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 15 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कोई कुछ बोले तो सुना अनसुना किया ?*

 

➢➢ *सुखदाई बन सबको सुख दिया ?*

 

➢➢ *शुद्ध संकल्प के व्रत द्वारा वृत्ति का परिवर्तन किया ?*

 

➢➢ *सर्वशक्तियों को साथी बन निर्विघन सफलता प्राप्त की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *विश्व कल्याण करने के लिए आपकी वृत्ति, दृष्टि और स्थिति सदा बेहद की हो।* वृत्ति में जरा भी किसी आत्मा के प्रति निगेटिव या व्यर्थ भावना नहीं हो। *निगेटिव बात को परिवर्तन कराना, वह अलग चीज़ है। लेकिन जो स्वयं निगेटिव वृत्ति वाला होगा वह दूसरे के निगेटिव को पॉजेटिव में चेंज नहीं कर सकता।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कल्प-कल्प की विजयी आत्मा हूँ"*

 

  माया को जीत लिया है? मायाजीत बन गये हो? कि अभी विजयी बनना है? माया का काम है खेल करना और आपका काम है खेल देखना। खेल में घबराना नहीं। घबराते हैं तो वह समझ जाती है कि ये घबरा तो गये हैं, अब लगाओ इसको अच्छी तरह से। *माया भी तो जानने में होशियार है ना। कुछ भी हो जाये, घबराना नहीं। विजय हुई ही पड़ी है। इसको कहा जाता है सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि।*

 

  पता नहीं क्या होगा, हार तो नहीं जाऊंगा, विजय होगी वा नहीं -ये नहीं। सदैव यह नशा रखो कि पाण्डव सेना की विजय नहीं होगी तो किसकी होगी! कौरवों की होगी क्या? तो आप कौन हो? पाण्डवों की विजय तो निश्चित है ना। कोई भी बड़ी बात को छोटा बनाना या छोटी बात को बड़ी बनाना अपने हाथ में है। किसका स्वभाव होता है छोटी बात को बड़ा बनाने का और किसका स्वभाव होता है बड़ी बात को छोटा बनाने का। *तो माया की कितनी भी बड़ी बात सामने आ जाये लेकिन आप उससे भी बड़े बन जाओ तो वह छोटी हो जायेगी। आप नीचे आ जायेंगे तो वह बड़ी दिखाई देगी और ऊपर चले जायेंगे तो छोटी दिखाई देगी।*

 

  *कितनी भी बड़ी परिस्थिति आये, आप ऊंची स्व-स्थिति में स्थित हो जाओ तो परिस्थिति छोटी-सी बात लगेगी और छोटी-सी बात पर विजय प्राप्त करना सहज हो जायेगा। निश्चय रखो कि अनेक बार के विजयी हैं। अभी कोई इस कल्प में विजयी नहीं बन रहे हैं, अनेक बार विजयी बने हैं।* इसलिए कोई नई बात नहीं है, पुरानी बात है। लेकिन उस समय याद आये। ऐसे नहीं-टाइम बीत जाये, पीछे याद आये कि ये तो छोटी बात है, मैंने बड़ी क्यों बना दी। समय पर याद आवे की मैं कल्प-कल्प का विजयी हूँ।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *ये तो बाप-दादा ने सेवा के लिए समय दिया है।* सेवाधारी का पार्ट बजा रहे हो। तो अपने को देखो *यह शरीर का बन्धन तो नहीं है* अथवा यह पुराना चोला टाइट तो नहीं है

 

✧  टाइट ड्रेस तो पसन्द नहीं करते हो ना? ड्रेस टाइट होगी तो एवररेडी नहीं होंगे। *बन्धन मुक्त अर्थात लूज ड्रेस, टाइट नहीं।*

 

✧  आर्डर मिला और सेकण्ड में गया। ऐसे बन्धन-मुक्त, योग-युक्त बने हो? *जब वायदा ही है एक बाप दूसरा न कोई तो बन्धन मुक्त हो गये ना।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ लौकिक में जब वृद्धि होती है तो एक-एक बिन्दी लगाते जाते हैं। आपको भी बिन्दी लगाना है। मैं भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी। *बड़े ते बड़े व्यापारी हो लेकिन लगाना है बिन्दी। सारे दिन में कितनी बिन्दी लगाते हो? जब क्वेश्चन होता है तो बिन्दी मिट जाती है। बिन्दी के बिना क्वेचन भी हल नहीं होता।* मैं भी बिन्दी, बाबा भी बिन्दी। इसके लिए यह भी कोई नहीं कह सकता कि समय नहीं है। *सेकण्ड की बात है।* तो जितने सेकण्ड मिलें बिन्दी लगाओ फिर रात को गिनो कितनी बिन्दी लगाई! *किसी बात को सोचो नहीं, जो बात ज्यादा सोचते हो वो ज्यादा बढ़ती है। सब सोच छोड़ एक बाप को याद करो, यही दुआ हो जायेगी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  सच्चा-सच्चा वैष्णव बनना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा की यादो ने इस कदर मुझे दीवाना कर दिया... की मै आत्मा बाबा से मिलन करने के लिए उड़ चली... और मीठे बाबा और मै आत्मा बाँहों में बाहें डालकर... शांति स्तम्भ के चारो ओर घूमने लगे... *कभी बाबा मुझे मुझे निहारे और मुस्कराये... कभी मै आत्मा बाबा से लिपट जाऊँ.*.. ऐसे ही बाँहों में बाहें डाले बाबा और मै आत्मा रुहरिहानं करने लगे..."

 

   *मीठे प्यारे बाबा मुझ आत्मा पर अपने ज्ञान रत्नों की दौलत लुटाते हुए मालामाल करते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वर को पाकर श्रीमत को अपनाकर सच्चा सच्चा वैष्णव बनना है,.. भगवान के बिना जो विकारो भरा जीवन आज तक जीते आये हो... अब उसका सम्पूर्ण त्याग करना है... *देवता कुल में आने के लिए गुणवान फूल बनना है.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान अमृत को अंतर्मन में पीकर बोली :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे...आप जीवन में न थे तो जीवन विकारो की दुर्गन्ध से भर गया था... आपने आकर मुझे फूलो सा सुवासित किया है... मात्र देह समझकर ही जीती जा रही थी... *आपने मुझे देवताओ सा खुबसूरत लक्ष्य देकर  भाग्यवान बना दिया है..*."

 

   *मीठे मीठे बाबा मेरे सिर पर वरदानी हाथो का स्पर्श देते हुए कहने लगे :-* "श्रीमत को दिल से अपनाकर... देवताओ सा सजधज कर... *सतयुगी सुखो की धरती पर अपना आशियाना पा लो..*. श्रीमत पर देवताओ सी चाल चलन धारण कर... देवताई गुणो से भरपूर हो जाओ... और सच्ची खुशियो में सदा की मुस्कान से खिल जाओ..."

 

_ ➳  *मीठे बाबा को मेरे सुखो की खातिर... यूँ धरती पर आता देख... और सारे संकल्प मेरे उज्ज्वल भविष्य के खतिर लुटाते देख... मै आत्मा रोम रोम से ऋणी हो गयी और बोली :-* "मीठे बाबा देह और धरती के रिश्तो ने मुझे सदा ही ठगा... और आपने आकर मेरे बिखरे जीवन को देवताई सांचे में ढाल दिया है... *सच्चे प्यार की यही तो बयानगी है न मीठे बाबा... कि आपकी चाहत मेरा सदा का सुख है.*.."

 

   *मीठे प्यारे बाबा अपनी नजरो में बेपनाह मुहोब्बत लिये... मेरे जज्बातों पर मुस्करा उठे और कहने लगे :-* "मीठे लाडले बच्चे... सच्चे प्यार को पाकर, श्रीमत की खुबसूरत राहो पर चलकर. सच्चे सौंदर्य से दमक जाओ... और स्वर्ग के सच्चे सुखो के हकदार हो मुस्कराओ... विकारी जीवन से मुक्त होकर, *सच्चे वैष्णव बन विष्णुकुल में आने का खुबसूरत भाग्य पा जाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा को अपना धाम छोड़कर... मुझ आत्मा के सुख के पीछे यूँ... दीवानो सा खपते देख कर बोली :-* "लाडले प्यारे बाबा मेरे... आपने अथाह ज्ञान रत्नों को मुझ आत्मा पर लुटाकर... मुझे बेहद का समझदार बना दिया है... ज्ञान के तीसरे नेत्र को देकर त्रिनेत्री बना दिया है... इस नेत्र से मै आत्मा अपने *खुबसूरत देवताई भाग्य विष्णुकुल को देख देखकर पुलकित हो रही हूँ..*.ऐसी मीठी रुहरिहानं से तृप्त होकर... मै आत्मा स्थूल जगत में आ गयी..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सुखदाई बन सबको सुख देना है*"

 

_ ➳  अपने सुख सागर मीठे परमपिता परमात्मा शिव बाबा की सुख देने वाली मीठी याद में बैठ, अपने मन बुद्धि को एकाग्र कर, *मैं अपने मन बुद्धि का कनेक्शन अपने सुख दाता निराकार बाप के साथ जैसे ही जोड़ती हूँ, सेकण्ड में बुद्धि की तार जुड़ जाती है परमधाम निवासी मेरे प्यारे अति मीठे सुख सागर शिव बाबा के साथ और परमधाम से सुख की असीम किरणे मुझ आत्मा पर प्रवाहित होने लगती हैं*। ऐसा लग रहा है जैसे सुख का कोई विशाल झरना मुझ आत्मा के ऊपर बह रहा है और मैं असीम सुख से भरपूर होती जा रही हूँ।

 

_ ➳  इस असीम सुख का गहराई से अनुभव करके मैं विचार करती हूँ कि *इस सृष्टि पर रहने वाले सभी मनुष्य मात्र जो स्वयं को और अपने सुखदाता बाप को भूलने के कारण अपरमअपार दुख का अनुभव कर रहें हैं। वो सभी मेरे ही तो आत्मा भाई है। तो अपने उन आत्मा भाइयो को मास्टर सुख दाता बन सुख देना मेरा परम कर्तव्य भी है और यही मेरे सुखदाता बाप का फरमान भी है*। तो अपने बाप के फरमान पर चल सुख दाता के बच्चे मास्टर सुखदाता बन मुझे सबको सुख देना है। ऐसा कोई संकल्प नही करना, मुख से ऐसा कोई बोल नही बोलना और ऐसा कोई कर्म नही करना जो दूसरों को दुख देने के निमित बनें। बाप समान सबको सुख देना ही मेरा परम कर्तव्य है।

 

_ ➳  अपने इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर को मैं आत्मा धारण करती हूँ और सुख का फ़रिश्ता बन सारे विश्व की तड़पती हुई दुखी अशांत आत्माओं को सुख की अनुभूति करवाने चल पड़ती हूँ। *मैं फ़रिश्ता ऊपर की ओर उडते हुए नीचे पृथ्वी लोक के हर दृश्य को देख रहा  हूँ। विकारों की अग्नि में जलने के कारण गहन दुख की अनुभूति करती सर्व आत्माओं को रोते बिलखते, चीखते - चिल्लाते हुए मैं देख रहा हूँ*। इन दुख दाई दृश्यों को देख सुख के सागर अपने शिव पिता का मैं आह्वान करता हूँ और उनके साथ कनेक्शन जोड़ कर उनसे सुख की शक्तिशाली किरणे लेकर सारे विश्व में सुख के शक्तिशाली वायब्रेशन फैलाने लगता हूँ।

 

_ ➳  विकारों की अग्नि में जल रही दुखी अशांत आत्माओं पर सुख की ये शक्तिशाली किरणे शीतल जल बन कर, उन्हें विकारों की तपन से मुक्त कर, शीतलता का अनुभव करवा रही हैं। *विश्व की सभी दुखी अशांत आत्माओं को सुख देकर अब मैं फ़रिश्ता सूक्ष्म लोक में पहुँच कर, बापदादा को सारा समाचार दे कर, उनके साथ अव्यक्त मिलन मना कर, उनसे गुण, शक्तियाँ, वरदान और खजाने लेकर अपनी फ़रिश्ता ड्रेस को सूक्ष्म लोक में ही छोड़ कर, अपने निराकार स्वरुप को धारण कर अब परमधाम की ओर रवाना होती हूँ*।

 

_ ➳  अपने निराकार स्वरूप में, निराकार सुखदाता अपने शिव पिता की सर्व शक्तियों की छत्रछाया के नीचे बैठ उनकी सुख की किरणों से स्वयं को भरपूर कर अब मैं वापिस साकारी दुनिया में अपने साकारी ब्राह्मण तन में आ कर प्रवेश करती हूँ। *"सुखदाता की सन्तान मैं मास्टर सुखदाता हूँ" इस स्वमान की सीट पर सदा सेट रहते हुए, अपने ब्राह्मण स्वरूप में रहते अब मैं अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओं को अपने हर संकल्प, बोल और कर्म से सुख दे रही हूँ*। हर कर्म अपने सुख सागर बाबा की याद में रह कर करते हुए अब मैं इस बात पर पूरा अटेंशन रखती हूँ कि मनसा, वाचा, कर्मणा मुझ से ऐसा कोई कर्म ना हो जो दूसरों को दुख देने के निमित बने।

 

_ ➳  *स्वयं को सदा सुखदाता बाप के साथ कम्बाइंड अनुभव करते मास्टर सुखदाता बन कभी अपने आकारी तो कभी साकारी स्वरूप द्वारा, सबको सुख का अनुभव करवाते अब मैं बाप समान मास्टर दुख हर्ता सुख कर्ता बन सबको दुखों से छुड़ाने और सुखी बनाने का रूहानी धन्धा निरन्तर कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं शुभ संकल्प की व्रतधारी आत्मा हूँ।*

   *मैं वृति का परिवर्तन करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं दिलतख्तनशींन आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सर्वशक्ति सम्पन्न हूँ  ।*

   *मैं आत्मा निर्विघ्न सफलता प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  कर्म बन्धन से मुक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए कर्मयोगी बनो:- सदा हर कर्म करतेकर्म के बन्धनों से न्यारे और बाप के प्यारे - ऐसी न्यारी और प्यारी आत्मायें अपने को अनुभव करते होकर्मयोगी बनकर्म करने वाले कभी भी कर्म के बन्धन में नहीं आते हैंवे सदा बन्धनमुक्त-योगयुक्त होते। *कर्मयोगी कभी अच्छे वा बुरे कर्म करने वाले व्यक्ति के प्रभाव में नहीं आते। ऐसा नहीं कि कोई अच्छा कर्म करने वाला कनेक्शन में आये तो उसकी खुशी में आ जाओ और कोई अच्छा कर्म न करने वाला सम्बन्ध में आये तो गुस्से में आ जाओ - या उसके प्रति ईर्ष्या वा घृणा पैदा हो। यह भी कर्मबन्धन है। कर्मयोगी के आगे कोई कैसा भी आ जाए - स्वयं सदा न्यारा और प्यारा रहेगा।* नॉलेज द्वारा जानेगाइसका यह पार्ट चल रहा है। घृणा वाले से स्वयं भी घृणा कर ले यह हुआ कर्म का बन्धन। ऐसा कर्म के बन्धन में आने वाला एकरस नहीं रह सकता। कभी किसी रस में होगा कभी किसी रस में। इसलिए अच्छे को अच्छा समझकर साक्षी होकर देखो और बुरे को रहमदिल बन रहम की निगाह से परिवर्तन करने की शुभ भावना से साक्षी हो देखो। इसको कहा जाता है - कर्मबन्धन से न्यारे'

 

_ ➳  क्योंकि ज्ञान का अर्थ है समझ। तो समझ किस बात कीकर्म के बन्धनों से मुक्त होने की समझ को ही ज्ञान कहा जाता है। ज्ञानी कभी भी बन्धनों के वश नहीं होंगे। सदा न्यारे। ऐसे नहीं कभी न्यारे बन जाओ तो कभी थोड़ा सा सेक आ जाए। *सदा विककर्माजीत बनने का लक्ष्य रखो। कर्मबन्धन जीत बनना है। यह बहुतकाल का अभ्यास बहुतकाल की प्रालब्ध के निमित्त बनायेगा।* और अभी भी बहुत विचित्र अनुभव करेंगे। तो सदा के न्यारे और सदा के प्यारे बनो। यही बाप समान कर्मबन्धन से मुक्त स्थिति है।

 

✺   *"ड्रिल :- कर्म बंधनों से मुक्त रहना।"*

 

 _ ➳  इस हलचल भरी सृष्टि पर मैं आत्मा कुछ आत्माओं के बीच बैठकर अपनी बुद्धि से शांतिधाम में स्थित हूं और शांतिधाम की गहन शांति को अपने अंदर अनुभव कर रही हूं.... जैसे-जैसे मैं इस शांति को अपने अंदर फील करती हूं वैसे वैसे मैं अपने आप को बहुत ही हल्का अनुभव करती हूँ... और *शांति धाम में उस लाल सुनहरे प्रकाश में मैं अपने साथ अनेक आत्माओं को भी देखती हूं जो शांति स्वरूप स्थिति में बैठकर अपना प्रकाश उस स्थान पर फैला रही है... और कुछ देर बाद में देखती हूं कि उस स्थान पर मेरे परम पिता परमात्मा ज्योति स्वरूप में विराजमान है और उनसे अनेक रंग बिरंगी किरणे निकल रही है जिसे देख कर मेरा मन अति आनंदित हो रहा है... परमात्मा की शीतल किरणें जैसे जैसे मुझ पर गिरने लगती है मैं बहुत ही आनंदित अवस्था को महसूस करती हूं...* 

 

 _ ➳  इसी शांति स्वरूप स्थिति में मैं धीरे-धीरे अपनी कर्मभूमि पर आती हूं और *अपने आप पर शांतिधाम से आती हुई किरणों को अनुभव करती हूं... जिसके कारण मैं उस हलचल भरी दुनिया से अपने आप को दूर रख पाती हूं और यहां के तेज भागते हुए संकल्पों से अपने आप को डिटेच अनुभव करती हूँ...* जैसे जैसे मैं अपने इस स्थिति में स्थित होती हूँ वैसे ही वहां बैठी अन्य आत्माओं को मेरी स्थिति का अनुभव होता है और सभी आत्माएं व्याकुल होते हुए अपनी इस व्याकुलता भरे प्रश्न से मुझे अवगत कराते हुए इसका उत्तर जानने का प्रयास करते हैं... और मुझसे कहती हैं... यहां पर इस हलचल भरी दुनिया में रहते हुए भी तुम इस आनंदित भरी स्थिति का कैसे अनुभव कर पाती हो... क्या तुम्हें यहां की हलचल अपने वश में नहीं करती... तुम्हें यहां की गतिविधियां हलचल में नहीं लाती... जैसे ही यह आत्माएं मुझसे यह पूछती है तो मैं परमात्मा का धन्यवाद करती हूं और उनकी व्याकुलता को समझते हुए उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए उन्हें कहती हूं... हे आत्माओं अगर हमें इस हलचल भरी दुनिया से अपने आप को शांति भरी दुनिया में अनुभव करना है तो तुम्हें एक दृश्य को समझना होगा... इस दृश्य को देखकर तुम सहज ही अनुभव कर पाओगी कि मैं इस स्थिति का कैसे अनुभव कर पा रही हूं...  

 

 _ ➳  कुछ समय बाद मैं उन आत्माओं को ज्योति स्वरुप में ही अपने साथ एक ऐसे स्थान पर ले जाती हूं जहां पर उन्हें अपने सभी प्रश्नों का उत्तर बड़ी ही सरलता से मिल सके... और हम अपना प्रकाश फैलाते हुए एक ऐसे स्थान पर आकर विराजमान हो जाते हैं जहां से हमें कमल कीचड़ में खिलता हुआ साफ साफ नजर आ रहा है... मैं उन आत्माओं से कहती हूं... हे आत्माओं अब आप इस दृश्य को बहुत ही गहराई से देखिए और समझिए... वह आत्माएं एकाग्रचित होकर उस दृश्य को देखती है और मेरे द्वारा कही हुई बातों को ध्यान से सुनने लगती है... मैं उन्हें कहती हूं कि इस कमल को देखिए यह सिर्फ कीचड़ में खिलता है परंतु कीचड़ में रहते हुए भी अपने आप को कीचड़ को छूने भी नहीं देता कीचड़ इसे छू भी नहीं पाती है... अगर यह कीचड़ में खिलकर कीचड़ में ही लिपट जाए तो इसे कोई भी मनुष्य देखेगा भी नहीं... क्योंकि कीचड़ के कारण इसकी सुंदरता और पवित्रता नष्ट हो जाएगी इसलिए *यह कमल अपनी ऊंची स्थिति के लिए अपने आप को कीचड़ में रखते हुए भी इससे दूर अनुभव करता है... इसके इसी गुण के कारण सभी मनुष्य इसकी सुंदरता और पवित्रता को गहराई से अनुभव करते हैं...*

 

 _ ➳  मेरी इतनी बात सुनकर वह सभी आत्माएं संतुष्ट हो जाती है... और उसी समय यह कहती है कि इस कमल की तरह आज से हम भी इस मायावी दुनिया के कर्म बंधनों से अपने आप को दूर रखेंगे... और कहती हैं कि *हम जब भी कोई भी कर्म करेंगे और हमारे सामने कैसे भी संकल्पों वाली आत्माएं आये तो हमें उनके संकल्पों से कोई असर नहीं पड़ेगा और ना ही हम अपनी स्थिति को हलचल में आने देंगे... ऐसा करने पर ही हम हमारी ऊंची इस स्थिति को सहज ही अनुभव कर पाएंगे और प्रभु के प्यारे बन पाएंगे...*  इतना कहकर वह सभी आत्माएं वहां से मेरे साथ प्रस्थान करने लगती है... और उसी समय से अपने आप को शांतिधाम में अनुभव करती हैं... रास्ते में चलते समय कई बार ऐसी परिस्थिति आई जिसके कारण हमारी स्थिति में हलचल आ सकती थी... परंतु हमने अपने आपको परमात्म प्यार में अनुभव किया और कर्मयोगी स्थिति का अनुसरण किया... जिससे हमारी स्थिति बनी रहे और हम चलते चलते वापिस अपने इस देह में विराजमान हो जाते हैं...

 

_ ➳  *और हमारा यह छोटा सा समूह इस दुनिया में रहते हुए भी बहुत ही गहन शांति का अनुभव करती है... जिसे देखकर अन्य आत्माएं बहुत ही आकर्षित और खुश होती हैं और हम सभी अब अन्य आत्माओं के किसी भी कर्म को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते और ना ही उनके कोई भी संकल्प हमारी स्थिति को हलचल में ला सकते हैं...* अब हम केवल इस स्थिति का अनुभव करते हैं जैसे कि एक व्यक्ति फांसी पर लटका हुआ हो अर्थात हमारा यह देह इस संसार में दिखाई देगा कर्मयोगी के रूप में और हम मन बुद्धि से शांतिधाम में अपने परमपिता परमात्मा के साथ अपने आप को अनुभव करते हैं... इन्हीं विचारों के साथ और इन्हीं संकल्पों के साथ हम वापस अपने इस देह में रहते हुए अपने आप को शांतिधाम में परमात्मा के साथ अनुभव करते हैं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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