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 17 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ बाप और सेवा से स्नेह रहा ?

 

➢➢ दिलशिकस्त आत्माओं को सतयुगी सृष्टि की स्थापना की खुशखबरी सुनायी ?

 

➢➢ सत्यता की शक्ति को प्रतक्ष्य किया ?

 

➢➢ उमंग उत्साह का वातावरण तैयार किया ?

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  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

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〰✧  ब्राह्मणों की भाषा आपस में अव्यक्त भाव की होनी चाहिए। किसी की सुनी हुई गलती को संकल्प में भी न तो स्वीकार करना है, न कराना है। संगठन में विशेष अव्यक्त अनुभवों की आपस में लेन-देन करनी है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

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अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

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   "मैं बापदादा का विशेष श्रृंगार हूँ"

 

  बापदादा के विशेष श्रृंगार हो ना! सबसे श्रेष्ठ श्रृंगार है -मस्तकमणि। मणि सदा मस्तक पर चमकती है। तो ऐसे मस्तकमणि बन सदा बाप के ताज में चमकने वाले कितने अच्छे लगेंगे।

 

  मणि सदा अपनी चमक द्वारा बाप का भी श्रृंगार बनती और औरों को भी रोशनी देती है। 

 

  तो ऐसे मस्तकमणि बन औरों को भी ऐसे बनाने वाले हैं - यह लक्ष्य सदा रहता हैं? सदा शुभ भावना सर्व की भावनाओंको परिवर्तन करने वाली है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

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         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

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✧  तो उडती कला के लिए ब्रेक बहुत पॉवरफुल चाहिए। जब पहाडी पर ऊँचे चढते हैं तो बार-बार क्या कहते हैं कि ब्रेक चेक करो, ब्रेक चेक करो। तो ऊंची अवस्था में जा रहे हो ना तो बार-बार ये ब्रेक चेक करो। कोई भी संकल्प वा संस्कार निगेटिव से पॉजिटिव में परिवर्तन कर सकते हैं और कितने समय में कर सकते हैं?

 

✧  समय है एक सेकण्ड का और आप पाँच सेकण्ड में करो तो क्या होगा? तो अटेन्शन इस परिवर्तन शक्ति का चाहिए। पहले स्वयं को परिवर्तन करो तब विश्व को परिवर्तन कर सकते हो। स्व-परिवर्तक बने हो?

 

✧  पहले है स्व-परिवर्तक उसके बाद है विश्व-परिवर्तक। क्योंकि अनुभव होगा कि व्यर्थ संकल्प की गति बहुत फास्ट होती है। एक सेकण्ड में कितने व्यर्थ संकल्प चलते हैं, अनुभव है ना फास्ट चलते हैं ना। तो ऐसे फास्ट गति के समय पॉवरफुल ब्रेक लगाकर परिवर्तन करने का अभ्यास चाहिए। (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

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         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

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〰✧  अभी जैसे समय की रफ़्तार चल रही है उसी प्रमाण अभी यह पाँव पृथ्वी पर न रहना चाहिए। कौन-सा पाँव? बुद्धि, जिससे याद की यात्रा करते हो। कहावत है ना कि फ़रिश्तों के पाँव पृथ्वी पर नहीं होते। तो अभी यह बुद्धि पृथ्वी अर्थात् प्रकृति के आकर्षण से परे हो जायेगी, फिर कोई भी चीज़ नीचे नहीं ला सकती है। फिर प्रकृति को अधीन करने वाले हो जायेंगे, न कि प्रकृति के अधीन होने वाले। जैसे साईन्स वाले आज प्रयत्न कर रहे हैं पृथ्वी से परे जाने के लिए। वैसे ही साइलेंस की शक्ति से इस प्रकृति के आकर्षण से परे, जब चाहें तब आधार लें, न कि प्रकृति जब चाहे तब अधीन कर दे। तो ऐसी स्थिति कहाँ तक बनी है?

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- बाप और सेवा से स्नेह रखना"

➳ _ ➳ मधुबन... श्रेष्ठ भूमि पर... मीठे बाबा के कमरे में रुहरिहान करने के लिये... जब मैं आत्मा... पांडव भवन के प्रांगण में पहुँचती हूँ... सुंदर सतयुग और मनमोहिनी सूरत... श्रीकृष्ण को सामने देख पुलकित हो उठती हूँ... मीठे बाबा ने ज्ञान के तीसरे नेत्र को देकर... चित्रो में चैतन्यता को सहज ही दिखाया है... भक्ति में सबकुछ कल्पना मात्र लगता था... परन्तु आज बाबा की गोद में बैठकर... हर नज़ारा दिल के कितने करीब है... बाबा ने सतयुगी दुनिया के ये प्यारे नज़ारे मेरे नाम लिख दिये हैं... मन के यह भाव... मीठे बाबा को सुनाने मैं आत्मा... कमरे की और बढ़ चलती हूँ...

❉ मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने महान भाग्य की खुशी से भरते हुए कहा :- "मीठे प्यारे फूल बच्चे... इस ऊँचे स्थान... मधुबन में, ऊँची स्थिति पर, ऊँची नॉलेज से, ऊँचे ते ऊँचे बाप की याद में, ऊँचे ते ऊँची सेवा स्मृति स्वरूप रहोंगे तो सदा समर्थ रहोगे..." जहाँ समर्थ है वहाँ व्यर्थ सदा के लिये समाप्त हो जाता है... इसलिये मधुबन श्रेष्ठ भूमि पर... बाप के साथ सदा सच्चे स्नेही बनकर रहना..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा प्यारे बाबा के ज्ञान रत्नों को अपनी झोली में समेटते हुए कहती हूँ :- "मीठे मीठे बाबा... मैं आत्मा अपने मीठे भाग्य पर क्यों न इतराऊ... कि स्वयं भगवान ने मुझे अपनी फूलो की बगिया में बिठा कर... मुझे भी सुंदर खिलता हुआ फूल बना दिया है... आपने मेरा जीवन सत्य की रोशनी से भर दिया है..."

❉ बाबा ने मुझ आत्मा को विश्वकल्याणकारी की भावना से ओतप्रोत बनाते हुए कहा :- "मीठी लाडली बच्ची... ईश्वर पिता को पाकर, अब अपनी हर श्वांस को ईश्वरीय यादों में पिरो दो... जब भी तुम ड्रामा के हर दृश्य को ड्रामा चक्र संगमयुगी टॉप पर स्थित हो कुछ भी देखोगी तो स्वतः ही अचल, अडोल रहोगी... तुम तो कल्प पहले वाली... स्नेही, सहयोगी, अटल, अचल स्थिति में रहने वाली विजयी आत्मा हो..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा ईश्वरीय यादों के खजानों से सम्पन्न होकर, मीठे बाबा से कहती हूँ :-"मीठे मीठे बाबा... आपने मुझ आत्मा के जीवन में आकर... विश्व कल्याण की सुंदर भावना से भर दिया है... मैं आत्मा आपसे सच्चा स्नेह रख सबके जीवन से दुःखों की लहर निकाल... सुख की किरणें फैलाती हूँ... सबके जीवन में आनंद और खुशियों के फूल खिला रही हूँ..."

❉ मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान रत्नों से भरपूर करते हुए कहा :- "मीठी बच्ची... जहाँ सच्चा, श्रेष्ठ स्नेह है... वहाँ दुःख की लहर आ नही सकती... परिवार के स्नेह के धागे में तो सभी बंधे हुए हो, लेकिन अब सच्चे सच्चे शिवबाबा की लग्न में मगन... सदा एक की याद में रह... कभी भी क्या, क्यों के संकल्प में फंस नहीं जाना... नहीं तो सब व्यर्थ के खाते में जमा हो जायेगा..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा मीठे बाबा के सच्चे प्यार में दिल से कुर्बान होकर कहती हूँ :- "मीठे प्यारे मेरे बाबा... मैं आत्मा आपसे सच्चा स्नेह... सच्चा सुख पाकर धन्य धन्य हो गयी हूँ... मीठे बाबा... आपने तो मेरे जीवन को दुःखों से सुलझाया है... और सच्चे प्यार और मीठे ज्ञान रत्नों से सजाया है... मैं आत्मा अब आपका साथ कभी भी नहीं छोडूंगी... मीठे बाबा से सदा साथ रहने का वायदा करके मैं आत्मा... अपने कर्मक्षेत्र पर वापिस लौट आई..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- दिलशिकस्त आत्माओं को सतयुगी सृष्टि की स्थापना की खुशखबरी सुनाना"

➳ _ ➳ अपने खुदा दोस्त के साथ विश्व की सैर करने का ख्याल मन मे आते ही मैं अशरीरी हो निराकार ज्योति बिंदु आत्मा बन अपने निराकार खुदा दोस्त की याद में बैठ उनका आह्वान करती हूँ। मेरे बुलाते ही मेरे खुदा दोस्त अपनी निराकारी दुनिया परमधाम को छोड़, फरिश्तों की दुनिया सूक्ष्म लोक में पहुंच कर, अपने निर्धारित रथ अव्यक्त ब्रह्मा बाबा की भृकुटि में विराजमान हो कर मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं और आ कर अपना हाथ जैसे ही मेरे मस्तक पर रखते हैं उनकी लाइट माइट से मेरा साकारी शरीर जैसे एक दम सुन्न हो जाता है और उस साकारी शरीर मे से अति सूक्ष्म लाइट का फ़रिशता स्वरूप बाहर निकल आता है।

➳ _ ➳ अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर को धारण किये अब मैं फ़रिशता अपने खुदा दोस्त के साथ चल पड़ता हूँ विश्व भ्रमण को। अपने मन की बातें अपने दिलाराम दोस्त के साथ करते करते, प्रकृति के खूबसूरत नजारो का आनन्द लेते लेते मैं सारे विश्व का चक्कर लगा रहा हूँ। प्रकृति के सुंदर नजारों का आनन्द लेने के साथ साथ विश्व मे हो रही दुखदायी घटनाओं को भी मैं देख रहा हूँ। कहीं प्रकृतीक आपदाओं के कारण होने वाली तबाही, कहीं अकाले मृत्यु, कहीं गृहयुद्ध, कहीं विकारों की अग्नि में जल रही तड़पती हुई आत्मायें। इन सभी दृश्यों को देखते देखते विरक्त हो कर मैं अपने खुदा दोस्त से कहता हूं कि वो जल्दी ही दुःखो से भरी इस दुनिया को सुख की नगरी बना दे।

➳ _ ➳ मेरे खुदा दोस्त, मेरे दिलाराम बाबा मुस्कराते हुए अपना हाथ ऊपर उठाते है और विश्व ग्लोब को अपने हाथों में उठा लेते हैं। उनके हाथों से बहुत तेज लाइट और माइट निकल रही है जो उस विश्व ग्लोब पर पड़ रही है। देखते ही देखते पूरा विश्व एक बहिश्त बन जाता है। अब मैं देख रहा हूँ माया रावण की दुःखो से भरी दुनिया के स्थान पर अपरम अपार सुखों से भरपूर सोने की एक खूबसूरत दुनिया।

➳ _ ➳ खो जाता हूँ मैं उन स्वर्गिक सुखों में। स्वयं को मैं विश्व महाराजन के रूप में देख रहा हूँ। हीरे जवाहरातों से सजे महल। प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य। सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी मर्यादा पुरुषोत्तम देवी-देवतायों की अति मनभावन इस दुनिया में राजा हो या प्रजा सभी असीम सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर हैं। पुष्पक विमानों पर बैठ देवी देवता विश्व भ्रमण कर रहें हैं। चारों ओर ख़ुशी की शहनाइयाँ बज रही हैं। रमणीकता से भरपूर देवलोक के इन नजारों को देख मैं मंत्रमुग्घ हो रहा हूँ। इन स्वर्गिक सुखों का अनुभव करवाकर मेरे खुदा दोस्त अब मुझे खुदाई खिदमतगार बन सबको बहिश्त में चलने का रास्ता बताने का फरमान देते हुए परमात्म बल और शक्तियों से मुझे भरपूर कर देते हैं।

➳ _ ➳ सतयुगी दुनिया के मनमोहक दृश्यों को अपनी आंखों में संजोए अब मैं फ़रिशता सच्चा सच्चा खुदाई खिदमतगार बन अपने खुदा दोस्त के इस फरमान का पालन करने के लिए उनके साथ कम्बाइंड हो कर उन सभी धार्मिक स्थानों पर जा रहा हूँ जहां भगवान को पाने के लिए मनुष्य भक्ति के कर्मकांडो में फंसे पड़े हैं। अपने खुदा दोस्त की छत्रछाया में बैठ, उनसे सर्वशक्तियाँ ले कर अब मैं वहां उपस्थित सभी आत्माओं में प्रवाहित कर रहा हूँ। उन्हें मुक्ति, जीवन मुक्ति पाने का सहज रास्ता बता रहा हूँ। मेरा कम्बाइंड स्वरूप उन्हें दिव्य अलौकिक सुख की अनुभूति करवा रहा है। परमात्म वर्से को पाने अर्थात बहिश्त में जाने का सत्य रास्ता जान कर सर्व आत्मायें आनन्द विभोर हो रही हैं।

➳ _ ➳ सर्व आत्माओं को बहिश्त में चलने का रास्ता बता कर अब मैं अपने सूक्ष्म आकारी स्वरूप के साथ अपने साकारी तन में प्रवेश कर जाता हूँ और इस स्मृति के साथ अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो जाता हूँ कि "मैं खुदाई खिदमतगार हूँ"। इसी स्मृति में स्थित हो कर अब मैं हर कर्म कर रहा हूँ और अपने संकल्प, बोल और कर्म से अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को परमात्म प्रेम का अनुभव करवाकर उन्हें भी परमात्म वर्से को पाने का रास्ता बता रहा हूँ।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   मैं आत्मा अंतिम जन्म में हूँ।
✺   मैं सर्व पावर्स को यूज़ करने वाली आत्मा हूँ।
✺   मैं आत्मा विल पावर सम्पन्न हूँ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ मैं आत्मा सदैव दिल से सेवा करती हूँ ।
✺ मैं आत्मा दुआओं का दरवाजा सदैव खुला रखती हूँ ।
✺ मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा सदा कहते हैं कि किसी भी रूप में अगर एक बाबा का सम्बन्ध ही याद रहेदिल से निकले 'बाबा', तो समीपता का अनुभव करेंगें। मन्त्र मुआफिक नहीं कहो 'बाबा-बाबा', वह राम-राम कहते हैं आप बाबा-बाबा कहतेलेकिन दिल से निकले 'बाबा!'

 

✺   ड्रिल :-  "दिल से 'बाबा' कह समीपता का अनुभव करना"

 

 _ ➳  अपने शिव पिता परमात्मा की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान मैं आत्मा एक छोटी सी, नन्ही सी बच्ची का चोला पहने अपने शिव पिता की उंगली थामे चल पड़ती हूँ दुनिया की चकाचौंध को देखने। बाबा की उंगली थामे मैं सारे विश्व का भ्रमण कर रही हूं। दुनिया के खूबसूरत नजारों का आनन्द ले रही हूँ। एक स्थान पर लोगों की भीड़ देख कर मैं बाबा से वहां चलने का आग्रह करती हूँ। बाबा मुझे वहां ले आते हैं। मैं देख रही हूं यहां बहुत सुंदर मेला लगा है। मेले की एक एक चीज मन को आकर्षित कर रही है। उन चीजों के आकर्षण में आकर कब बाबा का हाथ मेरे हाथ से छूट जाता है मुझे पता ही नही चलता। मेले की चीजों के आकर्षण में आकर मैं अपने बाबा को ही भूल जाती हूँ।

मेला समाप्त होता है और सभी अपने घर लौट जाते हैं।

 

 _ ➳  स्वयं को अकेला पाकर अब मैं वापिस घर लौटने का रास्ता ढूंढती हूँ लेकिन कोई रास्ता नही मिलता। जहां से जाती हूँ भूलभुलैया की तरह हर रास्ता बंद मिलता है। घबरा कर मैं रोने लगती हूँ। तभी कानो में आवाज आती है "दिल से बाबा कहो तो बाबा समीप है" अब मैं बाबा को दिल से पुकारती हूँ और देखती हूँ मेरे सामने मुस्कराते हुए मेरे बाबा खड़े हैं। बाबा को देखते ही मैं दौड़ कर बाबा की बाहों में समा जाती हूँ। बाबा अपनी बाहों में उठाये अब मुझे उस भूलभुलैया से बाहर ले आते हैं। जैसे ही मैं उस भूल भुलैया से बाहर आती हूँ वैसे ही मेरी चेतनता लौट आती है।

 

 _ ➳  अब मैं विचार करती हूं कि ये दुनिया भी तो एक भूल भुलैया की तरह ही है। इससे बाहर निकलने का रास्ता कोई नही जानता। इसकी चकाचौंध में सब फंसे पड़े है। बाहर निकलना चाहते हैं लेकिन निकल नही पा रहें। दुखी हो रहें हैं, रो रहें हैं। लेकिन मैं कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे मेरे शिव पिता मिल गए। जो दिल से बाबा कहते ही मेरे समीप आ जाते है और इस संसार की हर उलझन रूपी भूलभुलैया से पलक झपकते ही मुझे बाहर निकाल लेते हैं।

 

 _ ➳  अपने प्यारे मीठे बाबा की मेहरबानियों को याद करते ही मुख से स्वत: ही निकलता है। "मेरे तो शिव बाबा एक, दूसरा ना कोई" और इसी लग्न में मग्न हो कर मैं जैसे ही दिल से बाबा कहती हूँ। बाबा को अपने समीप अनुभव करती हूँ और इस समीपता का अनुभव करते - करते नश्वर देह का त्याग कर चल पड़ती हूँ अपने प्राणेश्वर बाबा के पास, उनके प्यार की शीतल छाया में बैठ स्वयं को तृप्त करने के लिए। अब मैं देख रही हूँ स्वयं को अपने दिलाराम बाबा के पास। मेरे दिलाराम बाबा की समीपता मुझे परमआनन्द का अनुभव करवा रही है। गहन शांति के अनुभवों मे मैं डूब रही हूँ। बाबा से आ रही सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रही हूं। भरपूर हो कर मैं वापिस लौट रही हूँ और साकार सृष्टि पर कर्म करने हेतू फ़िर से अपने पांच तत्वों के बने भौतिक शरीर मे प्रवेश कर रही हूं।

 

 _ ➳  अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हूँ और हर घड़ी मैं बाबा को अपने समीप अनुभव करती हूं। अब मेरे हर श्वांस में मेरे मीठे बाबा की याद बसी है। मेरे नयनो में उनकी सूरत और सीरत समाई हुई है। मेरे कानों में उनके ही बोल हर समय गूंजते रहते हैं। मेरा रोम - रोम उनकी याद से पुलकित हो रहा है। मेरे हर संकल्प, हर बोल, हर कर्म में उनकी ही छवि है। मेरे मनबुद्धि की तार निरन्तर उनसे जुड़ी हुई है। मैं हर पल उनके लव में लीन हूँ। दिल से बाबा कह अब मैं हर पल उन्हें अपने समीप अनुभव करती हूं।

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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