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 16 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कभी भी अपने हाथ में लॉ तो नहीं लिया ?*

 

➢➢ *आत्माओं को बाप का पैगाम दिया ?*

 

➢➢ *बाप द्वारा सफलता का तिलक प्राप्त किया ?*

 

➢➢ *स्वयं के परिवर्तन की घड़ी निश्चित की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बाप के समीप और समान बनने के लिए देह में रहते विदेही बनने का अभ्यास करो।* जैसे कर्मातीत बनने का एग्जैम्पल साकार में ब्रह्मा बाप को देखा, ऐसे फॉलो फादर करो। *जब तक यह देह है, कर्मेन्द्रियों के साथ इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजा रहे हो, तब तक कर्म करते कर्मेन्द्रियों का आधार लो और न्यारे बन जाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को विश्व कल्याणकारी बाप के बच्चे विश्व कल्याणकारी आत्मायें अनुभव करते हो? विश्व कल्याणकारी आत्माओंकी विशेषता क्या होगी? *विश्व का कल्याण करने वाली आत्मा पहले स्वयं सर्व ख़जानों से सम्पन्न होगी। तो सर्व ख़जानों से भरपूर हो? कितने ख़जाने हैं? बहुत हैं ना! तो सब खजाने से भरपूर आत्मायें ही औरों को दे सकेंगी*

 

  अगर ज्ञान का ख़जाना है तो फुल ज्ञान हो, कोई भी कमी नहीं हो तब कहेंगे भरपूर। तो फुल है या कभी कोई कम भी हो जाता है? है लेकिन समय पर कार्य में लगा सके-ये चेकिंग सदा करते रहो। तो समय पर यूज कर सकते हो कि समय बीत जाता है पीछे सोचते हो? फिर क्या कहना पड़ता है-ऐसे करते थे, ऐसे होता था तो 'थे' और 'था' होता है। *क्या चेक करना है कि समय पर जो ख़जाना चाहिये वो ख़जाना कार्य में लगा या नहीं? विश्व कल्याणकारी आत्मायें सदा हर समय चाहे मन्सा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणा, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में, हर समय सेवा में बिजी रहती हैं।*

 

  तो इतने बिजी रहते हो? सबसे ज्यादा सेवा में बिजी कौन रहता है? *क्योंकि जब नाम ही है विश्व कल्याणकारी तो यह आक्यूपेशन हो गया ना। तो जो आक्यूपेशन होता है उसके बिना रह नहीं सकते। तो सदा बिजी हैं और सदा रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *याद के चार्ट पर थकावट का असर नहीं होना चाहिए।* जितना सेवा में बिजी

 रहते हो, भल कितना भी बिजी रहो लेकिन थकावट मिटाने का विशेष साधन *हर घण्टे वा दो घण्टे में एक मिनट भी शक्तिशाली याद का अवश्य निकालो।* जैसे कोई शरीर में कमजोर होता है तो शरीर को शक्ति देने के लिए डॉक्टर्स दो-दो घण्टे बाद ताकत की दवाई पीने लिए देते हैं।

 

✧   टाइम निकाल दवाई पीनी पडती हे ना तो *बीच-बीच में एक मिनट भी अगर शक्तिशाली याद का निकालो तो उसमें ए, बी, सी, - सब विटामिन्स आ जायेंगे।* सुनाया था ना कि शक्तिशाली याद सदा क्यों नहीं रहती।

 

✧   जब हैं ही बाप के और बाप आपका, सर्व सम्बन्ध हैं, दिल का स्नहे हैं, नॉलेजफुल हो, प्राप्ति के अनुभवी हो, फिर भी शक्तिशाली याद सदा क्यों नहीं रहती, उसका कारण क्या? अपनी याद का लिंक नहीं रखते। *लिंक टूटता है, इसलिए फिर जोडने में समय भी लगता, मेहनत भी लगती और शक्तिशाली के बजाए कमजोर हो जाते।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ चेक करो कि कौन सा लगाव नीचे ले आता है? अपनी देह का लगाव खत्म किया तो सम्बन्ध और पदार्थ के लगाव आपे ही खत्म हो जायेंगे। अपनी देह का लगाव अगर है तो सम्बन्ध और पदार्थ का लगाव भी अवश्य ही खीचेगा। इसलिए पहला पाठ पढ़ाते हो कि - देह-भान को छोड़ो, तुम देह नहीं, आत्मा हो। तो यह पाठ पहले अपने को पढ़ाया है? *देह-भान को छोड़ने का सहज से सहज तरीका क्या है? चलो, आत्मा 'बिन्दी' याद नहीं आती, खिसक जाती है। लेकिन यह तो वायदा है कि तन भी तेरा, मन भी तेरा, धन भी तेरा..। जब देह मेरी है ही नहीं तो लगाव किससे? जब मेरा है ही नहीं तो ममता कहाँ से आई? मेरे में ममता होती है।* जब मैंने दे दिया तो लगाव खत्म हुआ। इस एक बात से ही सब लगाव सहज खत्म हो जायेंगे। अभी यह देह बाप की अमानत है - सेवा के लिए। *तो सदा फरिश्ता बनने के लिए पहले यह प्रेक्टिकल अभ्यास करो कि - सेवा अर्थ है, अमानत है, मैं ट्रस्टी हूँ।* ट्रस्टी अगर ट्रस्ट की चीज में ट्रस्ट नहीं करे तो उसको क्या कहा जायेगा? इस बात को पक्का करो। *फिर देखो, फरिश्ता बनना कितना सहज लगता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- "किसी को भी दुःख नही देना*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन बाबा की कुटिया में बैठ बाबा के प्रेम तरगों में डूबी हुई हूँ... यह पावन भूमि बहुत ही मीठी भूमि है... जहाँ निराकार परमपिता परमात्मा ब्रह्मा तन में आकर नई दुनिया के लिए नया  ज्ञान देते हैं...* पतितों को पावन बनाते हैं... यहाँ की हवाओं में फैली मीठी-मीठी पावन खुशबू मन को आह्लादित कर रही है... *फिर मीठे बाबा मेरा हाथ पकड बगीचे में ले जाते हैं और मुझे अपने हाथों से मीठे-मीठे अंगूर तोड़कर खिलाते हुए मीठी समझानी देते हैं...*

 

  *मनसा-वाचा-कर्मणा कभी किसी को भी दुःख ना देने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे लाडले बच्चे... *प्यार के सागर के दिल की मणि हो तो मीठे बन प्यार से मुस्कराओ...* हर दिल को पिता जैसे प्यार से सहलाओ... सबके सहयोगी बन सदा का दिल जीतो... *मीठे बोलो की टोली खाते रहो और खिलाते रहो... और मीठी वाणी से मीठे पिता का पता दे आओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा के प्यार में दीवानी होकर सर्व पर प्यार के फूल बरसाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कितनी मीठी और प्यारी बन गई हूँ... हर दिल की राहत हो गई हूँ... सारा विश्व मेरा परिवार है... *सब मेरे अपने ही आत्मा भाई है... इस सुंदर भाव में डूबकर सदा की मीठी हो गयी हूँ...*

 

  *प्यार के सागर प्यारे बाबा प्यार की मिठास का एहसास कराते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... सारी दुनिया दुखो में डूबी हुई निढाल हो गई है... आप प्यार भरी मिठास से उनमे नव जीवन का संचार करो... प्यार के मरहम से उनके दुखो को दूर करो... *मनसा-वाचा-कर्मणा सुख देकर उनके थके तनमन को आनन्द से भर दो... मा. प्यार सागर बन प्यार का दरिया बहाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्रेम की बदली बन पूरे विश्व को प्रेम की वर्षा में भिगोते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपके मीठे साये में प्रेम से ओतप्रोत हो रही हूँ... सब पर प्यार लुटाती जा रही हूँ... *सबपर सुखो की वर्षा कर दुखो से मुक्त कर रही हूँ.... मा. प्रेमसागर बन प्रेम के झरनो में सबको भिगो रही हूँ...*

 

  *अपने प्रेम किरणों से विकारों को भस्म कर निर्विकारी बनाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... आप बड़े वाले देवता हो... आपको सबको प्यार देना है सबका ध्यान रखना है सबकी सम्भाल करनी है... *ईश्वर के बच्चे हो सबको खुशियां देने के निमित्त हो... सारे विश्व को खुशियो से भर दो... हर आत्मा को प्रेम से सींच कर खुशहाली दो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा डबल अहिंसक बन भाई-भाई की मीठी दृष्टि रख सब पर प्रेम लुटाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा प्रेम धारा बनकर सबकी मीठी पालना कर रही हूँ...* मेरा पोर पोर प्यार में डूब रहा है और यह प्रेम तरंगे पूरे विश्व में फैला कर सुखो का कारवां ला रही हूँ.... *चारो और सुख और प्रेम बिखरा है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कभी अपने हाथ मे लॉ नही लेना है*"

 

_ ➳  सुख के सागर, अपने दिलाराम मीठे प्यारे बाबा का आह्वान कर, उनके साथ प्रकृति के अद्भुत सुन्दर नजारों का आनन्द लेती हुई, एक ऊँची पहाड़ी पर बैठी अपने प्यारे बाबा के साथ मैं मीठी - मीठी रूह रिहान कर रही हूँ। *अपने मन की बातें संकल्पो के माध्यम से मैं अपने दिलाराम बाबा से कह रही हूँ। बाबा आपको पा कर मेरा यह जीवन धन्य - धन्य हो गया। आपने मेरे जीवन को कौड़ी से हीरे तुल्य बना दिया। जीवन में ऐसे सच्चे और निस्वार्थ प्रेम की अनुभूति मैंने आज तक नही की थी जो मैं अब कर रही हूँ*। आपने हर दुख से मुझे लिबरेट कर अपरमअपार सुख से मेरे जीवन को भरपूर कर दिया। 

 

_ ➳  अब मेरा यह जीवन केवल आपके लिए है। और आपके इस निस्वार्थ प्रेम का रिटर्न मैं अवश्य दूँगी। मन ही मन मैं बाबा से प्रतिज्ञा करती हूँ और अनुभव करती हूँ जैसे *बाबा के संकल्प मुझे मेरी मीठी रूह रिहान का जवाब देते हुए कह रहें हैं कि उनके समान मास्टर सुख का सागर बन सबके जीवन को सुखों से भरपूर करना ही उनके प्रेम का रिटर्न है*। अपने प्यारे बाबा से उनके हर फरमान का पालन करने का उन्हें प्रॉमिस करके, अब मैं अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होती हूँ। प्रकृति के मनोहर दृश्य, शांत वातावरण और अपने शांत स्वरूप में स्थित होकर गहन शांति का असीम आनन्द लेते हुए *मैं अनुभव करती हूँ कि मुझ आत्मा से रंग बिरंगी दिव्य किरणे निकल रही हैं जो मेरे पूरे शरीर में फ़ैल रही हैं*। 

 

_ ➳  इन किरणों की दिव्यता से मेरा साकारी शरीर लाइट का बन गया है और ऊपर की ओर उड़ने लगा है। लाइट की दिव्य आकारी देह धारण कर मैं आत्मा अब दूर बहुत दूर उड़ती जा रही हूँ। पांचो तत्वों से पार, आकाश से पार मैं पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन। *बापदादा की दिव्य किरणे इस सूक्ष्म वतन में चारों ओर फैली हुई हैं। देह और देह की दुनिया से अलग, सफेद प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया बहुत ही न्यारी और प्यारी है*। स्वयं को मैं इस अव्यक्त वतन में बापदादा के सम्मुख देख रही हूँ। बाबा मुझे दृष्टि दे रहें हैं। बाबा के नयनो से अथाह स्नेह की धाराएं बह रही हैं जो मुझ फ़रिश्ते में समाती जा रही हैं।

 

_ ➳  अपना वरदानी हाथ बाबा मेरे सिर पर रख कर मुझे वरदानों से भरपूर कर रहें हैं। बाबा के वरदानी हस्तों से गुणों और शक्तियों की किरणें निकल - निकल कर मुझ फ़रिश्ते में समा रही हैं। *"सदा लवफुल और लॉ फुल" रहने का वरदान दे कर बाबा मेरे मस्तक पर विजय का तिलक लगा रहें हैं। बाबा से  वरदान लेकर उस वरदान को फलीभूत करने और सबके जीवन को सुखी बनाने का बल स्वयं में भरने के लिए अब मैं अपने बिंदु स्वरूप में स्थित होकर सुख के सागर अपने बिंदु बाप से सुख की अनन्त किरणे स्वयं में भरने के लिए उनके पास उनके धाम जा रही हूँ*। 

 

_ ➳  परमधाम में अपने सुख सागर बाबा के पास पहुँच कर, उनके सानिध्य में बैठ उनसे आ रही सुख की शक्तिशाली किरणो को मैं स्वयं में समाहित कर रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे सुख के विशाल झरने के नीचे मैं खड़ी हूँ। स्वयं को अथाह सुख से भरपूर करके, सबको सुख देने के लिए अब मैं वापिस साकार लोक की ओर प्रस्थान करती हूँ। *अपने साकार शरीर रूपी रथ पर विराजमान हो कर, अब मैं बाबा के फरमान पर चलने का पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ। लवफुल और लॉ फुल बन अपने हाथ मे लॉ ना उठाते हुए मैं हर आत्मा के पार्ट को साक्षी होकर देखते हुए, सबके प्रति  शुभभावना, शुभकामना रखते हुए सबके जीवन को सुखमय बनाने का कर्तव्य पूरी लगन के साथ पूरा कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बाप द्वारा सफलता का तिलक प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा आज्ञाकारी आत्मा हूँ।*

   *मैं दिलतख्तनशींन आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा स्वयं के परिवर्तन की घड़ी निश्चित करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा विश्व परिवर्तन की डेट सोचने से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं आत्मा स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन करती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  ऐसे नहीं सोचना कि अभी कुछ समय तो पड़ा हैइतने में विनाश तो होना नहीं हैयह नहीं सोचना। विनाश होना है अचानक। पूछकर नहीं आयेगा कि हाँ तैयार हो! सब अचानक होना है। आप लोग भी  ब्राह्मण कैसे बनें? *अचानक ही सन्देश मिला, प्रदर्शनी देखी, सम्पर्क-सम्बन्ध हुआ बदल गये। क्या सोचा था कि इस तारीख को ब्राह्मण बनेंगेअचानक हो गया ना! तो परिवर्तन भी अचानक होना है।* आपको पहले माया और ही अलबेला बनायेगीसोचेंगे हमने तो दो हजार सोचा था - वह भी पूरा हो गया, अभी तो थोड़ा रेस्ट कर लो। पहले माया अपना जादू फैलायेगी, अलबेला बनायेगी। किसी भी बात मेंचाहे सेवा मेंचाहे योग मेंचाहे धारणा मेंचाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में यह तो चलता ही हैयह तो होता ही है ....ऐसे पहले माया अलबेला बनाने की कोशिश करेगी।

 

 _ ➳  *फिर अचानक विनाश होगाफिर नहीं कहना कि बापदादा ने सुनाया ही नहींऐसा भी होना है क्या!* इसलिए पहले ही सुना देते हैं - अलबेले कभी भी किसी भी बात में नहीं बनना। *चार ही सबजेक्ट में अलर्ट, अभी भी कुछ हो जाए तो अलर्ट।* उस समय नहीं कहना बापदादा अभी आओअभी साथ निभाओअभी थोड़ी शक्ति दे दो, उस समय नहीं देंगे। *अभी जितनी शक्ति चाहिएजैसी चाहिए उतनी जमा कर लो। सबको खुली छुट्टी हैखुले भण्डार हैंजितनी शक्ति चाहिए, जो शक्ति चाहिए ले लो। पेपर के समय टीचर वा प्रिन्सीपाल मदद नहीं करता।*   

 

✺   *ड्रिल :-  "अचानक की स्मृति से अलर्ट होकर अलबेलेपन से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  पहाड़ी की ऊँची चोटी पर खड़ी मैं आत्मा... देख रही हूँ प्रकृति के सौंदर्य को... आह्लादक नज़ारा...  हरियाली की चुनरी ओढ़े सजी धरती... नीला नीला आसमान... जरमर जरमर बहते झरनें... असीम शांति की आगोश में मैं आत्मा सिर्फ एक की ही यादों में खोई  हूँ... *वह हैं मेरे शिवबाबा... मेरे पिता परमेश्वर... ब्रह्माण्ड के स्वामी की मैं संतान... बिंदु रूपी बाप की यादों में बिंदु रूप बनती जा रही हूँ... देवकुल की मैं देव आत्मा... देवताई गुणों के स्वामी का आह्वान करती हूँ...*

 

 _ ➳  मेरे पिता परमेश्वर... अपनी राज दुलारी का दुलार भरा आह्वान सुन कर मेरे समीप आ जाते हैं... *ब्रह्मा तन में अवतरित मेरे पिता का भव्य रूप देख के मैं आत्मा भाव विभोर हो जाती हूँ...* अश्रुभीनी आँखों से मैं बापदादा के गले मिलती हूँ... बापदादा मुझे अपने पास बिठा कर मुझ आत्मा के सर पर आशीर्वादों से भरा रूहानी हाथ रख रहे हैं...  बापदादा से आती हुई शक्तियों को मैं आत्मा अपने में धारण करती जा रही हूँ... *और अचानक बापदादा का धर्मराज का रूप देख मैं आत्मा भयभीत हो जाती हूँ...* बापदादा मेरा हाथ पकड़ें ले चलते हैं सूक्ष्म वतन में... और मैं आत्मा डरी हुई... सहमी सहमी सी बापदादा को देखती रहती हूँ... आँखों में अश्रु की धारा बहती ही जा रही हैं...

 

 _ ➳  सूक्ष्म वतन में बापदादा मेरे सर पर अपना हाथ रख कर मुझ आत्मा को एक सीन दिखा रहे हैं... *मनुष्यलोक में चारों ओर विनाश का तांडव रचा हुआ हैं... प्रकृति के पाचों तत्व का विकराल रूप देख कर मैं आत्मा अचंभित हो जाती हूँ...* कहीं ओर आकाश अग्नि वर्षा कर रहा है तो कहीं ओर वरुण का रौद्र रूप दिखाई दे रहा है... कहीं ओर जलसमाधि लिये हुए शहरों को देख रही हूँ... तो कहीं ओर पूरी धरती अचेतन शरीरों का बोझ उठा रही हैं... *त्राहिमाम त्राहिमाम सारी सृष्टि हो गई हैं... और त्राहिमाम त्राहिमाम हर आत्मा बन गयी हैं...*

 

 _ ➳  और मैं आत्मा देख रही हूँ अपने आप को इस विनाशी दुनिया में... अपने अंतिम पलों को महसूस करती हूँ... *समाधि अवस्था में बैठी मैं आत्मा सिर्फ बाप को याद करती हूँ... अंतिम समय में बापदादा की गोदी का सहारा लेकर मैं आत्मा शांति का अनुभव कर रही हूँ...* अब तो अपने घर को जाना हैं... अपने पिता के घर... और फिर सतयुगी दुनिया में रहना हैं... यह बात याद करती मैं आत्मा मृत्यु शैया पर भी मुस्कुराती रहती हूँ... बाप के रंग में रंगी मैं आत्मा... अब मृत्यु को अपने गले का हार बना रही हूँ... अपने अंतिम समय में बापदादा का शुक्रिया अदा करती हूँ... कर्मातीत अवस्था की अंतिम स्टेज पर पहुँची मैं आत्मा... अपनी आँखों से बापदादा को ही देख रही थी... *अंतिम स्वांस लेती मैं आत्मा... बापदादा की बाहों में सदा के लिए समां जा रही हूँ...*

 

 _ ➳  बापदादा का रूहानी हाथ मेरे सर से उठते ही... मैं आत्मा वापिस स्थूल शरीर में प्रवेश करती हूँ... और *मैं आत्मा यह नज़ारा देख मन ही मन अपने स्थूल देह को श्रद्धांजलि अर्पण करती हूँ... खुद के ही हाथों मंसा अग्निदाह दे रही हूँ...* और बापदादा को मुस्कुराते हुए देखती हूँ... उनका धर्मराज का रूप परिवर्तित हो कर मेरे बाबा का रूप दिखाई दे रहा है... और बापदादा द्वारा सतयुगी स्वराज्य अधिकार को प्राप्त करती हूँ... *अंत में ही आरम्भ को देखती मैं आत्मा कब बापदादा का सन्देश मिला... कैसे प्रदर्शनी देखी... कब सम्पर्क-सम्बन्ध हुआ और अचानक ही बापदादा की बन गईं...  कभी सोचा भी नहीं था कि ब्राह्मण जन्म मिलेगा...* और ऐसा शानदार... वैभवी ठाठबाठ... से खुद के ही हाथों से खुद का अग्निदाह करने को मिलेगा... *बापदादा के महावाक्य "अंत मती सो गति" को सफल कर दिखाया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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