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 17 / 09 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपना ईश्वरीय रूहानी बर्थडे मनाया ?*

 

➢➢ *अपना बैग बैगेज भविष्य के लिए तैयार किया ?*

 

➢➢ *स्मृति का स्विच ऑन कर सेकंड में अशरीरी स्थिति का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *देह भान की मिटटी के बोझ से परे रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अपने को शरीर के बंधन से न्यारा बनाने के लिए अवतार समझो। अवतार हूँ, इस स्मृति में रह शरीर का आधार ले कर्म करो।* कर्म के बंधन में नहीं बंधो। देह में होते भी विदेही अवस्था का अनुभव करो।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बाबा के साथ रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने को बाप के साथ रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? *सदा साथ रहने वाले वा कभी-कभी साथ रहने वाले? क्या समझते हो? जब बाप का साथ छूटता है तो और कोई साथी बनते हैं? माया तो साथी बनती है ना!* कितने जन्म माया के साथी रहे? बहुत रहे ना। और बाप का साथ प्रैक्टिकल में कितने समय का है? संगमयुग है ना और संगमयुग है भी सबसे छोटा युग। तो क्या करना चाहिये? सदा होना चाहिये।

 

  क्योंकि सारे कल्प में कितना भी पुरुषार्थ करो तो भी साथ का अनुभव कर सकेंगे? (नहीं) तो इसका स्लोगन क्या है? (अभी नहीं तो कभी नहीं) यह याद रहता है? समय का भी महत्व याद रहे और स्वयं का भी महत्व याद रहे। दोनों महत्व वाले हैं ना! *इस संगमयुग के समय को, जीवन को-दोनों को हीरे तुल्य कहा जाता है। हीरे का मूल्य कितना होता है! तो इतना महत्व जानते हुए एक सेकण्ड भी संगमयुग के साथ को छोड़ना नहीं है। सेकण्ड गया, तो सेकण्ड नहीं लेकिन बहुत कुछ गया।* ऐसी स्मृति रहती है?

 

  *सारे कल्प की प्रालब्ध जमा करने का समय अब है। अगर सीजन पर सीजन को महत्व नहीं देते तो सदा के लिये वंचित रह जाते हैं। तो इस समय का महत्व है, जमा करने का समय है। अगर राज्य अधिकारी भी बनते हो तो भी अभी के जमा के हिसाब से और पूज्य भी बनते हो तो इस समय के जमा के हिसाब से। एक छोटे से जन्म में अनेक जन्मों की प्रालब्ध जमा करना है।* ये याद रहता है कि कभी-कभी? सम टाइम है? तो ये सम टाइम शब्द कब खत्म करेंगे? समाप्ति समारोह कब मनायेंगे? रावण को भी मारने के बाद जलाकर खत्म कर देते हैं? तो अभी मारा है, जलाया नहीं है!

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  विस्मृति तो हो नहीं सकती, याद रहती है। लेकिन *सदा शक्तिशाली याद स्वत: रहे उसके लिए यह लिंक तूटना नहीं चाहिए।* हर समय बुद्धि में याद का लिंक जूट रहे - उसकी विधि यह है। यह भी आवश्यक समझो जैसे वह काम समझते हो कि आवश्यक है यह प्लैन पूरा करके ही उठना है। इसलिए समय भी देते हो, एनर्जी भी लगाते हो।

 

✧  वैसे यह भी आवश्यक है, इनको पीछे नहीं करो कि *यह काम पहले पूरा करके फिर याद कर लेंगे। नहीं।* इसका समय अपने प्रोग्राम में पहले ऐड करो। जैसे सेवा के प्लैन किये दो घण्टे का टाइम निकाल फिक्स करते हो - चाहे मीटिंग करते हो, चाहे प्रेक्टिकल करते हो, तो दो घण्टे के साथ-साथ यह भी बीच-बीच में करना ही है - यह ऐड करो।

 

✧  जो एक घण्टे में प्लैन बनायेंगे, वह आधा घण्टे में हो जायेगा। करके देखो। आपे ही फ्रेशनेस से दो बजे आँख खुलती है, वह दूसरी बात है। लेकिन कार्य के कारण जागना पडता है तो उसका इफैक्ट (प्रभाव) शरीर पर आता है। इसलिए *बैलेन्स के ऊपर सदा अटेन्शन रखो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सबसे विशेष कहने में भल एक शब्द 'देह-अभिमान' है। लेकिन देह-अभिमान का विस्तार बहुत है। एक है मोटे रूप में देह-अभिमान, जो कई बच्चों में नहीं भी है। *चाहे स्वयं की देह, चाहे औरों की देह, अगर औरों की देह का भी आकर्षण है तो वह भी देह-अभिमान है। कई बच्चे इस मोटे रूप में पास थे।* मोटे रूप से देह के आकार में लगाव व अभिमान नहीं है। *परन्तु इसके साथ-साथ देह के सम्बन्ध से अपनी संस्कार विशेष कोई शक्ति विशेष है, उसका अभिमान अर्थात् अहंकार, नशा, रोब यह सूक्ष्म देह-अभिमान है।* अगर इन सूक्ष्म देह-अभिमान में से कोई भी अभिमान है तो न आकारी फरिश्ता नैचुरल बन सकते, न निराकारी बन सकते। क्योंकि आकारी फरिश्ते में भी देह-भान नहीं है, डबल लाइट है। *देह-अहंकार निराकारी बनने नहीं देता।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पुरुषोत्तम संगमयुग पर उत्तम से उत्तम पुरुष बनना"*

 

_ ➳  मैं आत्मा कितनी ही तकदीरवान हूँ जो की स्वयं परमपिता परमात्मा, भाग्यविधाता बन मेरी सोई हुई तकदीर को जगाने परमधाम से आये हैं... *अविनाशी बेहद बाबा अविनाशी ज्ञान देकर इस एक जन्म में मुझे पढ़ाकर, 21 जन्मों के लिए मेरी ऊँची तकदीर बना रहे हैं...* यह पढ़ाई ही सोर्स ऑफ़ इनकम है... *मैं रूहानी आत्मा, रूहानी बाबा से, रूहानी पढ़ाई पढने चल पड़ती हूँ रूहानी कालेज सेंटर में...*  

 

  *पुरुषोत्तम संगम युग की पढाई से उत्तम ते उत्तम पुरुष बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *ईश्वर पिता की बाँहो में झूलने वाला खुबसूरत समय जो हाथ आया है तो इस वरदानी युग में पिता से अथाह खजाने लूट लो... 21 जनमो के मीठे सुखो से अपना दामन सजा लो...* ईश्वरीय पढ़ाई से उत्तम पुरुष बन विश्व धरा के मालिक हो मुस्करा उठो...

 

_ ➳  *बाबा की मीठी मुरली की मधुर तान पर फिदा होते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा अपने महान भाग्य को देख देख निहाल हो गई हूँ... *मेरा मीठा भाग्य मुझे ईश्वर पिता की फूलो सी गोद लिए वरदानी संगम पर ले आया है... ईश्वरीय पढ़ाई से मै आत्मा मालामाल होती जा रही हूँ...*

 

  *ज्ञान रत्नों के सरगम से मेरे मन मधुबन को सुरीला बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... इस महान मीठे समय का भरपूर फायदा उठाओ... *ईश्वरीय ज्ञान रत्नों से जीवन में खुशियो की फुलवारी सी लगाओ... जिस ईश्वर को दर दर खोजते थे कभी... आज सम्मुख पाकर ज्ञान खजाने से भरपूर हो जाओ... और 21 जनमो के सुखो की तकदीर बनाओ...*

 

_ ➳  *दिव्यता से सजधज कर सतयुगी सुखों की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा मीठे बाबा संग ज्ञान और योग के पंख लिए असीम आनन्द में खो गयी हूँ... *ईश्वर पिता के सारे खजाने को बुद्धि तिजोरी में भरकर और दिव्य गुणो की धारणा से उत्तम पुरुष आत्मा सी सज रही हूँ...*

 

  *इस संगमयुग में मेरे संग-संग चलते हुए सत्य ज्ञान की राह दिखाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *मीठे बाबा के साथ का संगम कितना मीठा प्यारा और सुहावना है...* सत्य के बिना असत्य गलियो में किस कदर भटके हुए थे... आज पिता की गोद में बैठे फूल से खिल रहे हो... *ईश्वरीय मिलन के इन मीठे पलों की सुनहरी यादो को रोम रोम में प्रवाहित कर देवता से सज जाओ...*

 

_ ➳  *ईश्वरीय राहों पर चलकर ओजस्वी बन दमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा मीठे बाबा की गोद में ईश्वरीय पढ़ाई पढ़कर श्रेष्ठ भाग्य को पा रही हूँ... इस वरदानी संगम युग में ईश्वर को शिक्षक रूप में पाकर अपने मीठे से भाग्य पर बलिहार हूँ...* और प्यारा सा देवताई भाग्य सजा रही हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अपना बैग बैगेज भविष्य के लिए तैयार करना है*"

 

_ ➳  अपने अनादि स्वरूप में मैं आत्मा सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था मे अपने निराकारी घर परमधाम में हूँ। मुझ आत्मा में पवित्रता की अनन्त शक्ति है। *सर्व गुणों, सर्व शक्तियों से मैं आत्मा सम्पन्न हूँ*। मेरा स्वरूप रीयल गोल्ड के समान अति चमकदार है। पवित्रता की लाइट मुझ आत्मा से निरन्तर निकल रही है।

 

_ ➳  अपनी इसी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था मे मैं आत्मा अपनी निराकारी दुनिया परमधाम को छोड़ इस सृष्टि रंगमंच रूपी *कर्मभूमि पर पार्ट बजाने के लिए, सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई स्वरूप धारण कर सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई दुनिया मे अवतरित होती हूँ*। एक ऐसी दुनिया जिसे स्वर्ग कहतें हैं, जो मेरे पिता परमात्मा ने मेरे लिए स्थापन की थी। जहां अपरमपार सुख, शांति और सम्पन्नता थी।

 

_ ➳  लक्ष्मी नारायण के इस सुखमयी राज्य में दो युग अपरमपार सुख भोगने के बाद मैं आत्मा जब द्वापरयुग में आई तो देह भान में आ कर विकारो में गिरने से मुझ आत्मा की कलाये कम हो गई। *मैं आत्मा जो सच्चा सोना थी, अब कॉपर की बन गई और अपने गुणों, अपनी शक्तियों को ही भूल गई*। कलयुग अंत तक आते आते मै आत्मा बिल्कुल कला विहीन हो गई। सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था से तमोप्रधान अवस्था मे पहुंच गई। किन्तु संगमयुग पर मेरे पिता परमात्मा ने आ कर मुझे स्वयं अपना और मेरा यथार्थ परिचय दे कर राजयोग द्वारा मुझे फिर से चढ़ती कला में जाने की यथार्थ विधि बता दी।

 

_ ➳  बाबा ने आ कर यह स्पष्ट कर दिया कि अब यह सृष्टि का नाटक पूरा हुआ इसलिए मुझे वापिस अब उसी सतोप्रधान अवस्था मे अपनी उसी निराकारी दुनिया परमधाम लौटना है जहां से मैं आत्मा अपनी सपूर्ण सतोप्रधान अवस्था के साथ आई थी। *अपने पिता परमात्मा के साथ वापिस अपने धाम जाने के लिए अब मुझे सम्पूर्ण सतोप्रधान बनने का पुरुषार्थ करना है* इसके लिए पुराना कखपन बाबा को दे बैग बैगेज सब ट्रांसफर कर देना है।

 

_ ➳  बाबा की श्रेष्ठ मत पर चल कर अब मैं आत्मा राजयोग के द्वारा अपनी खोई हुई शक्तियों को पुनः जागृत कर सम्पूर्ण सतोप्रधान बन फिर से सतयुगी राजाई प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर रही हूं। *देह भान में आने के कारण मुझ आत्मा पर विकारों की जो कट चढ़ गई थी उन विकारों की कट को अपने पिता परमात्मा की याद से, योगअग्नि द्वारा भस्म करने के लिए मैं आत्मा अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो कर, मन बुद्धि से अब जा रही हूँ परमधाम*।

 

_ ➳  अब मैं स्वयं को परमधाम में अपने प्राणेश्वर शिव बाबा के सम्मुख देख रही हूं। मुझ पर निरन्तर मेरे प्राणेश्वर बाबा की शक्तिशाली किरणे पड़ रही हैं। इन शक्तिशाली किरणों को स्वयं में समा कर मैं शक्ति स्वरूप बन रही हूं। *अपने प्यारे परमपिता परमात्मा की सर्व शक्तियों से भरपूर हो कर और अमर भव का वरदान ले कर अब मैं धीरे - धीरे परमधाम से नीचे आ रही हूँ और प्रवेश कर रही हूँ अपनी साकारी देह में*। मेरा मन अब परम आनन्द से भरपूर है। मेरा जीवन ईश्वरीय प्रेम से भर गया है।

 

_ ➳  इस सत्यता को अब मैं जान गई हूं कि यह सृष्टि नाटक अब पूरा हुआ और इस नश्वर संसार को छोड़ अब मुझे अपने शिव पिता के साथ वापिस अपने धाम जाना है। इस विनाशी दुनिया का कोई भी सामान साथ नही जा सकता इसलिए *बाबा के साथ वापिस जाने के लिए पुराना कखपन दे बैग बैगेज भविष्य नई दुनिया के लिए ट्रांसफर कर देने में ही कल्याण है*। इस बात को स्मृति में रख तीन स्मृतियों का तिलक सदा मस्तक पर लगाये अब मैं बिंदु बन बिंदु बाप की याद में रह, विकारों रूपी कखपन बाबा को दे,भविष्य नई दुनिया के लिए अपने जीवन को हीरे तुल्य बना रही हूं।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं स्मृति का स्विच ऑन कर सेकण्ड में अशरीरी स्थिति का अनुभव करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं प्रीत बुद्धि आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा देह भान की मिट्टी के बोझ से सदा परे रहती हूँ  ।*

   *मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ  ।*

   *मैं आत्मा बोझमुक्त हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  आप लोग यह नहीं सोचना कि हम लौकिक काम क्यों करें! यह तो आपकी सेवा का साधन है। *लौकिक कार्य नहीं करते हो लेकिन अलौकिक कार्य के निमित्त बनने के लिए लौकिक कार्य करते हो।* जहाँ भी जाते हो वहाँ सेन्टर खोलने का उमंग रहता है ना। तो लौकिक कार्य कब तक करेंगे-यह नहीं सोचो। *लौकिक कार्य अलौकिक कार्य निमित्त करते हो तो आप सरेन्डर हो।* लौकिकपन नहीं होअलौकिकपन है तो लौकिक कार्य में भी समर्पण हो।लौकिक कार्य को छोड़कर समर्पण समारोह मनाना है - यह बात नहीं है। ऐसा करने से वृद्धि कैसे होगी! इसीलिए निमित्त बनते होतो जो निमित्त लौकिक समझते हैं और रहते अलौकिकता में हैंऐसी आत्माओं को डबल क्यापदम मुबारक है। समझा। इसीलिए यह नहीं कहना-दादी हमको छुड़ाओहमको छुड़ाओ। नहींऔर ही डबल प्रालब्ध बना रहे हो।

 

 _ ➳  हाँ आवश्यकता अगर समझेंगे तो आपेही छुड़ायेंगेआपको क्या है! जिम्मेवार दादियां हैं, *आप अपने लौकिकता में अलौकिकता लाओ।*  थको नहीं। लौकिक काम करके थक कर आते हैं तो कहते हैं क्या करें! नहीं खुशी-खुशी में दोनों निभाओ क्योंकि देखा गया है कि डबल विदेशी आत्माओं में दोनों तरफ कार्य करने की शक्ति है। तो अपनी शक्ति को कार्य में लगाओ। कब छोड़ेंगेक्या होगा.... *यह बाप और जो दादियां निमित्त हैं उनके ऊपर छोड़ दोआप नहीं सोचो।* कौन-कौन हैं जो लौकिक कार्य भी करते हैं और सेन्टर भी सम्भालते हैं, वह हाथ उठाओ। बहुत अच्छा। आप निश्चिंत रहो। नम्बर आप लोगों को वैसे ही मिलेंगेजो सारा दिन करते हैं उन्हों जितना ही मिलेगा। *सिर्फ ट्रस्टी होकर करनामैं-पन में नहीं आना। मैं इतना काम करती हूँमैं-पन नहीं। करावनहार करा रहा है। मैं इन्स्ट्रुमेंट हूँ। पावर के आधार पर चल रही हूँ।*

 

✺   *ड्रिल :-  "अलौकिक कार्य के निमित्त बनने के लिए ट्रस्टी होकर लौकिक कार्य करने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *सुबह की ठंडी-ठंडी हवाओं में, उगते सुरज की सुनहरी रोशनी की पनाहों में, मैं कमल पुष्प समान आत्मा बगीचे में बैठ, मीठे बाबा की मीठी-मीठी यादों में विचरण कर रही हूँ...* मैं रुहे गुलाब आत्मा अपनी रूहानी खुशबू फैलाती, सुख-शांति की किरणों से इस प्रकृति को सजाती, *बाबा की यादों की लहरों में समा जाती हूँ...* खो जाती हूँ अपने शिव पिता की यादों में... तभी मुझ आत्मा की नजर सामने वाले वृक्ष पर पड़ती है... जिसमें गहरे नीले रंग की एक चिडिय़ा अपने घौंसले में बैठे बच्चों के मुख में दाना डाल रही है... उन्हें उड़ना सिखा रही है... इस दृश्य को देख मुझ आत्मा के मानस पटल पर पर बाबा के कहे महावाक्य सामने आ रहे हैं... बच्चे *गृहस्थ व्यवहार में रहते न्यारे और प्यारे हो रहो... स्वयं को निमित समझ कर रहो...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा सामने चल रहे इस दृश्य को देख विचार करती हूँ... ये चिडिय़ा अपने बच्चों को सम्भालती है... उन्हें दाना देती है उड़ना सिखाती है... और एक दिन ये सभी अपने ही द्वारा बनाए गए, तिनका-तिनका इकठ्ठा कर तैयार किए घौंसले को छोड़ उड़ान भरते हैं अपनी-अपनी मंजिल की तरफ... कितने न्यारे होकर रहते है... अपने इस घौंसले में... मैं आत्मा मन-बुद्धि रूपी नेत्रों द्वारा सामने लौकिक घर को देखती हूँ... बाबा के कहें महावाक्य एक बार फिर मुझ आत्मा के मानस पटल पर आते हैं... बच्चे *ये आपका लौकिक घर नहीं बल्कि सेवास्थान है...* और फिर मैं आत्मा मन-बुद्धि रूपी नेत्रों द्वारा लौकिक कार्य क्षेत्र को देखती हूँ... इसे देखते ही मुझ आत्मा को बाबा के महावाक्य याद आते हैं... बच्चे *यह तो आपकी सेवा का साधन हैं...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा सेवास्थान ( लौकिक घर ) के अन्दर प्रवेश करती हूँ... और एक संकल्प क्रिएट करती हूँ... *ये बाबा का घर है... ये सेवास्थान है... ये संकल्प क्रिएट करते ही बाबा से करंट मिलती है... और पूरे बाबा के इस घर में ईश्वरीय एनर्जी का फ्लो होना शुरु हो जाता है...* मैं आत्मा बापदादा की छत्रछाया की स्पष्ट अनुभूति कर रही हूँ... मुझ आत्मा में एक नयी उर्जा का संचार हो रहा है... अब *मैं आत्मा हर कार्य खुशी से बाबा की याद में कर रही हूँ...* इस स्पष्ट समृति के साथ की बाबा ने मुझे इस सेवा स्थान के निमित्त बनाया है... यहाँ अनेक आत्माओं के कल्याण अर्थ भेजा है... *इसी स्मृति द्वारा मैं आत्मा लौकिक को अलौकिक में परिवर्तन करने में सहज ही सफल हो रही हूँ...* हर कार्य मैं आत्मा निमित्त भाव से कर रही हूँ... ट्रस्टी भाव धारण कर हर कार्य करते मैं आत्मा बहुत हल्कापन महसूस कर रही हूँ... कोई बन्धन नहीं कोई बोझ नहीं... कमल पुष्प समान *मैं आत्मा न्यारी और प्यारी होकर हर कर्म कर रही हूँ...निमित मात्र हूँ बाबा का इंस्ट्रूमेंट हूँ...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को कार्य क्षेत्र पर जहाँ मैं आत्मा हर कार्य खुशी से बाबा की याद में कर रही हूँ... इस स्पष्ट स्मृति के साथ की *ये लौकिक कार्य क्षेत्र अलौकिक सेवा का साधन हैं... मैं आत्मा हर पल बाबा के हाथ और साथ का सहज अनुभव कर रही हूँ...* ये कार्य मैं आत्मा इस भाव से कर रही हूँ कि ये बाबा ने मुझ आत्मा को सेवा दी हैं... बाबा ने मुझे निमित्त बनाया हैं... *मैं आत्मा करनहार हूँ और मेरा बाबा करावनहार है... बाबा की शक्ति मुझे चला रही है... ये स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ...* इससे मैं आत्मा सहज ही हर कार्य में सफलता प्राप्त कर रही हूँ... और *ये सेवास्थान भी अब अनेक आत्माओं के कल्याण अर्थ निमित्त बन गया है... मैं आत्मा देख रही हूँ कई आत्माओं को बाबा का सन्देश मिल रहा है... उनका कल्याण हो रहा है...*बाबा की अलौकिक सेवा में वृद्धि हो गयी है... जो आत्माएं यह ज्ञान सुन रही है वो भी लौकिकता को अलौकिकता में परिवर्तन कर हल्के हो चल रहे हैं... *वे भी बंधनमुक्त अवस्था का अनुभव कर रही हैं... और वे ट्रस्टी बन गए हैं... शुक्रिया मीठे बाबा शुक्रिया...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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