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 17 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बहुत पेम से बैठकर रूहानी बाप को याद किया ?*

 

➢➢ *आत्माओं को अल्फ का परिचय दिया ?*

 

➢➢ *शुभ भावना से सेवा अपकारियों पर भी उपकार किया ?*

 

➢➢ *ज्ञान का सिमरन कर सदा हर्षित रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  ब्राह्मणों की भाषा आपस में अव्यक्त भाव की होनी चाहिए। *किसी की सुनी हुई गलती को संकल्प में भी न तो स्वीकार करना है, न कराना है। संगठन में विशेष अव्यक्त अनुभवों की आपस में लेन-देन करनी है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं बापदादा का विशेष श्रृंगार हूँ"*

 

  *बापदादा के विशेष श्रृंगार हो ना! सबसे श्रेष्ठ श्रृंगार है -मस्तकमणि। मणि सदा मस्तक पर चमकती है। तो ऐसे मस्तकमणि बन सदा बाप के ताज में चमकने वाले कितने अच्छे लगेंगे।*

 

  *मणि सदा अपनी चमक द्वारा बाप का भी श्रृंगार बनती और औरों को भी रोशनी देती है।* 

 

  *तो ऐसे मस्तकमणि बन औरों को भी ऐसे बनाने वाले हैं - यह लक्ष्य सदा रहता हैं? सदा शुभ भावना सर्व की भावनाओंको परिवर्तन करने वाली है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  तो *उडती कला के लिए ब्रेक बहुत पॉवरफुल चाहिए।* जब पहाडी पर ऊँचे चढते हैं तो बार-बार क्या कहते हैं कि ब्रेक चेक करो, ब्रेक चेक करो। तो ऊंची अवस्था में जा रहे हो ना तो बार-बार ये ब्रेक चेक करो। कोई भी संकल्प वा संस्कार निगेटिव से पॉजिटिव में परिवर्तन कर सकते हैं और कितने समय में कर सकते हैं?

 

✧  समय है एक सेकण्ड का और आप पाँच सेकण्ड में करो तो क्या होगा? *तो अटेन्शन इस परिवर्तन शक्ति का चाहिए।* पहले स्वयं को परिवर्तन करो तब विश्व को परिवर्तन कर सकते हो। स्व-परिवर्तक बने हो?

 

✧  *पहले है स्व-परिवर्तक उसके बाद है विश्व-परिवर्तक।* क्योंकि अनुभव होगा कि व्यर्थ संकल्प की गति बहुत फास्ट होती है। एक सेकण्ड में कितने व्यर्थ संकल्प चलते हैं, अनुभव है ना फास्ट चलते हैं ना। तो ऐसे फास्ट गति के समय पॉवरफुल ब्रेक लगाकर परिवर्तन करने का अभ्यास चाहिए। (पार्टियों के साथ)

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *अभी जैसे समय की रफ़्तार चल रही है उसी प्रमाण अभी यह पाँव पृथ्वी पर न रहना चाहिए। कौन-सा पाँव? बुद्धि, जिससे याद की यात्रा करते हो। कहावत है ना कि फ़रिश्तों के पाँव पृथ्वी पर नहीं होते।* तो अभी यह बुद्धि पृथ्वी अर्थात् प्रकृति के आकर्षण से परे हो जायेगी, फिर कोई भी चीज़ नीचे नहीं ला सकती है। फिर प्रकृति को अधीन करने वाले हो जायेंगे, न कि प्रकृति के अधीन होने वाले। *जैसे साईन्स वाले आज प्रयत्न कर रहे हैं पृथ्वी से परे जाने के लिए। वैसे ही साइलेंस की शक्ति से इस प्रकृति के आकर्षण से परे, जब चाहें तब आधार लें, न कि प्रकृति जब चाहे तब अधीन कर दे। तो ऐसी स्थिति कहाँ तक बनी है?*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- दृष्टि बहुत शुद्ध रखना"*

 

_ ➳  प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को मेरे आत्मिक रूप का एहसास याद दिलाकर... जीवन को खुशियों से... फूलों की मादकता जैसे... महका दिया है... जीवन को नया आयाम दे दिया है... बाबा ने कौड़ी जैसे जीवन को हीरे तुल्य बना दिया... अब तो हर पल... हर कर्म मीठे बाबा की यादों से सज गया है... खुद को जानने की... और ईश्वर को पाने की खुशी ने जीवन को आलिशान... बेशकीमती... बना दिया है... *मैं आत्मा ईश्वरीय यादों से भरपूर हो हरपल मुस्करा रही हूँ... बाबा के प्यार की छत्रछाया में पलने वाली मैं आत्मा महान... सौभाग्यशाली हो गई हूँ... इस मीठे चिंतन में डुबी हुई मैं आत्मा... उड़ चलती हूँ... मीठे सूक्ष्म वतन में... अपने मीठे प्यारे बाबा के पास...*

 

  *मीठे बाबा मुझ आत्मा को मेरे श्रेष्ठ भाग्य का नशा दिलाते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... देही अभिमानी बन... सारा दिन आत्मिक दृष्टि का खूब अभ्यास करो... जिसे भी देखो..*. आत्मा भाई भाई की दृष्टि से देखो... कोई मित्र... सम्बन्धी... की देह न नजर आये... वह आत्मा ही दिखाई दे...* ऐसा अनुभव करो कि जैसे इस स्थूल दुनिया में रहते हुए... इन आत्माओं की दुनिया में रह रही हो... हर पल आत्म अभिमानी स्थिति की अनुभूति करो..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा बड़े प्यार से नशे से महकते हुए गुलाब की तरह रूहानियत भरे अंदाज़ में बाबा से कहती हूँ:-* "मेरे मीठे प्यारे बाबा... आपकी याद में रह... मैं आत्मा अपने पुराने स्वभाव संस्कार... दृष्टि... वृति... से निजात पा रही हूँ... अब मैं आत्मा... ब्रह्मा बाबा को अनुसरण करती हुई... साक्षीदृष्टा बनने का भरसक प्रयत्न कर रही हूँ... *किसी को गलत करते हुए या देखते हुए भी मैं आत्मा देही अभिमानी बन... एकरस स्थिति में... सभी मित्र... सम्बंधियों को... सभी मनुष्यों को आत्मा रूप में देखती हूँ... हर एक को आत्मा रूप में देखने से भाई-भाई की दृष्टि पक्की हो रही है..."*

 

  *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को साक्षीदृष्टा भव!! का वरदान देते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... अपनी दृष्टि... वृति... अपने पुराने संस्कार स्वभाव को अब परिवर्तन कर साक्षी दृष्टा बनो... *किसी के अवगुणों को देखते हुए भी चित्त पर न धरो... आपकी चलन से रूहानियत झलके... अन्य मनुष्य आत्माऐं आपके चलन से प्रभावित हो... आपकी तरफ आकर्षित हो..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा से वरदान पाकर और ईश्वरीय मत पाकर खुशनुमा जीवन की मालिक बनकर कहती हूँ:-* "मीठे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपको पाकर... आप द्वारा ज्ञान रत्नों को पाकर कितनी सुखी हो गई हूँ... विकर्मो की कालिमा से छूट कर पवित्रता से सज संवर रही हूँ... मीठे बाबा... *आप जैसे सच्चे साथी को साथ रखकर अपनी दृष्टि... वृति को श्रेष्ठ बनाती जा रही हूँ... मेरे जीवन के सहारे बाबा... अब एक पल के लिये भी... आपका श्रीमत रूपी हाथ कभी भी नहीं छोडूंगी..."*

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने निराकारी रूप के नशे से भरते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... सदा अपने चमकते हुए रूप के भान में रह... हर कर्म करो... सदा स्वयं को आत्मा निश्चय कर... दिव्य कर्मो से अपने दामन को स्वच्छ बनाओ... और दिल में सदा यादों में खोये हुए... *अपने महान भाग्य की खुमारी से ओतप्रोत... दिव्य दृष्टि... दिव्य कृति द्वारा हर कर्म करो... तभी तुम्हारी दृष्टि... वृति से रूहानियत स्पष्ट दिखाई देगी..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने मीठे प्यारे बाबा के प्यार पर स्नेह पर दिल से न्योछावर होकर कहती हूँ:-* "मीठे मीठे बाबा... आपने अपना बनाकर... मुझ कमजोर आत्मा को मूल्यवान... अमूल्य बना दिया... *आपने शुभ संकल्पों और शुभ भावना का जादू सिखा कर... मेरा जीवन हीरे जैसा बना दिया... अब मैं आत्मा आपके बताये मार्ग पर चलकर... अपनी दृष्टि... वृति द्वारा रूहानियत फैला रही हूँ...* मीठे प्यारे बाबा के उपकारों का यूँ रोम रोम से शुक्रिया कर... मैं आत्मा स्थूल जगत में लौट आयी..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बहुत प्रेम से बैठ कर रूहानी बाप को याद करना है*"

 

_ ➳  "यादें तुम्हारी बाबा देती सुकून दिल को" मन ही मन ये गीत गुनगुनाते हुए बाबा की मीठी दिल को सुकून देने वाली याद में मैं खो जाती हूँ और अपने मीठे प्यारे बाबा के स्वरूप पर अपने मन और बुद्धि को पूरी तरह एकाग्र कर देती हूँ। *परमधाम में मेरे ज्ञान सूर्य शिव बाबा का शक्तियों की अनन्त किरणे बिखेरता हुआ सुन्दर मनोहर स्वरूप मेरी आँखों के सामने स्पष्ट दिखाई देने लगता है*। सूर्य के समान चमकते उस सुन्दर सलौने स्वरूप का आकर्षण मुझे सहज ही अपनी और खींचने लगता है और अपने प्यारे बाबा के उस सुन्दर स्वरूप को अपने नयनो में बसाये मैं अति शीघ्र उनके पास जाने की रूहानी यात्रा पर स्वत: ही चल पड़ती हूँ। *मन बुद्धि की एक ऐसी यात्रा जिसमें देह और देह से जुड़ी किसी भी वस्तु की कोई आवश्यकता नही केवल अपने निराकार स्वरूप में स्थित होकर मन बुद्धि के विमान पर बैठ अपने स्वीट साइलेन्स होम में जाना ही अपनी मंजिल को पाना है*।

 

_ ➳  अपनी उस मंजिल अर्थात अपने स्वीट साइलेन्स होम में जाने के लिए अब मैं सभी बातों से किनारा कर अपने मन और बुद्धि को हर संकल्प, विकल्प से हटा लेती हूँ और अपने ध्यान को मस्तक के सेन्टर में एकाग्र कर, अपने स्वरूप पर केंद्रित कर लेती हूँ। *अपने स्वरूप में स्थित होते ही मन बुद्धि का कनेक्शन अब देह और देह की दुनिया से हट कर मेरे प्यारे पिता के साथ जुड़ जाता है और मन स्वत: ही उनकी तरफ खिंचने लगता है*। उनके प्यार के एहसास की मधुर स्मृति मुझे देह और देह की दुनिया से पूरी तरह उपराम कर देती हैं और मैं अनुभव करती हूँ जैसे परमधाम से मेरे प्यारे पिता की सर्वशक्तियों की लाइट सीधी मुझ आत्मा के साथ आ कर कनेक्ट हो गई है। 

 

_ ➳  परमात्म शक्तियों का तेज करेन्ट मुझ आत्मा में प्रवाहित होकर मुझे ऊपर अपनी ओर खींचने लगा है। इस लाइट के साथ मैं आत्मा अब देह से निकल कर ऊपर की ओर जा रही हूँ। 5 तत्वों की बनी साकारी दुनिया को पार करके फरिश्तो की आकारी दुनिया से होती हुई अब मैं आत्माओं की निराकारी दुनिया मे प्रवेश कर चुकी हूँ और देख रही हूँ इस अन्तहीन ब्रह्माण्ड को जहाँ चारो और शान्ति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैले हुए हैं। *इस अन्तहीन ब्रह्माण्ड में जगमग करती चैतन्य मणियो में बीच अखण्ड ज्योतिर्मय शक्तियों के पुंज ज्ञानसूर्य अपने शिव पिता को मैं देख रही हूँ। उनकी सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ कर मैं उनकी सारी शक्तियों को अपने अंदर भर रही हूँ*। देह भान में आने के कारण, मुझ आत्मा की बैटरी जो डिसचार्ज हो गई थी वो परमात्म शक्तियों के बल से पुनः चार्ज हो रही है।

 

_ ➳  परमात्म लाइट मेरे अंदर समाती जा रही हैं और मैं स्वयं बहुत ही शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा अपनी सारी शक्तियाँ मेरे अंदर भरकर मुझे ऊर्जा का भण्डार बना रहें हैं। सर्वशक्तियों से सम्पन्न, ऊर्जावान बन कर अब मैं वापिस साकारी लोक में आ कर अपने साकारी तन में विराजमान हो कर इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ। *किन्तु देह और देह की दुनिया में रहते हुए भी निरन्तर अपने प्यारे पिता की याद की धुन में ही अब मैं सदैव मगन रहती हूँ। सृष्टि का यह नाटक अब पूरा हो रहा है और मुझे वापिस अपने धाम जाना है इस बात को सदैव स्मृति में रख, देह और देह की दुनिया से स्वयं को उपराम रखने का मैं पूरा पुरुषार्थ कर रही हूँ*।

 

_ ➳  बाबा की मीठी याद की धुन में खोई स्वयं को उनके प्यार से मैं हर समय भरपूर अनुभव करने लगी हूँ इसलिए हर पल उनके प्यार के झूले में झूलते हुए, सर्व सम्बन्धो का सुख उनसे लेते हुए मैं देह और देह की दुनिया से अब नष्टोमोहा बनने लगी हूँ। *देह और देह के सम्बन्धियों के बीच रहते, उनसे तोड़ निभाते, बुद्धि का योग अपने शिव पिता के साथ जोड़, मन बुद्धि से ऊपर वास करते हुए अब मैं स्वयं को सदा परमात्म शक्तियों की छत्रछाया के नीचे अनुभव करती हूँ*। सदा बाबा की याद की धुन में रहने से बाबा की याद सुरक्षा कवच बन कर मुझे माया के हर वार से अब बचा कर रखती है। *बाबा की याद रूपी सेफ्टी के किले के अन्दर, हर पल बाबा के साथ रहते हुए, सदैव अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करते हुए, परमात्म प्यार के झूले में झूलते, परमात्म पालना में पलने का सुखद अनुभव अब मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं शुभ भावना से सेवा करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं बाप समान आत्मा हूँ।*

✺   *मैं अपकारीयो पर भी उपकार करने वाली आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा सदा ज्ञान का सिमरण करती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सदा हर्षित रहती हूँ  ।*

✺   *मैं ज्ञानी तू योगी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा सदा कहते हैं कि *किसी भी रूप में अगर एक बाबा का सम्बन्ध ही याद रहेदिल से निकले 'बाबा', तो समीपता का अनुभव करेंगें*। मन्त्र मुआफिक नहीं कहो 'बाबा-बाबा', वह राम-राम कहते हैं आप बाबा-बाबा कहतेलेकिन दिल से निकले 'बाबा!'

 

✺   *ड्रिल :-  "दिल से 'बाबा' कह समीपता का अनुभव करना"*

 

 _ ➳  अपने शिव पिता परमात्मा की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान मैं आत्मा एक छोटी सी, नन्ही सी बच्ची का चोला पहने अपने शिव पिता की उंगली थामे चल पड़ती हूँ दुनिया की चकाचौंध को देखने। *बाबा की उंगली थामे मैं सारे विश्व का भ्रमण कर रही हूं। दुनिया के खूबसूरत नजारों का आनन्द ले रही हूँ*। एक स्थान पर लोगों की भीड़ देख कर मैं बाबा से वहां चलने का आग्रह करती हूँ। बाबा मुझे वहां ले आते हैं। मैं देख रही हूं यहां बहुत सुंदर मेला लगा है। मेले की एक एक चीज मन को आकर्षित कर रही है। *उन चीजों के आकर्षण में आकर कब बाबा का हाथ मेरे हाथ से छूट जाता है मुझे पता ही नही चलता*। मेले की चीजों के आकर्षण में आकर मैं अपने बाबा को ही भूल जाती हूँ।

मेला समाप्त होता है और सभी अपने घर लौट जाते हैं।

 

 _ ➳  स्वयं को अकेला पाकर अब मैं वापिस घर लौटने का रास्ता ढूंढती हूँ लेकिन कोई रास्ता नही मिलता। जहां से जाती हूँ भूलभुलैया की तरह हर रास्ता बंद मिलता है। घबरा कर मैं रोने लगती हूँ। *तभी कानो में आवाज आती है "दिल से बाबा कहो तो बाबा समीप है" अब मैं बाबा को दिल से पुकारती हूँ और देखती हूँ मेरे सामने मुस्कराते हुए मेरे बाबा खड़े हैं*। बाबा को देखते ही मैं दौड़ कर बाबा की बाहों में समा जाती हूँ। बाबा अपनी बाहों में उठाये अब मुझे उस भूलभुलैया से बाहर ले आते हैं। जैसे ही मैं उस भूल भुलैया से बाहर आती हूँ वैसे ही मेरी चेतनता लौट आती है।

 

 _ ➳  अब मैं विचार करती हूं कि ये दुनिया भी तो एक भूल भुलैया की तरह ही है। इससे बाहर निकलने का रास्ता कोई नही जानता। इसकी चकाचौंध में सब फंसे पड़े है। बाहर निकलना चाहते हैं लेकिन निकल नही पा रहें। दुखी हो रहें हैं, रो रहें हैं। लेकिन *मैं कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे मेरे शिव पिता मिल गए। जो दिल से बाबा कहते ही मेरे समीप आ जाते है और इस संसार की हर उलझन रूपी भूलभुलैया से पलक झपकते ही मुझे बाहर निकाल लेते हैं*।

 

 _ ➳  अपने प्यारे मीठे बाबा की मेहरबानियों को याद करते ही मुख से स्वत: ही निकलता है। "मेरे तो शिव बाबा एक, दूसरा ना कोई" और इसी लग्न में मग्न हो कर मैं जैसे ही दिल से बाबा कहती हूँ। बाबा को अपने समीप अनुभव करती हूँ और *इस समीपता का अनुभव करते - करते नश्वर देह का त्याग कर चल पड़ती हूँ अपने प्राणेश्वर बाबा के पास, उनके प्यार की शीतल छाया में बैठ स्वयं को तृप्त करने के लिए*। अब मैं देख रही हूँ स्वयं को अपने दिलाराम बाबा के पास। मेरे दिलाराम बाबा की समीपता मुझे परमआनन्द का अनुभव करवा रही है। *गहन शांति के अनुभवों मे मैं डूब रही हूँ। बाबा से आ रही सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रही हूं*। भरपूर हो कर मैं वापिस लौट रही हूँ और साकार सृष्टि पर कर्म करने हेतू फ़िर से अपने पांच तत्वों के बने भौतिक शरीर मे प्रवेश कर रही हूं।

 

 _ ➳  अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हूँ और हर घड़ी मैं बाबा को अपने समीप अनुभव करती हूं। अब मेरे हर श्वांस में मेरे मीठे बाबा की याद बसी है। *मेरे नयनो में उनकी सूरत और सीरत समाई हुई है। मेरे कानों में उनके ही बोल हर समय गूंजते रहते हैं*। मेरा रोम - रोम उनकी याद से पुलकित हो रहा है। मेरे हर संकल्प, हर बोल, हर कर्म में उनकी ही छवि है। मेरे मनबुद्धि की तार निरन्तर उनसे जुड़ी हुई है। मैं हर पल उनके लव में लीन हूँ। *दिल से बाबा कह अब मैं हर पल उन्हें अपने समीप अनुभव करती हूं*।

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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