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 15 / 05 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अशांत आत्माओं को शन्ति का दान दिया ?*

 

➢➢ *अमृतवेले से लेकर रात तक सर्व स्मृतियों को सामने लाये ?*

 

➢➢ *स्वयं को बाप समान अनुभव किया ?*

 

➢➢ *नथिंग न्यू का पाठ हर समय सदा स्मृति में रहा ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  सर्व प्राप्ति, सर्व साधन होते हुए भी साधनों में नहीं आओ, साधना में रहो। *साधन होते हुए भी त्याग वृत्ति में रहो तब थोड़े समय में अनेक आत्माओं का भाग्य बना सकेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं राजयुक्त आत्मा हूँ"*

 

  सदा इस ब्रह्मण-जीचन में राजयुक्त, योगयुक्त और युक्तियुक्त तीनों ही विशेषतायें अपने को अनुभव करते हो? *ज्ञान के सब राज बुद्धि में स्पष्ट स्मृति में रहे - इसको कहते हैं 'राजयुक्त' और सदा रचना बाप को याद रखना - इसको कहते हैं 'योगयुक्त'। तो जो ज्ञानी और योगी आत्मा है - उसके हर कर्म स्वत: युक्तियुक्त होते हैं। युक्तियुक्त अर्थात सदा यर्थाथ श्रेष्ठ कर्म।*

 

  कोई भी कर्म रुपी बीज फल के सिवाए नहीं होता। उनके संकल्प भी युक्तियुक्त होंगे। जिस समय जो संकल्प चाहिए वही होगा। ऐसे नहीं - यह सोचना तो नहीं चाहिए था लेकिन सोच चलता ही रहा। इसे युक्तियुक्त नहीं कहेंगे। *जो युक्तियुक्त होगा वह जिस समय जो संकल्प, वाणी या कर्म चाहे - वह कर सकेगा। ऐसे नहीं - यह करना नहीं चाहता था, हो गया। तो जो राजयुक्त, योगयुक्त होगा उसकी निशानी वह 'युक्तियुक्त' होगा।* तो वह निशानी सदा दिखाई देती है?

 

  *अगर कभी-कभी दिखाई देती तो राज्य-भाग्य भी कभी-कभी मिल जायेगा, सदा नहीं मिलेगा। लेने में तो कहते हो- सदा चाहिए और करने में कभी-कभी। ऐसे नहीं करना। अभी परिवर्तन करके जाओ। कभी-कभी की लाइन में, सदा वाली लाइन में आ जाओ।* जब जान लिया अनुभव कर लिया कि अच्छे-अच्छी बीज है तो अच्छी बीज को छोड़ कोई घटिया चीज क्यों लेंगे। तो अविनाशी खान पर आकर लेने में कमी नहीं करना। लेना है तो पूरा लेना है। दाता के भण्डारे भरपूर हैं, जितना भी लो अखुट है। तो अखुट खजाने में मालिक बनो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जिसका अपनी आवश्यक और समीप की चेतन शक्तियों, संकल्पों और बुद्धि अथवा मन और बुद्धि पर कन्ट्रोल नहीं, अधिकार नहीं या विजय नहीं तो क्या, विश्व के अधिकारी व विजयी रत्न बन सकता है? *जिस राज्य के मुख्य अधिकारी अपने अधिकार में न हो, क्या वह राज्य अटल, अखण्ड और निर्विघ्न चल सकता है?* यह मन और बुद्धि आप आत्मा की समीप शक्तियाँ व मुख्य राज्य अधिकारी हैं, यदि वह भी वश में नहीं, तो ऐसे को क्या कहा जायेगा? महान विजयी या महान कमजोर?

 

✧   *तो अपने आपको देखे कि क्या मेरे मुख्य राज्य - अधिकारी, मेरे अधिकार में हैं?* अगर नहीं, तो विश्वराज्य अधिकारी अथवा राजन कैसे बनेंगे? अपने ही छोटो- छोटे कार्यकर्ता अपने को धोखा दें, तो क्या ऐसे को महावीर कहा जायेगा? चैलेन्ज तो करते हो, कि हम लाँ और आँर्डर सम्पन्न राज्य स्थापित कर रहे हैं?

 

✧  तो चैलेन्ज करने वाले के यह छोटे - छोटे कार्यकर्ता अर्थात कर्मेन्द्रियाँ अपने ही लाँ और आँर्डर में नहीं और वे स्वयं ही कार्यकर्ता के वशीभूत हो तो क्या ऐसे वे विश्व में लाँ और आँर्डर स्थापित कर सकते हें? हर कर्मेन्द्रियाँ कहाँ तक अपने अधिकार में हैं? यह चेक करो और अभी से विजयी - पन के संस्कार धारण करो। *बापदादा का नाम बाला करने वाले ही बाप समान सम्पन्न होते हैं।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जितना लास्ट स्टेज अथवा कर्मातीत स्टेज समीप आती जायेगी उतना आवाज से परे शान्त स्वरूप की स्थिति अधिक प्रिय लगेगी इस स्थिति में सदा अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति हो। इसी अतीन्द्रिय सुखमय स्थिति द्वारा अनेक आत्माओं का सहज ही आहवान कर सकेंगे। यह पावरफुल स्थिति 'विश्व-कल्याणकारी स्थिति' कही जाती है।* जैसे आजकल साइन्स के साधनों द्वारा सब चीजें समीप अनुभव होती जाती हैं - दूर की आवाज टेलीफोन के साधन द्वारा समीप सुनने में आती है, टी.वी. द्वारा दूर का दृश्य समीप दिखाई देता है, ऐसे ही साइलेन्स की स्टेज द्वारा कितने भी दूर रहती हुई आत्मा को सन्देश पहुँचा सकते हो? *वो ऐसे अनुभव करेंगे जैसे साकार में सम्मुख किसी ने सन्देश दिया है। दूर बैठे हुए भी आप श्रेष्ठ आत्माओं के दर्शन और प्रभु के चरित्रों के दृश्य ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि सम्मुख देख रहे हैं। संकल्प के द्वारा दिखाई देगा अर्थात् आवाज से परे संकल्प की सिद्धि का पार्ट बजायेंगे। लेकिन इस सिद्धि की विधि ज्यादा-से-ज्यादा अपने शान्त स्वरूप में स्थित होना है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सर्व स्मृतियों से संपन्न बन सर्व को सहयोग देना"*

 

_ ➳  मै आत्मा तपस्या धाम में बेठी हुई... अपने मीठे बाबा से असीम वरदानों को ले रही हूँ... और अपने सुंदर सजीले भाग्य को निहारते हुए सोच रही हूँ... *आज बाबा के हाथो में फूल बनकर खिल गयी हूँ... हर दिल को खुशबु से सुवासित कर, ईश्वरीय दौलत से भर रही हूँ..*. कभी देह भान ने, मुझे आत्मा को कितना संकीर्ण और तंगदिल बना दिया था... आज भगवान से मिलकर, सागर सा दिल लिए घूम रही हूँ... और सदा खुशियो की टोकरी हाथो में लिए... *हर दिल पर दिलेरी से खुशियां बाँट रही हूँ.*.. मीठे बाबा ने मुझे किस कदर दरिया दिल बनाकर मेरा यूँ कायाकल्प किया है... रोम रोम से मीठे बाबा को धन्यवाद कर मै आत्मा... प्यारे बाबा के प्यार में खो जाती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को विश्व कल्याणकारी की भावना से भरते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... कितने महान भाग्यशाली हो कि पूरे विष की नजरो में हो... तो सदा स्वयं में शक्तियो का स्टॉक भरपूर करो... और दाता के बच्चे बनकर सर्व को सहयोग दो... *सदा शुभ भावना और समर्थ संकल्पों से भरपूर रहकर, सबके दिलो को सच्ची खुशियो से भर दो.*.. गुणो और शक्तियो से सम्पन्न बनकर सच्चे सेवाधारी बनो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के असीम प्यार को पाकर खुशियो में नाचते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... आपने मुझ आत्मा का भाग्य कितना सुंदर बना दिया है... *सबके लिए प्रेम शुभ भावना सिखाकर, मुझे कितना सुखदायीं बना दिया है.*.. मै आत्मा हर आत्मा में विशेषता के मोती देखने वाली आपके प्यार में होलिहंस बनकर मुस्करा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को ईश्वरीय प्राप्तियों का नशा दिलाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *खुशियो के और प्राप्तियों के झूले में सदा झूलने वाले, खुशनसीब हो... इस नशे सदा डूबे रहो..*.निष्काम सेवाधारी बनकर निरन्तर ईश्वरीय पथ पर बढे चलो... सच्चे सेवा भावना से ओतप्रोत होकर, प्राप्तियों का प्रत्क्षय फल खाने वाले... खुशियो में सदा खिलते रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की अमूल्य शिक्षाओ को पाकर, गुणो और शक्तियो से सजकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... *आपकी फूलो सी गोंद में आकर,मुझ आत्मा का जीवन, गुणो की सुगन्ध से भर गया है.*..मै आत्मा अपने सत्य स्वरूप में स्थित होकर... विश्व कल्याण की भावना दिल में लिए... सारे विश्व को आत्मिक मूल्यों से सजा रही हूँ..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को मेरे महान भाग्य का नशा दिलाते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता से मिली सर्व प्राप्तियों के नशे में रहकर... सदा सन्तुष्टमणि आत्मा बनो... सदा स्वयं को और वायुमण्डल को सेफ रखने वाले... सच्चे सेवाधारी बनकर... ईश्वर पिता के दिलतख्त पर मुस्कराओ...  *सदा निमित्त और निर्माण बनकर, डबल कमाई से मालामाल बनो.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की ईश्वरीय दौलत से अमीर बनते हुए कहती हूँ :-* "प्यारे बाबा मै आत्मा देह के भान में कितनी तंगदिल थी... और *आज आपने आज अपनी बाँहों में लेकर... मुझे कितने विशाल ह्रदय से सजा दिया है.*..मै आत्मा सबके जीवन को खुशियो की बहारो से सजा रही हूँ... ईश्वरीय गुणो को पूरे विश्व पर छलका रही हूँ..."मीठे बाबा से मीठी रुह रिहान कर... मै आत्मा कर्मक्षेत्र पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अशांत आत्माओ को शांति का दान देना*"

 

 _ ➳  "विश्व की सर्व आत्मायें शांति की तलाश में भटक रही है, उन तड़पती हुई आत्माओं को शांति की अनुभूति करवाओ" अपने शिव पिता परमात्मा के इस फरमान का पालन करने के लिए, अपनी शांत स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर मैं शांति के सागर अपने शिव पिता परमात्मा की याद में बैठ जाती हूँ। *अशरीरी स्थिति में स्थित होते ही मैं स्वयं को शान्तिधाम में शांति के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के सन्मुख पाती हूँ जो शांति की अनन्त शक्तियों से मुझे भरपूर कर रहें हैं*। अपने शिव पिता से आ रही शांति की शक्तिशाली किरणों को स्वयं में समा कर मैं जैसे शांति का पुंज बनती जा रही हूं।

 

 _ ➳  शांति की असीम शक्ति का स्टॉक अपने अंदर जमा करके अब मैं परमधाम से नीचे आ कर विश्व की उन सर्व आत्माओं को शांति की अनुभूति करवाने चल पड़ती हूँ जो पल भर की शांति की तलाश में भटक रही हैं। *सूक्ष्म लोक में पहुंच कर अपना लाइट का फ़रिशता स्वरूप धारण कर, शांति दूत बन बापदादा के साथ कम्बाइंड हो कर अब मैं विश्व ग्लोब पर आ कर बैठ जाता हूँ*। मैं देख रहा हूँ बापदादा से अविरल शांति की धाराएं निकल रही हैं जो निरन्तर मुझ फ़रिश्ते में समा रही है। शांति की इन धाराओं को मैं फ़रिशता अब विश्व ग्लोब के ऊपर प्रवाहित कर रहा हूँ। *शांति की इन धाराओं के विश्व ग्लोब पर पड़ते ही शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन पूरे विश्व मे फैल रहें हैं*।

 

 _ ➳  जैसे - जैसे ये वायब्रेशन वायुमण्डल में फैल रहें हैं वैसे - वैसे वायुमण्डल में एक दिव्यता छाने लगी है। *जैसे सुबह की ताजी हवा शरीर को सुखद अहसास करवाती है वैसे ही वायुमण्डल में फैले ये शांति के वायब्रेशन आत्माओं को एक अद्भुत सुख का अनुभव करवा रहें हैं*। उनके अशांत मन शांति का अनुभव करके तृप्त हो रहे हैं। सबके चेहरे पर एक सकून दिखाई दे रहा है। *जन्म जन्मान्तर से शांति की एक बूंद की प्यासी आत्माओं की प्यास बुझ रही है*। शांति के सागर शिव पिता से आ रही शांति की किरणों का प्रवाह और भी तीव्र होता जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे शांति की शक्ति की किरणों की बरसात हो रही है।

 

 _ ➳  *जैसे चात्रक पक्षी अपनी प्यास बुझाने के लिए स्वांति की एक बूंद पाने की इच्छा से व्याकुल निगाहों के साथ निरन्तर आकाश की ओर देखता रहता है*। इसी प्रकार शांति की तलाश में भटकती और तड़पती हुई आत्मायें भी शांति की एक बूंद पाने की इच्छा से व्याकुल निगाहों से ऊपर देख रही है और शांति की किरणों की बरसात में नहा कर जैसे असीम शांति का अनुभव करके प्रसन्न हो रही हैं। *विश्व की सर्व आत्माओं को शांति की अनुभूति करवाकर अब मैं फ़रिशता बापदादा के साथ फिर से सूक्ष्म लोक में पहुंचता हूँ*। अपनी फ़रिशता ड्रेस को उतार कर अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं आत्मा अपने शांत स्वरूप में स्थित हो कर वापिस साकारी दुनिया मे अपने साकारी शरीर मे प्रवेश करती हूं।

 

 _ ➳  साकारी दुनिया मे आ कर अब मैं आत्मा अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर, निरन्तर अपने शांत स्वधर्म में रहकर शांति के वायब्रेशन चारों ओर फैला रही हूँ। सर्व आत्माओ को शांति के सागर बाप का परिचय दे कर, उन्हें भी अपने शांत स्वधर्म में स्थित हो कर शांति पाने का सहज उपाय बता रही हूं। *स्वयं को शांति के सागर अपने शिव पिता के साथ सदा कम्बाइंड अनुभव करने से मेरे सम्पर्क में आने वाली परेशान आत्मायें डेड साइलेन्स की अनुभूति करके सहज ही अपनी सर्व परेशानियों से मुक्त हो रही हैं*। "विश्व की सर्व आत्माओं को शांति का अनुभव कराना" यही मेरा कर्तव्य है। इस बात को सदा स्मृति में रख अब मैं इसी ईश्वरीय सेवा में निरन्तर लगी रहती हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सर्व ख़ज़ानों से सम्पन्न बनने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं हर सेवा में बिजी रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा ज्ञान और योग की नेचर बना लेती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा हर कर्म को नेचरल श्रेष्ठ और युक्तियुक्त बना लेती हूँ  ।*

   *मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ ऐसे जानने वाले से अवगुण को न जानने वाले बहुत अच्छे हैं। ब्राह्मण परिवार में आपस में ऐसी आत्माओं को हँसी में बुद्धू' समझ लेते हैं। आपस में कहते हो ना कि तुम तो बुद्धू हो। कुछ जानते नहीं हो। लेकिन इस बात में बुद्धू बनना अच्छा है। *न अवगुण देखेंगे न धारण करेंगे, न वाणी द्वारा वर्णन कर परचिन्तन करने की लिस्ट में आयेंगे। अवगुण तो किचड़ा है ना। अगर देखते भी हो तो मास्टर ज्ञान सूर्य बन किचड़े को जलाने की शक्ति है, तो शुभ-चिन्तक बनो। बुद्धि में जरा भी किचड़ा होगा तो शुद्ध बाप की याद टिक नहीं सकेगी।* प्राप्ति कर नहीं सकेंगे। गन्दगी को धारण करने की एक बार अगर आदत डाल दी तो बार-बार बुद्धि गन्दगी की तरफ न चाहते भी जाती रहेगी। और रिजल्ट क्या होगी? वह नैचुरल संस्कार बन जायेंगे। फिर उन संस्कारों को परिवर्तन करने में मेहनत और समय लग जाता है। दूसरे का अवगुण वर्णन करना अर्थात् स्वयं भी परचिन्तन के अवगुण के वशीभूत होना है। लेकिन यह समझते नहीं हो - दूसरे की कमज़ोरी वर्णन करना, अपने समाने की शक्ति की कमज़ोरी जाहिर करना है। किसी भी आत्मा को सदा गुणमूर्त से देखो।

✺ *"ड्रिल :- दूसरे के अवगुण का वर्णन कर स्वयं परचिन्तन के अवगुण के वशीभूत न होना*"

➳ _ ➳ *इस भीड़ भरी दुनिया में अकेले बैठी हुई मुझ आत्मा को अपने साजन से मिलन मनाने की इच्छा जाग्रत होती है...* मैं आत्मा अपने मन उपवन में अपने साजन से मिलन मनाने साजन को निमंत्रण भेजती हूँ... मैं आत्मा साजन के आने की तैयारियां करती हूँ... मेरे मन उपवन में देखती हूँ अवगुण रूपी काँटों की झाड़ियाँ भरी हुई है... किचड़ा भरा हुआ है... मैं आत्मा कई जन्मों से परचिन्तन कर, दूसरों के अवगुणों का वाणी द्वारा वर्णन कर गन्दगी को धारण करने की आदत डाल ली थी... इसको अपना नैचुरल संस्कार बना ली थी... और परचिन्तन के अवगुण के वशीभूत हो गई थी...

➳ _ ➳ मेरे उपवन में अपने साजन को बिठाने का, मिलन मनाने का जगह ही नहीं है... *मेरा साजन जो कि परम पवित्र है, गुणों का सागर है, जिसकी महिमा अपरम्पार है, उसको इस गन्दगी में नहीं बिठा सकती...* मैं आत्मा तुरंत ज्ञान सूर्य बाबा का आह्वान करती हूँ... ज्ञान सूर्य से निकलती ज्वाला रूपी किरणें मुझ पर पड़ रही हैं... ज्ञान सूर्य की किरणों से सारा किचड़ा भस्म हो रहा है... अवगुण रूपी काँटों की झाड़ियाँ योग अग्नि में जलकर भस्म हो रही हैं... सारी गंदगी समाप्त हो रही है...

➳ _ ➳ मैं आत्मा गुण, शक्तियों को धारण कर रही हूँ... मैं आत्मा मास्टर ज्ञान सूर्य बन किचड़े को जलाने की शक्ति को ग्रहण कर रही हूँ... अब मैं आत्मा न अवगुण देखती हूँ, न धारण करती हूँ... मैं आत्मा समाने की शक्ति को धारण कर सबके अवगुणों को समा लेती हूँ... बिल्कुल भी वर्णन नहीं करती... *अब मैं आत्मा दूसरे के अवगुण का वर्णन कर स्वयं परचिन्तन के अवगुण के वशीभूत नहीं होती हूँ...* मैं आत्मा दिव्य गुणधारी बन सबके गुणों को ही देखती हूँ...

➳ _ ➳ अब मैं आत्मा अपने मन उपवन को, अपने साजन को सदा के लिए बिठाने लायक बना दी हूँ... अब मुझ आत्मा का मन उपवन मधुबन बन गया है... *मैं आत्मा अपने मन मधुबन को रंग-बिरंगी गुण-शक्तियों की फूल मालाओं से सजा रही हूँ... अब मेरा मन मधुबन ज्ञान-योग की रूहानी खुशबू से भर गया है...* मैं आत्मा रूहे गुलाब बन अपने दिलरुबा साजन को बुलाती हूँ... दिलाराम बाबा के आते ही उनकी बाँहों में समा जाती हूँ... अपने साजन के हाथों में हाथ डाल अपने मन मधुबन में सैर करती हूँ... उनकी यादों में खो जाती हूँ...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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