━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 16 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सेवा में थके तो नहीं ?*

 

➢➢ *देह के सब जूठे सम्बन्ध छोड़ एक से सर्व समबन्ध जोड़े ?*

 

➢➢ *भाग्य और भाग्यविधाता की स्मृति से सदा खुश रहे ?*

 

➢➢ *शुद्धी और विधिपूर्वक हर कार्य किया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  डबल लाइट अर्थात् संस्कार स्वभाव का भी बोझ नहीं, व्यर्थ संकल्प का भी बोझ नहीं-इसको कहा जाता है हल्का। जितने हल्के होंगे उतना सहज उड़ती कला का अनुभव करेंगे। *अगर योग में जरा भी मेहनत करनी पड़ती है तो जरूर कोई बोझ है। तो बाबा-बाबा का आधार ले उड़ते रहो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं सहजयोगी हूँ"*

 

〰✧  सदा अपने को सहज योगी अनुभव करते हो? कितनी भी परिस्थितियां मुश्किल अनुभव कराने वाली हों लेकिन मुश्किल को भी सहज करने वाले सहजयोगी हैं-ऐसे हो या मुश्किल के समय मुश्किल का अनुभव होता है? सदा सहज है? *मुश्किल होने का कारण है बाप का साथ छोड़ देते हो। जब अकेले बन जाते हो तो कमजोर पड़ जाते हो और कमजोर को तो सहज बात भी मुश्किल लगती है। इसलिये बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि सदा कम्बाइन्ड रूप में रहो। कम्बाइन्ड को कोई अलग नहीं कर सकता।* जैसे इस समय आत्मा और शरीर कम्बाइन्ड है ऐसे बाप और आप कम्बाइन्ड रहो। मातायें क्या समझती हो? कम्बाइन्ड हो या कभी अलग, कभी कम्बाइन्ड? ऐसा साथ फिर कभी मिलना है? फिर क्यों साथ छोड़ देती हो? काम ही क्या दिया है?

 

✧  सिर्फ यह याद रखो कि 'मेरा बाबा'। इससे सहज काम क्या होगा? मुश्किल है? (63 जन्मों का संस्कार है) अभी तो नया जन्म हो गया ना। नया जन्म, नये संस्कार। अभी पुराने जन्म में हो या नये जन्म में? या आधा-आधा है? तो नये जन्म में स्मृति के संस्कार हैं या विस्मृति के? फिर नये को छोड़कर पुराने में क्यों जाते हो? नई चीज अच्छी लगती है या पुरानी चीज अच्छी लगती है? फिर पुराने में क्यों चले जाते हो? *रोज अमृतवेले स्वयं को ब्राह्मण जीवन के स्मृति का तिलक लगाओ। जैसे भक्त लोग तिलक जरूर लगाते हैं तो आप स्मृति का तिलक लगाओ। वैसे भी देखो मातायें जो तिलक लगाती है वो साथ का तिलक लगाती हैं।*

 

✧  *तो सदा स्मृति रखो कि हम कम्बाइन्ड हैं तो इस साथ का तिलक सदा लगाओ। अगर युगल होगा तो तिलक लगायेंगे, अगर युगल नहीं होगा तो तिलक नहीं लगायेंगे। यह साथ का तिलक है। तो रोज स्मृति का तिलक लगाती हो या भूल जाता है? कभी लगाना भूल जाता, कभी मिट जाता! जो सुहाग होता है, साथ होता है वह कभी भूलता नहीं। तो साथी को सदा साथ रखो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

आज विश्व रचयिता बाप अपने मास्टर रचयिता बच्चों को देख रहे हैं। मास्टर रचयिता अपने रचना-पन की स्मृति में कहाँ तक स्थित रहते हैं। *आप सभी रचयिता की विशेष पहली रचना यह देह है।* इस देह रूपी रचना के रचयिता कहाँ तक बने हैं? देह रूपी रचना कभी अपने तरफ रचयिता को आकर्षित कर रचना-पन विस्मृत तो नहीं करा देती है? मालिक बन इस रचना को सेवा में लगाते रहते? जब चाहें जो चाहें मालिक बन करा सकते हैं? पहले-पहले *इस देह के मालिक-पन का अभ्यास ही प्रकृति का मालिक वा विश्व का मालिक बना सकता है।* अगर देह के मालिक-पन में सम्पूर्ण सफलता नहीं तो विश्व के मालिक-पन में भी सम्पन्न नहीं बन सकते हैं। *वर्तमान समय की यह जीवन - भविष्य का दर्पण है। इसी दर्पण द्वारा स्वयं का भविष्य स्पष्ट देख सकते हो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧ कर्मातीत स्थिति वाला देह के मालिक होने के कारण कर्मभोग होते हुए भी न्यारा बनने का अभ्यासी है। बीच-बीच में अशरीरी-स्थिति का अनुभव बिमारी से परे कर देता है। *जैसे साइन्स के साधन द्वारा बेहोश कर देते हैं तो दर्द होते भी भूल जाते हैं, दर्द फील नहीं करते हैं क्योंकि दवाई का नशा होता है। तो कमतिीत अवस्था वाले अशरीरी बनने के अभ्यासी होने कारण बीच-बीच में यह रूहानी इन्जेक्शन लग जाता है। इस कारण सूली से कांटा अनुभव होता है।* और बात-फालो फादर होने के कारण विशेष आज्ञाकारी बनने का प्रत्यक्ष फल बाप से विशेष दिल की दुआयें प्राप्त होती हैं। *एक अपना अशरीरी बनने का अभ्यास दूसरा आज्ञाकारी बनने का प्रत्यक्षफल बाप की दुआयें, वह बीमारी अर्थात् कर्मभोग को सूली से कांटा बना देती है।* कर्मातीत श्रेष्ठ आत्मा कर्मभोग को, कर्मयोग की स्थिति में परिवर्तन कर देगी।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  पवित्र बनने का व्रत लेकर विश्व का मालिक बनना"*

 

_ ➳  रिमझिम फुहारों में भीगती हुई... प्रकर्ति के रंगीन मिजाज का आनन्द लेती हुई... मै आत्मा... अपने सच्चे साथी बाबा को पुकारती हूँ... और अगले ही पल, मीठे बाबा को अपनी आँखों से निहारकर मन्त्रमुग्ध होती हूँ... आनन्द में डूबने के लिए... अब मै आत्मा बादलो की बौछारों की मोहताज नही हूँ... *क्योकि आनन्द का सागर मीठा बाबा ही मेरी बाँहों में भर आया है.*.. और अपने प्यार में मुझे भी प्रेम बदली बना रहा है...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपनी फूलो सी गोद में लेकर कहते है :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे,.. *ईश्वर पिता हथेली पर असीम सुखो को आप बच्चों के लिए ही तो सजाकर लाया है.*.. इसलिए सदा मीठे बाबा की याद और वर्से के नशे में खोये रहो... पुरानी मान्यताओ को छोड़ कर, सत्य राह का राही बनो... और पवित्र बनकर कृष्णपुरी में आने का सोभाग्य प्राप्त करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को अपनी यादो में बसाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... आपने जीवन में आकर जीवन को कितना हल्का प्यारा और श्रेष्ठ बना दिया है... रूढ़ियों में फंस कर जीवन सत्य से कोसो दूर था... *आपने आकर सत्य के प्रकाश से इसे सदा के लिए रौशन किया है.*.. और मुझ आत्मा को सुखो से भरपूर कर दिया है..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अपने नैनो का नूर बनाते हुए बोले :-* "मीठे लाडले बच्चे... देह के भान से निकलकर आत्मिक स्वरूप में रहो... *शरीर को कष्ट न देकर, ईश्वर पिता की यादो में आत्मा को पवित्रता से सजाओ..*. यादो में रहकर विकारो की कालिमा से मुक्त हो जाओ... मीठे बाबा की यादे ही पावनता से निखारकर स्वर्ग के असीम सुख दिलायेगी... इसलिए हर पल यादो में खोये रहो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा के ज्ञान रत्नों को अपनी पलको पर रखते हुए कहती हूँ :-* "सच्चे साथी मेरे बाबा... देह के जंजालों से सिर्फ भगवान ही मुझे छुड़ा सकता था... और भगवान ने ही आकर मुझे छुड़ाया... *प्यारे बाबा आपके सच्चे साथ ने जीवन को पावन कर महानता से भर दिया है.*.."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा पर अपने असीम प्रेम की वर्षा करते हुए बोले :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... *अब भगवान को पाकर जीवन को श्रेष्ठता और दिव्यता का पर्याय बनाओ.*.. दिव्य गुण और पवित्रता से सज संवर कर देवताई सुखो में मुस्कराओ... देह के भान को त्याग अपने सत्य भान में डूब जाओ... और खोया साम्रज्य पुनः बाँहों में भर आओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे बाबा पर बलिहार होकर दिल से धन्यवाद देते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मनमीत बाबा मेरे... आपको पाने की चाहत में मै आत्मा कितना भटकी, कितना थकी और कितनी गुमराह हुई... आपने अपना हाथ देकर मुझे सारी भटक्नो से बाहर निकाल दिया... और *ज्ञान के प्रकाश में मुझे मेरा सच्चा स्वरूप दिखाकर, मुझे फर्श से उठाकर अर्श पर बिठा दिया है.*.."अपने प्यारे बाबा को दिल से धन्यवाद देकर, मै आत्मा मुस्कराती हुई अपने कार्य जगत पर लौट आयी...

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- देह सहित देह के सब झूठे सम्बन्ध छोड़ एक से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं*"

 

_ ➳  अपने स्वीट साइलेन्स होम में बिंदु बन अपने बिंदु बाप के साथ मिलन मनाने का असीम सुख मैं आत्मा प्राप्त कर रही हूँ। *मणियों से चमकते इस परमधाम घर में अपने बिंदु स्वरूप में स्थित मैं देह और देह की दुनिया के हर संकल्प, विकल्प से मुक्त एक अति सुंदर निरसंकल्प स्थिति में स्थित हो कर अपने बिंदु बाप को निहार रही हूँ*। जैसे मैं आत्मा बिंदु हूँ वैसे मेरे पिता परमात्मा भी मेरे ही समान एक बिंदु हैं। अपने ही समान अपने पिता परमात्मा को पाकर मैं असीम आनन्द का अनुभव कर रही हूँ। *कभी मैं स्वयं को और कभी उन्हें देख रही हूँ। वो सर्वगुणों और सर्वशक्तियों के सागर हैं और मैं आत्मा सर्वगुण, सर्वशक्तिस्वरूप हूँ*।

 

_ ➳  अपने और अपने पिता परमात्मा के स्वरूप को निहारते - निहारते गहन आनन्द में खोई *मैं बिंदु आत्मा सर्व गुणों और सर्व शक्तियों के सागर अपने शिव पिता परमात्मा के गुणों और शक्तियों को स्वयं में समाकर उनके समान बनने के लिए अब धीरे - धीरे अपने बिंदु बाप के पास जा रही हूँ*। उनके अति समीप पहुँच कर मैं देख रही हूँ उनसे निकल रही सर्वशक्तियों की अनन्त किरणों को जो चारों और फैल कर अति सुंदर लग रही है। एक - एक किरण को ज्ञान के दिव्य चक्षु से मैं देख रही हूँ।

 

_ ➳  अपनी सुध - बुध खो कर इस अति सुंदर दृश्य को निहारते - निहारते मैं अनुभव करती हूँ जैसे बाबा ने अपनी किरणों रूपी गोद मे मुझे बिठा लिया है और अपनी सर्वशक्तियों से मुझे भरपूर कर रहें हैं। *जैसे - जैसे बाबा की सर्वशक्तियों की किरणे मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं मैं स्वयं में असीम बल भरता हुआ अनुभव कर रही हूँ*। अपने बिंदु बाप की शीतल किरणों की छत्रछाया में गहन शीतलता की अनुभूति करते हुए अपने प्यारे बाबा के साथ इतना सुन्दर मधुर मंगल मिलन मनाने का सुख मैं प्राप्त कर रही हूँ।

 

_ ➳  बिदु बन बिंदु बाप के साथ मिलन मनाने का यह सुख मुझे परम आनन्द प्रदान कर रहा है। *मेरे शिव पिता से आ रहे सर्व गुणों और सर्वशक्तियों के शक्तिशाली वायब्रेशन मुझे टच करके मेरे अंदर असीम ऊर्जा भर रहें हैं*। परमात्म शक्तियों से मैं आत्मा भरपूर होती जा रही हूँ और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ। अपने शिव पिता के सानिध्य में बैठ, उनकी सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर मेरा स्वरूप भी उनके समान अति तेजस्वी, पूर्ण प्रकाशित हो गया है।

 

_ ➳  अपने सर्वशक्तिवान बिंदु बाप की सर्वशक्तियों को स्वयं में समाकर शक्तियों का पुंज बन कर, बाबा को अपने संग लेकर अब मैं वापिस अपने कर्म क्षेत्र पर लौट रही हूँ। अपने ब्राह्मण स्वरूप में अब मैं स्थित हूँ और *हर समय बाबा के संग में रहते हुए सर्व सम्बन्ध और सर्व संपत्ति की प्राप्ति अपने एक बिंदु बाप द्वारा अनुभव कर रही हूँ*। मैं भी बिंदु बाप भी बिंदु इस स्मृति से मेरा सारा संसार एक बिंदु बाप में समा गया है। सर्व सम्बन्धों का अनुभव एक से करते हुए, सर्व सम्पति की प्राप्ति अविनाशी खुशी, सुख, शांति का मैं सहज ही अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  *बिंदु बन, बिंदु बाप के संग रहते हुए अब मैं सदा सुख - शांति के, खुशी के, ज्ञान के और आनन्द के झूले में झूलते हुए, सर्व प्राप्तियों के सम्पन्न स्वरूप के अविनाशी नशे में रहते हुए, अपनी सम्पन्न स्थिति से सबको अपने बिंदु बाप के संग का अनुभव निरन्तर करवा रही हूँ*।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं भाग्य और भाग्य विधाता की स्मृति से सदा खुश रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं खुशियां बांटने वाली सहजयोगी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव शुद्धि और विधि पूर्वक ही हर कार्य करती हूँ  ।*

   *मैं सच्ची सच्ची ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

   *मैं पूर्वज आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  *सबसे सहज है कि पहले स्वयं को झमेले मुक्त करो। दूसरे के पीछे नहीं पड़ो।* ये स्टूडेन्ट ऐसा हैये साथी ऐसा हैये सरकमस्टांश ऐसे हैं- उसको नहीं देखो लेकिन अपने को झमेला मुक्त करो।

➳ _ ➳  जहाँ झमेला हो वहाँ अपने मन को, बुद्धि को किनारे कर लो। आप सोचते हो-ये झमेला पूरा होगा तो बहुत अच्छा हो जायेगा, हमारी सेवा भी अच्छीहमारी अवस्था भी अच्छी हो जायेगी। लेकिन झमेले पहाड़ के समान हैं। *क्या पहाड़ से माथा टकराना हैपहाड़ हटेगा क्यास्वयं किनारा कर लो या उड़ती कला से झमेले के पहाड़ के भी ऊपर चले जाओ।* तो पहाड़ भी आपको एकदम सहज अनुभव होगा।

➳ _ ➳  मुझे बनना है। अमृतवेले से ये स्वयं से संकल्प करो कि मुझे झमेला मुक्त बनना है। बाकी तो है ही झमेलों की दुनियाझमेले तो आयेंगे ही। आपकी दुनिया आपका सेवाकेन्द्र है तो आपकी दुनिया ही वो हैतो वहाँ ही आयेंगे ना। आप पेपर देने के लिए अमेरिका, लण्डन जायेंगी क्या? सेन्टर पर ही देंगी ना! *तो झमेला नहीं आवे- यह नहीं सोचो। झमेला मुक्त बनना है-ये सोचो।*

✺   *ड्रिल :-  "झमेला मुक्त बनना"*

➳ _ ➳  मैं आत्मा अपनी शांत स्वरूप स्थिति में मीठे बाबा की यादों में खोई हुई हूं... तभी मुझे बाबा के यह महावाक्य स्मृति में आते हैं कि *"जैसे विश्व ड्रामा को मैं साक्षी होकर देखता हूं वैसे ही तुम भी देखो"...* यह स्मृति आते ही मेरे मानस पटल पर विश्व ड्रामा  के सीन उभरने लगते हैं... सहज रुप से एक के बाद एक सीन आता है और चला जाता है... *मैं आत्मा पूर्णत: डिटैच होकर हर सीन को देख रही हूं...*

➳ _ ➳  *इस साक्षी स्थिति में मैं क्या, क्यों के सभी प्रश्नों से मुक्त हूँ... प्रसन्नचित्त अवस्था में हूँ... मेरा मानस अब शांत होता जा रहा है...* इस सुखदाई, आनंदमई स्थिति में मैं अपने प्यारे शिव बाबा को अपने सामने देख रही हूं... बाबा से अनंत शक्तियां मुझ आत्मा में समाती जा रही हैं... मुझ आत्मा के आसुरी अवगुण नष्ट होते जा रहे हैं...

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा स्वयं को सभी विकारों और विकृतियों की मैल से मुक्त देख रही हूं... *मैं परदर्शन और परचिंतन की धूल से मुक्त होती जा रही हूं... सभी प्रकार के झमेलों से स्वयं को न्यारा करती जा रही हूं...* मुझ आत्मा में स्वचिंतन और परमात्म चिंतन की लगन बढ़ती जा रही है... स्वदर्शन चक्र फ़िराते हुए माया के बंधनों से मैं मुक्त होती जा रही हूं...

➳ _ ➳  मैं आत्मा अब उड़ती कला का अनुभव कर रही हूं... *परिस्थितियों रूपी पहाड़ों से टकराने में अपना समय गंवाने की बजाय स्वयं को मोल्ड, स्वयं को परिवर्तित करती जा रही हूं...* कोई बदले फिर मैं बदलू ऐसे झमेलों से मुक्त होकर एक बाबा की लगन में मगन होती जा रही हूं...

➳ _ ➳  सेवा केंद्र हो या कार्यक्षेत्र जो भी बातें आती हैं, विघ्न आते हैं... उन सभी विघ्नों को मैं एक बाबा की याद में रहकर पार करती जा रही हूं... हर पेपर को बाबा की याद में रह क्रॉस करती जा रही हूं... परिस्थितियां तो आनी ही है... *विघ्न ना आए इस व्यर्थ चिंतन में समय को नष्ट ना कर मैं आत्मा अपने को सर्व झमेलों से मुक्त करती जा रही हूं...* बाबा की शक्तियों और गुणों से मैं स्वयं को संपन्न अनुभव कर रही हूं...

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━