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 18 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *दिल दर्पण में देखा की हम कहाँ तक लायक बने हैं ?*

 

➢➢ *"शरीर का भान न रहे" - यह अभ्यास किया ?*

 

➢➢ *पवित्रता की रॉयल्टी द्वारा सदा हर्षित रहे ?*

 

➢➢ *पवित्रता का बल धारण किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जब तक आपकी याद ज्वाला रुप नहीं बनी है तब तक यह विनाश की ज्वाला भी सम्पूर्ण ज्वाला रुप नहीं लेती है।* यह भड़कती है, फिर शीतल हो जाती है क्योंकि ज्वाला मूर्त और प्रेरक आधार-मूर्त आत्माएं अभी स्वयं ही सदा ज्वाला रुप नहीं बनी हैं। *अब ज्वाला-रुप बनने का दृढ़ संकल्प लो और संगठित रूप में मन-बुद्धि की एकाग्रता द्वारा पावरफुल योग के वायब्रेशन चारों ओर फैलाओ।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं श्रीमत पर चलने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को श्रीमत पर चलने वाली श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? नाम ही है श्रीमत। श्री का अर्थ है श्रेष्ठ। तो श्रेष्ठ मत पर चलने वाले श्रेष्ठ हुए ना। यह रूहानी नशा, बेहद का नशा रहता है ना। या कभी-कभी हद का नशा भी आ जाता है? इसलिये सदा अपने को देखो-चलते-फिरते कोई भी कार्य करते बेहद का रूहानी नशा रहता है? *चाहे कर्म मजदूरी का भी हो, साधारण कर्म करते अपने श्रेष्ठ नशे को भूलते तो नहीं हो? घर में रहने वाली, घर की सेवा करने वाली साधारण मातायें हैं- यह याद रहता है या जगत माता हूँ, जगत का कल्याण करने के निमित्त यह कार्य कर रही हूँ-यह याद रहता है?*

 

  जिसे यह रूहानी नशा होगा उसकी निशानी क्या होगी? वह खुशी में रहेगा, कोई भी कर्म करेगा लेकिन कर्म के बन्धन में नहीं आयेगा, न्यारा और प्यारा होगा। कर्म के बन्धन में आना अर्थात् कर्म में फंसना और जो न्यारा-प्यारा होता है वह कर्म करते भी कर्म के बन्धन में नहीं आता, कर्मयोगी बन कर्म करता है। *अगर कर्म के बन्धन में आयेंगे तो खुशी गायब हो जायेगी। क्योंकि कर्म अच्छा नहीं होगा। लेकिन कर्मयोगी बनकर कर्म करने से दु:ख की लहर से मुक्त हो जायेंगे। सदा न्यारा होने के कारण प्यारे रहेंगे।* तो समझा, कैसे रहना है? कर्मबन्धन मुक्त।

 

  कर्म का बन्धन खींचे नहीं, मालिक होकर कर्म करायें। मालिक न्यारा होता है ना। मालिक होकर कर्म कराना-इसे कहा जाता है बन्धन-मुक्त। ऐसी आत्मा सदा स्वयं भी खुश रहेगी और दूसरों को भी खुशी देगी। ऐसे रहते हो? सुनते तो बहुत हो, अभी जो सुना है वह करना है। करेंगे तो पायेंगे। अभी-अभी करना, अभी-अभी पाना। कभी दु:ख की लहर आती है? कभी मन से रोते हो? मन का रोना तो सबको आ सकता है। तो श्रीमत है-सदा खुश रहो। श्रीमत यह नहीं है कि कभी-कभी रो लो। बहुतकाल मन से वा आंखों से रोया, रावण ने रुलाया ना। लेकिन अभी बाप के बने हो खुशी में नाचने के लिये, रोने के लिये नहीं। रोना खत्म हो गया। दु:ख की लहर-यह भी रोना है। यह मन का रोना हो गया। *सुखदाता के बच्चे सदा सुख में झूलते रहो। दु:ख की लहर आ नहीं सकती। भूल जाते हो तब आती है। इसलिये अभूल बनो। अभी जो भी कमजोरी हो उसे महायज्ञ में स्वाहा करके जाना। साथ में लेकर नहीं जाना, यहाँ ही स्वाहा करके जाओ।* स्वाहा करना आता है ना। दृढ़ संकल्प करना अर्थात् स्वाहा करना। यही याद रखना कि महान् हैं और महान् बनाना है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *एक  सेकण्ड का वन्डरफुल खेल जिससे पास विद ऑनर बन जायें* :- एक सेकण्ड का खेल है *अभी-अभी शरीर में आना और अभी-अभी शरीर से अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जाना।* इस सेकन्ड का खेल का अभ्यास है, जब चाहो जैसे चाहो उसे स्थिति में स्थित रह सको।

 

✧   *अंतिम पेपर सेकन्ड का ही होगा जो इस सेकन्ड के पेपर में पास हुआ वही पास विद आँनर होगा।* अगर एक सेकन्ड की हलचल में आया तो फेल, अचल रहा तो पास। ऐसी कंट्रोलिंग पावर है। अभी ऐसा अभ्यास तीव्र रूप का होना चाहिए। जितना हंगामा हो उतना स्वयं की स्थिति अति शान्त।

 

✧  जैसे सागर बाहर आवाज़ सम्पन होता अन्दर बिल्कुल शान्त, ऐसा अभ्यास चाहिए। *कन्ट्रोलिंग पाँवर वाले ही विश्व को कन्ट्रोल कर सकते हैं।* जो स्वयं को नहीं कर सकते वह विश्व का राज कैसे करेंगे। *समेटने की शक्ति चाहिए।* एक सेकन्ड में विस्तार से सार में चले जायें। और *एक सेकन्ड में सार से विस्तार में आ जायें यही वन्डरफुल खेल।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *पहला-पहला वायदा है सब बच्चों का कि तन-मन-धन तेरा न कि मेरा। जब तेरा है, मेरा है ही नहीं तो फिर बन्धन काहे का?* यह तो लोन पर बाप-दादा ने दिया है। आप ट्रस्टी हो, न कि मालिक। *जब मरजीवा बन गये तो ८ ३ जन्मों का हिसाब समाप्त हो गया।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक बाप को याद करना"*

 

_ ➳  विषय सागर में डूबी हुई मेरे जीवन की नईया को पार लगाने वाले मेरे खिवैया की यादों के नाव में बैठकर मैं आत्मा पहुँच जाती हूँ सूक्ष्मवतन... विकारों के गर्त से निकाल शांतिधाम और सुखधाम का रास्ता बताने वाले मेरे स्वीट बाबा के सम्मुख जाकर बैठ जाती हूँ... *मुस्कुराते हुए बापदादा अपने मस्तक और रूहानी नैनों से मुझ पर पावन किरणों की बौछारें कर रहे हैं... एक-एक किरण मुझमें समाकर इस देह, देह की दुनिया, देह के संबंधो से डिटैच कर रही हैं... और मैं आत्मा सबकुछ भूल फ़रिश्तास्वरुप धारण कर बाबा की शिक्षाओं को ग्रहण करती हूँ...*

 

  *अपने सुनहरी अविनाशी यादों में डुबोकर सच्चे सौन्दर्य से मुझे निखारते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वर पिता की यादो में ही वही अविनाशी नूर वही रंगत वही खूबसूरती को पाओगे... *इसलिए हर पल ईश्वरीय यादो में खो जाओ... बुद्धि को विनाशी सम्बन्धो से निकाल सच्चे ईश्वर पिता की याद में डुबो दो...*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा के यादों की छत्रछाया में अमूल्य मणि बनकर दमकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा देह अभिमान और देहधारियों की यादो में अपने वजूद को ही खो बैठी थी... *आपने प्यारे बाबा मुझे सच्चे अहसासो से भर दिया है... मुझे मेरे दमकते सत्य का पता दे दिया है...*

 

  *मेरे भाग्य की लकीर से दुखों के कांटे निकाल सुखों के फूल बिछाकर मेरे भाग्यविधाता मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता धरा पर उतर कर अपने कांटे हो गए बच्चों को फूलो सा सजाने आये है... *तो उनकी याद में खोकर स्वयं को विकारो से मुक्त कर लो... ये यादे ही खुबसूरत जीवन को बहारो से भरा दामन में ले आएँगी...*

 

_ ➳  *शिव पिता की यादों के ट्रेन में बैठकर श्रीमत की पटरी पर रूहानी सफ़र करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी प्यारी सी गोद में अपनी जनमो के पापो से मुक्त हो रही हूँ... *मेरा जीवन खुशियो का पर्याय बनता जा रहा है... और मै आत्मा सच्चे सुखो की अधिकारी बनती जा रही हूँ...*

 

  *देह की दुनिया के हलचल से निकाल अपनी प्यारी यादों में मुझे अचल अडोल बनाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... अपनी हर साँस संकल्प और समय को यादो में पिरोकर सदा के पापो से मुक्त हो जाओ... *खुशियो भरे जीवन के मालिक बन सुखो में खिलखिलाओ... यादो में डूबकर आनन्द की धरा, खुशियो के आसमान को अपनी बाँहों में भर लो...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा लाइट हाउस बन अपने लाइट को चारों और फैलाकर इस जहाँ को रोशन करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा कितनी भाग्यशाली हूँ... मुझे ईश्वर पिता मिल गया है... मेरा जीवन सुखो से संवर गया है... *प्यारे बाबा आपने अपने प्यार में मुझे काँटों से फूल बना दिया है... और देवताई श्रृंगार देकर नूरानी कर दिया है...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  अन्दर से भूतों को निकाल नर से नारायण बनने के लायक बनना है*"

 

_ ➳  अंतर्मुखता की गुफा में बैठ, अपने मन रूपी दर्पण में मैं अपने आपको निहार रही हूँ और विचार कर रही हूँ कि *अपने अनादि स्वरूप में मैं आत्मा कितनी पवित्र और सतोप्रधान थी और आदि स्वरूप में भी 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण गुणवान थी किन्तु देह भान में आकर मैं आत्मा पतित और कला विहीन हो गई इसलिए कोई भी गुण मुझ आत्मा में नही रहा*। यह सोचते - सोचते कुछ क्षणों के लिए अपने अनादि और आदि स्वरूप की अति सुखदाई मधुर स्मृतियों में मैं खो जाती हूँ और मन बुद्धि से पहुँच जाती हूँ अपने अनादि स्वरूप का आनन्द लेने के लिए अपनी निराकारी दुनिया परमधाम में।

 

_ ➳  देख रही हूँ अब मैं अपने उस सम्पूर्ण सत्य स्वरूप को जो मैं आत्मा वास्तव में थी। सर्वगुणों, सर्वशक्तियों से सम्पन्न अपने इस अति चमकदार, सच्चे सोने के समान दिव्य आभा से दमकते निराकार बिंदु स्वरूप को देख मन ही मन आनन्दित हो रही हूँ। *लाल प्रकाश की एक अति खूबसूरत दुनिया मे, चारों और चमकती हुई जगमग करती मणियों के बीच, अपना दिव्य प्रकाश फैलाते हुए एक अति तेजोमय चमकते हुए सितारे के रूप मे मैं स्वयं को देख रही हूँ*। अपने इस सम्पूर्ण सतोप्रधान अनादि स्वरूप की स्मृति में स्थित होकर, अपने गुणों और शक्तियों का भरपूर आनन्द लेने के बाद अब मैं अपने आदि स्वरूप का आनन्द लेने के लिए मन बुद्धि के विमान पर बैठ अपनी सम्पूर्ण निर्विकारी सतयुगी दुनिया में पहुँच जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई स्वरूप में मैं स्वयं को एक अति सुंदर मनभावनी स्वर्णिम दुनिया मे देख रही हूँ। सोने के समान चमकती हुई कंचन काया, नयनों में समाई पवित्रता की एक दिव्य अलौकिक चमक और मस्तक पर एक अद्भुत रूहानी तेज से सजे अपने इस स्वरूप को देख मैं गदगद हो रही हूँ। *पवित्रता और सम्पन्नता का डबल ताज मेरी सुन्दरता में चार चांद लगा रहा है। 16 कलाओं से सजे अपने इस सम्पूर्ण पवित्र, सर्व गुणों से सम्पन्न स्वरूप को बड़े प्यार से निहारते हुए मैं अपने इस आदि स्वरूप का भरपूर आनन्द लेने के बाद फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप की स्मृति में स्थित हो जाती हूँ* और मन ही मन विचार करती हूँ कि अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान स्वरूप को पुनः प्राप्त करने का ही अब मुझे तीव्र पुरुषार्थ करना है।

 

_ ➳  इसी संकल्प के साथ अब मैं अपने मन रूपी दर्पण में अपने आपको देखने का प्रयास करती हूँ और बड़ी महीनता के साथ अपनी चेकिंग करती हूँ कि कौन - कौन से भूतों की समावेशता अभी भी मेरे अन्दर है! *कहीं ऐसा तो नही कि मोटे तौर पर स्थूल विकारो रूपी भूतों पर तो मैंने जीत पा ली हो किन्तु सूक्ष्म में अभी भी देह भान में आने से कुछ सूक्ष्म भूत मेरे अंदर प्रवेश कर जाते हो! यह चेकिंग करने के लिए अब मैं स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सेट हो जाती हूँ और आत्मा राजा बन अपनी कर्मेन्द्रियों की राजदरबार लगाती हूँ* कि कौन - कौन सी कर्मेन्द्रिय मुझे धोखा देती है और भूतों को प्रवेश होने में सहायक बनती है।

 

_ ➳  अपनी एक - एक कर्मेन्द्रिय की महीन चेकिंग करते हुए और स्वयं को मन रूपी दर्पण में देखते हुए, अपने अंदर विद्यमान भूतों को दृढ़ता से बाहर निकालने का दृढ़ संकल्प लेकर, स्वयं को गुणवान बनाने के लिए अब मैं अपने निराकार बिंदु स्वरूप में स्थित होकर गुणों के सागर अपने शिव पिता के पास उनके धाम की ओर रवाना हो जाती हूँ। *सैकेंड में साकारी और आकारी दुनिया को पार कर आत्माओ की निराकारी दुनिया में पहुँच कर, गुणों की खान अपने गुणदाता बाबा के सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की किरणो की छत्रछाया के नीचे जाकर बैठ जाती हूँ*। अपनी सारी विशेषताएं, सारे गुण बाबा अपनी शक्तियों की किरणों के रूप में मुझ आत्मा पर लुटाकर मुझे आप समान बना देते हैं।

 

_ ➳  अपने प्यारे बाबा से सर्वगुण, सर्वशक्तियाँ लेकर मैं लौट आती हूँ वापिस साकारी दुनिया में। फिर से ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर अब मैं अपने पुरुषार्थ पर पूरा अटेंशन दे रही हूँ। *अपने प्यारे पिता की याद से विकर्मो को भस्म कर पावन बनने के साथ - साथ अपने अनादि और आदि गुणों को जीवन मे धारण कर, गुणवान बनने के लिए, अपने मन दर्पण में अपने आपको को देखते हुए अब मैं बार बार अपनी चेकिंग कर, भूतों को निकाल कर दिव्य गुणों को धारण करती जा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं पवित्रता की रॉयल्टी में रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं हर्षितचित आत्मा हूँ।*

   *मैं हर्षितमुख आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा संसार में सर्वश्रेष्ठ बल को धारण करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा पवित्रता के बल को धारण करती हूँ  ।*

   *मैं परम पवित्र आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ आज बापदादा अपने सर्व विकर्माजीत अर्थात् विकर्म- संन्यासी आत्माओं को देख रहे हैं। *ब्राह्मण आत्मा बनना अर्थात् श्रेष्ठ कर्म करना और विकर्म का संन्यास करना। हरेक ब्राह्मण बच्चे ने ब्राह्मण बनते ही यह श्रेष्ठ संकल्प किया कि हम सभी अब विकर्मी से सुकर्मी बन गये।* सुकर्मी आत्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा कहलाई जाती है। तो संकल्प ही है विकर्माजीत बनने का। यही लक्ष्य पहले-पहले सभी ने धारण किया ना! इसी लक्ष्य को रखते हुए श्रेष्ठ लक्षण धारण कर रहे हो। तो अपने आप से पूछो - विकर्मों का संन्यास कर विकर्माजीत बने हो?

✺ *"ड्रिल :- विकर्मों का संन्यास कर विकर्माजीत बनकर रहना।*

➳ _ ➳ *माया रावण के इच्छा, तृष्णा, आसक्ति रूपी विकारों के जहर से भरी हुई मैं आत्मा रूपी सर्प मधुर बीन की आवाज़ सुन उसकी तरफ चली जा रही हूँ... सर्व शक्तिवान भोलेनाथ बाबा एक पेड़ के नीचे बैठकर मधुर मुरली की बीन बजा रहे हैं...* मैं आत्मा रूपी सर्प इस मीठी मधुर मुरली की बीन पर डांस कर रही हूँ... मैं आत्मा मधुर मुरली की तान में मगन होती जा रही हूँ... मुरली की मिठास से मुझ आत्मा रूपी सर्प से देह रूपी खोल बाहर निकल रहा है...

➳ _ ➳ *बाबा बीन बजा-बजाकर सारा जहर बाहर निकाल रहे हैं... जन्म-जन्मांतर से मैं आत्मा माया रावण की कैद में रहकर विकारों के वशीभूत होकर कई विकर्म करती गई और विकर्मों के बंधन में बंधती चली गई थी...* रावण रूपी विकारों के सर्प ने डस कर मुझमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार का जहर भर दिया था... और मैं आत्मा इंद्रियों के आकर्षण में पड़कर पतित बनती गई... कर्मेन्द्रियों की कठपुतली बन कई जन्मों तक दास बनकर रह गई थी...

➳ _ ➳ मीठे बाबा से आती दिव्य किरणों में मुझ आत्मा रूपी सर्प से विकारों रूपी सारा जहर बाहर निकलता जा रहा है... विकारों का सूक्ष्म और रॉयल स्वरुप अंश सहित मिट रहे हैं... मैं आत्मा काली से गोरी बन रही हूँ... *इंद्रियों के आकर्षण से परे होकर मैं आत्मा इस देह रूपी खोल से बाहर निकलती हूँ और अपने असली सुन्दर स्वरूप को देखती हूँ... मेरा निज स्वरुप कितना पवित्र, सतोगुणी, दिव्य गुणों, शक्तियों से भरपूर संपन्न स्वरुप है...*

➳ _ ➳ प्यारे बाबा मुझे अपनी गोद में लेकर अपना बच्चा बनाकर कहते हैं- मीठे बच्चे अब तुम ब्राह्मण आत्मा बन गई हो... ब्राह्मण आत्मा बनना अर्थात श्रेष्ठ कर्म करना और विकर्म का सन्यास करना... अब विकर्मी से सुकर्मी बन श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा बनो... विकर्माजीत बनने का लक्ष्य सामने रख श्रेष्ठ लक्षण धारण करो... *मैं ब्राह्मण आत्मा बाबा के सामने श्रेष्ठ संकल्प करती हूँ कि मैं अब श्रेष्ठ कर्म कर सुकर्मी आत्मा बन श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा बनूँगी... विकारों के वशीभूत होकर कोई भी विकर्म नहीं करुँगी... अब मैं आत्मा श्रेष्ठ कर्म करती हुई विकर्मों का संन्यास कर विकर्माजीत बन रही हूँ...*
 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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