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 15 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपनी आखों को बहुत बहुत सिविल बनाया ?*

 

➢➢ *बाबा ने जो हुकुम किया, उसे फ़ौरन माना ?*

 

➢➢ *अपने महत्व व कर्तव्य को जान सदा जागती ज्योत बनकर रहे ?*

 

➢➢ *स्मृति विस्मृति के युद्ध को समाप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे आपकी रचना कछुआ सेकेण्ड में सब अंग समेट लेता है। समेटने की शक्ति रचना में भी है। आप मास्टर रचता समेटने की शक्ति के आधार से सेकेण्ड में सर्व संकल्पों को समाकर एक संकल्प में सेकेण्ड में स्थित हो जाओ। *जब सर्व कर्मेन्द्रियों के कर्म की स्मृति से परे एक ही आत्मिक स्वरूप में स्थित हो जायेंगे तब कर्मातीत अवस्था का अनुभव होगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ"*

 

  अपने को सदा स्वदर्शन-चक्रधारी समझते हो? स्व का दर्शन हो गया है ना? *आत्मा का इस सृष्टि-चक्र में क्या-क्या पार्ट है, उनको जानना अर्थात् स्वदर्शन-चक्रधारी बनना। स्वदर्शन-चक्रधारी आत्मा सदा माया से मुक्त है।*

 

  *स्वदर्शन-चक्रधारी ही बाप के प्रिय हैं क्योंकि ज्ञानी तू आत्मा बन गये ना। स्व के चक्र को जानना अर्थात् ज्ञानी तू आत्मा बनना। जो स्वदर्शन चक्रधारी हैं, उनके आगे माया ठहर नहीं सकती। वह सहज ही माया को समाप्त कर देते हैं।* तो सभी स्वदर्शन-चक्रधारी हो या कभी-कभी चक्र गिर जाता है?

 

  *ज्ञान को बुद्धि में धारण करना अर्थात् स्वदर्शन-चक्र चलाना। 'स्वदर्शन चक्र ही भविष्य में चक्रवर्ती राजा बनायेगा'। तो यह वरदान सदा याद रखना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  कर्मातीत स्थिति के समीप आ रहे हैं। कर्म भी वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। लेकिन *कर्मातीत अर्थात कर्म के किसी भी बंधन के स्पर्श से न्यारे।* ऐसा ही अनुभव बढ़ता रहे। जैसे मुझ आत्मा ने इस शरीर द्वारा कर्म किया ना, ऐसे ही न्यारा-पन रहे।

 

✧  न कार्य के स्पर्श करने का और करने के बाद जो रिजल्ट हुई - उस फल को प्राप्त करने में भी न्यारा-पना कर्म का फल अर्थात जो रिजल्ट निकलती है उसका भी स्पर्श न हो, बिल्कुल ही न्यारा-पन अनुभव होता रहे।

 

✧  जैसे कि *दूसरे कोई ने कराया और मैंने किया।* किसी ने कराया और मैं निमित बनी। लेकिन *निमित बनने में भी न्यारा-पना ऐसी कर्मातीत स्थिति बढ़ती जाती है* - ऐसा फील होता है?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *बापदादा आपके आफिस का भी चक्कर लगाते हैं। कैसे काम कर रहे हैं। बहुत बिजी रहते हैं ना।* अच्छी तरह से आफिस चलती है ना! जैसे एक सेकण्ड में साधन यूज करते हो ऐसे ही बीच-बीच में कुछ समय साधना के लिए भी निकालो। सेकण्ड भी निकालो। *अभी साधन पर हाथ है और अभी-अभी एक सेकण्ड साधना बीच-बीच में अभ्यास करो।* जैसे साधनों में जितनी प्रेक्टिस करते हो तो ऑटोमेटिक चलता रहता है ना। ऐसे एक सेकण्ड में साधना का भी अभ्यास हो। *ऐसे नहीं टाइम नहीं मिला, सारा दिन बहुत बिजी रहे। बापदादा यह बात नहीं मानते हैं। क्या एक घण्टा साधन को अपनाया, उसके बहुत में क्या ५६ सेकण्ड नहीं निकाल सकते?* ऐसा कोई बिजी है जो ५ मिनट भी नहीं निकाल सके, ५ सेकण्ड भी नहीं निकाल सके। *ऐसा कोई है? निकाल सकते हैं?*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- दुःख-सुख, मान-अपमान सब सहन करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अंतर्मुखी बन परमत, परचिंतन को छोड़ ज्ञान योग के पर लगाकर मन बुद्धि रूपी विमान में बैठकर बाबा की झोपड़ी के बाहर पहुंच जाती हूँ... सुंदर सुंदर पेड़ पौधों, फूलों से सजे हुए बगीचे में चारों ओर बाबा के प्रेम की सुगंध फैली हुई है...* बापदादा झूले पर बैठ झूला झूलते हुए दोनों हाथों को फैलाए मुझे अपने पास बुलाते हैं और अपनी बाहों में समेटकर प्यार का झूला झुलाते हुए प्यारी प्यारी शिक्षाएं देते हैं...

 

   *निंदा स्तुति जय पराजय सबमे समान रह सब बातो में सहनशील बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे बच्चे... मीठा पिता सदा आपके साथ है... सम्मुख है... *अथाह दुखो को सहने के आदी जनमो से हो... तो इस समय भी सहनशील बनो...* सब बातो से उपराम बन समय और सांसो को मीठे पिता में खपा दो... और कहीं न उलझो... बस एक पिता की याद में मगन रहो..."

 

_ ➳  *सुनी सुनाई व्यर्थ बातो को छोड़ एक बाबा से ही सुनकर धारण करती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मुझ आत्मा ने सारा जीवन इन व्यर्थ भरी बातो में ही खपाया... *पर अब मै आत्मा प्यारे बाबा में खो गई हूँ... ईश्वर पिता के साथ सहनशीलता की मिसाल बन रही हूँ... जीवन खूबसूरत होता जा रहा है..."*

 

   *इस सृष्टि नाटक के सारे राजों को बताकर मेरे ज्ञान चक्षुओं को खोलते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे.... अब यह खेल पूरा हो गया है... सारे हिसाब पूरे होने है... *मान हो या अपमान दुनिया कुछ भी कहे.... आप प्यारे बाबा की यादो में स्थिर रहो... यादो में हर कर्म को कर ईश्वरीय पिता के दिल पर राज करो... सिर्फ पिता की सुनो और याद करो..."*

 

_ ➳  *स्मृति स्वरूप समर्थी स्वरूप बन सुख-दुख, मान-अपमान से परे होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... सबको सुनकर मै आत्मा किस कदर भटक पड़ी थी... *अब आप जो मिले हो बाबा तो आप ही को सुन रही... आपकी यादो में इस कदर खो रही हूँ... कि सब भावो से न्यारी बन रही हूँ..."*

 

   *जन्म जन्मांतर के प्यास को बुझाकर ज्ञान अमृत पिलाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... जनमो से असत्य को सुनकर सत्य से कोसो दूर हो गए... अब और इन बातो में न फंसो... सच्चे पिता से सुनकर गहरे आनन्द में उतरो... *भगवान आ गया है जीवन में तो सारे दुखो से उबर जाओ... खुशियो संग नाचो और सदा का मुस्कराओ... पाना था सो पा लिया..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वमान में स्थित रहकर एकरस अवस्था का अनुभव करते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कितनी खुशनसीब हूँ... ईश्वर पिता को सुनने देखने जानने का सौभाग्य मिला है... *अब झूठ के भँवर से निकल पड़ी हूँ... अब मेरी ख़ुशी को दुनिया का कोई भी दुःख छीन ही न सके..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बहुत मीठे, शांत अति मीठे स्वभाव का बनना है*

 

_ ➳  अपने मोस्ट स्वीटेस्ट बाप के समान स्वीटेस्ट बनने का संकल्प मन में लेकर, मैं अपने स्वीटेस्ट बाबा की याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करती हूँ और सेंकड में विदेही बन उनकी स्वीटेस्ट दुनिया की और चल पड़ती हूँ। *वो दुनिया जो सूर्य, चाँद, सितारों से परे हैं, जहाँ प्रकृति के पांचों तत्वों से जुड़ा कुछ भी नही। कोई आवाज, कोई संकल्प नही। वाणी से परें एक ऐसी बेहद खूबसूरत दुनिया जहाँ पहुँच कर आत्मा महसूस करती है जैसे उसकी जन्म - जन्म की प्यास बुझ गई है*। अपनी ऐसी स्वीट दुनिया की और अब मैं आत्मा चल पड़ती हूँ। मन बुद्धि के विमान पर बैठ, देह की दुनिया से किनारा कर अपने स्वीट होम में स्वीटेस्ट बाप से मिलने की लग्न मुझे बहुत ही तीव्र गति से ऊपर आकाश की ओर ले जा रही है। *सेकेण्ड में आकाश तत्व से ऊपर पहुँच कर, मैं सूक्ष्म लोक को भी पार करके पहुँच जाती हूँ अपने स्वीट घर में*।

 

_ ➳  मेरा यह स्वीट घर जहाँ आकर मेरे चित को चैन और मन को आराम मिल गया है। एक गहन सुकून मैं आत्मा अपने इस घर मे आकर महसूस कर रही हूँ। *यहाँ चारों और फैले गहन शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स धीरे - धीरे मुझे विचार शून्य बनाते जा रहें है। हर संकल्प - विकल्प से मुक्त एक खूबसूरत निरसंकल्प स्थिति में मैं स्थित होती जा रही हूँ*। एक शक्तिशाली बीज रूप स्थिति में अब मैं स्थित हो चुकी हूँ और अपने स्वीटेस्ट बीज रूप बाबा से योग लगाकर उस विशाल योग अग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए अब मैं उनके सम्मुख पहुँच गई हूँ, जिस *योग अग्नि द्वारा मैं अपने जन्म जन्मांतर के पापों को, पुराने सभी आसुरी स्वभाव संस्कारो को जलाकर भस्म करके अपने स्वीटेस्ट बाप के समान स्वीटेस्ट बन जाऊँगी*।

 

_ ➳  मास्टर बीज रूप बन अपने बीज रूप पिता के सामने अब मैं उपस्थित हूँ। उनसे निकल रही सर्वशक्तियों की अनन्त किरणें मुझ आत्मा के ऊपर पड़ रही हैं और मुझे सर्वशक्तियों से सम्पन्न बना रही है। मैं महसूस कर रही हूँ धीरे - धीरे इन किरणों का प्रवाह बढ़ रहा है और ये किरणे ज्वाला स्वरूप धारण करती जा रही है। *योग की अग्नि प्रज्ज्वलित होकर अब मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जलाकर भस्म कर रही है। आत्मा के ऊपर चढ़ी पुराने स्वभाव संस्कारो की सारी अशुद्धता खत्म होती जा रही है और मैं आत्मा एकदम हल्की, शुद्ध  होती जा रही हूँ*। मेरा स्वरूप बहुत ही शक्तिशाली और चमकदार बनता जा रहा है। मैं अनुभव कर रही हूँ जैसे मेरे स्वीटेस्ट बाबा मुझे आप समान स्वीटेस्ट बनाने के लिए अपने समस्त गुण और समस्त शक्तियाँ मुझे प्रदान कर रहें हैं।

 

_ ➳  बीज रूप अवस्था में स्थित हो कर अपने बीज रूप पिता के साथ मिलन मनाकर, योग अग्नि में विकर्मों को दग्ध कर, अपने प्यारे पिता के सर्व गुणों, सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर, परमधाम से नीचे आकर अब मैं सूक्ष्म वतन में प्रवेश करती हूँ और अपने फरिश्ता स्वरूप को धारण कर बापदादा के पास पहुँचती हूँ। *मैं देख रही हूँ मेरे बिल्कुल सामने बापदादा खड़े हैं और उनके मस्तक से, उनकी दृष्टि से शक्तियों की अनन्त धारायें निकल रही हैं और उन धाराओं में समाई ज्ञान और योग की पावन किरणे मुझ फरिश्ते को छू रही हैं*। जैसे पारस के संग में पीतल भी सोना बन जाता है ऐसे ज्ञान और योग की पावन किरणे जैसे - जैसे मेरे ऊपर पड़ रही हैं, विकारों रूपी भूत एक - एक करके भाग रहें हैं और आसुरी अवगुण दैवी गुणों में बदल रहें हैं। *बाबा अपने सारे गुण और सारी शक्तियाँ मेरे अंदर समाहित कर मुझे आप समान स्वीटेस्ट बना रहें हैं*।

 

_ ➳  परमात्म गुणों और शक्तियों को स्वयं में धारण कर बाप समान स्वीटेस्ट बन कर अब मैं फिर से अपने निराकारी बिंदु स्वरूप में स्थित होकर वतन से नीचे आ जाती हूँ। *साकार सृष्टि पर आकर, अपने साकार तन में मैं आत्मा वापिस प्रवेश करती हूँ और कर्मक्षेत्र पर कर्म करने के लिए तैयार हो जाती हूँ। किन्तु कर्म करते हुए अब मैं हर कर्म योगयुक्त स्थिति में स्थित रहकर करती हूँ*। किसी के भी सम्बन्ध सम्पर्क में आते, आत्मिक स्मृति में स्थित होकर उनको भी मैं आत्मिक दृष्टि से देखती हूँ जिससे आत्मा के निजी गुण और शक्तियाँ इमर्ज रहते हैं। सबके प्रति आत्मिक दृष्टि मेरे अंदर साक्षीपन का भाव उतपन्न करके सबके पार्ट को साक्षी होकर देखने की मुझे प्रेरणा देती है इसलिये *हर आत्मा के पार्ट को साक्षी होकर देखने से अब मेरे हृदय से सर्व आत्माओं के प्रति शुभ भावना, शुभकामना स्वत: ही निकलती रहती है। अपने स्वीटेस्ट बाबा के प्यार की मिठास अपने अंदर भरकर, बाप समान स्वीटेस्ट बन अब मैं अपनी मीठी दृष्टि वृति से सबके जीवन को मिठास से भर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं अपने महत्व व कर्तव्य को जानने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं सदा जगती ज्योत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा स्मृति-विस्मृति की युद्ध को समाप्त करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सदा लवलीन स्थिति का अनुभव करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सहज योगी हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  चारों ओर की सेवाओं के समाचार बापदादा सुनते रहते हैं और दिल से सभी अथक सेवाधारियों को मुबारक भी देते हैं, सेवा बहुत अच्छे उमंग-उत्साह से कर रहे हैं और आगे भी करते रहो लेकिन सेवा और स्थिति का बैलेन्स थोड़ा -सा कभी इस तरफ झुक जाता हैकभी उस तरफ इसलिए सेवा खूब करो, *बापदादा सेवा के लिए मना नहीं करते और जोर-शोर से करो लेकिन सेवा और स्थिति का सदा बैलेन्स रखते चलो।* स्थिति बनाने में थोड़ी मेहनत लगती है और सेवा तो सहज हो जाती है। इसलिए सेवा का बल थोड़ा स्थिति से ऊंचा हो जाता है। *बैलेन्स रखो और बापदादा कीसर्व सेवा करने वाले आत्माओं कीसंबंध-सम्पर्क में आने वाले ब्राह्मण परिवार की ब्लैसिंग लेते चलो।* यह दुआओं का खाता बहुत जमा करो।

 

 _ ➳  *अभी की दुआओं का खाता आप आत्माओं में इतना सम्पन्न हो जाए जो द्वापर से आपके चित्रों द्वारा सभी को दुआयें मिलती रहेंगी। अनेक जन्म में दुआयें देनी हैं लेकिन जमा एक जन्म में करनी हैं।* इसलिए क्या करेंगेस्थिति को सदा आगे रख सेवा में आगे बढ़ते चलो। क्या होगा, यह नहीं सोचो।ब्राह्मण ब्राह्मण आत्माओं के लिए अच्छा हैअच्छा ही होना है। लेकिन बैलेन्स वालों के लिए सदा अच्छा है। बैलेन्स कम तो कभी अच्छाकभी थोड़ा अच्छा। सुना क्या करना हैक्वेश्चन मार्क सोचने के हिसाब से आश्चर्यवत होके सोचने को फिनिश करो, यह तो नहीं होगायह तो नहीं होगा....। वह स्थिति को नीचे ऊपर करता है। समझा।

 

✺   *ड्रिल :-  "सेवा और स्थिति का बैलेन्स करना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा मन और बुद्धि से शक्ति स्तम्भ पर... शक्तियों के सुरक्षित घेरे के अन्दर... *शिव बिन्दु से आता लाल सुनहरें प्रकाश का तेजमेरी भृकुटी पर स्थित हो गया है...* मेरे मस्तिष्क में फैलता नीले रंग का प्रकाश मेरे हृदय स्थल में हरे रंग व उदर भाग में जाकर पीले रंग में बदल रहा है... पूरी ही देह सतरंगी प्रकाश की आभा से दमक रही है... आहिस्ता आहिस्ता मैं आत्मा देह से अलग होती हुई... देहभान से मुक्त मैं आकारी फरिश्ता... *सामने से मुस्कुराते आ रहे है बापदादा मेरी ही ओर... इन्तजार के लम्हों पर एकाएक विराम सा लग गया है*... और मैं बापदादा संग उड चला सूक्ष्म वतन की ओर नन्हें हाथों में उनकी उगँली थामें हुए...

 

 _ ➳  सूक्ष्म वतन में बापदादा के सम्मुख बैठा हूँ मैं... और बापदादा समझा रहे है... *सेवा और स्व स्थिति का बैलेन्स रखना है सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली ब्राह्मण आत्माओं से ब्लैसिंग लेनी है, अनेक जन्म में दुआए देनी है मगर इस जन्म में लेनी है...* मैं फरिश्ता सब कुछ ध्यान पूर्वक सुनता हुआ... अब मैं और बापदादा विश्व सेवा पर... ग्लोब के ऊपर खडा हूँ मैं, ठीक मेरे पीछे मेरी छत्रछाया बने बापदादा... बापदादा के हाथों में मेरे दोनों हाथ, शान्ति की, पावनता की, शक्तिशाली किरणें बापदादा से लेकर ग्लोब पर बिखराता हुआ... प्रकृति को सकाश देता हुआ... और साक्षी होकर अपनी ऊँची स्थिति को देखता हुआ... मैं देख रहा हूँ पूरे ग्लोब पर प्रकाश का प्रसरण... सचमुच ऊँचाई पर स्थित होकर ही मैं ऐसा कर पा रहा हूँ...

 

 _ ➳  *तभी सागर में उठती मनोरम लहरों से आकर्षित होता हुआ मैं उतर जाता हूँ सागर के किनारें पर मगर ये क्या?* मेरी शक्तियाँ तो सीमित होती जा रही है, मैं स्वयं को अशक्त सा महसूस करने लगा हूँ... सागर में भयंकर लहरों का उत्पात... *मैं शान्ति की किरणें भेज रहा हूँ... मगर मेरी कोशिशें असर हीन सी साबित हो रही है... घबराकर मैं देख रहा हूँ बापदादा की ओर... ग्लोब पर खडे बापदादा मुस्कुरा रहे है मुझे देखकर... मगर ये मुस्कान मेरी गलती का एहसास कराने वाली मुस्कान है... मैं समझ गया हूँ, सेवा में स्व स्थिति का बैलैन्स कैसे रखना है...* बापदादा के पास उडकर वापस लौटता हुआ मैं... फिर से ग्लोब पर, और फिर से बाबा के हाथों में मेरे हाथ... और शान्त होती सागर की लहरें...

 

 _ ➳  *मेरे पास लौटकर आती हुई दुआएं, मैं भरपूर महसूस कर रहा हूँ स्वयं को* मन के निर्मल गगन में विचरता द्वापर युगीन विमान... स्वयं को इस विमान पर सवार, द्वापर युग में देख रहा हूँ... भव्य राजमहलों और मन्दिरों को अपने आँगन में सजाये ये द्वापर युग... स्वर्ण कलश से सुशोभित सुनहरी आभा छिटकाता मेरा भव्य और विशाल मन्दिर... और मन्दिर के गर्भ गृह में दिव्य प्रकाश फैलाती मेरी पावन प्रतिमा... मगंल गायन करते भक्त जन... घन्टे और घडियाल बजाते पुजारी... और *द्वार पर भक्तों की लंबी कतार... और मन्द मन्द मुस्कुरातें हुए एक एक भक्त की मनोकामनाओं को पूरा करता हुआ मैं...* भक्तों की कतार कम होने का नाम नही ले रही... मगर मैं बडी उदारता से सबकी मनोकामनाएं पूरा करता जा रहा हूँ, और अब मैं आत्मा लौट आयी हूँ वापस उसी देह में... सेवा और स्वस्थिति का बैलेन्स का गहरा अनुभव लिए... ओम शान्ति...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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