━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 17 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बहुतों को रास्ता बताने में बिजी रहे ?*

 

➢➢ *धनी के नाम पर पाना सब कुछ सफल किया ?*

 

➢➢ *कड़े नियम और दृढ़ संकल्प द्वारा अलबेलेपन को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *बोल में आत्मिक भाव और शुभ भावना रही ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  आप बच्चे जहाँ भी रहते हो, जो भी कर्मक्षेत्र है, आप हर एक बच्चे से बाप समान गुण, कर्म और श्रेष्ठ वृत्ति का वायुमण्डल अनुभव में आये, यही है बाप समान बनना। *सब कुछ होते हुए, नॉलेज और विश्व कल्याण की भावना से, बाप को, स्वयं को प्रत्यक्ष करने की भावना से अभी बेहद की वैराग्य वृत्ति धारण करो।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं पुरुषार्थ में सदा आगे बढ़ने वाली आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को पुरुषार्थ में आगे बढ़ने वाली आत्मा हूँ-ऐसे अनुभव करते हो? पुरुषार्थ में कभी ठहरती कला, कभी उतरती कला-ऐसा नहीं होना चाहिए। कभी बहुत अच्छा, कभी अच्छा, कभी थोड़ा अच्छा-ऐसा नहीं। सदा बहुत अच्छा। क्योंकि समय कम है और सम्पूर्ण बनने की मंजिल श्रेष्ठ है। तो अपने भी पुरुषार्थ की गति तीव्र करनी पड़े। *पुरुषार्थ के तीव्र गति की निशानी है कि वह सदा डबल लाइट होगा, किसी भी प्रकार का बोझ नहीं अनुभव करेगा। चाहे प्रकृति द्वारा कोई परिस्थिति आये, चाहे व्यक्तियों द्वारा कोई परिस्थिति आये लेकिन हर परिस्थिति 'स्व-स्थिति' के आगे कुछ भी अनुभव नहीं होगी।*

 

  स्व-स्थिति की शक्ति पर-स्थिति से बहुत ऊंची है, क्यों? यह स्व है, वह पर है। *अपनी शक्ति भूल जाते हो तब ही परस्थिति बड़ी लगती है। सदा डबल लाइट का अर्थ ही है कि लाइट अर्थात् ऊंचे रहने वाले। हल्का सदा ऊंचा जाता है, बोझ वाला सदा नीचे जाता है।* आधा कल्प तो नीचे ही आते रहे ना। लेकिन अभी समय है ऊंचा जाने का। तो क्या करना है? सदा ऊपर।

 

  शरीर में भी देखो तो आत्मा का निवास-स्थान ऊपर है, ऊंचा है। पांव में तो नहीं है ना। *जैसे शरीर में आत्मा का स्थान ऊंचा है, ऐसे स्थिति भी सदा ऊंची रहे। ब्राह्मणों की निशानी भी ऊंची चोटी दिखाते हैं ना। चोटी का अर्थ है ऊंचा।* तो स्थूल निशानी इसीलिए दिखाई है कि स्थिति ऊंची है। शूद्र को नीचे दिखाते हैं, ब्रह्म को ऊंचा दिखाते हैं। तो ब्राह्मणों का स्थान और स्थिति-दोनों ऊंची। अगर स्थान की याद होगी तो स्थिति स्वत: ऊंची हो जायेगी।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  *वरदानी रूप द्वारा सेवा करने के लिए पहले स्वयं में शुद्ध संकल्प चाहिए।* तथा अन्य संकल्पों को सेकण्ड में कन्ट्रोल करने का विशेष अभ्यास चाहिए।

 

✧  सारा दिन शुद्ध संकल्पों के सागर में लहराता रहे और जिस समय चाहे शुद्ध संकल्पों के सागर के तले में जाकर साइलेंस स्वरूप हो जाए अर्थात ब्रेक पॉवरफुल हो। *संकल्प शक्ति अपने कन्ट्रोल में हो।*

 

✧  साथ-साथ आत्मा की और भी विशेष दो शक्तियाँ *बुद्धि और संस्कार*, तीनों ही अपने अधिकार में हो। *तीनों में से एक शक्ति के ऊपर भी अगर अधिकार कम है तो वरदानी स्वरूप की सेवा जितनी करनी चाहिए उतनी नहीं कर सकते।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧ *चलते फिरते, बैठते, बातचीत करते पहली अनुभूति- यह शरीर जो हिसाब-किताब के वृक्ष का मूल तना है जिससे यह शाखायें प्रकट होती हैं, यह देह और आत्मा रूपी बीज, दोनों ही बिल्कुल अलग हैं।* ऐसे आत्म न्यारेपन का चलते फिरते बार-बार अनुभव करेंगे। नालेज के हिसाब से नहीं कि आत्मा और शरीर अलग हैं। लेकिन शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ! यह अलग् वस्तु की अनुभूति हो। जैसे स्थूल शरीर के वस्त्र और वस्त्र धारण करने वाला शरीर अलग अनुभव होता है ऐसे मुझ आत्मा का यह शरीर वस्त्र है, मैं वस्त्र धारण करने वाली आत्मा हूँ। ऐसा स्पष्ट अनुभव हो। जब चाहे इस देह भान रूपी वस्त्र को धारण करें, जब चाहे इस वस्त्र से न्यारे अर्थात् देहभान से न्यारे स्थिति में स्थित हो जायें ऐसा न्यारेपन का अनुभव होता है? *वस्त्र को मैं धारण करता हूँ या वस्त्र मुझे धारण करता है? चैतन्य कौन? मालिक कौन? तो एक निशानी- 'न्यारेपन की अनुभूति अलग होना नहीं है लेकिन मैं हूँ ही अलग।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बाप को याद करना और दूसरों को भी कराना"*

 

_ ➳  *वर्षा के बाद आसमान में निकले इन्द्रधनुष को मैं आत्मा निहार रही हूँ... इन्द्रधनुषी रंगों से सजा ये आसमान ऐसे लग रहा, जैसे आसमान ने अपने माथे पर रंग-बिरंगी बिंदिया लगाईं हो...* गले में सतरंगी माला पहनी हो... एक तरफ बादलों के पीछे से सूरज निकल रहा जैसे ज्ञान सूर्य बाबा मुझे ऊपर बुला रहे हों... मैं आत्मा इस देह से न्यारी होती हुई ऊपर उडती हुई पहुँच जाती हूँ वतन में बाबा के पास...

 

  *प्यारे बाबा मुझे अपने निज स्वरुप की स्मृति दिलाते हुए कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... इस देह और देहधारियों के सम्बन्धो में फसकर स्वयं के सच्चे दमकते आत्मिक स्वरूप को ही भूल गए हो... इस खेल को ही अपना वजूद समझ दुखी हो गए हो... *अब अपने उसी सच्चे स्वरूप के भान में खो जाओ... और अपने सच्चे पिता शिवबाबा को याद करो... और दूसरों को भी बाप की याद दिलाओ... यह याद ही सारे सुखो का आधार है..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा के प्यार में मीठी डुबकी लगाती हुई कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपके बिना तो देह के दलदल में गर्दन तक गहरे धँसी थी... *आपने प्यारे बाबा मुझे मेरे दमकते सौंदर्य का अहसास कराया... और सच्चे पिता का सच्चा रिश्ता मेरे दिल में सजाया...* मै आत्मा आपकी अथाह प्यार की गहराई में डूब गयी हूँ..."

 

  *मीठा बाबा मेरे देहभान का आवरण उतारते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... इस देह में मात्र खेल के लिए अवतरित हुए हो... अपने अविनाशी सुन्दरतम स्वरूप के नशे में डूब जाओ... किसके हो क्या हो और कहाँ से आये हो इस खुमारी में खो जाओ... *एकमात्र सच्चे सहारे वफादार साथी शिवबाबा को ही याद करो जो सदा की वफादारी निभायेगा..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सच्चे साफ दिल में सिर्फ प्यारे बाबा को बिठाकर कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में अपने रूप के नशे में खो गई हूँ... *विदेही बन मुस्करा रही हूँ और मीठे बाबा की प्यारी सी बाँहों में राजकुमारी सी इठला रही हूँ...* भगवान मुझे प्यार कर रहा है और मै उसके प्यार डूबती जा रही हूँ..."

 

  *मेरे बाबा अविनाशी सुखों के रस का पान कराते हुए कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... विनाशी रिश्तो को विनाशी देह को प्यार करके अपनी सारी शक्तियो और गुणो को गवांया... अब इस भ्रम से बुद्धि को निकालो... *अपने सुंदर आत्मिक नशे में झूम उठो... विदेही हो... इस भान में आकर प्यारे बाबा को प्यार करो और असीम आनन्द से भर जाओ..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा देहधारियों से बुद्धियोग निकाल एक विदेही बाबा की याद में मग्न होकर कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा विदेही बन मुस्करा रही हूँ... मीठे बाबा से अपने अविनाशी स्वरूप को जानकर... अनन्त खुशियो में खिलखिला रही हूँ... *प्यारे बाबा के प्यार की गहराई में डूबी हुई अपने और दूसरों के शानदार भाग्य को सहार रही हूँ..."*

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपना टाइम सफल करने का अटेंशन देना है*"

 

_ ➳  "समय आपका शिक्षक बने, इससे पहले आप स्वयं ही स्वयं के शिक्षक बन जाओ" इन ईश्वरीय महावाक्यों पर विचार सागर मंथन करते करते एक पार्क में मैं टहल रही हूँ। टहलते - टहलते वही कोने में रखे एक बैंच पर मैं बैठ जाती हूँ और इधर उधर देखने लगती हूँ। तभी सामने सड़क पर लगे एक बोर्ड पर मेरी निगाह जाती है, जिस पर बड़े बड़े शब्दों में एक स्लोगन लिखा हुआ है *"समय की पुकार को सुनो" इस स्लोगन को पढ़ते ही मन फिर से विंचारो में खो जाता है और ऐसा अनुभव होता है जैसे मेरे कानों में कोई इन्ही शब्दो को बार बार दोहरा रहा है*। मैं इधर उधर देखती हूँ कि आखिर मेरे कानों में ये आवाज कहाँ से आ रही है।

 

_ ➳  फिर महसूस होता है कि ये आवाज तो ऊपर से आ रही है। मैं जैसे ही ऊपर की और देखती हूँ एक तेज प्रकाश मुझे अपने ऊपर अनुभव होता है। *मैं देख रही हूं अपने सिर के ऊपर महाज्योति शिव बाबा को जिनसे निकल रही प्रकाश की किरणे मुझ पर पड़ रही हैं और मैं देह के भान से मुक्त स्वयं को एक दम हल्का अनुभव कर रही हूं*। अपने शरीर को मैं देख रही हूं जो शिव बाबा की लाइट और माइट पा कर एकदम लाइट का बन गया है। अब शिवबाबा ब्रह्माबाबा के आकारी रथ में विराजमान हो कर धीरे धीरे नीचे आ रहें हैं। अपने बिल्कुल समीप बैंच पर बापदादा की उपस्थिति को मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  बापदादा मेरा हाथ अपने हाथ मे ले कर मुझे शक्तिशाली दृष्टि दे रहें हैं। बाबा की सम्पूर्ण शक्ति स्वयं में भरने के लिए मैं गहराई से बाबा के नयनो में देख रही हूँ। शक्ति लेते लेते एक विचित्र दृश्य देख कर मैं हैरान रह जाती हूँ। *एक पल के लिए मैं देखती हूँ दिल को दहलाने वाला दुनिया के विनाश का विनाशकारी दृश्य और दूसरे ही पल बाबा के नयनो में समाए अपने प्रति असीम स्नेह और बाबा की अपने प्रति वो आश जिसे बाबा जल्दी से जल्दी पूरा होते हुए देखना चाहते हैं*। अब मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूं कि बाबा ने एक पल के लिए मुझे दिव्य दृष्टि से विनाश का साक्षात्कार करा कर समय की समीपता की ओर ईशारा किया है।

 

_ ➳  इस रोमांचकारी दृश्य का अनुभव करवाकर बापदादा अदृश्य हो जाते हैं और मैं फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में लौट आती हूँ और फिर से उसी स्लोगन पर नजर डालते हुए विचार करती हूं कि *संगमयुग का एक एक  सेकेण्ड मेरे लिए बहुमूल्य है। एक भी सेकेंड व्यर्थ गया तो बहुत बड़ा घाटा पड़ जायेगा*। यह विचार करते करते मैं घर लौट आती हूँ और संगमयुग के अनमोल पलो को सफल करने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपने हर सेकेंड, संकल्प, बोल और कर्म की वैल्यू को स्मृति में रख अब मैं उन्हें ईश्वरीय याद और सेवा में सफल कर रही हूँ* ।

 

_ ➳  हर श्वांस में अपने प्यारे मीठे बाबा की यादों को समाये अपनी बुद्धि को अविनाशी ज्ञान रत्नों से भरपूर करके अब मैं *इन ज्ञान रत्नों को उन आत्माओं को दान कर रही हूं जो इस दान की पात्र आत्मायें हैं*। अपने वरदानी स्वरूप में स्थित हो कर, वरदानी बोल द्वारा उन्हें मुक्ति जीवनमुक्ति पाने का रास्ता बता रही हूं। *परखने की शक्ति का उचित प्रयोग करके, अपने सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को परख कर, पात्र देख कर ज्ञान दान देते हुए उन आत्माओं का कल्याण करने के साथ साथ स्व - पुरुषार्थ करते हुए हर बात में मैं अपने समय को सफल कर रही हूं*।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं कड़े नियम और दृढ़ संकल्प धारी आत्मा हूँ।*

   *मैं अलबेलेपन को समाप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं ब्रह्मा बाप समान अथक आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदा समर्थ बोल बोलती हूँ  ।*

   *मैं आत्मिक भाव में रहकर बोल बोलती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा शुभ भावना के बोल बोलती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  *तो खुला चांस होते भी बाप नम्बरवार नहीं देते लेकिन स्वयं को नम्बरवार बना देते हैं।* बाप का दिलतख्त इतना बेहद का बड़ा है जो सारे विश्व की आत्माएं भी समा सकती हैं इतना विराट स्वरूप है लेकिन बैठने की हिम्मत रखने वाले कितने बनते हैं! क्योंकि दिलतख्तनशीन बनने के लिए दिल का सौदा करना पड़ता है। इसलिए *बाप का नाम दिलवालापड़ा है। तो दिल लेता भी हैदिल देता भी है।*

 

_ ➳  जब सौदा होने लगता है तो चतुराई बहुत करते हैं। पूरा सौदा नहीं करतेथोड़ा रख लेते हैं फिर क्या कहतेधीरे-धीरे करके देते जायेंगे। किश्तों में सौदा करना पसन्द करते हैं। *एक धक से सौदा करने वालेएक के होने कारण सदा एकरस रहते हैं।* और सबमें नम्बर एक बन जाते हैं। बाकी जो थोड़ा-थोड़ा करके सौदा करते हैं - एक के बजाए दो नाव में पाँव रखने वालेसदा कोई न कोई उलझन की हलचल मेंएकरस नहीं बन सकते हैं। इसलिए *सौदा करना है तो सेकण्ड में करो। दिल के टुकड़े-टुकड़े नहीं करो।* आज अपने से दिल हटाकर बाप से लगाईएक टुकड़ा दिया अर्थात् एक किश्त दी। फिर कल सम्बन्धियों से दिल हटाकर बाप को दीदूसरी किश्त दीदूसरा टुकड़ा दियाइससे क्या होगा?

 

_ ➳  *बाप की प्रॉपर्टी के अधिकार के भी टुकड़े के हकदार बनेंगे।* प्राप्ति के अनुभव में सर्व अनुभूतियों के अनुभव को पा नहीं सकेंगे। थोड़ा-थोड़ा अनुभव किया इससे सदा सम्पन्न, सदा सन्तुष्ट नहीं होंगे। *इसलिए कई बच्चे अब तक भी ऐसे ही वर्णन करते हैं कि जितना, जैसा होना चाहिए वह इतना नहीं है।* कोई कहते पूरा अनुभव नहीं होताथोड़ा होता है। और कोई कहते - होता है लेकिन सदा नहीं होता। क्योंकि पूरा फुल सौदा नहीं किया तो अनुभव भी फुल नहीं होता है। *एक साथ सौदे का संकल्प नहीं किया। कभी-कभी करके करते हैं तो अनुभव भी कभी-कभी होता है। सदा नहीं होता।*

 

_ ➳   *वैसे तो सौदा है कितना श्रेष्ठ प्राप्ति वाला। भटकी हुई दिल देना और दिलाराम बाप के दिलतख्त पर आराम से अधिकार पाना।* फिर भी सौदा करने की हिम्मत नहीं। जानते भी हैंकहते भी हैं लेकिन फिर भी हिम्मतहीन भाग्य पा नहीं सकते। है तो सस्ता सौदा नाया मुश्किल लगता हैकहने में सब कहते कि सस्ता है। जब करने लगते हैं तो मुश्किल बना देते हैं। वास्तव में तो देनादेना नहीं है। *लोहा दे करके हीरा लेनातो यह देना हुआ वा लेना हुआ?* तो लेने की भी हिम्मत नहीं है क्या? *इसलिए कहा कि बेहद का बाप देता सबको एक जैसा है लेकिन लेने वाले खुला चांस होते भी नम्बरवार बन जाते हैं।*

 

✺   *ड्रिल :- "बाप के साथ एक धक के साथ दिल का सौदा कर बाप की सम्पूर्ण प्रॉपर्टी के अधिकारी बनना"*

 

_ ➳  *स्व के स्वार्थ से परे मैं आत्मा...  गहरी आत्म चिंतन में बैठी देख रही हूँ भक्ति मार्ग की भक्त शिरोमणि मीरा को...* असीम सौन्दर्य की मालिक... पवित्रता की देवी... शांत... शीतल... मधुर... स्वररागिनी की साम्राज्ञी... हाथों में श्रीकृष्ण की मूर्त... हर्षोल्लास में घूमती... अपने श्रीकृष्ण में ही सर्वस्व देखती मीरा... अनन्य भक्ति... अतुल्य... निःस्वार्थ प्यार केवल एक श्रीकृष्ण के प्रति... ऐसीे भक्ति... ऐसीे पवित्र प्यार के फूलों के खुशबू से भरी... मीरा... *अपना सर्वस्व समर्पण सिर्फ और सिर्फ श्रीकृष्ण को कर दिया... ऐसी भक्ति की हक़दार मीरा जो जहर भी श्रीकृष्ण के प्यार में पी गयी...*

 

_ ➳  मैं आत्मा अपने आप से पूछ रही हूँ... क्या मेरी भक्ति ऐसी हैं ? निःस्वार्थ, अतुल्य... क्या मैं मंसा... वाचा... कर्मणा... सम्पूर्ण समर्पण सिर्फ और सिर्फ एक बाप को कर पाई हूँ ? *क्या मैं इस संगमयुग पर मीरा बन पाई हूँ ? मीरा के जैसे जहर का प्याला क्या मैं इस संगमयुग में बाप के नाम पे पी लूंगी?* क्या इतना विश्वास... इतनी श्रद्धा मुझ आत्मा को शिवबाबा पर हैं... क्या निश्चय बुद्धि विजयन्ती बन पाई हूँ ? *दिलवाला बाप दिल देता भी हैं तो दिल लेता भी हैं... क्या मैं दिल दे पाई हूँ...* इस सवाल ने मेरे दिल की गहराईओ में उतरकर मन के तार को झंझोड़ कर रख दिया...

 

_ ➳  अपने इस सवालों के जवाब के लिए मन के तार को बिन्दुरूपी बाप की याद में उलझा देती हूँ... शरीर के भान से परे मैं आत्मा... पहुँचती हूँ अपने घर जहाँ मेरे पिता हैं... बाप के प्यार की अधिकारी मैं आत्मा... अपने आप को बाबा के स्नेहभरी किरणों से भरती जा रही हूँ... *बिंदु बन बिंदु रूपी बाप की समीपता का अनुभव कर रही हूँ... अपनी ज्योति को बाप की ज्योति से मिलता हुआ महसूस करती मैं आत्मा अपने फ़रिश्ते स्वरुप में परिवर्तित हो रही हूँ...* और बापदादा के साथ चल पड़ती हूँ... सभी सेंटर... सभी बाबा के बच्चों के घर पर पहुँच जाते हैं और देखते हैं वैरायटी बाबा के बच्चों को...

 

_ ➳  कोई सुदामा है... कोई राधा हैं... कोई श्री गणेश, कोई हनुमान हैं तो कोई माँ अम्बा... माँ लक्ष्मी... माँ सरस्वती के रूप में हैं... *तो कोई कोई मीरा भी हैं... जो सम्पूर्ण समर्पित हैं...* गृहस्थी में रहकर कमल फूल समान कई बाबा के लाडले बच्चे हैं जो श्रीमत पर पूरा बलिहार जाते हैं... *कई बच्चे एक धक से सौदा करने वाले हैं...* एक के होने कारण सदा एकरस रहते हैं और सबमें नम्बर एक बन जाते हैं... और कोई-कोई बच्चे ऐसे भी हैं जो सब कुछ जानते भी हैंकहते भी हैं *लेकिन फिर भी हिम्मतहीन भाग्य पा नहीं सकते... ऐसे बच्चे भी देखे जो किश्तों में सौदा करना पसन्द करते हैं...*

 

_ ➳  और मैं आत्मा एक बात दिल की गहराईओं से जान गई कि *बेहद का बाप देता सबको एक जैसा है लेकिन लेने वाले खुला चांस होते भी नम्बरवार बन जाते हैं...* और मैं आत्मा अपने फ़रिश्ता स्वरुप में बापदादा से आती हुई सर्व शक्तियों को अपने में समेट कर... *निश्चय बुद्धि विजयन्ती का टीका बापदादा के हाथों से लगाकर...* अपने आप को सर्व दैहिक बंधनों से मुक्त कर... मन बुद्धि सिर्फ एक बाप में लगाये जा रही हूँ... सौगात रूपी शक्तियों को अपने में धारण कर मैं आत्मा मन बुद्धि से पहुँच जाती हूँ अपने स्थूल देह में... *मीरा बनकर संगमयुग का एक-एक क्षण सिर्फ और सिर्फ एक बाप की यादों में व्यतीत कर रही हूँ...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━