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 15 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *आत्मा में पडी खाद को योग अग्नि से निकाला ?*

 

➢➢ *आत्मा अभिमानी बन बाप को याद किया ?*

 

➢➢ *मेरे मेरे को तेरे में परिवर्तित किया ?*

 

➢➢ *सच्चे सेवाधारी बन निस्वार्थ सेवा करते चले ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  अपनी सब जिम्मेवारी बाप को दे दो अर्थात् अपना बोझ बाप को दे दो तो स्वयं हल्के हो जायेंगे, बुद्धि से सरेन्डर हो जाओ। *अगर बुद्धि से सरेन्डर होंगे तो और कोई बात बुद्धि में नहीं आयेगी। बस सब कुछ बाप का है, सब कुछ बाप में है तो और कुछ रहा ही नहीं।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं खुशनसीब हूँ"*

 

✧  अपने को खुशनसीब आत्मायें अनुभव करते हो? *खुशी का भाग्य जो स्वप्न में भी नहीं था वो प्राप्त कर लिया। तो सभी की दिल सदा यह गीत गाती है कि सबसे खुशनसीब हूँ तो मैं हूँ। यह है मन का गीत। मुख का गीत गाने के लिये मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मन का गीत सब गा सकते हैं।*

 

  *सबसे बड़े से बड़ा ख़जाना है खुशी का ख़जाना। क्योंकि खुशी तब होती है जब प्राप्ति होती है। अगर अप्राप्ति होगी तो कितना भी कोई किसी को खुश रहने के लिये कहे, कितना भी आर्टीफिशयल खुश रहने की कोशिश करे लेकिन रह नहीं सकते।* तो आप सदा खुश रहते हो या कभी-कभी रहते हो? जब चैलेन्ज करते हो कि हम भगवान के बच्चे हैं, तो जहाँ भगवान् है वहाँ कोई अप्राप्ति हो सकती है? तो खुशी भी सदा है क्योंकि सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप हैं। ब्रह्मा बाप का क्या गीत था? पा लिया-जो था पाना। तो यह सिर्फ ब्रह्मा बाप का गीत है या आप सबका? कभी-कभी थोड़ी दु:ख की लहर आ जाती है? कब तक आयेगी?

 

  अभी थोड़ा समय भी दु:ख की लहर नहीं आये। जब विश्व परिवर्तन करने के निमित्त हो तो अपना ये परिवर्तन नहीं कर सकते हो? *अभी भी टाइम चाहिये, फुल स्टॉप लगाओ। ऐसा श्रेष्ठ समय, श्रेष्ठ प्राप्तियाँ, श्रेष्ठ सम्बन्ध सारे कल्प में नहीं मिलेगा। तो पहले स्व-परिवर्तन करो। यह स्व-परिवर्तन का वायब्रेशन ही विश्व परिवर्तन करायेगा।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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*अगर कोई भी शक्ति वा गुण समय पर इमर्ज नहीं होता है तो इससे सिद्ध है कि मालिक को समय का महत्व नहीं है।* क्या करना चाहिए? सिंहासन पर बैठना अच्छा या मेहनत करना अच्छा? अभी इसमें समय देने की आवश्यकता नहीं है। मेहनत करना ठीक लगता या मालिक बनना ठीक लगता? क्या अच्छा लगता है? सुनाया ना - इसके लिए सिर्फ *एक यह अभ्यास सदा करते रहो - निराकार सो साकार के आधार से यह कार्य करा रहा हूँ" करावनहार बन कर्मेन्द्रियों से कराओ।* अपने निराकारी वास्तविक स्वरूप को स्मृति में रखेंगे तो वास्तविक स्वरूप के गुण, शक्तियाँ स्वतः ही इमर्ज होंगे। जैसा स्वरूप होता है वैसे गुण और शक्तियाँ स्वतः ही कर्म में आते हैं। जैसे कन्या जब माँ बन जाती है तो माँ के स्वरूप में सेवा भाव, त्याग, स्नेह, अथक सेवा आदि गुण और शक्तियाँ स्वतः ही इमर्ज होती है ना तो *अनादि अविनाशी स्वरूप याद रहने से स्वतः ही यह गुण और शक्तियाँ इमर्ज होंगे।* स्वरूप की स्मृति स्थिति को स्वतः ही बनाता है। समझा क्या करना है। मेहनत शब्द को जीवन से समाप्त कर दो। मुश्किल मेहनत के कारण लगता है। *मेहनत समाप्त तो मुश्किल शब्द भी स्वत: ही समाप्त हो जायेगा।* अच्छा -

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ इस देह के जो सर्व सम्बन्ध हैं, दृष्टि से, वृति से, कृत से उन सबसे न्यारा। *देह का सम्बन्ध देखते हुए भी स्वत: ही आत्मिक, देही सम्बन्ध स्मृति में रहे। इसलिए दीपावली के बाद भैया-दूज मनाया ना।* जब चमकता हुआ सितारा व जगतमाता अविनाशी दीपक बन जाते हो तो भाई-भाई का सम्बन्ध हो जाता है।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पावन बन पावन दुनिया का वर्सा लेना, पवित्र जरूर बनना*

 

_ ➳  मै आत्मा मीठे बाबा की यादो में सुमन हो गये... अपने मन को निहार कर, आनन्द के सागर में डूब जाती हूँ... और मीठे बाबा की यादो में खो जाती हूँ... कि *कैसे चलते चलते बाबा ने मेरे विकारी हाथो में, अपना पावन मखमली हाथ देकर, मेरा कायाकल्प कर दिया है.*.. इस अंतिम जनम में भगवान को पिता, टीचर और सतगुरु रूप में पाकर... जनमो की यात्रा ही जेसे सफल हो गयी है... सृस्टि जगत के इस खेल में मुझ आत्मा ने... अंत में भगवान को ही जीत लिया है.. सब कुछ मेने पा लिया है...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपनी देवताई शानोशौकत याद दिलाते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... सदा अपने मीठे भाग्य के नशे में खोये रहो... और पावनता के रंग में रंगकर मनुष्य से देवता बनने का सदा का अधिकार पा लो...ईश्वर पिता के साथ का यह खुबसूरत वरदानी संगम है... *इसमे पवित्रता से सजकर पिता की सम्पूर्ण दौलत को पा लो.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के महावाक्यों को गहराई से दिल में समाकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... *अपनी यादो भरा मदद का हाथ देकर, मेरे भाग्य को कितना ऊंचाइयों पर ले जा रहे हो.*.. मै क्या हूँ और क्या मुझे बना रहे हो... विकारो के पतितपन को जीकर मै कितनी निकृष्ट से हो गयी थी... आज पावनता से सजाकर मुझे देवता बना रहे हो..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को सच्चे प्रेम के अहसासो से भरते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता की गोद में पलने का महाभाग्य पाकर अब पवित्रता की तरंगे पूरे विश्व में फैलाओ... पावन बनकर, पावन दुनिया के मालिक बन सदा के लिए मुस्कराओ... *इस अंतिम जनम में ईश्वर पिता की श्रीमत के रंग में रंगकर, सुंदर देवता बन जाओ.*..

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे बाबा के मुझ आत्मा पर लुटाते हुए संकल्पों को देख कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा... मनुष्य मन और मनमत ने मुझ आत्मा को विकारो के दकदल में गहरे डुबो दिया... आपने आकर जो मात्र चोटी बची थी... खींच कर निकाला और ज्ञान अमृत से मुझे उजला बनाया है... *आपकी प्यारी यादो में डूबकर मै आत्मा अब पवित्रता का आँचल ओढ़ मुस्करा रही हूँ.*.."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को वरदानों से सजाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता को पाकर, अब अपनी हर अदा में ईश्वरीय झलक दिखाओ... इस पतित हो गयी दुनिया को अपनी पावनता से पुनः खुबसूरत पवित्र बनाओ... विकारो के कालेपन से निकल कर, ज्ञान धारा में धवल बन, और *यादो में तेजस्वी होकर, देवताई सौंदर्य से विश्व धरा पर जगमगाओ.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने भाग्य के ऊपर, ईश्वरीय जादूगरी को देख, मीठे बाबा से कहती हूँ :-* " मेरे सच्चे साथी बाबा... आपके सच्चे साथ और यादो के हाथ को पाकर मै आत्मा विकारो के घने जंगल से बाहर निकल रही हूँ... *अपनी खोयी हुई पावनता से पुनः सज संवर रही हूँ.*.. अपने साथ इस प्रकर्ति को भी पावन बनाकर, सुखो के स्वर्ग में बदल रही हूँ..." मीठे बाबा को अपने दिल की सारी बात सुनाकर मै आत्मा इस धरती पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप की श्रीमत पर चलकर सम्पूर्ण निर्विकारी बनना है*"

 

_ ➳  कितनी पदमा पदम सौभाग्यशाली हूँ मैं ब्राह्मण आत्मा जिसे स्वयं भगवान ने ब्रह्मा मुख कमल द्वारा रचा है, *मन ही मन स्वयं से यह बातें करती, अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सराहना करते हुए, मैं अपने तीनो कालों औऱ आदि से लेकर अंत तक के अपने 84 जन्मों के सर्वश्रेष्ठ पार्ट के बारे में जैसे ही विचार करती हूँ उन 84 जन्मो में मुझ आत्मा द्वारा बजाए अलग - अलग पार्ट अलग - अलग स्वरुप में मेरी आँखों के सामने एक सिनेमा की भांति स्पष्ट होने लगते हैं*। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे सामने एक बहुत बड़ी स्क्रीन है जिस पर मैं अपने पास्ट, प्रेजेंट और भविष्य को देख रही हूँ। 84 जन्मो में अपने अलग -अलग स्वरूप में बजाए हर पार्ट में मैं अपना सम्पूर्ण निर्विकारी स्वरूप देख रही हूँ।

 

_ ➳  सबसे पहले मैं देख रही हूँ अपने आपको अपने वास्तविक अनादि निराकार स्वरूप में अपने घर परमधाम में अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के पास। *झिलमिल करती आत्माओं की इस निराकारी खूबसूरत दुनिया में, एक चमकता हुआ सितारा मैं आत्मा सच्चे सोने के समान अपनी आभा चारों और बिखेरती हुई, सातों गुणों और अष्ट शक्तियों के अनन्त प्रकाश से प्रदीप्तमय हूँ*। अपने इस सम्पूर्ण निर्विकारी अनन्त ज्योतिर्मय स्वरूप को देख मैं गहन आनन्द का अनुभव कर रहती हूँ। मेरा यह सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप मुझे मेरे अंदर निहित गुणों और शक्तियों की महसूसता करवाकर, असीम सुख की अनुभूति करवा रहा है। 

 

_ ➳  अपने इस वास्तविक अनादि स्वरूप का सुखमय अनुभव करके, अब मैं अपना अगला सम्पूर्ण निर्विकारी देवताई स्वरूप देख रही हूँ। *अपने शिव पिता द्वारा बनाई, प्रकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण एक खूबसूरत स्वर्णिम दुनिया में मैं स्वयं को 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम स्वदर्शन चक्रधारी विष्णु के रूप में देख रही हूँ*। मेरा यह स्वरूप मुझे मेरे विश्व महाराजन स्वरूप की स्मृति दिलाकर गहन खुशी का अनुभव करवा रहा है। इस स्वरूप में अपने मुख मण्डल पर फैली दिव्य आभा और सम्पूर्ण पवित्रता के तेज को देख मैं मन ही मन हर्षित हो रही हूँ। 

 

_ ➳  अपने इस डबल ताजधारी सम्पूर्ण निर्विकारी स्वरूप को देख आनन्दविभोर होकर अब मैं अपने परम पवित्र पूज्य स्वरूप को देख रही हूँ। *अष्ट भुजाधारी दुर्गा के रूप में मंदिर में प्रतिस्थापित प्रतिमा मुझे मेरे पूज्य स्वरूप की स्मृति दिला रही हूँ। देख रही हूँ मैं अपने सामने लम्बी - लम्बी कतारों में खड़े अपने भक्तों को जो केवल मेरे एक दर्शन के प्यासे हैं*। अपनी मनोकामना पूर्ण करवाने के लिए घण्टों भूखे प्यासे लाइनों में खड़े तपस्या कर रहें हैं। मुख पर दिव्य मुस्कराहट और नयनों में दया भाव लिए मैं अपना वरदानी हाथ ऊपर उठाए उनकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर रही हूँ। 

 

_ ➳  बड़े श्रद्धा भाव के साथ अपने मस्तक को झुका कर अपनी वन्दना करते, अपने भक्तों की आश को पूर्ण करते, अपने इस परम पूज्य स्वरूप को आनन्दमग्न होकर देखते हुए *अब मैं फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप की स्मृति में लौटती हूँ और अपने प्यारे शिव पिता द्वारा मिली उन अविनाशी प्राप्तियों को याद करती हूँ जो ब्राह्मण बनते ही मेरे मीठे प्यारे बाबा ने मुझे गिफ्ट के रूप में दी हैं। उन्हें याद कर, अपने भाग्य पर मैं नाज करती हूँ कि कितनी सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा, जिस भगवान की महिमा के दुनिया गीत गाती हैं वो स्वयं मेरे सामने आकर मेरे गीत गाता है*। बाप बन मेरी पालना करता है, टीचर बन हर रोज मुझे पढ़ाने आता है और सतगुरु बन मुझे श्रेष्ठ कर्म करना सिखलाता है। 

 

_ ➳  ऐसे अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य के गीत गाते हुए अब मैं कर्मयोगी बन अपने कार्य मे लग जाती हूँ। किन्तु कर्म करते - करते भी अब मैं इन अखुट प्राप्तियों औऱ अपने प्यारे प्रभु से मिलने वाले निस्वार्थ औऱ निष्काम प्यार को सदा स्मृति में रखते हुए, तथा *अपने तीनों कालों में बजाने वाले अपने सर्वश्रेष्ठ सम्पूर्ण निर्विकारी पार्ट को मन बुद्धि से सदा अपने सामने इमर्ज रखते हुए, सम्पूर्ण निर्विकारी बन सच्चा ब्राह्मण बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्र बनने का पुरुषार्थ अब मैं पूरी लगन के साथ कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मेरे-मेरे को तेरे में परिवर्तन कर श्रेष्ठ मंजिल को प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं नष्टोमोहा आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव नि:स्वार्थ सेवा करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सेवा का फल स्वत: प्राप्त होते अनुभव करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  १. कई कहते हैं ज्ञान-योग बहुत अच्छा लगता हैअच्छा है वो तो ठीक है लेकिन कर्म में लाते होज्ञान माना आत्मापरमात्मा, ड्रामा.... यह कहना नहीं। *ज्ञान का अर्थ है समझ। समझदार जैसा समय होता है वैसे समझदारी से सदा सफल होता है*।

➳ _ ➳  २. समझदार की निशानी है *कभी धोखा नहीं खाना - ये है ज्ञानी की निशानी, और योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लियर बुद्धि*। क्लीन भी हो और क्लियर भी हो। *योगी कभी नहीं कहेगा-पता नहीं, पता नहीं* उनकी बुद्धि सदा ही क्लियर है। और *धारणा स्वरूप की निशानी है सदा स्वयं भी डबल लाइट*। कितनी भी जिम्मेवारी हो लेकिन धारणामूर्तसदा डबल लाइट। चाहे मेला होचाहे झमेला हो-दोनों में डबल लाइट। और *सेवाधारी की निशानी है-सदा निमित्त और निर्माण भाव*। तो ये सभी अपने में चेक करो। कहने में तो सभी कहते हो ना कि चारों ही सब्जेक्ट के गाडली स्टूडेण्ट हैं। तो निशानी दिखाई देनी चाहिये।  

✺   *ड्रिल :-  "ज्ञानी, योगी, धारणा स्वरूप और सेवाधारी बनना"*

➳ _ ➳  *झील में खिले पावन कमल की कोमल पंखुरियों पर पडें ओस कणों के समान...* शिव सूर्य की किरणों से स्वर्ण मयी आभा बिखराती, मैं ज्योति बिन्दु उन्हीं किरणों पर सवार होकर पहुँच गयी हूँ परमधाम में... *असंख्य जगमगाते हीरों की मालाओं से जडी, जैसे कोई भव्य और विशाल पारदर्शी सुराही*... शान्ति और पावनता का मधुरस-सा झलकाती हुई... *सुराही के शीर्ष पर स्वयं अमृत के सागर, अनवरत अमृत धारा छलकाते हुए*... आत्माओं के उर को निरन्तर भरपूर किये जा रहे है... छलछलाती सुराही, शान्ति से, पावनता से, और भरपूर अवस्था में हर आत्मा मणि... मैं आत्मा शिवबाबा के एकदम करीब उनको पास से निहारती हुई... और *देखते ही देखते एक जादुई आकर्षण में बंधी समाँ गई हूँ उनकी परम पावन सी गोद में*... चिरकाल तक स्वयं को उस मधु से भरपूर करती हुई...

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा फरिश्ता रूप में सूक्ष्म वतन में... सन्दली पर बैठे शिक्षक रूप में बापदादा, और असंख्य फरिश्तों की कतार उनके सामने बैठी है... आहिस्ता से पीछे जाकर बैठ गया हूँ मैं फरिश्ता भी... बापदादा की स्नेहमयी नजरें मेरा पीछा करती हुई... और *बापदादा हर एक फरिश्ते को ज्ञान, योग, सेवा और धारणा चारों विषयों में सम्पन्न बनने का वरदान दे रहे है*... वरदान पाकर सभी एक एक कर अपने अपने सेवा स्थानों को जाते हुए... मैं फरिश्ता मगन होकर देख रहा हूँ इस दृश्य को... सहसा चौक गया हूँ कोई स्नेहिल सा स्पर्श अपने कन्धे पर पाकर... *बापदादा सामने खडे हैं हाथो में उपहारों का थाल सजाये... मेरे सामने थाल को रख मेरे सर पर हाथ रखकर मुझे ज्ञानी तू आत्मा का वरदान दे रहे है*... *सामने रखे स्वर्ण जडित थाल से स्वमानों की माला मेरे गले में पहनाते हुए, समझदारी की प्रतीक ज्ञान गदा सौंप रहे है मेरे हाथों में*... मैं देख रहा हूँ, गले मे पहनी स्वमानों की माला को... जो मेरी समझ और शक्ति को तीव्रता से बढा रही है... *योग का प्रतीक स्वदर्शन चक्र मेरी बुद्धि को क्लीन और क्लीयर कर रहा है*...

➳ _ ➳  *और अब धारणा का पावन कमल मैंने स्वयं ही उठा लिया बापदादा के सामने से... मेरी इस बालसुलभ उत्सुकता पर बापदादा मुस्कुरा रहे हैं आँखों में विशेष स्नेह भरकर... मानो कह रहे हो *बच्चे! अब ये सेवा का शंखनाद भी तुम्हें स्वतः ही करना है*... जैसे ही सेवा का शंख हाथ में उठाता हूँ... खुशी से भर गया हूँ सामने, अपना ही देवताई अलंकारों से सजा भव्य रूप देखकर... *गदा शंख चक्र और कमल देवताई अलंकारों से सुशोभित रूप अपने भविष्य रूप को देखकर उत्साह से भर गया हूँ मैं*... और चारों ही विषयों में सम्पूर्णता पाने की लगन अब पहले से तेज हो गयी है... सम्पूर्णता का दृढ निश्चय लिए मैं लौट आया हूँ अपने उसी ब्राह्मण शरीर में... *धारणाओं का कमल अब पहले से भी ज्यादा शोभा के साथ खिल रहा है उसी झील में*... *कोमल पत्तियों पर पडे ओस कण सुनहरे प्रतीत हो रहे है... मेरे सतयुगी भविष्य के समान*...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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