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 17 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *कर्मभोग ख़ुशी ख़ुशी चुक्तु किया ?*

 

➢➢ *"हम प्रिंस प्रिंसेस बन रहे हैं" - सदा इसी नशे में रहे ?*

 

➢➢ *अचल स्थिति द्वारा मास्टर दाता बनकर रहे ?*

 

➢➢ *शांति की शक्ति से क्रोध की अग्नि को बुझाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे सूर्य की किरणें फैलती हैं, वैसे ही मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज पर शक्तियों व विशेषताओं रुपी किरणें चारों ओर फैलती अनुभव करे,* इसके लिए 'मैं मास्टर सर्वशक्तिवान, विघ्न-विनाशक आत्मा हूँ', इस स्वमान के स्मृति की सीट पर स्थित होकर कार्य करो तो विघ्न सामने तक भी नहीं आयेंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं सदा खुश रहने वाली खुशनसीब आत्मा हूँ"*

 

  सभी खुश रहते हो? *कैसी भी परिस्थिति आ जाए, कितना भी बड़ा विघ्न आ जाए लेकिन खुशी नहीं जाए। विघ्न आता है तो चला जायेगा। लेकिन अपनी चीज क्यों चली जाए। वह आया, वह जाए। अपनी चीज तो नहीं जाए ना।* आने वाला जायेगा या रहने वाला भी चला जायेगा? तो खुशी अपनी चीज है।

 

  *बाप का वर्सा है ना खुशी। तो विघ्न आता और चला जाता है। जब भी विघ्न आये ना तो यह सोचो यह आया है चले जाने के लिए। कोई घर का मेहमान आता है तो ऐसे नहीं, मेहमान होकर आया और सारी चीजें लेकर जाये। ध्यान रखेंगे ना।*

 

  तो विध्न आया और चला जायेगा। लेकिन आपकी खुशी तो नहीं ले जाये। दा खुशी साथ रहे। *बाप है अर्थात् खुशी है। अगर पाप है तो खुशी नहीं, बाप है तो खुशी है। तो सदा खुश रहो। हर एक समझे कि मैं खुश रहने वाला हूँ। खुश रहने वाले को देख दूसरा भी खुश हो जाता है। रोने वाले को देखेंगे तो दूसरे को भी रोना आ जाता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अशरीरी बनना इतना ही सहज होना चाहिए। जैसे स्थूल वस्त्र उतार देते हैं वैसे यह देह अभिमान के वस्त्र सेकंड में आतार ने हैं। जब चाहे धारण करें, जब चाहे न्यारे हो जाएं।  लेकिन यह अभ्यास तब होगा जब किसी भी प्रकार का बंधन नहीं होगा। *अगर मन्सा संकल्प का भी बंधन है तो डिटैच हो नहीं सकेंगे।*

 

✧  जैसे कोई तंग कपड़ा होता है तो सहज और जल्दी नहीं उतार सकते हो। इस प्रकार *मन्सा, वाचा, कर्मणा सम्बन्ध में अगर अटैचमेंट है लगाव  है तो डिटैच नहीं हो सकेंगे।* ऐसा अभ्यास सहज कर सकते हो। जैसा संकल्प किया, वैसा स्वरूप हो जाए।

 

✧  संकल्प के साथ-साथ

स्वरूप बन जाते हो या संकल्प के बाद टाइम लगता है स्वरूप मैंने में? संकल्प किया और अशरीरी हो जाओ। *संकल्प किया मास्टर प्रेम के सागर की स्थिति में स्थित हो जाओ और वह स्वरुप हो जाए।* ऐसी प्रैक्टिस हैं? अब इसी प्रैक्टिस को बढ़ाओ। इसी प्रैक्टिस के आधार पर स्कॉलरशिप ले लेंगे।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ जैसे बाप प्रवेश होते हैं और चले जाते हैं, *तो जैसे परमात्मा प्रवेश होने योग्य हैं वैसे मरजीवा जन्मधारी ब्राह्मण आत्मायें अर्थात् महान आत्मायें भी प्रवेश होने योग्य हैं। जब चाहो कर्मयोगी बनो, जब चाहो परमधाम निवासी योगी बनो, जब चाहो सूक्ष्मवतनवासी योगी बनो। स्वतन्त्र हो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- याद में रह विकर्माजीत बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा स्वीट बाबा की यादों में मगन होकर उड़ चलती हूँ स्वीट होम... और बाबा के सामने बैठ जाती हूँ... स्वीट बाबा से स्वीट रंगीन चमकती हुई किरणें निकलकर मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं...* मुझ आत्मा के जन्म-जन्मान्तर के विकर्म भस्म हो रहे हैं... मैं आत्मा स्वीट बाबा के साथ स्वीट होम से नीचे उतरकर फ़रिश्ता स्वरुप धारण कर अव्यक्त वतन में पहुँच जाती हूँ... मीठे बाबा मीठी दृष्टि देते हुए मीठी शिक्षाएं देते हैं...

 

  *योग अग्नि से पापो को भस्म कर सम्पूर्ण सतोप्रधान बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... खूबसूरत महकते फूल आत्मा से... देहभान में लिप्त साधारण मनुष्य बनकर... विकारो में फंस पड़े हो... *अब स्वयं के सत्य स्वरूप को ईश्वरीय यादो में उजला करो... योग अग्नि में... सारे पापो को भस्म कर वही दमकता चमकता स्वरूप पुनः पा लो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा योग अग्नि से सारे हिसाब-किताब चुक्तु करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा आपको पाकर निहाल हो गई हूँ... और पिता की मीठी यादो में देहभान के सारे पापो से मुक्त होती जा रही हूँ...* अपने दमकते स्वरूप को पाती जा रही हूँ... और बाबा का हाथ थामे खुशियो में उड़ती जा रही हूँ...

 

  *मीठे बाबा सतयुगी स्वर्णिम सुखों से मुझ आत्मा को मालामाल करते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... अब भगवान को पाकर जीवन को सच्चा बनाओ... *अब और नए हिसाब किताब बनाकर स्वयं को मत उलझाओ... पुराने सारे पापो को ईश्वरीय यादो में जलाओ...* और हल्के खुशनुमा होकर अथाह खुशियो में डूब जाओ... सुंदर देवता बन मुस्कराओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा पवित्रता के सफ़ेद किरणों से विकारों की कालिमा को भस्म करते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा...मै आत्मा मीठे बाबा को पाकर सारे विकारो से मुक्त हो गई हूँ... बाबा ने मुझे दमकता सा सुनहरा रंग दे दिया है... *मै आत्मा गुणो और शक्तियो से भरपूर होती जा रही हूँ... और अपने पापो के सारे बोझों को यादो में स्वाहा कर रही हूँ...*

 

  *सुखों के आसमान तले मेरे भाग्य के सितारे को पारसमणि समान चमकाते हुए पारसनाथ बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... जब घर से निकले थे तो सतोप्रधान स्थिति से भरपूर थे... अथाह सुखो के मालिक थे... फिर नीचे उतरते विकारो में गिरकर पापो से भर गए... *अब मीठा बाबा अपनी गोद में बिठा सारे पापो को मिटाकर... स्वर्ग की खूबसूरत सौगात हथेली पर रख ले आया है... और वही सच्चा सोना बनाने आया है...*

 

_ ➳  *बिंदु बाबा के यादों के सहारे पुराने सारे हिसाब-किताब को बिंदु लगाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा ईश्वर पिता की यादो में सतोप्रधान होती जा रही हूँ... फिर से सजकर देवताई स्वरूप पा रही हूँ... *पापो की दुनिया से सारे हिसाबो को खत्म कर... नई सुख़ शांति आनन्द की दुनिया का राज्य भाग्य पा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पुण्यआत्मा बनने के लिए याद की मेहनत करनी है*"

 

_ ➳  बाबा के अव्यक्त इशारे बार - बार समय की समीपता को स्पष्ट कर रहें हैं। इन अव्यक्त इशारों को समझ अपने आप से मैं सवाल करती हूँ कि समय जिस रफ्तार से दौड़ रहा है उस रफ्तार से क्या मेरा पुरुषार्थ भी तीव्रता को पा रहा है! *क्या ज्ञान से मेरी अवस्था इतनी अचल, अडोल और एकरस हो चुकी है जो कोई भी बात मुझे हिला ना सके! माया का कोई भी वार मेरी अवस्था को डगमग ना कर सके!* इसलिए समय की समीपता को देखते हुए अब मुझे अपना सम्पूर्ण ध्यान केवल अपनी अवस्था को जमाने मे लगाना है ताकि अंत समय के सेकण्ड के पेपर को पास कर मैं पास विद ऑनर का खिताब ले सकूँ और अपने प्यारे बाबा की आशाओं को पूरा कर सकूँ।

 

_ ➳  इसी दृढ़ प्रतिज्ञा के साथ ज्ञान को धारणा में ला कर अपनी अवस्था जमाने के लिए स्वयं में योग का बल जमा करने के लिए अब मैं स्वयं को आत्मिक स्मृति में स्थित करती हूँ और अपना सम्पूर्ण ध्यान केवल अपने स्वरूप पर एकाग्र करती हूँ। *एकाग्रता की यह स्थिति सेकण्ड में मुझे देह और देह की दुनिया से न्यारा कर देती है और मैं आत्मा सहजता से देह से किनारा करभृकुटि सिहांसन को छोड़, देह की कुटिया से बाहर निकल आती हूँ*। देह से बाहर आकर अपने जड़ शरीर को मैं आत्मा साक्षी हो कर देख रही हूँ। इस देह और इससे जुड़ी किसी भी चीज का कोई भी आकर्षण अब मुझे आकर्षित नही कर रहा।

 

_ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे हर बन्धन से मैं मुक्त हो चुकी हूँ। यह निर्बन्धन स्थिति मुझे एकदम हल्के पन का अनुभव करवा रही है। *इसी हल्केपन की अनुभूति में मैं आत्मा स्वयं को ऊपर की और उड़ता हुआ अनुभव कर रही हूँ। ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे कोई चीज मुझे ऊपर की ओर खींच रही है और मैं बरबस ऊपर की और खिंची चली जा रही हूँ*। यह हल्कापन मुझे असीम आनन्द से भरपूर कर रहा है। और इसी गहन आनन्द में डूबी मैं आत्मा आकाश और तारामण्डल को पार कर जाती हूँ। अंतरिक्ष के सुंदर नजारो को मन बुद्धि के दिव्य नेत्रों से देखती, सूक्ष्म वतन को पार कर अब मैं एक बहुत ही सुन्दर दुनिया में प्रवेश करती हूँ जहाँ अथाह शान्ति ही शान्ति है।

 

_ ➳  इस गहन शान्ति के अनुभव में गहराई तक खोकर स्वयं को तृप्त करके अब मैं इस अंतहीन निराकारी दुनिया मे विचरण करते - करते उस महाज्योति के पास पहुँच जाती हूँ जो मेरे परम पिता परमात्मा है। *जो मेरे ही समान बिन्दु किन्तु गुणों में सिंधु हैं। अपने ही जैसा अपने पिता का स्वरूप देखकर मैं आत्मा आनन्द मगन हो रही हूँ और उनसे मिलन मनाने के लिए उनके समीप जा रही हूँ*। उनके बिल्कुल समीप जा कर बड़े प्यार से उन्हें निहारते हुए उनके प्यार की किरणों की शीतल छाया में मैं आत्मा जाकर बैठ जाती हूँ और उनके प्यार की शीतल फ़ुहारों का आनन्द लेती हुए उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर करने लगती हूँ।

 

_ ➳  जैसे लौकिक में एक बच्चा अपने सिर पर अपने पिता का हाथ अनुभव करके स्वयं को हिम्मतवान अनुभव करता है ऐसे मेरे शिव पिता की सर्वशक्तियों की छत्रछाया मेरे अन्दर असीम ऊर्जा का संचार कर मुझे शक्तिशाली बना रही है। *स्वयं को मैं बहुत ही बलशाली अनुभव कर रही हूँ। शक्तियों का पुंज बन कर अपने ब्राह्मण जीवन में ज्ञान को धारण कर अपनी अवस्था को जमाने का पुरुषार्थ करने के लिये अब मैं आत्मा परमधाम से नीचे वापिस साकारी दुनिया मे लौट आती हूँ* और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण जीवन में अब मैं अपने परम शिक्षक शिव पिता की निरन्तर याद से स्वयं को बलशाली बनाकर उनसे मिलने वाले ज्ञान को अच्छी रीति समझ उसे अपने जीवन मे धारण करने का पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ। *अपने शिव पिता से मिलने वाले ज्ञान और योग के बल से अपनी अवस्था को जमाने की मेहनत करते हुए अब मैं अपने सम्पूर्णता के लक्ष्य को पाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अचल स्थिति द्वारा मास्टर दाता बनने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव शान्ति की शक्ति को यूज़ करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अन्य की क्रोध अग्नि को बुझा देती हूँ  ।*

   *मैं शान्त स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ यह भी एक गुह्य कर्मों का हिसाब बुद्धि में रखो। कर्मों का हिसाब कितना गुह्य है - इसको जानो। *किसी भी आत्मा द्वारा अल्पकाल का सहारा लेते हो वा प्राप्ति का आधार बनाते हो, उसी आत्मा के तरफ बुद्धि का झुकाव होने के कारण कर्मातीत बनने के बजाए कर्मों का बन्धन बंध जाता है। एक ने दिया दूसरे ने लिया - तो आत्मा का आत्मा से लेन-देन हुआ।* तो लेन-देन का हिसाब बना वा समाप्त हुआ? उस समय अनुभव ऐसे करेंगे जैसे कि हम आगे बढ़ रहे हैं लेकिन वह आगे बढ़ना, बढ़ना नहीं, लेकिन कर्म बन्धन के हिसाब का खाता जमा किया। रिजल्ट क्या होगी! कर्म-बन्धनी आत्मा, बाप से सम्बन्ध का अनुभव कर नहीं सकेगी। कर्मबन्धन के बोझ वाली आत्मा याद की यात्रा में सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव कर नहीं सकेगी, वह याद के सबजेक्ट में सदा कमजोर होगी। नॉलेज सुनने और सुनाने में भल होशियार, सेन्सीबुल होगी लेकिन इसेन्सफुल नहीं होगी। सर्विसएबुल होगी लेकिन विघ्न विनाशक नहीं होगी। सेवा की वृद्धि कर लेंगे लेकिन विधिपूर्वक वृद्धि नहीं होगी। इसलिए ऐसी आत्मायें कर्म बन्धन के बोझ कारण स्पीकर बन सकती हैं लेकिन स्पीड में नहीं चल सकती अर्थात् उड़ती कला की स्पीड का अनुभव नहीं कर सकती। तो यह भी दोनों प्रकार के देह के सम्बन्ध हैं जो महात्यागी' नहीं बनने देंगे।

➳ _ ➳ तो सिर्फ पहले *इस देह के सम्बन्ध को चेक करो - किसी भी आत्मा से चाहे घृणा के सम्बन्ध में, चाहे प्राप्ति वा सहारे के सम्बन्ध से लगाव तो नहीं है? अर्थात् बुद्धि का झुकाव तो नहीं है? बार-बार बुद्धि का जाना वा झुकाव सिद्ध करता है कि बोझ है।* बोझ वाली चीज झुकती है। तो यह भी कर्मों का बोझ बनता है इसलिए बुद्धि का झुकाव न चाहते भी वहाँ ही होता है।

✺ *"ड्रिल :- आत्मा का आत्मा से लेनदेन कर कर्मों से नए बंधन नहीं बनाना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा नुमाशाम योग में बैठी हूं... जैसे-जैसे मैं योग की गहराई में जाती हूँ... मेरे शरीर की एक-एक नस खुलने लगती है... जो भी आज तक किसी कारणवश बन्द थी वो सभी नसें खुलने लगती हैं... पवित्र सफेद प्रकाश से मेरा मस्तिष्क एकदम सफेद लाइट रूपी बॉल के समान प्रतीत हो रहा है... और अब मैं धीरे-धीरे अपने आपको सफेद प्रकाश रूपी शरीर में अनुभव करती हूं... मेरे शरीर से अद्भुत किरणें निकल रही है... और यह पूरा स्थान सफेद किरणों से भरा हुआ प्रतीत होता है... *मेरा सूक्ष्म शरीर निकलकर प्रकृति के पास पहुंच जाता है... जहां मेरे बाबा मेरा हाथ पकड़े मुझे यह नजारा दिखा रहे हैं... और मैं इस प्रकृति को और यहां रहने वाली सभी आत्माओं को साकाश दे रही हूं...*

➳ _ ➳ प्रकृति को साकाश देते समय मैं ऐसे स्थान पर पहुंच जाती हूं... जहां पर एक मां अपने पुत्र को कहीं जाने से रोकती है, विलाप कर रही है जितना मैं उसके पास जाती हूँ उतना ही मुझे उनकी स्थिति का अनुभव होता है... *मुझे ज्ञात होता है वह मां अपने पुत्र मोह के कारण अपने पुत्र को अपने से दूर नहीं कर रही है... और पुत्र इस संसार की गतिविधियों को जानने के लिए वहां से जाना चाहता है... माँ का बुद्धि का झुकाव अपने पुत्र में इस कदर हो जाता है... कि वह अपने आपको इस पुत्रमोह में फंसा लेती है... इस कारण मां ना सो पाती है ना ही कुछ खा पाती है... और ना ही किसी प्रकार की सेवा कर पाती है... जैसे ही वह किसी भी प्रकार की सेवा करती है... उसका बुद्धियोग अपने पुत्र में चला जाता है...*

➳ _ ➳ और अपना *बुद्धि योग पुत्र में जाने के कारण कर्म बंधन में आ जाती है... जिस कर्म को अभी तक अपना कर्तव्य और सेवा समझती थी... अब वह कर्म उसका बंधन बन जाता है... अपने इस बंधन के कारण वह अपने आप को किसी भी प्रकार निस्वार्थ आगे नहीं बढ़ा पाती है... और ना ही निमित्त भाव से सेवा करने का अनुभव कर पाती है...* इस संसार में वह स्वयं भी अपना यह बंधन नहीं देख पाती है... और ना ही समझ पाती है... कुछ देर रुककर मैं आत्मा उस आत्मा को शांति का साकाश देती हूं... जैसे ही वह आत्मा शांति का अनुभव करती है मैं आत्मा उसे समझाने लगती हूं...

➳ _ ➳ और कहती हूँ... *हे आत्मा अपने आप से इस मोह का और इस कर्म बंधन का पर्दा हटा कर देखो... तुम धीरे-धीरे इस कर्म बंधन में फंसती जा रही हो... तुम्हारी इस स्थिति के कारण तुम परमपिता परमात्मा से योग नहीं लगा पा रही हो... और ना ही आत्मिक स्थिति का अनुभव कर पा रही हो... अगर ऐसा ही रहा तो तुम्हारा कर्मों का खाता बढ़ता जाएगा और पुरुषार्थ की लगन कम होती जाएगी... जब-जब तुम याद की यात्रा से उड़ती कला का अनुभव करने लगोगी तब तब तुम्हें यह कर्म बंधन अपनी और खींचेगा और तुम्हें उड़ने नहीं देगा...* मेरे यह वचन सुनकर उस आत्मा को सत्य का आभास होता है और याद की यात्रा में और पुरुषार्थ में आगे बढ़ने का वचन देती है... इसी तरह मैं सारी आत्माओं को साकाश देते हुए अपने इस शरीर में वापस विराजमान हो जाती हूं... और मैं इस स्मृति में अपने पुरुषार्थ को आगे बढ़ाती हूं... कि मुझे कर्म बंधन को चेक करते हुए आगे बढ़ना है...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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