━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 16 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ किसी भी बंधन में बंधे तो नहीं ?

 

➢➢ कमाई में कभी भी संशयबुधी बन थके तो नहीं ?

 

➢➢ सर्व प्राप्तियों के खजानों को स्मृति स्वरुप बन कार्य में लगाया ?

 

➢➢ निश्चय बुधी बन विजय को प्राप्त किया ?

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  जैसे ब्रह्मा बाप ने निश्चय के आधार पर, रुहानी नशे के आधार पर, निश्चित भावी के ज्ञाता बन सेकेण्ड में सब सफल कर दिया। अपने लिए कुछ नहीं रखा। तो स्नेह की निशानी है सब कुछ सफल करो। सफल करने का अर्थ है श्रेष्ठ तरफ लगाना।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   "मैं सर्व की दुआयें लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"

 

   सदा 'दृढ़ता सफलता की चाबी है' - इस विधि से वृद्धि को प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ, ऐसा अनुभव होता है ना।

 

  दृढ़ संकल्प की विशेषता कार्य में सहज सफल बनाए विशेष आत्मा बना देती है और कोई भी कार्य में जब विशेष आत्मा बनते हैं तो सबकी दुआयें स्वत: ही मिलती हैं। स्थूल में कोई दुआयें नहीं देता लेकिन यह सूक्ष्म है जिससे आत्मा में शक्ति भरती है और स्व-उन्नति में सहज सफलता प्राप्त होती है।

 

   तो सदा दृढ़ता की महानता से सफलता को प्राप्त करने वाली और सर्व की दुआयें लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ - इस स्मृति से आगे बढ़ते चलो।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  आत्मा का आदि वा अनादि लक्षण तो शान्त है, तो सेकण्ड में ऑर्डर हो कि अपने अनादि स्वरूप में स्थित हो जाओ तो हो सकते हो कि टाइम लगेगा? सुनाया था ना कि लगाना चाहे बिन्दी और लग जाये क्वेचन मार्क तो क्या होगा? इसको किस अवस्था का अभ्यास कहेंगे? सभी फरिश्ते स्थिति का अभ्यास करते हो?

 

✧  अभी और अभ्यास करना है कि जितना समय चाहे उतना समय उस विधि से स्थित हो जायें। अभी देखो कोई भी प्रकृति की आपदा या परिस्थिति की आपदा आती है तो अचानक आती हैना, और दिन-प्रतिदिन अचानक यह प्रकृति अपनी हलचल बढ़ाती जाती है। यह कम नहीं होनी है, बढ़नी ही है। अचानक आपदा आ जाती है।

 

✧  तो ऐसे समय पर समाने वा समेटने की शक्ति की आवश्यकता है। और कहाँ भी बुद्धि नहीं जाये, बस बाप और मैं, बुद्धि को जहाँ लगाना चाहें वहाँ लग जाये। क्यों-क्या में नहीं जाये, ये क्या हुआ, ये कैसे होगा, होना तो नहीं चाहिये, हो कैसे गया - इसको ब्रेक कहेंगे?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧  आप के आगे आने से लाइट ही लाइट देखने में आये। ऐसे होना है। मधुबन ही लाइट का घर हो जायेगा। यह दीवे आदि देखते भी जैसे कि नहीं देखेंगे। जैसे वतन में लाइट ही लाइट देखने में आती है वैसे यह स्थूल वतन लाइट का हाउस हो जायेगा। जब आप चैतन्य लाइट हाउस हो जायेंगे तो फिर यह मधुबन भी लाइट हाउस हो जायेगा। अभी यह है लास्ट पढ़ाई की लास्ट सब्जेक्ट प्रैक्टिकल (उँमूम्त) में। थ्योरी (पदैब्) का कोर्स समाप्त हुआ। प्रैक्टिकल कोर्स की लास्ट सब्जेक्ट है। इस लास्ट सब्जेक्ट में बहुत फास्ट पुरुषार्थ करना पड़ेगा। इसी स्टेज के लिए गायन है।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- स्थापना, विनाश और पालना-अपने तीन कर्तव्य याद रखना"

➳ _ ➳ परमपिता परमात्मा परमधाम से आकर विकारों की अग्नि से धधकते इस दुनिया को स्वाहा कर... नई निर्विकारी सतयुगी दुनिया की स्थापना के लिए रूद्र ज्ञान यज्ञ की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं... कोटो में से चुनकर प्यारे बाबा ने मुझे अपनी गोदी में पालना दी... मुझे ब्राहमण बनाकर इस यज्ञ में अपना राईट हैण्ड बनाया... विचार करते हुए मैं आत्मा उड़ चलती हूँ, अव्यक्त वतन में... मीठे बाबा मेरे सिर पर विश्व परिवर्तन का ताज पहनाते हुए समझानी देते हैं...

❉ सबकी जिन्दगी की राहों से अँधेरा मिटाकर विश्व को रोशन करने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:- मेरे मीठे फूल बच्चे... बापदादा आज चैतन्य दीपको से मिलन मना रहे है... हर एक दीपक अपनी रौशनी से विश्व के अंधकार को दूर करने वाला चैतन्य दीपक है... अपनी इस खुबसूरत जिम्मेदारी के ताज को सदा पहने रहो... विश्व की आत्माये अंधकार के सागर में समायी सी... बेसब्री से आपकी बाट निहार रही है... उनके जीवन का अँधेरा दूर करो...

➳ _ ➳ इस जहान की नूर मैं आत्मा सबके दिलों की आश बन दुःख दर्द मिटाकर खुशियों से महकाते हुए कहती हूँ:- हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में प्रकाश पुंज बन गई हूँ... सबके दुखो को दूर करने वाली दीपक बन जगमगा रही हूँ... सबके दामन में सुखो के फूल खिला रही हूँ... और विश्व परिवर्तन की जिम्मेदारी का ताज पहन मुस्करा रही हूँ...

❉ प्यारे बाबा अमृत भरा कलश मेरे सिर पर रख विश्व परिवर्तन की जिम्मेवारी के निमित्त बनाते हुए कहते हैं:- मीठे प्यारे फूल बच्चे... कितने महान भाग्यशाली ब्रह्मा कुमार हो... आपके स्नेह के आकर्षण में बाबा अव्यक्त होते हुए भी....मधुबन में साकार रूप चरित्र की अनुभूति सदा कराते है... कितने बड़े स्नेह के जादूगर हो... ऐसी विशेषता भरी खुबसूरत मणि हो कि स्नेह के बन्धन में बापदादा को बांध लिया है...

➳ _ ➳ परमात्मा की गले का हार बन अविनाशी सुखों से इस सृष्टि का श्रृंगार करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:- मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा खुबसूरत भाग्य की धनी हूँ... भगवान मेरी बाँहों में आ गया है... मेरे स्नेह की डोरी में खिंच कर सदा साथ रह मुस्करा रहा है... वाह बच्चे वाह के गीत गा रहा है... आपके प्यार में मै आत्मा खुबसूरत चैतन्य दीपक बन गई हूँ...

❉ अपने वरदानी हाथों से अविनाशी भाग्य की लकीर मेरे मस्तक पर खींचते हुए मेरे बाबा कहते हैं:- मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... बापदादा होलिहंसो का ख़ुशी भरा डांस देख देख मन्त्रमुग्ध है... मनमनाभव के महामन्त्र के वरदानी बन मुस्करा रहे हो... ईश्वर पिता की सारी दौलत को बाँहों में भरने वाले खबसूरत सौदागर भी हो और जादूगर भी हो... सदा इस अलौकिक नशे में रहो और ज्ञान सूर्य बन चमको...

➳ _ ➳ इस धरा पर स्वर्ग लाने के कार्य में मैं आत्मा अपना तन, मन, धन सफल करते हुए कहती हूँ:- हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपको पाकर किस कदर गुणो और शक्तियो की जादूगर सी बन गयी हूँ... जीवन कितना मीठा प्यारा और खुशनुमा इस प्यार की जादूगरी से हो गया है... मै आत्मा ज्ञान सूर्य बन अपनी रूहानियत से सबके दिल रोशन कर रही हूँ...

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- मौलाई मस्ती में रहकर स्वयं को स्वतंत्र बनाना है

➳ _ ➳ जिस मौलाई मस्ती का वर्णन पीरों - फकीरों ने किया, वो मौलाई मस्ती क्या है! उसका आनन्द कैसा है! उसका अनुभव मैं आत्मा जब चाहे तभी कर लेती हूँ। तो कितना श्रेष्ठ सौभाग्य है मेरा कि उन फकीरों ने तो सिर्फ उस मस्ती का वर्णन किया लेकिन मैंने तो उसे जब चाहा तब अनुभव किया। कितना सुख समाया है बाबा की याद में। दिल को कितना सुकून, कितना आराम देती है मेरे मीठे बाबा की मीठी यादें। मन ही मन अपने श्रेष्ठ भाग्य का गुणगान करती, उस मौलाई मस्ती का अनुभव करने के लिए मैं आत्मिक समृति में टिक कर, अपने सुख, शांत और आनन्दमय स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और अपने मन बुद्धि को सभी बातों से हटाकर सम्पूर्ण एकाग्रचित अवस्था में बैठ जाती हूँ।

➳ _ ➳ अपने सम्पूर्ण ध्यान को मैं केवल अपने निराकारी चमकते हुए ज्योति बिंदु स्वरूप पर और अपने प्यारे पिता के अनन्त प्रकाशमय निराकारी बिंदु स्वरूप पर पूरी तरह एकाग्र कर लेती हूँ। अपने ही समान अपने पिता के स्वरूप को देख कर मन को जैसे एक सुकून मिल रहा है और बुद्धि सभी बातों से हटकर केवल अपने पिता के उस अति सुंदर स्वरूप को आंखों के सामने चित्रित कर रही हैं। मेरे प्यारे पिता का स्वरूप मेरी आँखों के सामने ऐसे स्पष्ट हो रहा है जैसे वो मेरी आँखों में ही समाये हुए हैं। उनसे आ रहे परमात्म शक्तियों के करेंट को मैं अपने अंदर प्रवाहित होते हुए स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ।

➳ _ ➳ जैसे मोबाइल को चार्जर से जोड़ते ही उसकी बैटरी चार्ज होने लगती है ऐसे ही मन बुद्धि से सर्वशक्तिवान अपने पिता के साथ कनेक्ट होकर, मैं भी स्वयं को परमात्म शक्तियों से चार्ज होता हुआ अनुभव कर रही हूँ। मुझ आत्मा की सोई हुई शक्तियाँ परमात्म बल पा कर जागृत हो रही हैं और मैं स्वयं को सर्व शक्तियों से भरपूर होता हुआ महसूस कर रही हूँ। सर्वगुणों और सर्वशक्तियों के सागर मेरे पिता के अनन्त प्रकाशमय स्वरूप से निकल रही सर्व गुणों और सर्व शक्तियों की किरणें मुझ आत्मा को जैसे - जैसे गहराई तक छू रही है एक रूहानी सुरूर मुझ आत्मा के ऊपर छाने लगा है। एक अद्भुत रूहानी नशे से मैं आत्मा स्वयं को भरपूर अनुभव करने लगी हूँ।

➳ _ ➳ चित को चैन और मन को आराम देने वाली रूहानी मस्ती में डूबी, मौलाई बन अपने मौला अर्थात अपने मालिक से मिलने उनकी निराकारी दुनिया में चलने का मैं जैसे ही संकल्प करती हूँ मैं महसूस करती हूँ जैसे मेरे शिव पिता परमात्मा से निकल रही अनन्त शक्तियों की शक्तिशाली किरणे मैगनेट की तरह मुझ आत्मा को अपनी तरफ खींच रही हैं और मैं आत्मा परमात्म शक्तियों के चुम्बकीय आकर्षण से आकर्षित हो कर अब नश्वर देह का त्याग कर ऊपर की और उड़ने लगी हूँ। देह और देह की दुनिया के हर बन्धन से मुक्त होकर मैं स्वयं को बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ। तीव्र गति से उड़ते हुए मैं सेकेण्ड में आकाश को पार करती हूँ और अब आकाश से भी ऊपर, सूक्ष्म लोक को पार करके मैं पहुंच गई हूँ अपने शिव पिता परमात्मा की अनन्त शक्तियों की किरणों के बिल्कुल नीचे उनके परमधाम घर मे।

➳ _ ➳ अपने इस परमधाम घर मे अब मैं अपने शिव पिता परमात्मा के बिल्कुल समीप हूँ और उनसे आ रही शक्तिशाली किरणों को स्वयं में समा कर असीम ऊर्जावान बन रही हूँ। अपने प्यारे शिव बाबा के सर्वगुणों, सर्वशक्तियों और सर्व खजानों को मैं अपने अंदर भरती जा रही हूँ। मौलाई बन उनके प्यार की मस्ती में डूब कर, स्नेह के सागर अपने प्यारे पिता के स्नेह की शीतल धाराओं में मैं बहती ही जा रही हूँ और उस स्नेह में डूबकर गहन अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर रही हूँ। एक दिव्य अलौकिक आनन्द और अथाह सुख की मैं अनुभूति कर रही हूँ। अपनी बीज रूप स्थिति में स्थित होकर बीज रूप अपने पिता परमात्मा से बेहद का असीम मौलाई सुख पाकर अब मैं आत्मा वापिस अपने कर्म क्षेत्र पर लौट आती हूँ और अपने साकार तन का आधार लेकर मैं फिर से इस सृष्टि पर कर्म करने के लिए तैयार हो जाती हूँ।

➳ _ ➳ अपनी साकारी देह में भृकुटि के अकालतख्त पर अब मैं विराजमान हूँ और शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी कर रही हूँ किन्तु हर कर्म अब मैं मौलाई बन बाबा की याद में रहकर कर रही हूँ इसलिए अब कर्म का अच्छा या बुरा कोई भी फल मुझे अपनी और नही खींचता बल्कि बाबा की याद की मौलाई मस्ती, कर्म के फल से मुझे धीरे - धीरे मुक्त कर कर्मातीत बनाती जा रही है।

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   मैं सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मा हूँ।
✺   मैं स्मृति स्वरूप बन खजानों को कार्य मे लगाने वाली आत्मा हूँ।
✺   मैं सदा संतुष्ट आत्मा हूँ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ मैं निश्चय बुद्धि आत्मा हूँ ।
✺ मैं विजय के तकदीर की लकीर मस्तक पर धारण करने वाली आत्मा हूँ ।
✺ मैं विजयी रत्न हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  1. जब बाप के बने हैं तो सबसे पहले कौन-सा वायदा कियाबाबा तन-मन-धन जो भी हैकुमारों के पास धन तो ज्यादा होता नहीं फिर भी जो हैसब आपका है। यह वायदा किया हैतन भीमन भीधन भी और संबंध भी सब आपसे - यह भी वायदा पक्का किया है? जब तन-मन-धनसम्बन्ध सब आपका है तो मेरा क्या रहा! फिर कुछ मेरा-पन है? होता ही क्या है? तन, मन, धन, जन.... सब बाप के हवाले कर लिया।

 

 _ ➳  2. जब मन भी बाप का हुआमेरा मन तो नहीं है ना! या मन मेरा हैमेरा समझकर यूज करना है? जब मन बाप को दे दिया तो यह भी आपके पास 'अमानतहै। फिर युद्ध किसमें करते होमेरा मन परेशान हैमेरे मन में व्यर्थ संकल्प आते हैंमेरा मन विचलित होता है....जब मेरा है नहीं, अमानत है फिर अमानत को मेरा समझ कर यूज करनाक्या यह अमानत में ख्यानत नहीं है? माया के दरवाजे हैं - 'मैं और मेरा'। तो तन भी आपका नहींफिर देह- अभिमान का मैं कहाँ से आया! मन भी आपका नहींतो मेरा-मेरा कहाँ से आयातेरा है या मेरा हैबाप का है या सिर्फ कहना हैकरना नहींकहना बाप का और मानना मेरा!

 

 _ ➳  सिर्फ पहला वायदा याद करो कि न बाडी-कान्सेस की - 'मैं हैन मेरा'। तो जो बाप की आज्ञा हैतन को भी अमानत समझो। मन को भी अमानत समझो। फिर मेहनत की जरूरत है क्या? कोई भी कमजोरी आती है तो इन दो शब्दों से आती है - 'मैं और मेरा'। तो न आपका तन है बाडी-कान्सेस का मैं।  मन में जो भी संकल्प चलते हैं अगर आज्ञाकारी हो तो बाप की आज्ञा क्या हैपाजिटिव सोचो, शुभ भावना के संकल्प करो। फालतू संकल्प करो - यह बाप की आज्ञा है क्यानहीं। तो जब आपका मन नहीं है फिर भी व्यर्थ संकल्प करते हो तो बाप की आज्ञा को प्रैक्टिकल में नहीं लाया ना! सिर्फ एक शब्द याद करो कि-मैं 'परमात्म-आज्ञाकारी बच्चा हूँ'। बाप की यह आज्ञा है या नहीं हैवह सोचो। जो आज्ञाकारी बच्चा होता है वह सदा बाप को स्वत: ही याद होता है। स्वत: ही प्यारा होता है। स्वत: ही बाप के समीप होता है। तो चेक करो मैं बाप के समीपबाप का आज्ञाकारी हूँएक शब्द तो अमृतवेले याद कर सकते हो - 'मैं कौन?' आज्ञाकारी हूँ या कभी आज्ञाकारी और कभी आज्ञा से किनारा करने वाले

 

✺   ड्रिल :-  "'परमात्म-आज्ञाकारी बच्चा होने का अनुभव"

 

 _ ➳  अमृतवेले मीठे शिवबाबा की कोमल स्पर्श से आँखे खुली... बाबा की मीठी मुस्कान देख रोमांचित हो उठी... बाबा का हाथ माथे पर अनुभव कर अपना दोनों हाथ उनकी ओर बढा दिया... बाबा का हाथ पकड अशरीरी हो चल पड़ी अनंत की सैर करने... मीठे बाबा की मधुर मुस्कान से मन पुलकित हो गया... इतनी सहज सच्ची थी बाबा संग प्रेम अनुभूति... बाबा संग रहने का दिल ने वायदा जो किया है... मीठे बाबा ही है तन मन धन संबंध में...

 

 _ ➳  जहां बाबा बसे हो वो तन है पवित्र, वो मन है मंदिर, वो संबंध है स्वर्णिम... बाबा की शिक्षाऐं और ज्ञान की वर्षा से यह तन मन धन जन की सुधि खोने लगी... मीठे बाबा के संग सहज ही सब विस्मृत सा अनुभव करती हूँ... मैं कौन और मेरा क्या ? मैैं बाबा का और मीठा बाबा मेरा... बड़ा ही सुंदर सरल अनुभव हुआ... स्वयं को बाबा के सान्निध्य में देखकर असीम संतोष का अनुभव किया... बाबा की समीपता से अंदर के भराव को महसूस कर रही हूँ...

 

 _ ➳  अपने पुराने जीर्ण शीर्ण देह और देह के परिचय के परत दर परत आवरण को अनायास चीरते हुए अपने मूल स्वरूप के दर्शन कर हल्‍का महसूस कर रही हूँ... अंधकार की कालिमा से, समस्त व्यर्थ से मुक्ति को प्राप्त कर दीप्त आभामय हो गई हूँ... स्वयं को उज्जवल प्रकाश स्वरूप में देख पुराने मैं - पन, मेरा - पन से सहज भाव से किनारा कर समर्थ अनुभव करती हूँ... बाॅडी काॅन्शियस से वैराग महसूस हो रही है... बाबा की आज्ञाओं के पालन में रमता योगी बन आनंद ले रही हूँ... कोई मेहनत नहीं, कोई परिश्रम नहीं केवल असीम शांति को महसूस कर भरपूर हो रही हूँ...

 

 _ ➳  सहज रीति से शुभ भावना व समर्थ संकल्प से परिपूर्ण हो तन मन धन के समर्पण से बोझ रहित प्रफुल्लित अनुभव कर रही हूँ... अपने इसी स्वरूप में स्थित होकर मैं आत्मा अपने कर्म क्षेत्र पर वापिस लौट आती हूँ... और अपने सभी कर्तव्यों का पालन कर... बाबा की आज्ञानुसार अपने सर्व आत्मा भाईयों की निःस्वार्थ सेवा में अपना संगम का अनमोल समय व्यतीत करती हूँ... मैं औैर मेरा को ज्योति स्वरूप का चोला पहनाकर  सदा समर्थ स्वरूप में रह सर्व आत्माओं को  शांति प्रदान करने की सेवा में जुट जाती हूँ...

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━