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 16 / 09 / 21  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कर्म सन्यासी न बन कर्मयोगी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *याद में रहकर आत्मा को सतोप्रधान बनाने का पुरुषार्थ किया ?*

 

➢➢ *अपनी श्रेष्ठता द्वारा नवीनता का झंडा लहराया ?*

 

➢➢ *मनसा द्वारा शक्तियों का और कर्म द्वारा गुणों का दान दिया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *बाप के समीप और समान बनने के लिए देह में रहते विदेही बनने का अभ्यास करो।* जैसे कर्मातीत बनने का एग्जैम्पल साकार में ब्रह्मा बाप को देखा, ऐसे फॉलो फादर करो। *जब तक यह देह है, कर्मेन्द्रियों के साथ इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजा रहे हो, तब तक कर्म करते कर्मेन्द्रियों का आधार लो और न्यारे बन जाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को विश्व कल्याणकारी बाप के बच्चे विश्व कल्याणकारी आत्मायें अनुभव करते हो? विश्व कल्याणकारी आत्माओंकी विशेषता क्या होगी? *विश्व का कल्याण करने वाली आत्मा पहले स्वयं सर्व ख़जानों से सम्पन्न होगी। तो सर्व ख़जानों से भरपूर हो? कितने ख़जाने हैं? बहुत हैं ना! तो सब खजाने से भरपूर आत्मायें ही औरों को दे सकेंगी*

 

  अगर ज्ञान का ख़जाना है तो फुल ज्ञान हो, कोई भी कमी नहीं हो तब कहेंगे भरपूर। तो फुल है या कभी कोई कम भी हो जाता है? है लेकिन समय पर कार्य में लगा सके-ये चेकिंग सदा करते रहो। तो समय पर यूज कर सकते हो कि समय बीत जाता है पीछे सोचते हो? फिर क्या कहना पड़ता है-ऐसे करते थे, ऐसे होता था तो 'थे' और 'था' होता है। *क्या चेक करना है कि समय पर जो ख़जाना चाहिये वो ख़जाना कार्य में लगा या नहीं? विश्व कल्याणकारी आत्मायें सदा हर समय चाहे मन्सा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणा, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में, हर समय सेवा में बिजी रहती हैं।*

 

  तो इतने बिजी रहते हो? सबसे ज्यादा सेवा में बिजी कौन रहता है? *क्योंकि जब नाम ही है विश्व कल्याणकारी तो यह आक्यूपेशन हो गया ना। तो जो आक्यूपेशन होता है उसके बिना रह नहीं सकते। तो सदा बिजी हैं और सदा रहेंगे।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *याद के चार्ट पर थकावट का असर नहीं होना चाहिए।* जितना सेवा में बिजी

 रहते हो, भल कितना भी बिजी रहो लेकिन थकावट मिटाने का विशेष साधन *हर घण्टे वा दो घण्टे में एक मिनट भी शक्तिशाली याद का अवश्य निकालो।* जैसे कोई शरीर में कमजोर होता है तो शरीर को शक्ति देने के लिए डॉक्टर्स दो-दो घण्टे बाद ताकत की दवाई पीने लिए देते हैं।

 

✧   टाइम निकाल दवाई पीनी पडती हे ना तो *बीच-बीच में एक मिनट भी अगर शक्तिशाली याद का निकालो तो उसमें ए, बी, सी, - सब विटामिन्स आ जायेंगे।* सुनाया था ना कि शक्तिशाली याद सदा क्यों नहीं रहती।

 

✧   जब हैं ही बाप के और बाप आपका, सर्व सम्बन्ध हैं, दिल का स्नहे हैं, नॉलेजफुल हो, प्राप्ति के अनुभवी हो, फिर भी शक्तिशाली याद सदा क्यों नहीं रहती, उसका कारण क्या? अपनी याद का लिंक नहीं रखते। *लिंक टूटता है, इसलिए फिर जोडने में समय भी लगता, मेहनत भी लगती और शक्तिशाली के बजाए कमजोर हो जाते।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ चेक करो कि कौन सा लगाव नीचे ले आता है? अपनी देह का लगाव खत्म किया तो सम्बन्ध और पदार्थ के लगाव आपे ही खत्म हो जायेंगे। अपनी देह का लगाव अगर है तो सम्बन्ध और पदार्थ का लगाव भी अवश्य ही खीचेगा। इसलिए पहला पाठ पढ़ाते हो कि - देह-भान को छोड़ो, तुम देह नहीं, आत्मा हो। तो यह पाठ पहले अपने को पढ़ाया है? *देह-भान को छोड़ने का सहज से सहज तरीका क्या है? चलो, आत्मा 'बिन्दी' याद नहीं आती, खिसक जाती है। लेकिन यह तो वायदा है कि तन भी तेरा, मन भी तेरा, धन भी तेरा..। जब देह मेरी है ही नहीं तो लगाव किससे? जब मेरा है ही नहीं तो ममता कहाँ से आई? मेरे में ममता होती है।* जब मैंने दे दिया तो लगाव खत्म हुआ। इस एक बात से ही सब लगाव सहज खत्म हो जायेंगे। अभी यह देह बाप की अमानत है - सेवा के लिए। *तो सदा फरिश्ता बनने के लिए पहले यह प्रेक्टिकल अभ्यास करो कि - सेवा अर्थ है, अमानत है, मैं ट्रस्टी हूँ।* ट्रस्टी अगर ट्रस्ट की चीज में ट्रस्ट नहीं करे तो उसको क्या कहा जायेगा? इस बात को पक्का करो। *फिर देखो, फरिश्ता बनना कितना सहज लगता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बेहद का बाप गरीब बच्चों को गोद लेने आये हैं"*

 

_ ➳  *माया की गोद से निकल ईश्वर पिता की गोद में मुस्कुराती हुई मैं आत्मा अपने भाग्य सितारा को देख रही हूँ... पहले माया के वश होकर गर्त में डूबा हुआ था लेकिन अब ऊँचे आसमान में झिलमिला रहा है...* मेरे भाग्य को ऊँचा उठाकर 21 जन्मों के लिए मुझे माया से सुरक्षित करने वाले मेरे प्राण प्यारे परमपिता परमात्मा के पास उड़ चलती हूँ सूक्ष्म वतन में... जहाँ सफ़ेद बादलों पर विराजमान होकर बापदादा मुझे अपनी बाँहों में भर लेते हैं और मीठी-मीठी श्रीमत देते हैं...

 

  *गति सद्गति के लिए श्रीमत देकर कौड़ी से हीरे तुल्य बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... श्रीमत को दिल की गहराइयो से अमल में लाकर जीवन को सुखो की बहार बना दो... *ईश्वर पिता की श्रीमत ही पवित्रता के रंग में रंगकर देवताई ताज से सजाएगी... श्रीमत की ऊँगली पकड़ कर सहज ही सुखो के आँगन में पाँव रखेंगे...* और भारत कौड़ी से हीरे जैसा चमक उठेगा..."

 

_ ➳  *बाबा की श्रीमत का हाथ और साथ पकड़कर अनन्य सुखों की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... *मै आत्मा श्रीमत के साये में खुबसूरत प्यारे जीवन को जीती जा रही हूँ... प्यारे बाबा आपकी छत्रछाया में कितनी सुखी और निश्चिन्त हूँ...* देह की मिटटी से बाहर निकल, खुबसूरत मणि बन दमक रही हूँ..."

 

  *श्रीमत के विमान में बिठाकर स्वर्णिम युग की ओर ले जाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... रावण की मत और विकारी जीवन ने दुखो की तपिश से कितना जलाया है... *अब राम पिता की मत को थाम... फूलो के मखमल पर चलकर दुखो के छालो पर सदा का मरहम लगाओ.. श्रीमत ही अथाह सुखो से भरा भाग्य दिलायेगी... और असाधारण देवता बनाकर विश्व धरा पर चमकाएगी..."*

 

_ ➳  *दिव्य गुणों के श्रृंगार से अमूल्य बेदाग हीरा बनकर चमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आपकी मीठी यादो में खोयी हुई अपने मीठे भाग्य को देख पुलकित हूँ... *श्रीमत को पाकर श्रेष्ठ कर्मो से जीवन सुखो का पर्याय बनाती जा रही हूँ... प्यारे बाबा आपके प्यार के जादू में... मै आत्मा कौड़ी से हीरा बन दमक उठी हूँ..."*

 

  *मुझ आत्मा को अविनाशी ज्ञान रत्नों की मालिक बनाकर ज्ञान सागर प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता को कभी दर दर खोज रहे थे... *आज उसकी मखमली गोद में फूलो सा खिल रहे हो... यह मीठी यादे,यह ईश्वरीय अमूल्य रत्न और श्रीमत 21जनमो तक असीम सुख प्रेम और शांति से जीवन खुशनुमा बनाएगी...* इसलिए सदा श्रीमत को बाहों में भरकर खुशियो संग मुस्कराओ..."

 

_ ➳  *हर कर्म श्रीमत प्रमाण करते हुए पारसमणि समान दमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा श्रीमत के आँचल तले विकारो की छाया से सुरक्षित हूँ... प्यारे बाबा जीवन कितना धवल और प्रकाश से सराबोर हो गया है...* आपकी यादो और अमूल्य ज्ञान रत्नों ने मेरा कायाकल्प किया है... और देवताई सौंदर्य से मुझे सुसज्जित किया है..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- हर बात में पुरुषार्थ जरूर करना है, ड्रामा कहकर बैठ नही जाना है"*

 

_ ➳  एकान्त में बैठ, बाबा द्वारा मिली ड्रामा की नॉलेज को स्मृति में लाकर, उस पर मन्थन करते हुए मैं विचार कर रही हूँ कि बाबा ने ड्रामा का जो राज हम बच्चों को समझाया है अगर उसे यथार्थ रीति जानकर, उस ज्ञान को ब्राह्मण जीवन मे धारण किया जाए तो कोई भी ब्राह्मण आत्मा कभी भी अपने इस बहुमूल्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों के बेहतरीन अनुभवों से वंचित नही रह सकती। *ब्राह्मण बनकर भी अगर ब्राह्मण जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों का अनुभव आत्मा को नही हो रहा तो स्पष्ट सी बात है कि ड्रामा को यथार्थ रीति जाना ही नही। कितनी बदनसीब है वो ब्राह्मण आत्मायें जो ये सोच कर पुरुषार्थ ही नही करना चाहती कि मेरा तो ड्रामा में पार्ट ही ऐसा है और कितनी महान सौभाग्यशाली है वो आत्मायें जो समय और परिस्थिति के अनुसार ड्रामा के ज्ञान को ढाल बनाकर उसे यथार्थ रीति यूज़ कर अपने तीव्र पुरुषार्थ से अपनी श्रेष्ठ प्रालब्ध बना रही हैं*।

 

_ ➳  मन ही मन यह विचार सागर मंथन करते हुए अपने आप से मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि अपने इस सर्वश्रेष्ठ संगमयुगी ब्राह्मण जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों का अनुभव करने के लिए और जन्म जन्मांतर की अपनी ऊँच प्रालब्ध बनाने के लिए मैं अपने पुरुषार्थ पर पूरा ध्यान दूँगी। *"ड्रामा में होगा तो हो जायेगा" यह कहकर कभी भी थककर बैठूँगी नही, बल्कि उचित समय पर ड्रामा के ज्ञान को यथार्थ रीति यूज़ कर, बीती को बीती कर अपने लक्ष्य को पाने के लिए निरन्तर आगे बढ़ने का पुरुषार्थ मैं निरन्तर करती रहूँगी*। इसी दृढ़ संकल्प और दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ अपने पुरुषार्थ को सदा सहज और मेहनत से मुक्त बनाने का बल स्वयं में भरने के लिए अपने प्यारे पिता के पास जाने की अति सहज यात्रा पर चलने के लिए अपने मन और बुद्धि को मैं एकाग्र कर लेती हूँ और स्वयं को अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित कर लेती हूँ।

 

_ ➳  आत्मिक स्मृति में स्थित होकर, स्वयं को देह से डिटैच करके, अपने गुणों और शक्तियों का अनुभव करते हुए थोड़ी देर के लिए मैं अपने अति सुंदर स्वरूप में खोकर उसका आनन्द लेने में तल्लीन हो जाती हूँ। *भूल जाती हूँ नश्वर देह और देह से जुड़ी सभी बातों को। केवल एक ही स्मृति कि मैं आत्मा हूँ, महान आत्मा हूँ, विशेष आत्मा हूँ, परमात्मा की संतान हूँ, मेरे सर्व सम्बन्ध केवल उस एक मेरे पिता परमात्मा के साथ हैं। इस सृष्टि पर मैं केवल पार्ट बजाने आई हूँ। अब ये पार्ट पूरा हुआ और मुझे वापिस अपने पिता के पास जाना है* इन्ही संकल्पो के साथ मैं आत्मा, एक चमकता हुआ सितारा अब देह से बाहर निकलती हूँ और चल पड़ती हूँ उनके पास उनकी निराकारी दुनिया उस पार वतन में जहाँ प्रकृति के पांचो तत्वों की कोई हलचल नही। 

 

_ ➳  मन बुद्धि के विमान पर बैठ कर, आत्माओं की उस सुन्दर दुनिया में जो मेरा परमधाम घर हैं, जहाँ मेरे पिता रहते हैं उस निर्वाणधाम घर में अब मैं पहुँच चुकी हूँ। चारों और फैले अनन्त लाल प्रकाश को मैं देख रही हूँ। *एक सुंदर लालिमा चारों और बिखरी हुई है जो मन को सुकून दे रही हैं। एक ऐसा गहन सुकून जिससे मैं आत्मा आज दिन तक अनजान थी, वो सुकून, वो शांति, वो सुख पाकर मैं आत्मा जैसे तृप्त हो गई हूँ। मन में अपने पिता से मिलने की आश तीव्र होती जा रही है। अपने प्यारे पिता से मिलकर जन्म  जन्मांतर से उनसे बिछुड़ने की प्यास बुझाने के लिए अब मैं उनके पास जा रही हूँ*। अपने सामने मैं देख रही हूँ सर्वगुणों, सर्वशक्तियों के सागर, महाज्योति अपने प्यारे पिता को जो अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैलाये मेरा आह्वान कर रहें हैं। बिना एक पल भी व्यर्थ गवांए अपने पिता की किरणों रूपी बाहों में मैं जाकर समा जाती हूँ।

 

_ ➳  उनकी बाहों में समाकर मैं ऐसा महसूस कर रही हूँ जैसे सर्वशक्तियों की मीठी - मीठी लहरों में मैं डुबकी लगा रही हूँ। मेरे शिव पिता से रही सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे झरने की फुहारों की तरह निरन्तर मुझ पर बरस रही है और मुझे असीम सुख, शांति का अनुभव करवाने के साथ - साथ, मुझ में असीम बल भर कर मुझे शक्तिशाली भी बना रही हैं। *स्वयं को सर्वशक्तिसम्पन्न बना कर अब मैं फिर से अपना पार्ट बजाने के लिए साकार सृष्टि पर लौट रही हूँ। अपने साकारी शरीर मे विराजमान हो कर ड्रामा के राज को यथार्थ रीति स्मृति में रखकर केवल अपने पुरुषार्थ द्वारा अपनी ऊँच प्रालब्ध बनाने पर अब मैं अपना पूरा ध्यान दे रही हूँ*। कोई संदेह, कोई भी प्रश्न अब मेरे मन मे नही हैं। त्रिकालदर्शी बन ड्रामा की हर एक्ट को साक्षी होकर देखते हुए, अपने पुरुषार्थ को ड्रामा के ऊपर ना छोड़ कर, पूरी लगन के साथ भविष्य ऊँच प्रालब्ध बनाने के लिए अब मैं तीव्र पुरुषार्थ कर रही हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपनी श्रेष्ठता द्वारा नवीनता का झंडा लहराने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं शक्ति स्वरूप आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव मन्सा द्वारा शक्तियों का दान करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा कर्म द्वारा गुणों का दान करती हूँ  ।*

   *मैं महादानी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  ऐसे नहीं सोचना कि अभी कुछ समय तो पड़ा हैइतने में विनाश तो होना नहीं हैयह नहीं सोचना। विनाश होना है अचानक। पूछकर नहीं आयेगा कि हाँ तैयार हो! सब अचानक होना है। आप लोग भी  ब्राह्मण कैसे बनें? *अचानक ही सन्देश मिला, प्रदर्शनी देखी, सम्पर्क-सम्बन्ध हुआ बदल गये। क्या सोचा था कि इस तारीख को ब्राह्मण बनेंगेअचानक हो गया ना! तो परिवर्तन भी अचानक होना है।* आपको पहले माया और ही अलबेला बनायेगीसोचेंगे हमने तो दो हजार सोचा था - वह भी पूरा हो गया, अभी तो थोड़ा रेस्ट कर लो। पहले माया अपना जादू फैलायेगी, अलबेला बनायेगी। किसी भी बात मेंचाहे सेवा मेंचाहे योग मेंचाहे धारणा मेंचाहे सम्बन्ध-सम्पर्क में यह तो चलता ही हैयह तो होता ही है ....ऐसे पहले माया अलबेला बनाने की कोशिश करेगी।

 

 _ ➳  *फिर अचानक विनाश होगाफिर नहीं कहना कि बापदादा ने सुनाया ही नहींऐसा भी होना है क्या!* इसलिए पहले ही सुना देते हैं - अलबेले कभी भी किसी भी बात में नहीं बनना। *चार ही सबजेक्ट में अलर्ट, अभी भी कुछ हो जाए तो अलर्ट।* उस समय नहीं कहना बापदादा अभी आओअभी साथ निभाओअभी थोड़ी शक्ति दे दो, उस समय नहीं देंगे। *अभी जितनी शक्ति चाहिएजैसी चाहिए उतनी जमा कर लो। सबको खुली छुट्टी हैखुले भण्डार हैंजितनी शक्ति चाहिए, जो शक्ति चाहिए ले लो। पेपर के समय टीचर वा प्रिन्सीपाल मदद नहीं करता।*   

 

✺   *ड्रिल :-  "अचानक की स्मृति से अलर्ट होकर अलबेलेपन से मुक्त होने का अनुभव"*

 

 _ ➳  पहाड़ी की ऊँची चोटी पर खड़ी मैं आत्मा... देख रही हूँ प्रकृति के सौंदर्य को... आह्लादक नज़ारा...  हरियाली की चुनरी ओढ़े सजी धरती... नीला नीला आसमान... जरमर जरमर बहते झरनें... असीम शांति की आगोश में मैं आत्मा सिर्फ एक की ही यादों में खोई  हूँ... *वह हैं मेरे शिवबाबा... मेरे पिता परमेश्वर... ब्रह्माण्ड के स्वामी की मैं संतान... बिंदु रूपी बाप की यादों में बिंदु रूप बनती जा रही हूँ... देवकुल की मैं देव आत्मा... देवताई गुणों के स्वामी का आह्वान करती हूँ...*

 

 _ ➳  मेरे पिता परमेश्वर... अपनी राज दुलारी का दुलार भरा आह्वान सुन कर मेरे समीप आ जाते हैं... *ब्रह्मा तन में अवतरित मेरे पिता का भव्य रूप देख के मैं आत्मा भाव विभोर हो जाती हूँ...* अश्रुभीनी आँखों से मैं बापदादा के गले मिलती हूँ... बापदादा मुझे अपने पास बिठा कर मुझ आत्मा के सर पर आशीर्वादों से भरा रूहानी हाथ रख रहे हैं...  बापदादा से आती हुई शक्तियों को मैं आत्मा अपने में धारण करती जा रही हूँ... *और अचानक बापदादा का धर्मराज का रूप देख मैं आत्मा भयभीत हो जाती हूँ...* बापदादा मेरा हाथ पकड़ें ले चलते हैं सूक्ष्म वतन में... और मैं आत्मा डरी हुई... सहमी सहमी सी बापदादा को देखती रहती हूँ... आँखों में अश्रु की धारा बहती ही जा रही हैं...

 

 _ ➳  सूक्ष्म वतन में बापदादा मेरे सर पर अपना हाथ रख कर मुझ आत्मा को एक सीन दिखा रहे हैं... *मनुष्यलोक में चारों ओर विनाश का तांडव रचा हुआ हैं... प्रकृति के पाचों तत्व का विकराल रूप देख कर मैं आत्मा अचंभित हो जाती हूँ...* कहीं ओर आकाश अग्नि वर्षा कर रहा है तो कहीं ओर वरुण का रौद्र रूप दिखाई दे रहा है... कहीं ओर जलसमाधि लिये हुए शहरों को देख रही हूँ... तो कहीं ओर पूरी धरती अचेतन शरीरों का बोझ उठा रही हैं... *त्राहिमाम त्राहिमाम सारी सृष्टि हो गई हैं... और त्राहिमाम त्राहिमाम हर आत्मा बन गयी हैं...*

 

 _ ➳  और मैं आत्मा देख रही हूँ अपने आप को इस विनाशी दुनिया में... अपने अंतिम पलों को महसूस करती हूँ... *समाधि अवस्था में बैठी मैं आत्मा सिर्फ बाप को याद करती हूँ... अंतिम समय में बापदादा की गोदी का सहारा लेकर मैं आत्मा शांति का अनुभव कर रही हूँ...* अब तो अपने घर को जाना हैं... अपने पिता के घर... और फिर सतयुगी दुनिया में रहना हैं... यह बात याद करती मैं आत्मा मृत्यु शैया पर भी मुस्कुराती रहती हूँ... बाप के रंग में रंगी मैं आत्मा... अब मृत्यु को अपने गले का हार बना रही हूँ... अपने अंतिम समय में बापदादा का शुक्रिया अदा करती हूँ... कर्मातीत अवस्था की अंतिम स्टेज पर पहुँची मैं आत्मा... अपनी आँखों से बापदादा को ही देख रही थी... *अंतिम स्वांस लेती मैं आत्मा... बापदादा की बाहों में सदा के लिए समां जा रही हूँ...*

 

 _ ➳  बापदादा का रूहानी हाथ मेरे सर से उठते ही... मैं आत्मा वापिस स्थूल शरीर में प्रवेश करती हूँ... और *मैं आत्मा यह नज़ारा देख मन ही मन अपने स्थूल देह को श्रद्धांजलि अर्पण करती हूँ... खुद के ही हाथों मंसा अग्निदाह दे रही हूँ...* और बापदादा को मुस्कुराते हुए देखती हूँ... उनका धर्मराज का रूप परिवर्तित हो कर मेरे बाबा का रूप दिखाई दे रहा है... और बापदादा द्वारा सतयुगी स्वराज्य अधिकार को प्राप्त करती हूँ... *अंत में ही आरम्भ को देखती मैं आत्मा कब बापदादा का सन्देश मिला... कैसे प्रदर्शनी देखी... कब सम्पर्क-सम्बन्ध हुआ और अचानक ही बापदादा की बन गईं...  कभी सोचा भी नहीं था कि ब्राह्मण जन्म मिलेगा...* और ऐसा शानदार... वैभवी ठाठबाठ... से खुद के ही हाथों से खुद का अग्निदाह करने को मिलेगा... *बापदादा के महावाक्य "अंत मती सो गति" को सफल कर दिखाया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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