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 16 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *श्रीमत पर शरीर निर्वाह करते हुए बाप ने जो होमवर्क दिया, उसे भी जरूर किया ?*

 

➢➢ *बाप को सर्व समाचार दे श्रीमत ली ?*

 

➢➢ *देह, सम्बन्ध और वैभवो के बंधन से स्वतंत्र रहे ?*

 

➢➢ *स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अभी समय प्रमाण बेहद के वैराग्य वृत्ति को इमर्ज करो। बिना बेहद के वैराग्य वृत्ति के सकाश की सेवा हो नहीं सकती।* वर्तमान समय जबकि चारों ओर मन का दु:ख और अशान्ति, मन की परेशानियां बहुत तीव्रगति से बढ़ रही हैं। तो जितना तीव्रगति से दुःख ही लहर बढ़ रही हैं उतना ही आप सुख दाता के बच्चे अपने मन्सा शक्ति से, सकाश की सेवा से, वृत्ति से चारों ओर सुख की अंचली का अनुभव कराओ।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विजय के तिलकधारी आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने मस्तक पर विजय का तिलक लगा हुआ अनुभव होता है? अविनाशी तिलक अविनाशी बाप द्वारा लगा हुआ है। तो तिलक है स्मृति की निशानी। तिलक सदा मस्तक पर लगाया जाता है। तो मस्तक की विशेषता क्या है? याद या स्मृति। *तो विजय के तिलकधारी अर्थात् 'सदा विजय भव' के वरदानी। जो स्मृति-स्वरूप हैं वे सदा वरदानी हैं। वरदान आपको मांगने की आवश्यकता नहीं है।* वरदान दे दो-मांगते हो?

 

  *मांगना क्या चाहिए-यह भी आपको नहीं आता था। क्या मांगना चाहिए-वह भी बाप ही आकर सुनाते हैं। मांगना है तो पूरा वर्सा मांगो।* बाकी हद का वरदान-एक बच्चा दे दो, एक बच्ची दे दो, एक मकान दे दो, अच्छी वाली कार दे दो, अच्छा पति दे दो - यही मांगते रहे ना। बेहद का मांगना क्या होता है- वो भी नहीं आता था। इसीलिए बाप जानते हैं कि इतने नीचे गिर गये जो मांगते भी हद का हैं, अल्पकाल का हैं। आज कार मिलती है, कल खराब हो जाती है, एक्सीडेन्ट हो जाता है। फिर क्या करेंगे? फिर और मांगेंगे-दूसरी कार दे दो!

 

  आप तो अधिकारी बन गये। बेहद के बाप के बेहद के वर्से के अधिकारी बन गये। अभी स्वत: ही वरदान प्राप्त हो ही गये। जब दाता के बच्चे बन गये, वरदाता के बच्चे बन गये-तो वरदान का खजाना बच्चों का हुआ ना। तो जब वरदानों का खजाना ही हमारा है तो मांगने की क्या आवश्यकता है! *अभी खुशी में रहो कि 'मांगने से बच गये। जो सोच में भी नहीं था वह साकार रूप में मिल गया! हर बात में भरपूर हो गये, कोई कमी नहीं'।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अशरीरी के लिए विशेष 4 बातों का अटेन्शन रखो :- 1. कभी भी अपने आपको भूलाना होता है तो दुनिया में भी एक सच्ची प्रीत में खो जाते हैं। तो सच्ची प्रीत ही भूलने का सहज साधन है। *प्रीत दुनिया को भूलाने का साधन है, देह को भूलाने का साधन है।*

 

✧  2. दूसरी बात *सच्चा मीत भी दुनिया को भूलाने का साधन है।* अगर दो मीत आपस में मिल जाएँ तो उन्हें न स्वयं की, न समय की स्मृति रहती है। 3. तीसरी बात दिल के गीत - *अगर दिल से कोई गीत गाते हैं तो उस समय के लिए वह स्वयं और समय को भूला हुआ होता है।*

 

✧  4. चौथी बात - यथार्थ रीत। अगर *यथार्थ रीत है तो अशरीरी बनना बहुत सहज है।* रीत नहीं आती तब मुश्किल होता है। तो एक हुआ प्रीत, 2.- मीत, 3.- गीत, 4.- रीत।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *जैसे बहुत ऊँचे स्थान पर चले जाते हो तो चक्कर लगाना नहीं पड़ता लेकिन एक स्थान पर रहते सारा दिखाई देता है। ऐसे जब टॉप की स्टेज पर, बीजरूप स्टेज पर, विश्व-कल्याणकारी स्थिति में स्थित होंगे तो सारा विश्व ऐसे दिखाई देगा जैसे छोटा 'बाल' है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- संगमयुग में विकर्म विनाश करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा बाबा की सुनहरी यादों में खोई हुई, अपना सुनहरा शरीर धारण कर उड़ चलती हूँ... मधुबन बाबा के कमरे में... अपनी मुस्कान बिखेरते बापदादा अपने तेजस्वी सुनहरी किरणों की बाँहों को फैलाते हुए मुझे अपने पास बुलाते हैं...* मैं आत्मा तुरंत उनकी बाँहों में समा जाती हूँ और उनके मखमली सपर्श से अतीन्द्रिय सुख में खो जाती हूँ... फिर बाबा मुझे बगीचे में लेकर जाते हैं... और सैर करते हुए मीठी शिक्षाएं देते हैं...

 

  *अनंत शक्तियों से भरपूर कर सत्यता के प्रकाश से आलोकित करते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... जब घर से निकले थे कितने खुबसूरत फूल थे... पर देह के भान ने उजले स्वरूप को निस्तेज कर दिया... और विकर्मो से दामन भर दिया... *अब ईश्वर पिता के सच्चे प्रेम रंग में रंग जाओ और सतयुगी सुखो के अधिकारी बन सदा के मुस्कराओ...*

 

_ ➳  *अपने सत्य स्वरुप में स्थित होकर यादों के झूले में झूलते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके सच्चे प्रेम को पाकर दुनियावी रिश्तो से उपराम हो गई हूँ... *विकारो से मुक्त होकर खुबसूरत जीवन की मालिक बन... मीठे बाबा आपकी गोद में फूलो सा मुस्करा रही हूँ...*

 

  *विकारों रूपी काँटों को निकाल अपने बगीचे का महकता फूल बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देह के मटमैले संग में आकर अपने सत्य मणि स्वरूप को ही भूल गए हो... *अब ईश्वर पिता की मीठी यादो में उसी ओज से भरकर सुखो की बहारो में झूम जाओ... सब संग तोड़ सच्चे साथी के संग सदा के जुड़ जाओ...*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा की यादों में समाकर खुशियों के आसमान में झूमती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा देह के भान में विकर्मो का खाते को किस कदर बढ़ाती जा रही थी... *प्यारे बाबा आपने मेरा जीवन खुशियो से भर दिया है... मेरे आत्मिक स्वरूप का परिचय कराकर मुझे गुणो से सजा दिया है...*

 

  *अपनी किरणों की ज्वाला से जन्मजन्मान्तर के विकर्मों को भस्म कर दिव्य गुणों से सजाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... जिस देह के भान ने जीवन विकारो की कालिमा से भरकर दारुण दुखो से भर दिया...  उसे छोड़ अब आत्मिक नशे में डूब जाओ... *मीठे बाबा के सच्चे संग में आनन्द के गीत गाओ... सब जगह से बुद्धि निकाल ईश्वर पिता के प्यार में खो जाओ...*

 

_ ➳  *मीठे बाबा की मीठी यादों की रश्मियों से ऊँचे आसमान में अपने भाग्य का झंडा लहराते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अपने सत्य स्वरूप को पाकर सदा खुशनसीब हो गयी हूँ... *मीठे बाबा आपका प्यार पाकर मै आत्मा विकारो के जंजाल से निकल अपने खुबसूरत मणि रूप में खिल गयी हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सर्जन को सब सुनाना है*"

 

_ ➳  कर्मयोगी बन हर कर्म करते, कदम - कदम पर सुप्रीम सर्जन *अपने शिव पिता परमात्मा से राय लेते, उनकी श्रीमत पर चल अपने दैनिक कर्तव्यों को पूरा करके, एकांत में अपने सुप्रीम सर्जन शिव बाबा की याद में मैं मन बुद्धि को स्थिर करके बैठ जाती हूँ* और विचार करती हूँ कि 5 विकारों रूपी ग्रहण ने कैसे मुझ आत्मा को बिल्कुल ही रोगी बना दिया था! मेरे सुंदर सलौने सोने के समान दमकते स्वरूप को इन विकारों की बीमारी ने आयरन के समान बिल्कुल ही काला कर दिया था।

 

_ ➳  शुक्रिया मेरे सुप्रीम सर्जन शिव पिता परमात्मा का जो ज्ञान और योग की दवाई से मुझ बीमार आत्मा का उपचार कर मुझे फिर से स्वस्थ बना रहें हैं। *मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी हुई विकारों की कट को उतार, ज्ञान अमृत और योग अग्नि से हर रोज मुझे प्युरीफाई करके रीयल गोल्ड के समान फिर से चमकदार बना रहें हैं*। अपने सुप्रीम सर्जन शिव बाबा को याद करते - करते अब मैं अपने मन बुद्धि को अपने सुंदर सलौने ज्योति बिंदु स्वरूप पर एकाग्र करती हूँ जो हर रोज ज्ञान और योग की खुराक खाकर सोने के समान उज्जवल बनता जा रहा है।

 

_ ➳  देख रही हूँ मन बुद्धि के नेत्रो से अब मैं अपने सत्य ज्योतिर्मय स्वरूप को। *अपनी स्वर्णिम किरणे बिखेरता एक चमकता हुआ सितारा भृकुटि के मध्य में जगमगाता हुआ मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है*। मेरा यह दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप मुझे असीम आनन्द की अनुभूति करवा रहा है। अपने इस सम्पूर्ण निर्विकारी स्वरूप में मैं आत्मा स्वयं को सातों गुणों और सर्वशक्तियों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ। *अपने इस सतोप्रधान स्वरूप में स्थित हो कर अब मैं अपना सम्पूर्ण ध्यान परमधाम में विराजमान अपने शिव पिता पर केंद्रित करती हूँ*।

 

_ ➳  अशरीरी बन उनकी याद में बैठते ही मन उनसे मिलने के लिए बेचैन हो उठता है और मैं आत्मा उनसे मिलने के लिए जैसे ही उनका आह्वान करती हूँ मैं स्पष्ट अनुभव करती हूँ कि *मेरे सुप्रीम सर्जन मेरे शिव पिता परमात्मा एक ज्योतिपुंज के रूप में अपनी सर्वशक्तियों रूपी अनन्त किरणों को चारों और फैलाते हुए परमधाम से नीचे उतर कर मेरे सामने उपस्थित हो गए हैं और आ कर अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में मुझे भर लिया है*। अपने शिव पिता परमात्मा की किरणों रूपी बाहों में समा कर इस नश्वर देह और देह की दुनिया को अब मैं बिल्कुल भूल गई हूँ। केवल मेरे सुप्रीम सर्जन शिव बाबा और मुझ पर निरन्तर बरसता हुआ उनका असीम प्यार मुझे दिखाई दे रहा है।

 

_ ➳  अपनी बाहों के झूले में झुलाते हुए मेरे मीठे शिव बाबा अब मुझे अपने साथ इस छी - छी विकारी दुनिया से दूर, अपने निर्विकारी धाम की ओर ले कर जा रहे हैं। *एक चमकती हुई ज्योति मैं आत्मा स्वयं को महाज्योति अपने शिव पिता की किरणों रूपी बाहों में समाये, साकारी दुनिया से दूर ऊपर की ओर जाते हुए मन बुद्धि रूपी नेत्रों से स्पष्ट देख रही हूँ*। पांच तत्वों की इस दुनिया के पार, सूक्ष्म लोक से भी पार अपने शिव पिता के साथ मैं पहुंच गई निर्वाणधाम अपने असली घर। शिव पिता के साथ कम्बाइंड हो कर अब मैं स्वयं को उनकी सर्वशक्तियों से भरपूर कर रही हूँ ।

 

_ ➳  मेरे सुप्रीम सर्जन शिव बाबा से आ रही सर्वशक्तियों का स्वरूप ज्वालामुखी बन कर मुझ आत्मा द्वारा किये हुए 63 जन्मो के विकर्मों को दग्ध कर रहा है। *विकारों की कट उतर रही है और मैं आत्मा सच्चा सोना बनती जा रही हूँ*। मुझ आत्मा की चमक करोड़ो गुणा बढ़ती जा रही है। स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूं।

 

_ ➳  अपने शिव पिता की लाइट माइट से स्वयं को भरपूर करके डबल लाइट बन अब मैं वापिस साकारी दुनिया मे अपने साकारी तन में आ कर विराजमान हो गई हूँ। *फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित  हो कर हर कदम पर अपने सुप्रीम सर्जन शिव बाबा से राय ले कर अब मैं सम्पूर्ण निर्विकारी बनने का पुरुषार्थ निरन्तर कर रही हूँ*। मेरे सुप्रीम सर्जन शिव बाबा से कदम - कदम पर मिलने वाली राय मेरे हर संकल्प, बोल और कर्म को श्रेष्ठ बना कर मुझे श्रेष्ठता का अनुभव करवा रही है।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं देह, सम्बन्ध और वैभवों के बन्धन से स्वतंत्र आत्मा हूँ।*

   *मैं बाप समान आत्मा हूँ।*

   *मैं कर्मातीत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप बन जाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा राजधानी में नंबर आगे प्राप्त करती  हूँ  ।*

   *मैं शक्तिशाली आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

*✺ अव्यक्त बापदादा :-*

 

_ ➳  *सेवाधारी अर्थात् बड़ों के डायरेक्शन को फौरन अमल में लाने वाले।* लोक संग्रह अर्थ कोई डायरेक्शन मिलता है तो भी सिद्ध नहीं करना चाहिए कि मैं राइट हूँ। भल राइट हो लेकिन लोकसंग्रह अर्थ निमित्त आत्माओं का डायरेक्शन मिलता है तो सदा -  *जी हाँ', जी हाजर', करना यही सेवाधारियों की विशेषता हैयह झुकना नहीं हैनीचे होना नहीं है लेकिन फिर भी ऊँचा जाना है।* कभी-कभी कोई समझते हैं अगर मैंने किया तो मैं नीचे हो जाऊँगीमेरा नाम कम हो जायेगामेरी पर्सनैलिटी कम हो जायेगीलेकिन नहीं। मानना अर्थात् माननीय बननाबड़ों को मान देना अर्थात् स्वमान लेना। तो ऐसे सेवाधारी हो जो अपने मान शान का भी त्याग कर दो। अल्पकाल का मान और शान क्या करेंगे। *आज्ञाकारी बनना ही सदाकाल का मान और शान लेना है।* तो अविनाशी लेना है या अभी-अभी का लेना हैतो सेवाधारी अर्थात् इन सब बातों के त्याग में सदा एवररेडी।

 

_ ➳  *बड़ों ने कहा और किया। ऐसे विशेष सेवाधारीसर्व के और बाप के प्रिय होते हैं। झुकना अर्थात् सफलता या फलदायक बनना।*  यह झुकना छोटा बनना नहीं है लेकिन सफलता के फल सम्पन्न बनना है। उस समय भल ऐसे लगता है कि मेरा नाम नीचे जा रहा हैवह बड़ा बन गयामैं छोटी बन गई। मेरे को नीचे किया गया उसको ऊपर किया गया। *लेकिन होता सेकण्ड का खेल है। सेकण्ड में हार हो जाती और सेकण्ड में जीत हो जाती।* सेकण्ड की हार सदा की हार है जो चन्द्रवंशी कमानधारी बना देती है और सेकण्ड की जीत सदा की खुशी प्राप्त कराती जिसकी निशानी श्रीकृष्ण को मुरली बजाते हुए दिखाया है। तो कहाँ चन्द्रवंशी कमानधारी और कहाँ मुरली बजाने वाले! तो सेकण्ड की बात नहीं है लेकिन सेकण्ड का आधार सदा पर है'। तो इस राज़को समझते हुए सदा आगे चलते चलो।

 

✺   *ड्रिल :- "बड़ों ने कहा और किया" - ऐसे विशेष सेवाधारी बनकर रहना।"*

 

_ ➳  *भृकुटी सिंहासन पर विराजमान मैं आत्मा... एक चमकती हुई दिव्य ज्योति...* अपने निज् गुण... निज् स्वधर्म को जान... बैठी हूँ एक बाप की लगन में मग्न होकर... न देह का भान... न इस दैहिक दुनिया का भान... अपने आप में मस्त... बैठी हूँ तपस्या धाम में... तपस्या धाम... पवित्र भूमि... भगवान के अवतरण की भूमि जहाँ *बापदादा से योग लगाना नहीं पड़ता... स्वतः ही लग जाता है... बापदादा से मन के तार को जुड़ने में पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता... वहाँ आप और बाप... बाप और आप ही दिखाई देते हैं...*

 

_ ➳  *"तपस्या करनी हैं तो तपस्या धाम में जाओ..."* और मैं आत्मा तपस्या धाम में बैठी बापदादा का आह्वान करती हूँ... मन बुद्धि रूपी घोड़े को बाप की याद रूपी लगाम से मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ परमधाम... सुनहरे किरणों के प्रकाश की दुनिया में... पवित्रता... शांति का साम्राज्य छाया हुआ हैं जहाँ... देह की दुनिया से परे... अपने ओरिजिनल स्वरुप में... *मैं आत्मा बिन्दुरूप में बिन्दुरूपी बाप को और सभी आत्माओं को निहार रही हूँ... जो तन-मन-धन से... मंसा-वाचा-कर्मणा से एक बाप को प्रत्यक्ष करने पर लगे है...*

 

_ ➳  हम सभी आत्मायें एक बाप की लगन में और अपने आप को सदा बाप के प्यार के झूले में झूलता अनुभव करते... सर्व शक्तियों से भरपूर होते जा रहें हैं... रंग बिरंगी किरणों की फाउंटेन में हम सभी आत्मायें परिपूर्ण होते जा रहे हैं... और *बाबा के साथ हम सभी आत्मायें पहुँचते हैं... सूक्ष्म वतन में... जहाँ ब्रह्मा बाबा हमारा इंतजार कर रहे थे...* शिवबाबा का ब्रह्मा बाबा के सूक्ष्म शरीर में प्रवेश और हमारा बिन्दुरूप से फ़रिश्ता स्वरुप में परिवर्तन का यह नजारा सूक्ष्म वतन में पूनम के चाँद के जैसे चांदनी बिखेर रहा हैं...

 

_ ➳  दिव्य स्वरूप वह ब्रह्मा बाबा का... अलौकिकता से भरे नयनों से प्यार की वर्षा.. हम सभी आत्माओ को भीगाता जा रहा हैं... ब्रह्मा तन में विराजमान शिवबाबा ने मुरली चलाई... "मेरे लाडले बच्चों..." और हम सभी फ़रिश्ते झूम उठे... बाबा ने कहा... "बच्चे सेवाधारी हो कि अथक सेवाधारी हो? सेवा में क्या मेरेपन की भावना और मैंने किया यह संकल्प तो हावी नहीं हो रहा है? *बड़ों ने कहा और किया।* ऐसे विशेष सेवाधारीसर्व के और बाप के प्रिय होते हैं तो क्या विशेष सेवाधारी बन के रहते हो? *जी हाँ', जी हाजर', करना यही सेवाधारियों की विशेषता हैयह झुकना नहीं हैनीचे होना नहीं है लेकिन फिर भी ऊँचा जाना है।"*

 

_ ➳  *"आज्ञाकारी बनना ही सदाकाल का मान और शान लेना है... तो अविनाशी लेना है या अभी-अभी का लेना हैतो सेवाधारी अर्थात् इन सब बातों के त्याग में सदा एवररेडी..."* बापदादा की यह अमूल्य शिक्षाओं को हम सभी फ़रिश्ते आत्मायें अपने में धारण करते जा रहें हैं और मेरेपन के त्याग से अपने पुरूषार्थ को उच्च शिखर पर पहुँचा रहे हैं... अमूल्य शिक्षाओं के खजानों से भरपूर हम आत्मायें वापिस अपने स्थूल शरीर में प्रवेश करते हैं और हर कार्य चाहे लौकिक हो या अलौकिक सेवा हो... मेरेपन के भावना से परे हो करके करते जा रहे हैं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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