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 15 / 10 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सिर्फ एक की ही याद में रहे ?*

 

➢➢ *स्वदर्शन चक्रधारी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *करन-करावनहार की स्मृति द्वारा सहजयोग का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *इच्छाओं को पीठ दिखाई ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे आपकी रचना कछुआ सेकेण्ड में सब अंग समेट लेता है। समेटने की शक्ति रचना में भी है। आप मास्टर रचता समेटने की शक्ति के आधार से सेकेण्ड में सर्व संकल्पों को समाकर एक संकल्प में सेकेण्ड में स्थित हो जाओ। *जब सर्व कर्मेन्द्रियों के कर्म की स्मृति से परे एक ही आत्मिक स्वरूप में स्थित हो जायेंगे तब कर्मातीत अवस्था का अनुभव होगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं स्वदर्शन चक्रधारी हूँ"*

 

  अपने को सदा स्वदर्शन-चक्रधारी समझते हो? स्व का दर्शन हो गया है ना? *आत्मा का इस सृष्टि-चक्र में क्या-क्या पार्ट है, उनको जानना अर्थात् स्वदर्शन-चक्रधारी बनना। स्वदर्शन-चक्रधारी आत्मा सदा माया से मुक्त है।*

 

  *स्वदर्शन-चक्रधारी ही बाप के प्रिय हैं क्योंकि ज्ञानी तू आत्मा बन गये ना। स्व के चक्र को जानना अर्थात् ज्ञानी तू आत्मा बनना। जो स्वदर्शन चक्रधारी हैं, उनके आगे माया ठहर नहीं सकती। वह सहज ही माया को समाप्त कर देते हैं।* तो सभी स्वदर्शन-चक्रधारी हो या कभी-कभी चक्र गिर जाता है?

 

  *ज्ञान को बुद्धि में धारण करना अर्थात् स्वदर्शन-चक्र चलाना। 'स्वदर्शन चक्र ही भविष्य में चक्रवर्ती राजा बनायेगा'। तो यह वरदान सदा याद रखना।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  कर्मातीत स्थिति के समीप आ रहे हैं। कर्म भी वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। लेकिन *कर्मातीत अर्थात कर्म के किसी भी बंधन के स्पर्श से न्यारे।* ऐसा ही अनुभव बढ़ता रहे। जैसे मुझ आत्मा ने इस शरीर द्वारा कर्म किया ना, ऐसे ही न्यारा-पन रहे।

 

✧  न कार्य के स्पर्श करने का और करने के बाद जो रिजल्ट हुई - उस फल को प्राप्त करने में भी न्यारा-पना कर्म का फल अर्थात जो रिजल्ट निकलती है उसका भी स्पर्श न हो, बिल्कुल ही न्यारा-पन अनुभव होता रहे।

 

✧  जैसे कि *दूसरे कोई ने कराया और मैंने किया।* किसी ने कराया और मैं निमित बनी। लेकिन *निमित बनने में भी न्यारा-पना ऐसी कर्मातीत स्थिति बढ़ती जाती है* - ऐसा फील होता है?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *बापदादा आपके आफिस का भी चक्कर लगाते हैं। कैसे काम कर रहे हैं। बहुत बिजी रहते हैं ना।* अच्छी तरह से आफिस चलती है ना! जैसे एक सेकण्ड में साधन यूज करते हो ऐसे ही बीच-बीच में कुछ समय साधना के लिए भी निकालो। सेकण्ड भी निकालो। *अभी साधन पर हाथ है और अभी-अभी एक सेकण्ड साधना बीच-बीच में अभ्यास करो।* जैसे साधनों में जितनी प्रेक्टिस करते हो तो ऑटोमेटिक चलता रहता है ना। ऐसे एक सेकण्ड में साधना का भी अभ्यास हो। *ऐसे नहीं टाइम नहीं मिला, सारा दिन बहुत बिजी रहे। बापदादा यह बात नहीं मानते हैं। क्या एक घण्टा साधन को अपनाया, उसके बहुत में क्या ५६ सेकण्ड नहीं निकाल सकते?* ऐसा कोई बिजी है जो ५ मिनट भी नहीं निकाल सके, ५ सेकण्ड भी नहीं निकाल सके। *ऐसा कोई है? निकाल सकते हैं?*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  स्वयं को आशिक समझ एक माशूक को याद करना"*

 

_ ➳  बहुत ही खुबसूरत ऊँची पहाड़ी पर खड़ी मै आत्मा... चाँद की शीतल चाँदनी का आनन्द लेते हुए मीठे बाबा की प्यारी यादो में खो जाती हूँ... कि *प्यारे बाबा ने जीवन में आकर मुझे कितना ऊँचा उठाया है.*.. मुझे क्या से क्या बना दिया है... गुणो और शक्तियो में सम्पन्न बनाकर, मन की ऊँची अवस्था में लाकर... शीतल स्वरूप की चाँदनी में रख... *मुझे कितना खुबसूरत आशिक बना दिया है..*. मीठे बाबा को अपनी भावनाये सुनाने मै आत्मा... सूक्ष्म वतन में मीठे बाबा की बाँहों में चली जाती हूँ...

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को सच्चे प्यार में डुबोते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... रूहानी माशूक बाबा आज अपने आशिको से मिलने आये है... *गुणो और शक्तियो के सागर कण्ठे पर... ऊँची स्थिति की पहाड़ी पर, और सदा शीतल स्वरूप की चांदनी में... दिल का गीत सुन रहे है.*..निरन्तर याद और यह रूहानी आशिक माशूक का सम्बन्ध् को सदा यादो में बसाये रखो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के प्यार में रोम रोम से डूबकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा भगवान को माशूक रूप में पाकर... इस कदर प्यार में बावरी हो जाउंगी... यह तो मेने कभी सोचा भी न था बाबा... *आपने तो जीवन में आकर, सच्चे प्रेम की बहार खिलाई है... मन तो जेसे प्यार की खुशबु में रोम रोम से भीगा भीगा सा है.*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को गुणो और शक्तियो के खजाने से सम्पन्न बनाते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... माशूक बाबा तो सागर है... इसलिए सागर से जितना चाहे उतना अथाह लेकर नम्बरवन बनो... *सदा मेरा बाबा में दिल की गहराइयो से खोये रहो... मेरा मेरा कह और जगह फेरे न लगाओ..*. जेसे माशूक प्यारा है, सजा संवरा है, ऐसे ही गुणो और शक्तियो से सजे संवरे चमकीली ड्रेस में माशूक संग... समान बन मुस्कराओ

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के रूहानी प्यार को मन बुद्धि में समाकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे दुलारे बाबा... *आपने अपनी आशिकी के रंग में... मुझ आत्मा को रंगकर, कितना खुबसूरत और प्यारा बना दिया है.*.. काली दागो वाली ड्रेस की जगह... चमकीली सुंदर फ़रिश्ता ड्रेस पहनाकर अपना आशिक सजाया है... वाह कितना प्यारा यह मेरा भाग्य है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को आप समान बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... *सदा माशूक समान हल्के बनो तो ही संग उड़ साथ जा सकेंगे.*.. यादो में रह व्यर्थ के सारे बोझों के भारीपन को समाप्त करो... अभी अभी निराकारी, अभी अव्यक्त फ़रिश्ता, अभी कर्मयोगी,अभी सेवाधारी, यह अभ्यास निरन्तर बढ़ाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में खुबसूरत आशिक बनी मुस्कराती हुई कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा देहभान में कितनी काली और दागो से भर गयी थी... *आपने मीठे बाबा मुझे अपने प्यार में कितना सुंदर चमकीला बना दिया है.*.. और हाथ पकड़ कर संग ले चलने को सजा दिया है..." मीठे बाबा से अथाह प्यार पाकर, यूँ सज संवर कर मै आत्मा... अपने स्थूल वतन में आ गयी...

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- स्वदर्शन चक्रधारी बनना है*"

 

 _ ➳  इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर अपने सर्वश्रेष्ठ पार्ट को मैं जैसे ही साक्षी होकर देखती हूँ जीवन बिल्कुल सहज लगने लगता है। *क्या, क्यो और कैसे के सभी सवालों से मुक्त एक बहुत ही प्यारी और न्यारी स्थिति में मैं सहज ही स्थित हो जाती हूँ और इस स्थिति में स्थित होते ही मेरे तीनो काल पास्ट, प्रेजन्ट और फ्यूचर, तथा मेरे 84 जन्मो का चक्र स्वत: ही मेरी बुद्धि में फिरने लगता है*। अपने तीनो कालों और 84 जन्मो के चक्र को स्मृति में लाकर अब मैं त्रिकालदर्शी और स्वदर्शन चक्रधारी बन मन बुद्धि रूपी नेत्रों से अपने तीनो कालो और 84 जन्मो में बजाए अपने सर्वश्रेष्ठ पार्ट को भिन्न - भिन्न स्वरूपों में बिल्कुल स्पष्ट देख रही हूँ।

 

 _ ➳  अपने अनादि स्वरूप में मैं स्वयं को देख रही हूँ परमधाम, लाल प्रकाश से प्रकाशित आत्माओं की निराकारी दुनिया में जहां देह और देह की दुनिया का कोई संकल्प नही, केवल चारों और जगमग करती चमकती हुई मणिया हैं। *ऐसे पवित्र प्रकाश की दुनिया में अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप में मैं स्वयं को देख रही हूँ*। रीयल गोल्ड के समान चमकते अपने स्वरूप को देख मैं मन्त्रमुग्ध हो रही हूँ।

 

 _ ➳  अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान रीयल गोल्ड स्वरुप में मैं आत्मा परमधाम से नीचे आ रही हूँ और एक सम्पूर्ण सतोप्रधान दैवी दुनिया में प्रवेश कर रही हूँ। *यहां आकर अब मैं अपना सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई शरीर रूपी वस्त्र धारण करती हूँ। देव कुल की सर्वश्रेष्ठ आत्मा के रूप में मेरा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट प्रारम्भ होता है*। असीम सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर, प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस अति खूबसूरत सृष्टि पर अपना खूबसूरत पार्ट बजाने के बाद अब मेरे पूज्य स्वरूप का पार्ट प्रारम्भ होता है।

 

 _ ➳  मैं देख रही हूँ स्वयं को कमल आसन पर विराजमान, शक्तियों से संपन्न अष्ट भुजाधारी दुर्गा के रूप में। *मेरे सामने मेरे भक्त मेरी आराधना कर रहें हैं। मेरे दर्शन पाने के लिए घण्टों लम्बी - लम्बी लाइन में खड़े इंतजार कर रहें हैं*। मेरे दिव्यता से भरपूर नयन उन्हें सुख, शांति की अनुभूति करवा रहें हैं। मेरे वरदानी हस्तों से निकल रहे वरदान उनकी हर मनोकामना को पूर्ण कर रहें हैं। *अपने पूज्य स्वरूप के बाद अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप को देख रही हूँ*।

 

 _ ➳  स्वयं परमपिता परमात्मा के मुख कमल द्वारा हुए अपने ब्राह्मण जन्म की उपलब्धियों और प्राप्तियों का अनुभव करते - करते मन ही मन अपने सर्वश्रष्ठ भाग्य का मैं गुणगान करती हूँ। *जिस भगवान को पाने के लिए सारी दुनिया भटक रही है वो भाग्यविधाता बाप मुझे इतनी सहज रीति घर बैठे मिल जाएगा यह तो मैंने कभी स्वप्न में भी नही सोचा था*। कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो भगवान ने स्वयं मुझे अपना बना लिया। 

 

 _ ➳  अपने ब्राह्मण जीवन की अखुट प्राप्तियों को स्मृति में लाकर, उनके अनुभव में खोई असीम आनन्द लेकर अब मैं अपने डबल लाइट फ़रिश्ता स्वरूप को देख रही हूँ। *मेरे अंग - अंग से निकल रही श्वेत रश्मियां चारों और फैल रही हैं। प्रकाश के एक बहुत सुंदर कार्ब में मैं फ़रिश्ता अपने प्यारे परमपिता परमात्मा का संदेशवाहक बन विश्व की सर्व आत्माओं को परमात्मा के इस धरा पर अवतरित होने का संदेश दे रहा हूँ*। 

 

 _ ➳  अपने इन पांचो स्वरूपों में अपने 84 जन्मो और तीनों कालों के खूबसूरत पार्ट को देख मैं स्वयं में एक अद्भुत शक्ति के संचार का अनुभव कर रही हूँ। सृष्टि चक्र के ज्ञान से त्रिकालदर्शी और स्वदर्शन चक्रधारी बन माया के हर वार का सामना करना अब मुझे सहज लगने लगा है इसलिए *अपने इस ब्राह्मण जीवन मे अब मैं अपने इन स्वरूपों के

के चक्र को बुद्धि द्वारा फिराते हुए, और अपने तीनों कालों को देखते हुए इस बात को सदैव स्मृति में रखती हूँ कि मेरा बीता हुआ कल भी श्रेष्ठ था, आज भी श्रेष्ठ है और आने वाला कल भी श्रेष्ठ है। यह स्मृति मेरी स्व स्थिति को शक्तिशाली बना कर अब हर परिस्थिति पर मुझे सहज ही विजय दिला रही है*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं करन - करावनहार की स्मृति द्वारा सहजयोग का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सफलतामूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *इच्छाएं जो परछाई के समान हैं, मैं आत्मा सदा उनसे पीठ कर देती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव उन इच्छाओं को पीछे-पीछे आते अनुभव करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा इच्छा मात्रम् अविद्या हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  चारों ओर की सेवाओं के समाचार बापदादा सुनते रहते हैं और दिल से सभी अथक सेवाधारियों को मुबारक भी देते हैं, सेवा बहुत अच्छे उमंग-उत्साह से कर रहे हैं और आगे भी करते रहो लेकिन सेवा और स्थिति का बैलेन्स थोड़ा -सा कभी इस तरफ झुक जाता हैकभी उस तरफ इसलिए सेवा खूब करो, *बापदादा सेवा के लिए मना नहीं करते और जोर-शोर से करो लेकिन सेवा और स्थिति का सदा बैलेन्स रखते चलो।* स्थिति बनाने में थोड़ी मेहनत लगती है और सेवा तो सहज हो जाती है। इसलिए सेवा का बल थोड़ा स्थिति से ऊंचा हो जाता है। *बैलेन्स रखो और बापदादा कीसर्व सेवा करने वाले आत्माओं कीसंबंध-सम्पर्क में आने वाले ब्राह्मण परिवार की ब्लैसिंग लेते चलो।* यह दुआओं का खाता बहुत जमा करो।

 

 _ ➳  *अभी की दुआओं का खाता आप आत्माओं में इतना सम्पन्न हो जाए जो द्वापर से आपके चित्रों द्वारा सभी को दुआयें मिलती रहेंगी। अनेक जन्म में दुआयें देनी हैं लेकिन जमा एक जन्म में करनी हैं।* इसलिए क्या करेंगेस्थिति को सदा आगे रख सेवा में आगे बढ़ते चलो। क्या होगा, यह नहीं सोचो।ब्राह्मण ब्राह्मण आत्माओं के लिए अच्छा हैअच्छा ही होना है। लेकिन बैलेन्स वालों के लिए सदा अच्छा है। बैलेन्स कम तो कभी अच्छाकभी थोड़ा अच्छा। सुना क्या करना हैक्वेश्चन मार्क सोचने के हिसाब से आश्चर्यवत होके सोचने को फिनिश करो, यह तो नहीं होगायह तो नहीं होगा....। वह स्थिति को नीचे ऊपर करता है। समझा।

 

✺   *ड्रिल :-  "सेवा और स्थिति का बैलेन्स करना"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा मन और बुद्धि से शक्ति स्तम्भ पर... शक्तियों के सुरक्षित घेरे के अन्दर... *शिव बिन्दु से आता लाल सुनहरें प्रकाश का तेजमेरी भृकुटी पर स्थित हो गया है...* मेरे मस्तिष्क में फैलता नीले रंग का प्रकाश मेरे हृदय स्थल में हरे रंग व उदर भाग में जाकर पीले रंग में बदल रहा है... पूरी ही देह सतरंगी प्रकाश की आभा से दमक रही है... आहिस्ता आहिस्ता मैं आत्मा देह से अलग होती हुई... देहभान से मुक्त मैं आकारी फरिश्ता... *सामने से मुस्कुराते आ रहे है बापदादा मेरी ही ओर... इन्तजार के लम्हों पर एकाएक विराम सा लग गया है*... और मैं बापदादा संग उड चला सूक्ष्म वतन की ओर नन्हें हाथों में उनकी उगँली थामें हुए...

 

 _ ➳  सूक्ष्म वतन में बापदादा के सम्मुख बैठा हूँ मैं... और बापदादा समझा रहे है... *सेवा और स्व स्थिति का बैलेन्स रखना है सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली ब्राह्मण आत्माओं से ब्लैसिंग लेनी है, अनेक जन्म में दुआए देनी है मगर इस जन्म में लेनी है...* मैं फरिश्ता सब कुछ ध्यान पूर्वक सुनता हुआ... अब मैं और बापदादा विश्व सेवा पर... ग्लोब के ऊपर खडा हूँ मैं, ठीक मेरे पीछे मेरी छत्रछाया बने बापदादा... बापदादा के हाथों में मेरे दोनों हाथ, शान्ति की, पावनता की, शक्तिशाली किरणें बापदादा से लेकर ग्लोब पर बिखराता हुआ... प्रकृति को सकाश देता हुआ... और साक्षी होकर अपनी ऊँची स्थिति को देखता हुआ... मैं देख रहा हूँ पूरे ग्लोब पर प्रकाश का प्रसरण... सचमुच ऊँचाई पर स्थित होकर ही मैं ऐसा कर पा रहा हूँ...

 

 _ ➳  *तभी सागर में उठती मनोरम लहरों से आकर्षित होता हुआ मैं उतर जाता हूँ सागर के किनारें पर मगर ये क्या?* मेरी शक्तियाँ तो सीमित होती जा रही है, मैं स्वयं को अशक्त सा महसूस करने लगा हूँ... सागर में भयंकर लहरों का उत्पात... *मैं शान्ति की किरणें भेज रहा हूँ... मगर मेरी कोशिशें असर हीन सी साबित हो रही है... घबराकर मैं देख रहा हूँ बापदादा की ओर... ग्लोब पर खडे बापदादा मुस्कुरा रहे है मुझे देखकर... मगर ये मुस्कान मेरी गलती का एहसास कराने वाली मुस्कान है... मैं समझ गया हूँ, सेवा में स्व स्थिति का बैलैन्स कैसे रखना है...* बापदादा के पास उडकर वापस लौटता हुआ मैं... फिर से ग्लोब पर, और फिर से बाबा के हाथों में मेरे हाथ... और शान्त होती सागर की लहरें...

 

 _ ➳  *मेरे पास लौटकर आती हुई दुआएं, मैं भरपूर महसूस कर रहा हूँ स्वयं को* मन के निर्मल गगन में विचरता द्वापर युगीन विमान... स्वयं को इस विमान पर सवार, द्वापर युग में देख रहा हूँ... भव्य राजमहलों और मन्दिरों को अपने आँगन में सजाये ये द्वापर युग... स्वर्ण कलश से सुशोभित सुनहरी आभा छिटकाता मेरा भव्य और विशाल मन्दिर... और मन्दिर के गर्भ गृह में दिव्य प्रकाश फैलाती मेरी पावन प्रतिमा... मगंल गायन करते भक्त जन... घन्टे और घडियाल बजाते पुजारी... और *द्वार पर भक्तों की लंबी कतार... और मन्द मन्द मुस्कुरातें हुए एक एक भक्त की मनोकामनाओं को पूरा करता हुआ मैं...* भक्तों की कतार कम होने का नाम नही ले रही... मगर मैं बडी उदारता से सबकी मनोकामनाएं पूरा करता जा रहा हूँ, और अब मैं आत्मा लौट आयी हूँ वापस उसी देह में... सेवा और स्वस्थिति का बैलेन्स का गहरा अनुभव लिए... ओम शान्ति...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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