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 16 / 04 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपना रजिस्टर अच्छा रखा ?*

 

➢➢ *माया के तूफानों की परवाह न कर कर्मेन्द्रिय जीत बनने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *सम्बन्ध और प्राप्तियों की स्मृति द्वारा सदा ख़ुशी में रहे ?*

 

➢➢ *देह भान से मुक्त होने का अभ्यास किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अब योगबल द्वारा आत्माओं को जगाने का कर्तव्य करो और सर्व शक्तिवान बाप की पालना का प्रत्यक्ष स्वरुप दिखाओ।* साकार रुप द्वारा भी बहुत पालना ली और अव्यक्त रुप द्वारा भी पालना ली, *अब अन्य आत्माओं की ज्ञान-योग से पालना करके उनको भी बाप के सम्मुख और समीप लाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कर्मयोगी आत्मा हूँ"*

 

  सेवा करते हुए सदा अपने को कर्मयोगी स्थिति में स्थित रहने का अनुभव करते हो कि कर्म करते हुए याद कम हो जाती है और कर्म में बुद्धि ज्यादा रहती है! *क्योंकि याद में रहकर कर्म करने से कर्म में कभी थकावट नहीं होती। याद में रहकर कर्म करने वाले कर्म करते सदा खुशी का अनुभव करेंगे।*

 

  कर्मयोगी बन कर्म अर्थात् सेवा करते हो ना! *कर्मयोग के अभ्यासी सदा ही हर कदम में वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ बनाते हैं। भविष्य खाता सदा भरपूर और वर्तमान भी सदा श्रेष्ठ। ऐसे कर्मयोगी बन सेवा का पार्ट बजाते हो। भूल तो नहीं जाता।*

 

  मधुबन में सेवाधारी हैं तो मधुबन स्वत: ही बाप की याद दिलाता है। *सर्व शक्तियों का खजाना जमा किया है ना! इतना जमा किया है जो सदा भरपूर रहेंगे। संगमयुग पर बैटरी सदा चार्ज है। द्वापर से बैटरी ढीली होती। संगम पर सदा भरपूर, सदा चार्ज है।* तो मधुबन में बैटरी भरने नहीं आते हो, स्वेज मनाने आते हो। बाप और बच्चों का स्नेह है इसलिए मिलना, सुनना, यही संगमयुग के स्वेज हैं।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आप कोई कार्य करते हो वा बात करते हो तो बीच - बीच में यह संकल्पों की ट्रैफिक को स्टाँप करना चाहिए। *एक मिनिट के लिए भी मन के संकल्पों को चाहे शरीर द्वारा चलते हुए कर्म को बीच में रोक कर भी यह प्रैक्टीस करनी चाहिए।*

 

✧  अगर यह प्रैक्टीस नहीं करेंगे तो बिन्दु रुप की पाँवरफुल स्टेज कैसे और कब ला सकेंगे? इसलिए यह अभ्यास करना आवश्यक है।

बीच - बीच में यह प्रैक्टीस प्रैक्टिकल में करते रहेंगे तो जो आज यह बिन्दु रुप की स्थिती मुश्किल लगती है वह ऐसे सरल हो जायेगी जैसे अभी मैजारिटी को अव्यक्त स्थिति सहज लगती है।

     

✧  पहले जब अभ्यास शुरु किया तो व्यक्त में अव्यक्त स्थिति में रहना मुश्किल लगता था। *अभी अव्यक्त स्थिति में रह कार्य करना जैसे सरल होता जा रहा है वैसे ही यह बिन्दु रुप की स्थिति भी सहज हो जायेगी*। अभी महारथियों को यह प्रैक्टिस करनी चाहिए। समझा।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *यह सोचो कि अगर देहभान का त्याग नहीं करेंगे अर्थात् देही अभिमानी नहीं बनेंगे तो भाग्य भी अपना नहीं बना सकेंगे संगमयुग का जो श्रेष्ट भाग्य है उनसे वंचित रहेंगे।* तो चेक करो - संकल्प के रूप में व्यर्थ संकल्प का कहाँ तक त्याग किया है? वृत्ति सदा भाई-भाई की रहनी चाहिए; उस वृत्ति को कहां तक अपनाया है और देह में देहधारी पन की वृत्ति का कहां तक त्याग किया है?

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बाप जो शिक्षायें देते हैं, उन्हें अमल में लाना"*

 

_ ➳  मीठे बाबा के कमरे में बैठी हुई मै आत्मा... आत्म चिंतन में खोयी अपने गुणो और खुशियो से सजे जीवन के बारे में सोचती हुई... मुझे ऐसा सुंदर सजाने वाले मीठे बाबा की ओर निहारती हूँ... *प्यारे बाबा ने अपनी सर्व शक्तियो और बेपनाह मुहोब्बत से सींचकर मुझ पर अपना सब कुछ लुटा दिया है... और रूहानियत से भरकर, मुझे कितना सुगन्धित कर दिया है... ऐसे प्यारे पिता को पाकर मै आत्मा... बलिहार हो गयी हूँ... और अपने मीठे भाग्य का गुणगान कर रही हूँ... दिल से ईश्वर पिता का धन्यवाद कर रही हूँ...*

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान की अमूल्य मणियो से सजाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता ने जो अमूल्य शिक्षाओ से संवारा है... ज्ञान रत्नों की अमीरी से भरपूर किया है...उस अमीरी की मुस्कान को पूरे जग में बिखेरो...* श्रीमत की धारणा कर, गुणवान फूल बनकर मुस्कराओ... मूल्यों की दौलत से सज संवर कर, ईश्वरीय प्यार में ख़ुशी से खिल जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की शिक्षाओ को पाकर खुशनुमा फूल बनकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार के साये तले पलकर, कितनी प्यारी और दिव्य हो गयी हूँ... *गुणो और शक्तियो से भरपूर होकर, अपने खोये वजूद को पुनः पा ली हूँ... ईश्वरीय शिक्षाओ को पाकर गुणो से महकता रूहानी गुलाब हो गयी हूँ..."*

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान मोतियो से सजाकर होलिहंस बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... मीठे बाबा ने आकर जो ईश्वरीय मत दी है उस मत पर चलकर, अथाह सुखो के मालिक बनकर, विश्व धरा पर मुस्कराओ... *ज्ञान को जीवन में धारण कर, जीवन सच्ची खुशियो का पर्याय बनाओ... जनमो के दुखो को भूल, ईश्वरीय प्यार में सदा खिलखिलाते हसंते मुस्कराते रहो..."*

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के प्यार में खुशियो संग खिलते हुए कहती हूँ :-* "मेरे सच्चे साथी बाबा... *आपने मेरा जीवन ज्ञान रत्नों से सजाकर, कितना दिव्य और पावन कर दिया है... आपकी श्रीमत के हाथो में मै आत्मा... अपने खोये मूल्यों को पाकर पुनः मालामाल हो रही हूँ...* सदा हर्षित रहकर देवताई मुस्कान से सज रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी प्यार भरी बाँहों में भरकर देवत्व से सजाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... देह के भान में आकर अपने सत्य स्वरूप को ही भूल गए हो... *अब अनमोल ज्ञान रत्नों में गहरे खोकर, खोयी चमक को फिर से पाकर, सदा के लिए नूरानी बन जाओ... सदा की मुस्कराहट से निखर कर, अपने सुंदर देवताई स्वरूप में खो जाओ*..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के असीम प्यार में गहरे खोकर कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... *मै आत्मा आपके प्यार भरी छत्रछाया में सुख शांति प्रेम से भरा दिव्य जीवन पा रही हूँ... सदा खुशियो की बहारो में झूम रही हूँ... और वरदानी संगम पर देवताई पावनता से भरती जा रही हूँ...* सदा की खुशियो की अधिकारी हो गयी हूँ... मीठे बाबा को अपने दिल की बात सुनाकर मै आत्मा... इस धरा पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अपना रजिस्टर अच्छा रखना है*"

 

_ ➳  बाबा के कमरे में बैठी, बाबा के चित्र को बड़े प्यार से निहारते हुए, मैं उनकी देन अपने इस ईश्वरीय ब्राह्मण जीवन के लिए मन ही मन उन्हें शुक्रिया अदा करते हुए उन अखुट प्राप्तियों को याद कर रही हूँ जो बाबा ने मुझे दी है। *उन अखुट प्राप्तियों को स्मृति में लाकर अपने बेरंग जीवन में खुशियों के रंग भरने वाले अपने दिलाराम बाबा के चित्र को निहारते हुए मैं महसूस करती हूँ जैसे बाबा के मुख मण्डल पर फैली मीठी मधुर मुस्कान मुझे कोई इशारा दे रही हैं और बाबा आंखों ही आंखों में मुझ से कुछ कह रहे हैं*। बाबा के अव्यक्त इशारे को समझने का प्रयास करते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे बाबा की अव्यक्त आवाज धीरे - धीरे मेरे कानों में सुनाई पड़ रही है।

 

_ ➳  बाबा कह रहे हैं, बच्चे-: "कभी कोई विकर्म करके अपने इस अमूल्य जीवन रूपी रजिस्टर पर दाग मत लगने देना। इसे कभी खराब नही होने देना। *जैसे एक विद्यार्थी अपनी स्टूडेंट लाइफ में पूरा ध्यान रखता है कि उससे ऐसा कोई भी गलत कर्म ना हो जिससे उसके चरित्र पर कोई आंच आये और उसका रजिस्टर खराब हो। ऐसे ही तुम्हारा ये ईश्वरीय जीवन पुरुषार्थी जीवन है जहाँ कदम - कदम पर सम्भल कर चलना पड़े एक छोटे से छोटी गलती भी रजिस्टर को दागी बना सकती है इसलिए अपनी बहुत सम्भल रखनी है*। बाबा के अव्यक्त इशारे को समझ कर, बाबा से ऐसा कोई भी कर्म ना करने का मैं प्रोमिस करती हूँ जो मेरे रजिस्टर को खराब करने के निमित बने।

 

_ ➳  अपने रजिस्टर को सदा साफ, स्वच्छ रखने का बाबा से वायदा करके, परमात्म बल से स्वयं को बलशाली बनाने के लिए अब मैं अपने सम्पूर्ण ध्यान को अपने मस्तक पर एकाग्र कर, अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होकर, अपने गुणों और शक्तियों की अनुभूति करते हुए, अपने पिता परमात्मा के पास  जाने वाली आंतरिक यात्रा पर चलने के लिए तैयार होती हूँ। *देह भान से न्यारी, मन बुद्धि की इस सुहावनी यात्रा पर चलने के लिए, मैं आत्मा भृकुटि के सिहांसन से उतर कर, देह रूपी मंदिर की गुफा से बाहर आती हूँ और एक दिव्य प्रकाश चारों ओर फैलाती हुई ऊपर नीले गगन की ओर चल पड़ती हूँ*।

 

_ ➳  अपने चारों और एक दिव्य प्रकाश के कार्ब को धारण किये हुए, मैं जगती ज्योति सेकण्ड में आकाश को पार करके, उससे ऊपर सूक्ष्म वतन को भी पार करके, मणियों की उस खूबसूरत दुनिया, अपने पिता परमात्मा के शान्तिधाम घर मे प्रवेश करती हूँ जहाँ चारो और शांति के अथाह वायब्रेशन्स फैले हुए हैं। *इन वायब्रेशन्स को अपने अंदर समा कर गहन शान्ति की अनुभूति करती हुई मैं धीरे - धीरे शांति के सागर अपने पिता के पास पहुँचती हूँ और उनकी एक - एक किरण को बड़े प्यार से निहारते हुए, उनकी किरणो रूपी बाहों के आगोश में समा जाती हूँ*। अपनी किरणों रूपी बाहों में भरकर, अपना असीम स्नेह मुझ पर लुटा कर बाबा मुझे तृप्त कर देते हैं और अपनी समस्त शक्तियों का बल मेरे अंदर भरकर मुझे शक्तिशाली बना देते हैं।

 

_ ➳  बाबा का असीम स्नेह पाकर, बाबा की शक्तियों को स्वयं में समाकर, सर्व शक्ति सम्पन्न स्वरूप बनकर, बाबा से किये हुए वायदे को पूरा करने के लिए मैं वापिस अपनी साकारी दुनिया में फिर से अपना पार्ट बजाने के लिए लौट आती हूँ। *अपने साकार शरीर रूपी रथ में भृकुटि के भव्य भाल पर बैठ, कर्मेन्द्रियों से कर्म करते, इस बात का अब मैं विशेष ध्यान देती हूँ कि जाने - अनजाने में भी मुझ से ऐसा कोई विकर्म ना हो जिससे मेरा रजिस्टर खराब हो*। अपने रजिस्टर को साफ स्वच्छ रखने के बाबा से किये हए अपने वायदे को निभाने के लिए, हर कदम श्रीमत प्रमाण चलने पर मैं पूरा अटेंशन दे रही हूँ। *कदम - कदम पर मम्मा, बाबा को फॉलो कर, मनसा - वाचा - कर्मणा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनने का अब मैं पूरा पुरुषार्थ कर, अपने रजिस्टर को कभी भी खराब ना होने देने की अपनी प्रतिज्ञा का पालन पूरी दृढ़ता और लग्न के साथ कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं संबंध और प्राप्तियों की स्मृति द्वारा सदा खुशी में रहने वाली सहजयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं देहभान से मुक्त बनकर दूसरे सब बंधन स्वतः खत्म होते हुए अनुभव करने वाली अशरीरी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  साधारण मैं-पन वा रायल मैं-पन दोनों का समर्पण किया है? किया है या कर रहे हैं? करना तो पड़ेगा ही... आप लोग आपस में हँसी में कहते हो ना, मरना तो पड़ेगा ही... *लेकिन यह मरना भगवान की गोदी में जीना है... यह मरना, मरना नहीं है... 21 जन्म देव आत्माओं के गोदी में जन्मना है...* इसीलिए खुशी-खुशी से समर्पित होते हो ना! चिल्ला के तो नहीं होते? नहीं। *भक्ति में भी चिल्लाया हुआ बलि स्वीकार नहीं होती है...* तो जो खुशी से समर्पित होते हैं, हद के मैं और मेरे में, वह जन्म-जन्म वर्से के अधिकारी बन जाते हैं...

 

✺   *ड्रिल :-  "मरना अर्थात भगवान की गोदी में जीने का अनुभव"*

 

 _ ➳  यह देह, देह की दुनिया और इस देह से जुड़े सम्बन्धों में लगाव, झुकाव और टकराव ही तो भगवान की गोद में जीने के सुख से वंचित करते हैं और *जो इस बात को अच्छी रीति जान जाते है कि देह और देह से जुड़ी कोई भी चीज हमे सच्चे सुख और शांति की अनुभूति कभी नही करवा सकती वो फिर इस दुनिया मे स्वयं को वंचित होने से बचा लेते हैं* और इस दुनिया से जीते जी मर कर भगवान की गोद मे जीने का सुख अनुभव करते हुए सदा अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलते रहते हैं... मन ही मन स्वयं से यह बातें करती मैं खो जाती हूँ अपने उस भगवान बाप की मीठी सी याद में जो मुझे सेकण्ड में परमात्म पालना का मीठा सा अनुभव करवा कर तृप्त कर देती है...

 

 _ ➳  मेरे संकल्प मात्र से ही मेरे शिव पिता परमात्मा अपनी शक्तिशाली किरणों की छत्रछाया रूपी गोद मे मुझे बिठा लेते हैं... मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ परमधाम से मेरे मीठे बाबा की सर्वशक्तियाँ सीधे मुझ आत्मा पर पड़ रही है और *अपने भगवान बाप की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी गोद मे बैठ मैं असीम आनन्द का अनुभव कर रही हूँ...* जैसे एक बच्चा माँ की गोद मे आते ही स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है और निश्चित हो जाता है ठीक उसी प्रकार परमात्म गोद में बैठ मैं आत्मा भी स्वयं को बेफिक्र अनुभव कर रही हूँ क्योकि *भगवान की गोद में बैठ कर मैं स्वयं को हर प्रकार के बोझ और बन्धन से मुक्त अनुभव कर रही हूँ...* यह बोझ मुक्त और निर्बन्धन स्थिति मुझे लाइट और माइट बना रही है...

 

 _ ➳  अपने भगवान बाप की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी गोद मे बैठ अब मैं अपने निराकार लाइट माइट स्वरूप में स्थित हो कर ऊपर आकाश की ओर जा रही हूँ... *परमात्म गोद का सुख लेते हुए सेकेंड में मैं इस पांच तत्वों की दुनिया को पार कर अपनी निराकारी दुनिया मे प्रवेश करती हूँ...* अपने शिव पिता परमात्मा की शक्तिशाली किरणों रूपी गोद से उतर कर अब मैं अपनी इस निराकारी दुनिया की सैर कर रही हूँ... इस पूरे परमधाम घर मे फैले मेरे शिव पिता से निरन्तर निकल रहे शांति के शक्तिशाली प्रकम्पन ऐसे लग रहे हैं जैसे *शांति की शीतल लहरे घड़ी - घड़ी पास कर मुझ आत्मा को गहन सुकून से भरपूर कर रही हैं...* जिस शांति की तलाश में आत्मा दो युगों से भटक रही थी वो गहन शांति पाकर अब जैसे मैं आत्मा तृप्त हो गई हूँ...

 

 _ ➳  अपने परमधाम घर की सैर करके, शांति की गहन अनुभूति करके अब मैं वापिस अपने निराकार भगवान बाप की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी गोद मे आ कर बैठ जाती हूँ और परमात्म गोद का सुख लेने लगती हूँ... *ऐसा लग रहा है जैेसे मेरी शिव माँ अपनी ममतामयी गोद मे मुझे बिठा कर, अपनी शक्तियों की शीतल छाया मुझ पर करते हुए मुझे धीरे - धीरे सहला रही है और अपनी शक्तियों से मुझे शक्तिशाली बना रही है...* परमात्म लाइट और माइट से मुझे भरपूर करके मेरे अंदर असीम बल भर रही है ताकि माया के किसी भी वार का मुझ पर कोई प्रभाव ना पड़ सके...

 

 _ ➳  परमात्म बल , परमात्म शक्तियों से भरपूर हो कर और परमात्म गोद के सुखद अनुभव के साथ अब मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया की ओर प्रस्थान करती हूँ... फिर से पांच तत्वों की दुनिया मे प्रवेश कर मैं अपने साकारी तन में विराजमान होती हूँ... *मेरा यह ब्राह्मण जन्म मरजीवा जन्म है, मेरे भगवान बाप की देन है इस बात को सदा स्मृति में रख, इस दुनिया से जीते जी मर कर अब मैं सम्पूर्ण समर्पण भाव से, अपना तन - मन - धन सब कुछ भगवान बाप पर समर्पण कर, पदमापदम सौभाग्यशाली बन, भगवान की गोदी में जीने के सुख का आनन्द हर पल ले रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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