभी हद के किनारे, चाहे संकल्प, चाहे बोल, चाहे कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क कोई भी हद का किनारा, अपने मन की नईया को इन हद के किनारों से मुक्त कर दो। *अभी से जीवन में रहते मुक्त ऐसे जीवनमुक्ति का अलौकिक अनुभव बहुतकाल से करो। अच्छा।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  व्यक्तभाव से अव्यक्त भाव में कहाँ तक आगे बढ़े - यह चेकिंग करनी है। अगर अव्यक्ति स्थिति बढ़ी है तो अपने चलन में भी अलौकिक होंगे। *अव्यक्त स्थिति की प्रैक्टिकल परख क्या है? आलौकिक चलन।* इस लोक में रहते अलौकिक कहाँ तक बने हो? यह चेक करना है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  संगमयुग है चढ़ती कला का युग"*

 

_ ➳   मीठे बाबा की यादो में डूबी मै आत्मा... कुटिया में हाले दिल सुनाने के लिए पहुंचती हूँ... मीठे बाबा भी बस मेरे ही इंतजार में बेठे है... अपना समय और संकल्प मुझ पर लुटा रहे है... और मै आत्मा भगवान को सम्मुख पाकर भाव विभोर हूँ... और मीठे बाबा से कह रही हूँ कि... बाबा आपने जीवन को ज्ञान रत्नों से सजाकर कितना मीठा, प्यारा और अनोखा कर दिया है... मै आत्मा *आपका असीम प्यार पाकर, इस विश्व धरा पर महाभाग्यवान बन मुस्करा रही हूँ.*..

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा के जीवन को ऊँचे आयामो से सजाते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वरीय यादो में सर्व प्राप्तियों से भरपूर होकर, सदा उन्नति की ओर अग्रसर हो जाओ.*.. उतरने चढ़ने के खेल में... सदा के अधिकार को न गंवाओ... साक्षी व् साथी पन की स्म्रति से... फूल पास होने वाले महा भाग्यवान बन जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा महान जीवन के गुर सीखकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा आपकी प्यारी यादो में सदा उन्नति को पा रही हूँ... *शक्तियो की मालिक बनकर, सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न बन कर सुखो में मुस्करा रही हूँ.*.. व्यर्थ को समाप्त कर सदा समर्थ चिंतन में खोयी हुई हूँ...

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को चढ़ती कला में जाने के राज समझाते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे... *अपने जीवन की कहानी को विशेषताओ से सम्पन्न बनाकर... इतना खुबसूरत बनाओ कि हर दिल प्रेरणा को प्राप्त करे.*.. व्यर्थ से परे होकर, फुल स्टॉप लगाकर... सदा उन्नति की राहो पर बढ़ते चलो... विशेषताओ के मोती चुगने वाले होलिहंस बन मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के ज्ञान धन से सम्पन्न बनकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... स्वयं को मात्र देह समझ कर उतरती कला में चलती चली जा रही थी... अंधेरो में भटक रही थी... *कि आपने अपना हाथ देकर, मेरा भाग्य जगा दिया, और मुझे चढ़ती कला में जाने का सारा राज समझा दिया..*. मै आत्मा सदा आपकी उपकारी हूँ बाबा..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को उन्नति से सजे श्रेष्ठ जीवन को समझाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... *जीवन के सार को जीवन में लाकर, वरदानी मूर्त बन मुस्कराओ.*.. अपनी श्रेष्ठ स्थिति से सबको निर्विघ्न बनाने का सहयोग देकर....मीठे बापदादा के स्नेह का रिटर्न देने वाले... बाप समान और सम्पन्न बन जाओ... अनुभवी मूर्त बन सबको अनुभूतियों में लाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की असीम दौलत को पाकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... अपनी गोद में बिठाकर, अपनी मीठी पालना देकर, आपने मुझे कितना प्यारा और श्रेष्ठ बना दिया है... *मूल्यों को जीने वाली मै आत्मा वरदानी मूर्त बनकर विश्व धरा पर मुस्करा रही हूँ.*.. और अपनी चलन से ईश्वरीय अदा दिखा रही हूँ..."मीठे बाबा से सारे खजाने अपनी झोली में भरकर मै आत्मा साकार सृष्टि में लौट आयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पास विद ऑनर होने के लिए एक बाप को याद करना है, किसी भी देहधारी को नही*"

 

 _ ➳  मनमनाभव के महामन्त्र को स्मृति में रखते हुए, देह और देह के सर्व सम्बन्धों से किनारा कर, एक परमात्मा की अव्यभिचारी याद में मैं आत्मा अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूँ। उस एक *अपने परम प्रिय प्रभु की अव्यभिचारी याद में बैठते ही इस देह रूपी पिंजड़े में कैद मैं आत्मा रूपी पँछी इस देह के पिंजड़े के हर बंधन को तोड़ उड़ चलती हूँ अपने उस परमप्रिय प्रभु, अपने स्वामी, शिव पिता परमात्मा के पास जिनके साथ मेरा जन्म - जन्म का अनादि सम्बन्ध है*। अपने सच्चे शिव प्रीतम की याद मुझे उनसे मिलने के लिए बेचैन कर रही है इसलिए ज्ञान और योग के पंख लगाए मैं आत्मा पँछी और भी तीव्र उड़ान भरते हुए पहुंच जाती हूँ अपने प्रभु के धाम, शांति धाम, निर्वाणधाम में।

 

 _ ➳  अपने शिव प्रभु को अपने सामने पा कर बिना कोई विलम्ब किये मैं पहुंच जाती हूँ उनके पास और उनकी किरणों रूपी बाहों में समा जाती हूँ। *जन्म जन्मान्तर से अपने शिव पिता परमेश्वर से बिछुड़ी मैं आत्मा अपने शिव प्रभु की किरणों रूपी बाहों में अतीन्द्रिय सुख की गहन अनुभूति में मैं इतना खो जाती हूँ कि देह और देह की दुनिया संकल्प मात्र भी याद नही रहती*। केवल मैं और मेरे प्रभु, दूसरा कोई नही। प्रेम के सागर अपने परम प्रिय मीठे बाबा के अति प्यारे, अति सुन्दर, चित को चैन देने वाले अनुपम स्वरूप को निहारते - निहारते मैं डूब जाती हूँ उनके प्रेम की गहराई में और उनके सच्चे निस्वार्थ रूहानी प्रेम से स्वयं को भरपूर करने लगती हूँ।

 

 _ ➳  मेरे शिव प्रीतम का प्यार उनकी सर्वशक्तियों की किरणों के रूप में निरन्तर मुझ पर बरस रहा है। *उनसे आ रही सर्वशक्तियों रूपी किरणों की मीठी फुहारें मन को रोमांचित कर रही हैं, तृप्त कर रही हैं और साथ ही साथ रावण की जेल में कैद होने के कारण निर्बल हो चुकी मुझ आत्मा को बलशाली बना रही हैं*। अपने शिव प्रभु की सर्व शक्तियों से स्वयं को भरपूर करके, उनके प्यार को अपनी छत्रछाया बना कर अब मैं वापिस देह और देह की दुनिया की में लौट रही हूं। किन्तु *अब मेरे शिव प्रभु का प्यार मेरे लिए ढाल बन चुका है* जो मुझे इस आसुरी दुनिया मे रहते हुए भी आसुरी सम्बन्धों के लगाव से मुक्त कर रहा है।

 

 _ ➳  देह और देह की दुनिया मे रहते हुए भी अब इस दुनिया से मेरा कोई ममत्व नही रहा। यह तन - मन - धन मेरा नही, मेरे बाबा का है, यह सम्बन्धी भी मेरे नही, बाबा ने मुझे इनकी सेवा अर्थ निमित बनाया हैं। *इस स्मृति में रहने से मैं और मेरे से अटैचमेन्ट समाप्त हो गई है। प्रवृति को ट्रस्टी बन कर सम्भालने से अब मैं स्वयं को हर बन्धन से मुक्त, न्यारा और प्यारा अनुभव कर रही हूं*। परमात्म प्रीत से मेरे सभी लौकिक सम्बन्ध भी अलौकिक बन गए हैं इसलिए देह और दैहिक सम्बन्धो में होने वाला लगाव, झुकाव और टकराव अब समाप्त हो गया है।

 

 _ ➳  साक्षी भाव से हर आत्मा के पार्ट को अब मैं साक्षी हो कर देख रही हूं और हर कर्म साक्षी पन की सीट पर सेट हो कर करने से सदा बाप के साथीपन का अनुभव कर रही हूं। *देह और देह के सम्बन्धो के प्रति साक्षीभाव मुझे इस पुरानी दुनिया से स्वत: ही उपराम बना रहा है*। दैहिक दृष्टि और वृति परिवर्तित हो कर रूहानी बन गई है। इसलिए अब सदैव यही अनुभव होता है कि मैं इस देह में मेहमान हूँ। *मैं रूह हूँ और मुझ रूह का करन करावनहार सुप्रीम रूह है। वह चला रहे हैं, मैं चल रही हूं। सदा मैं रूह और सुप्रीम रूह कम्बाइंड हैं*। निरन्तर इस स्मृति में रहने से किसी भी देहधारी के नाम रूप की अब मुझे याद नही आती। केवल अपने शिव प्रभु की अव्यभिचारी याद में रह, मैं उनके ही प्रेम का रसपान करते हुए सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलती रहती हूं।*"

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अतीन्द्रिय सुखमय स्थिति द्वारा अनेक आत्माओं का आव्हान करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हर एक की विशेषता को सदैव स्मृति में रखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा फेथफुल हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव संगठन को एकमत बनाती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  देवता बनने वाले माना देने वाले। लेवता नहीं देवता... कितने बार देवता बने हो, अनेक बार बने हो ना... तो देवता अर्थात् देने के संस्कार वाले... *कोई कुछ भी दे लेकिन आप सुख की अंचली, शान्ति की अंचली, प्रेम की अंचली दो*... लोगों के पास है ही दुःख अशान्ति तो क्या देंगे वो ही देंगे ना... और आपके पास क्या है - सुख-शान्ति... सब ठीक है ना! अच्छा...

 

✺   *ड्रिल :-  "देवता बन सुख-शान्ति की अंचली देने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अपने देवता स्वरूप को स्मृति में लाते ही दाता पन के संस्कार स्वत: ही इमर्ज होने लगते हैं और *अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप को धारण कर मैं फ़रिशता चल पड़ता हूँ विश्व की उन सभी दुखी और अशांत आत्माओं को सुख शांति की अनुभूति करवाने जो पल भर की सुख शांति पाने के लिए दर - दर भटक रहे हैं, भक्ति मार्ग के अनेक कर्मकांडो में फंस कर स्वयं को कष्ट दे रहें हैं*... लम्बी - लम्बी पैदल यात्रायें करके मंदिरों, तीर्थो पर जा रहें हैं... किन्तु सुख, शांति की अंचली मात्र से भी कोसों दूर हैं...

 

 _ ➳  सुख, शांति की तलाश में भटक रही इन आत्माओं के बारे में विचार करते ही मुझे अनुभव होता है जैसे ये सभी तड़पती हुई आत्मायें मेरे ही भक्त हैं और सुख, शांति की अंचली पाने के लिए मुझे पुकार रहें हैं... अपने भक्तों के रोने -चिल्लाने की करुण आवाजें अब मेरे कानों में स्पष्ट सुनाई दे रही हैं... *अपने भक्तों की करुणामयी, दुखदाई पुकार को सुन कर अब मैं फ़रिशता अपने देवता स्वरूप को धारण करता हूँ और अपने भक्तों को सुख, शांति की अंचली देने मंदिर की ओर चल पड़ता हूँ*...

 

 _ ➳  मन्दिर के बाहर पहुंच कर अब मैं मन्दिर के अंदर का दृश्य देख रहा हूँ... मन्दिर में प्रतिस्थापित मेरे जड़ चित्रों के सामने खड़े भक्तों को मैं देख रहा हूँ... उनके चेहरों पर पड़ी दुख की रेखाएं मुझे स्पष्ट दिख रही हैं ... दोनों हाथ जोड़ कर सुख, शांति की भीख मांग रहें हैं... *विनाशी साधनों में सुख शांति समझने के कारण उन साधनों को पाने के लिये लम्बी - लम्बी अरदासें कर रहें हैं*... अपने भक्तों की यह दुर्दशा देख, रहम दिल बन अब मैं अपनी उस जड़ मूर्ति में प्रवेश करता हूँ... और अपने शिव पिता परमात्मा का आह्वान करता हूँ...

 

 _ ➳  पलक झपकते ही मैं अपने बिल्कुल ऊपर अपने पिता परमात्मा शिव बाबा की छत्रछाया को अपने ऊपर अनुभव करता हूँ... *बाबा से निकल रही सुख, शांति की शक्तिशाली किरणे सीधी मेरे ऊपर पड़ रही हैं और मेरे देव स्वरूप से निकल कर अब धीरे - धीरे पूरे मन्दिर में फैल रही हैं*... मेरे वरदानी हस्तों से सुख, शांति के पुष्पों की वर्षा हो रही हैं... सुख शांति के ये पुष्प भक्तों की झोली में गिर रहें हैं और उन्हें पल भर के लिए गहन सुख, शांति की अनुभूति करवा रहें हैं... सुख, शांति की अंचली पाने की उनकी आश जैसे पूरी हो रही है...

 

 _ ➳  सुख शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन धीरे - धीरे पूरे मन्दिर में फैल कर मन्दिर से बाहर चारों और फैल रहें हैं और सबको अपनी और आकर्षित कर रहें हैं... दूर दूर से आत्मायें खिंची आ रही हैं और मन्दिर में आ कर सुख, शांति की अनुभूति करके तृप्त हो रही हैं... *पल भर की सुख, शांति पाकर सभी के दुखी चेहरे जैसे खिल उठे हैं... उनकी खोई हुई मुस्कान पुनः लौट आई है*... आंखों में खुशी के आंसू लिए मेरे भक्त मेरी जयजयकार करते हुए अपने घर लौट रहे हैं...

 

 _ ➳  वरदानी मूरत बन, अपने वरदानी हस्तों से अपने भक्तों को सुख शांति की अंचली देकर अब मैं अपने देव स्वरूप से अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट आती हूँ... अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर *अब मैं अपने देवताई स्वरूप को सदा स्मृति में रख, स्वयं को परमात्म शक्तियों से सम्पन्न कर, मास्टर दाता बन, अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को सुख, शांति की अनुभूति करवाती रहती हूँ*...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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