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 15 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *परम आत्मा को स्नेह के बंधन में बाँधा ?*

 

➢➢ *अति प्यारे और अति न्यारे बनकर रहे ?*

 

➢➢ *शरीर की व्याधि का चिंतन तो नहीं चलाया ?*

 

➢➢ *अशरीरी बनने का अभ्यास किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  *किसी भी प्रकार का विघ्न बुद्धि को सताता हो तो योग के प्रयोग द्वारा पहले उस विघ्न को समाप्त करो।* मन-बुद्धि में जरा भी डिस्टरबेन्स न हो। *अव्यक्त स्थिति में स्थित होने का ऐसा अभ्यास हो जो रूह, रूह की बात को या किसी के भी मन के भावों को सहज ही जान जाये।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं रूहानी फरिश्ता हूँ"*

 

  सदा अपना रुहानी फरिश्तास्वरूप स्मृति में रहता? *ब्राह्मण सो फरिश्ता, फरिश्ता सो देवता - यह पहली हल कर ली है ना! पहेलियाँ हल करना आता है! सेकण्ड में ब्राह्मण सो देवता, देवता सो चक्र लगाते ब्राह्मण, फिर देखता।*

 

  *तो 'हम सो, सो हम' की पहेली सदा बुद्धि में रहती है? जो पहेजी हल करते उनहें ही प्राइज मिलती है। तो प्राइज मिली है ना! जो अभी मिली है, वह भविष्य में भी नहीं मिलेगी! प्राइज में क्या मिला है? स्वयं बाप मिल गया, बाप के बन गये।*

 

  *भविष्य की राजाई के आगे यह प्राप्ति कितना ऊंची है! तो सदा प्राइज लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ - इसी नशे और खुशी से सदा आगे बढ़ते रहो। पहेली और प्राइज दोनों स्मृति में सदा रहें तो आगे स्वत: बढ़ते रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *सभी आवाज से परे रहना सहज अनुभव करते हो वा आवाज में आना सहज अनुभव करते हो?* सहज क्या है? आवाज में आना या आवाज से परे होना? आवाज से परे होना अर्थात अशरीरी स्थिति का अनुभव होना। तो शरीर के भान में आना जितना सहज है, उतना ही अशरीरी होना भी सहज है कि मेहनत करनी पडती है

 

✧  सेकण्ड में आवाज में तो आ जाते हो लेकिन सेकण्ड में कितना भी आवाज में हो, चाहे स्वयं हो या वायुमण्डल आवाज का हो लेकिन सेकण्ड में फुलस्टॉप लगा सकते हो कि कॉमा लगेगी, फुलस्टॉप नहीं? इसको कहा जाता है फरिश्ता वा *अव्यक्त स्थिति की अनुभूति में रहना, व्यक्त भाव से सेकण्ड में परे हो जाना।*

 

✧  *इसके लिए ये नियम रखा हुआ है कि सारे दिन में ट्रैफिक ब्रेक का अभ्यास करो।* ये क्यों करते हो? कि ऐसा अभ्यास पक्का हो जाये जो चारों ओर कितना भी आवाज का वातावरण हो लेकिन एकदम ब्रेक लग जाये।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *कोई भी सामने आये तो उनको यह नयन बल्ब दिखाई पड़े। ज्योति ही ज्योति दिखाई दे। जैसे अन्धियारे में सच्चे हीरे चमकते हैं ना? जैसे सर्च लाइट होती है बहुत फोर्स से और अच्छी रीति फैलाते हैं इस रीति से मस्तक के लाइट का साक्षात्कार एक-एक से होना है। तब कहेंगे यह तो जैसे फ़रिश्ता है।* साकार में नयन, मस्तक और माथे के क्राउन के साक्षात्कार स्पष्ट होंगे। नयनों तरफ़ देखते देखते लाइट देखेंगे। *तुम्हारी लाइट को देख दूसरे भी जैसे लाइट हो जायेंगे। कितना भी मन से वा स्थिति में भारीपन हो लेकिन आने से ही हल्का हो जाये। ऐसी स्टेज अब पकड़नी है।* क्योंकि आप लोगों को देख कर और सभी भी अपनी स्थिति ऐसी करेंगे। अभी से ही अपना गायन सुनेंगे। द्वापर का गायन कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन ऐसे साक्षात्कारमूर्त और साक्षात् मूर्त बनने से अभी का गायन अपना सुनेंगे।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺  *"ड्रिल :- कर्मातीत स्थिति को पाना"*

 

_ ➳  *अमृत की वेला में मनमोहक-मनभावन परम आन्दमय प्रभु मिलन का आनन्द लेकर मै आत्मा... मीठे बाबा के प्यार भरे गीत गुनगुनाती हुई... टहलते हुए... सूर्य को, धरती को, आलिंगन करती, नई नवेली रंग-बिरंगी किरणों को निहार रही हूँ... और विचार कर रही हूँ... कि ज्ञान सूर्य बाबा ने मुझ आत्मा को... गले लगाकर... मुझे गुणों और शक्तियो से कितना सजा दिया है...और श्रृंगारित करके मुझ आत्मा को सीधे अपने दिल में सजा दिया है...* बाबा के दिल की प्यारी राजदुलारी बनकर... मै आत्मा, अपने मीठे भाग्य पर बलिहार हूँ... आज मै आत्मा, बाबा के दिल में रहती हूँ, मीठी बाते करती हूँ, दिल की हर बात बताती हूँ.... उस के साथ हंसती मुस्कुराती हूँ..... इन मीठे अहसासो ने जनमो के दुःख ही विस्मृत कर दिए है... अब सुख ही सुख मेरे चारो ओर बिखरा है... वाह मेरा भाग्य जो सपने में भी नहीं सोचा था उसे साकार में पाया है... यही मनभावन जज्बात मीठे बाबा को सुनाने वतन में उड़ चलती हूँ...

 

_ ➳  *ज्ञान सागर बाबा ज्ञान का प्रकाश मुझ आत्मा पर डालते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे मेरे... समय की है अन्तिम वेला जरा गहरे से अब आप गौर फरमाओं... समय की इस अन्तिम वेला में कर्मातीत तुम बन जाओ... *बच्चे गफलत छोड़ इस सच्चे सच्चे पुरूषार्थ में जुट जाओ... कर्मातीत बनने की मंजिल पर पहुंचने के लिए उड़ान जरा जोर से लगाओ..."*

 

  *ज्ञान के प्रकाश को स्वयं में समाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ :-*  "मीठे-मीठे लाडले ओ बाबा मेरे... आप की इस गहरी सी समझानी को बुद्धि में बिठा रही हूँ... *कर्मातीत बनने के सच्चे-सच्चे पुरूषार्थ की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही हूँ... कर्मातीत स्थिति के प्रवाह में बहती जा रही हूँ...* उड़ता पंछी बन अन्दर से अब मुस्कुरा रही हूँ..."

 

_ ➳  *ज्ञान रत्नों से मुझ आत्मा को सजाते हुए रत्नाकर बाबा बोले :-* "मीठे मीठे सिकीलधे प्यारे बच्चे मेरे... समाने और समेटने की शक्तियों को अब तुम कार्य में लगाओ... और कर्मातीत बन जाओ... *उड़ता पंछी बन खुले आसमा में बाहे फैलाओं... जरा अटेंशन देकर बच्चे तुम अब कर्मातीत स्थिति बनाने के पुरूषार्थ में लग जाओ..."*

 

  *ज्ञान रत्नों से सज-धज कर मैं आत्मा कहती हूँ :-* "राजदुलारे प्यारे बाबा मेरे... अटेंशन से कर्मातीत स्थिति के पुरूषार्थ में जुट गई हूं... समाने और समेटने की शक्तियों को कार्य में लगाए रही हूँ... अपनी स्थिति द्वारा सत्यता का प्रकाश फैला रही हूं... उड़ता पंछी बन आसमा में बाहें फैला रही हूँ... *कर्मों के बन्धन से भी मुक्त होने का अनुभव औरों को करा रही हूँ... इस प्रकार अपनी कर्मातीत स्थिति की ओर कदम बढ़ा रही हूँ..."*

 

_ ➳  *ज्ञान की रिमझिम वर्षा करते हुए मीठे बाबा मुझ आत्मा से कहते है :-* "मीठे प्यारे-प्यारे बच्चे मेरे... *कर्मातीत स्टेज को अब तुम नजदीक लाओ... बच्चे अटेंशन से अब इस पुरूषार्थ में लग जाओ... अपनी इस अन्तिम अवस्था की तरफ अब तेजी से दौड़ी लगाओ...* जीवन की प्रयोगशाला में समेटने और समाने की शक्ति को प्रयोग में ला कर्मातीत स्थिति में स्थित हो जाओ..."

 

  *ज्ञान की रिमझिम वर्षा में भीगकर मैं आत्मा कहती हूँ :-* "लाडले ज्ञान सागर बाबा मेरे... सुन के आपकी ये गहरी सी समझानी अटेंशन से इस पुरुषार्थ में जुट गई हूँ... *जीवन रूपी प्रयोगशाला में समाने और समेटने की शक्ति को प्रयोग में लाकर कर्मातीत स्थिति को नजदीक ला रही हूँ...* मुक्त पंछी बन उड़ती जा रही हूँ... तेजी से इस पुरूषार्थ में आगे बढ़ती जा रही हूँ... इस पुरूषार्थ में सफलता पा रही हूँ..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अशरीरी बनने का अभ्यास करना*

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता के मधुर महावाक्यों को स्मृति में लाकर मैं एकांत में बैठ उन पर विचार सागर मंथन करते हुए, इस नश्वर देह और देह से जुड़े सम्बन्धों के बारे में चिंतन करते, अपने आप से ही सवाल करती हूँ कि जिस देह और देह की दुनिया, देह के सम्बन्धो, देह के पदार्थो के पीछे आज तक मैं भागती रही, उनसे मुझे क्या मिला! सिवाय दुख और अशांति के और कुछ भी इनसे मुझे प्राप्त नही हुआ। *लेकिन मेरे प्यारे बाबा ने आकर मुझे एक ही सेकण्ड में उस अविनाशी सुख और शांति को पाने का कितना सहज रास्ता बता दिया। शरीर मे होते सब से तैलुक तोड़ अशरीरी बनने का अनुभव कितना निराला कितना सुखदाई है*। सेकेण्ड में मन को सुकून और शांति देने वाला है। जिस विनाशी देह और दुनियावी सम्बन्धो में मैं रस ढूंढ रही थी उनमें कोई सार है ही नही। ये सारा संसार ही असार संसार है। *अगर सार है तो केवल अपने स्वरूप में स्थित हो अशरीरी बन अपने प्यारे पिता की याद में है*। इसलिए इस शरीर में होते हुए भी अब मुझे सबसे तैलुक तोड़, अशरीरी बनने का पुरुषार्थ निरन्तर करना है।

 

_ ➳  मन ही मन इस संकल्प को दृढ़ता का ठप्पा लगा कर अब मैं सभी बातों से अपने मन और बुद्धि को हटाती हूँ और अपने ध्यान को एकाग्र करके अशरीरी बनने का अभ्यास करती हूँ। *शरीर के सभी अंगों से धीरे - धीरे चेतना को समेट कर अपने ध्यान को अपने स्वरूप पर एकाग्र करते ही मैं स्वयं को बोडिलेस अनुभव करने लगती हूँ। स्वयं को मैं इतना रिलेक्स अनुभव कर रही हूँ कि लगता है जैसे मैं देह में हूँ ही नही*। भृकुटि के बीच चमकती एक अति सूक्ष्म ज्योति को मैं देख रही हूँ जो बहुत ही प्रकाशवान है। देह से न्यारे अपने इस अति सूक्ष्म, सुन्दर स्वरूप को देख, इसके अंदर समाये गुणों और शक्तियों का अनुभव मुझे आनन्दविभोर कर रहा है। *अपने इस स्वरूप से अनजान मैं आत्मा आज अपने इस सत्य स्वरुप का अनुभव करके तृप्त हो गई हूँ*।

 

_ ➳  मन ही मन अपने प्यारे पिता का मैं शुक्रिया अदा कर रही हूँ जिन्होंने आकर मेरे इस अति सुन्दर स्वरूप की पहचान मुझे दी। *सबसे तैलुक तोड़ अशरीरी बन अपने इस सुंदर स्वरूप को देखने और अनुभव करने का सहज तरीका यह राजयोग मुझे सिखलाकर मेरे प्यारे पिता ने मेरे जीवन को सुखमय, शांतिमय और आनन्दमय बना दिया*। अपने प्यारे बाबा का बारम्बार धन्यवाद करते हुए अब मैं अशरीरी आत्मा नश्वर देह का भी आधार छोड़ उससे बाहर निकलती हूँ और देह से पूरी तरह अलग हो कर, अपने जड़ शरीर को अपने सामने पड़ा हुआ मैं देख रही हूँ किन्तु उससे अब कोई भी अटैचमेंट मुझे महसूस नही हो रही। *साक्षी हो कर मैं उसे देख रही हूँ और धीरे - धीरे उससे दूर होती जा रही हूँ। ऊपर आकाश की ओर अब मैं उड़ रही हूँ और अपने प्यारे बाबा के पास उनके धाम जा रही हूँ*।

 

_ ➳  देह, देह की दुनिया, देह के वैभवों, पदार्थो के आकर्षण से मुक्त होकर, निरन्तर ऊपर की ओर उड़ते हुए मैं आकाश को पार करती हूँ और उससे भी परें सूक्ष्म लोक को पार कर पहुँच जाती हूँ आत्माओं की उस निराकारी दुनिया मे जहाँ मेरे मीठे शिवबाबा रहते हैं। *लाल प्रकाश से प्रकाशित, चैतन्य सितारों से सजे अपने स्वीट साइलेन्स होम में पहुँच कर मैं आत्मा एक गहन मीठी शांति का अनुभव कर रही हूँ*। मेरे पिता मेरे बिल्कुल सामने है। उनसे मिलन मनाकर मैं असीम तृप्ति का अनुभव कर रही हूँ। बड़े प्यार से अपने पिता के सुंदर मनमोहक स्वरूप को निहारते हुए मैं धीरे - धीरे उनके समीप जा रही हूँ और उनकी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में समा कर उनके अथाह निस्वार्थ प्यार से स्वयं को भरपूर कर रही हूँ। 

 

_ ➳  प्यार के सागर अपने प्यारे बाबा के प्रेम की गहराई में खोकर मैं उनके बिल्कुल समीप होती जा रही हूँ। इतना समीप कि ऐसा लग रहा है जैसे मैं बाबा में समाकर बाबा का ही रूप बन गई हूँ। *यह समीपता मेरे अंदर मेरे प्यारे पिता की सर्वशक्तियों का बल भरकर मुझे असीम शक्तिशाली बना रही है*। स्वयं को मैं सर्वशक्तियों का एक शक्तिशाली पुंज अनुभव कर रही हूँ।  सर्व शक्ति सम्पन्न स्वरूप बन कर अब मैं फिर से कर्म करने के लिए अपने कर्मक्षेत्र पर लौट आती हूँ। फिर से देह रूपी रथ पर विराजमान होकर शरीर निर्वाह अर्थ हर कर्म अब मैं कर रही हूँ किन्तु इस स्मृति में स्थित होकर कि मैं देह से न्यारी हूँ। *ईश्वरीय सेवा अर्थ मैंने ये शरीर रूपी चोला धारण किया है बुद्धि में यह धारण कर, शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करने के लिए देह में आना और फिर कर्म करके देह में होते भी, देह से न्यारे अपने निराकार बिंदु स्वरूप में स्थित हो कर, अशरीरी हो जाना, यह अभ्यास अब मैं घड़ी - घड़ी करती रहती हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं पुराने खाते समाप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं नये संस्कारो रूपी नये वस्त्र धारण करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं बाप समान सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा शुद्ध संकल्प का खजाना सदा जमा करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा व्यर्थ संकल्पों में समय गंवाने से सदा मुक्त हूँ  ।*

✺   *मैं सदा समर्थ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. यह सब साधन आप बच्चों की सेवा के सहयोग के लिए निकले हैं। *ब्रह्मा बाप जब समाचार सुनते हैं - यह ई-मेल हैये यह है, तो खुश होते हैं कि वाह बच्चेवाह!* इतना सहज साधन ब्रह्मा बाप को भी साकार में नहीं मिला लेकिन बच्चों के पास हैं। खुश होते हैं। *सिर्फ सेवा का साधन समझकर यूज करना। सेवा के लिए साधन है क्योंकि विश्व-कल्याण करना है तो यह भी साधन सहयोग देते हैं। साधनों के वश नहीं होना।* लेकिन साधन को सेवा में यूज करना। यह बीच का समय है जिसमें साधन मिले हैं। आदि में भी कोई इतने साधन नहीं थे और अन्त में भी नहीं रहेंगे। यह अभी के लिए हैं। सेवा बढ़ाने के लिए हैं। लेकिन यह साधन हैंसाधना करने वाले आप हो। *साधन के पीछे साधना कम नहीं हो।* बाकी बापदादा खुश होते हैं। बच्चों की सीन भी देखते हैं। फटाफट काम कर रहे हैं। बापदादा आपके आफिस का भी चक्कर लगाते हैं। कैसे काम कर रहे हैं। बहुत बिजी रहते हैं ना! अच्छी तरह से आफिस चलती है ना! *जैसे एक सेकण्ड में साधन यूज करते हो ऐसे ही बीच-बीच में कुछ समय साधना के लिए भी निकालो। सेकण्ड भी निकालो।*

 

 _ ➳  *अभी साधन पर हाथ है और अभी अभी एक सेकण्ड साधनाबीच-बीच में अभ्यास करो।* जैसे साधनों में जितनी प्रैक्टिस करते हो तो आटोमेटिक चलता रहता है ना। ऐसे एक सेकण्ड में साधना का भी अभ्यास हो। ऐसे नहीं टाइम नहीं मिलासारा दिन बहुत बिजी रहे। बापदादा यह बात नहीं मानते हैं। *क्या एक घण्टा साधन को अपनाया, उसके बीच में क्या 5-6 सेकण्ड नहीं निकाल सकतेऐसा कोई बिजी है जो 5 मिनट भी नहीं निकाल सके, 5 सेकण्ड भी नहीं निकाल सके।* ऐसा कोई हैनिकाल सकते हैं तो निकालो। बापदादा जब सुनते हैं आज बहुत बिजी हैंबहुत बिजी कह करके शक्ल भी बिजी कर देते हैं। बापदादा मानते नहीं हैं। जो चाहे वह कर सकते हो। अटेन्शन कम है। *जैसे वह अटेन्शन रखते हो ना - 10 मिनट में यह लेटर पूरा करना हैइसीलिए बिजी होते हो ना - टाइम के कारण।* ऐसे ही सोचो 10 मिनट में यह काम करना हैवह भी तो टाइम-टेबल बनाते हो ना। इसमें एक दो मिनट पहले से ही एड कर दो। *8 मिनट लगना है, 6 मिनट नहीं, 8 मिनट लगना है तो 2 मिनट साधना में लगाओ।* यह हो सकता है

 

✺   *ड्रिल :-  "साधन और साधना का बैलेन्स रखना"*

 

 _ ➳  इस संगम युग की सुहानी बेला में... एकान्त में बैठी हुई मैं आत्मा... अपनी शांत स्वरूप स्थिति का आनंद ले रही हूँ... *मैं शांत... घर शांत... शांत वातावरण... मेरा बाबा शांति का सागर...* मेरे बाबा ऊपर से मुझ पर शांति और स्नेह की किरणें बरसा रहे हैं... मुझे बहुत ही प्रेम से अपने पास बुला रहे हैं... मैं आत्मा अपने फरिश्ता स्वरूप में स्थित हो जाता हूँ... अपने बाबा से दिव्य मिलन मनाने के लिए उड़ जाता हूँ...

 

 _ ➳  मैं फरिश्ता स्वरूप आत्मा... फरिश्तों की दुनिया में... ब्रह्मा बाबा के सम्मुख पहुँच जाता हूँ... स्नेह भरी दृष्टि और दिव्य मुस्कान के साथ... बाबा मेरा स्वागत करते हैं... शिवबाबा भी परमधाम से आकर... उनकी भृकुटि पर विराजमान हो जाते हैं... बापदादा अपने वरदानी हस्त मेरे सिर पर रखते हैं... वरदानों के शक्तियों भरे फव्वारे से... मुझे भिगोकर सराबोर कर देते हैं... *साधन तथा साधना का बैलेंस रखते हुए बाबा से सफलता स्वरूप भव का वरदान प्राप्त कर...* मैं फरिश्ता अपने कर्म क्षेत्र में आ जाता हूं

 

 _ ➳  मैं आत्मा पांच तत्वों की इस देह में प्रवेश कर... साधनों को देख निश्चय कर रही हूँ... यह साधन तो विश्व कल्याण करने के लिए सेवा अर्थ हैं... सेवाओं को आगे बढ़ाने के लिए हैं... *सेवा करते करते भी अपनी साररूपी बीजस्वरूप की स्थिति की अनुभूति कर रही हूँ... औरों को भी सार स्वरूप की अनुभूति करा रही हूँ...* आदि-अंत में तो यह साधन होंगे नहीं... मैं आत्मा अभी के समय में... यह सेवा अर्थ साधन पुरुषार्थ को तीव्र करने के लिए यूज़ कर रही हूँ...

 

 _ ➳  अलौकिक सेवाओं में बिजी रहकर... मैं आत्मा व्यर्थ को पूर्ण रूप से त्याग कर... समर्थ आत्मा बन रही हूँ... हर सेकंड... हर संकल्प... हर बोल को सफल बनाकर... सफलतामूर्त बन रही हूँ... ज्ञान के अनमोल रत्नों को धारण कर... धारणा स्वरूप बन रही हूँ... *एक पल सेवार्थ साधन... दूसरे ही पल साधना का उत्तम अभ्यास स्वतः ही हो रहा है...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा ऑफिस में भी हर कर्म करते हुए... स्वस्थिति को चेक कर रही हूँ...  मुझे ज्ञात है... बापदादा मेरे ऑफिस का भी चक्कर लगाते हैं... मैं आत्मा विश्व कल्याणकारी सेवाओं के लिए साधनों को यूज़ कर रही हूँ... अलौकिक सेवा करते-करते... ईश्वरीय पढ़ाई में भी मग्न हो जाती हूँ... *साधन तथा साधना का बैलेन्स रखते हुए... पुरुषार्थ में तीव्रता लाकर... मैं आत्मा साधना स्वरूप बन गई हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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