━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 18 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *श्रीमत पर तन मन धन से भरता को स्वर्ग बनाने की सेवा की ?*

 

➢➢ *आपस में बहुत मीठी मीठी ज्ञान की बातें सुनी और सुनाई ?*

 

➢➢ *पुरुषार्थ के सूक्षम आलस्य का अभी त्याग किया ?*

 

➢➢ *समय के महत्व को सामने रख सर्व प्राप्तियों का खाता फुल जमा किया ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  *जैसे स्थापना के आदि में साधन कम नहीं थे, लेकिन बेहद के वैराग्य वृत्ति की भट्ठी में पड़े हुए थे।* यह 14 वर्ष जो तपस्या की, यह बेहद के वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल था। बापदादा ने अभी साधन बहुत दिये हैं, साधनों की कोई कमी नहीं हैं लेकिन होते हुए बेहद का वैराग्य हो। *आपके वैराग्य वृत्ति के वायुमण्डल के बिना आत्मायें सुखी, शान्त बन नहीं सकती, परेशानी से छूट नहीं सकती।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं बाप समान न्यारा और प्यारा हूँ"*

 

  सदा अपने को जैसे बाप न्यारा और प्यारा है, ऐसे न्यारे और प्यारे अनुभव करते हो? बाप सबका प्यारा क्यों है? क्योंकि न्यारा है। जितना न्यारा बनते हैं उतना सर्व का प्यारा बनते हैं। न्यारा किससे? *पहले अपनी देह की स्मृति से न्यारा। जितना देह की स्मृति से न्यारे होंगे उतने बाप के भी प्यारे और सर्व के भी प्यारे होंगे। क्योंकि न्यारा अर्थात् आत्म-अभिमानी। जब बीच में देह का भान आता है तो प्यारापन खत्म हो जाता है। इसलिए बाप समान सदा न्यारे और सर्व के प्यारे बनो।*

 

  आत्मा रूप में किसको भी देखेंगे तो रूहानी प्यारा पैदा होगा ना। और देहभान से देखेंगे तो व्यक्त भाव होने के कारण अनेक भाव उत्पन्न होंगे-कभी अच्छा होगा, कभी बुरा होगा। लेकिन आत्मिक-भाव में, आत्मिक दृष्टि में, आत्मिक वृत्ति में रहने वाला जिसके भी सम्बन्ध में आयेगा अति प्यारा लगेगा। तो सेकेण्ड में न्यारे हो सकते हो? कि टाइम लगेगा? *जैसे शरीर में आना सहज लगता है, ऐसे शरीर से परे होना इतना ही सहज हो जाये। कोई भी पुराना स्वभाव-संस्कार अपनी तरफ आकर्षित नहीं करे और सेकेण्ड में न्यारे हो जाओ।*

 

  सारे दिन में, बीच-बीच में यह अभ्यास करो। *ऐसे नहीं कि जिस समय याद में बैठो उस समय अशरीरी स्थिति का अनुभव करो। नहीं। चलते-फिरते बीच-बीच में यह अभ्यास पक्का करो- 'मैं हूँ ही आत्मा!' तो आत्मा का स्वरूप ज्यादा याद होना चाहिए ना! सदा खुशी होती है ना!* कम नहीं होनी चाहिए, बढ़नी चाहिए। इसका साधन बताया-मेरा बाबा। और कुछ भी भूल जाये लेकिन 'मेरा बाबा' यह भूले नहीं।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  बापदादा सभी बच्चों को सम्पन्न स्वरूप बनाने के लिए रोज-रोज भिन्न-भिन्न प्रकार से प्वाइंटस बताते रहते हैं। *सभी प्वाइंटस का सार है, सभी को सार में समाए बिन्दु बन जाओ।* यह अभ्यास निरंतर रहता है?

 

✧  कोई भी कर्म करते हुए यह स्मृति रहती है कि - *मैं ज्योति बिन्दु इन कर्मेन्द्रियों द्वारा यह कर्म कराने वाला हूँ।'* यह पहला पाठ स्वरूप में लाया है? आदि भी यही है और अंत में भी इसी स्वरूप में स्थित हो जाना है। तो सेकण्ड का ज्ञान, सेकण्ड के ज्ञान स्वरूप बने हो? विस्तार को समाने के लिए एक सेकण्ड का अभ्यास है।

 

✧  जितना विस्तार में आना सहज है उतना ही सार स्वरूप में आना सहज अनुभव होता है? सार स्वरूप में स्थित हो फिर विस्तार में आना यह बात भूल तो नहीं जाते हो? सार स्वरूप में स्थित हो विस्तार में आने से कोई भी प्रकार के विस्तार की आकर्षण नहीं होगी। *विस्तार को देखते, सुनते, वर्णन करते ऐसे अनुभव करेंगे जैसे एक खेल कर रहे हैं। ऐसा अभ्यास सदा कायम रहे। *इसको ही सहज याद' कहा जाता है।*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧ *एवररेडी अर्थात् साथ चलने के लिए समान बनी हुई आत्मा साक्षात्कार द्वारा आत्मा को नहीं देखेंगी लेकिन बुद्धियोग द्वारा सदा स्वयं को साक्षात् 'ज्योति बिन्दु आत्मा' अनुभव करेगी। साक्षात् स्वरूप बनना सदाकाल है और साक्षात्कार अल्पकाल का है।* साक्षात स्वरूप आत्मा कभी भी यह नहीं कह सकती कि मैंने आत्मा का साक्षात्कार नहीं किया है। मैंने देखा नहीं है। लेकिन वह अनुभव द्वारा साक्षात् रूप की स्थिति में स्थित रहेंगी। *जहाँ साक्षात स्वरूप होगा वहाँ साक्षात्कार की आवश्यकता नहीं। ऐसे साक्षात आत्मा स्वरूप की अनुभूति करने वाले अथार्टी से, निश्चय से कहेंगे कि मैंने आत्मा को देखा तो क्या लेकिन अनुभव किया है। क्योंकि देखने के बाद भी अनुभव नहीं किया तो फिर देखना कोई काम का नहीं।* तो ऐसे साक्षात् आत्म-अनुभवी चलते-फिरते अपने ज्योति-स्वरूप का अनुभव करते रहेंगे।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- श्रीमत पर दैवी राजधानी स्थापन करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन की पहाड़ी पर बैठ प्रकृति के नजारों को देखती हूँ... पहाड़ों के बीच से उगते हुए सूरज की लालिमा ने अपना सुनहरा आँचल फैलाकर पहाड़ों को और ही खूबसूरत बना दिया है...* ठंडी-ठंडी हवाओं के झोंकें मधुर संगीत सुना रही हैं... इस मधुर पावन धरती की गाथा गा रही है... मैं आत्मा हद की दुनिया से दूर बेहद के इस घर में बेहद बाबा को याद करती हूँ... तुरंत ही मीठे प्यारे बाबा मेरे सम्मुख हाजिर होकर अपने प्यार की खुशबू मुझ पर बरसाते हैं...

 

  *ऊँगली पकडकर श्रीमत की राह पर चलाकर श्रेष्ठ बनाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे बच्चे... अब यह विकारो से भरी दुनिया खत्म होने वाली है और दिव्य गुणो के महक वाली सतयुगी दुनिया आने वाली है... तो ईश्वर पिता की श्रीमत को जीवन का आधार बना लो... *यही श्रीमत और पवित्रता देवी देवता के रूप में श्रृंगारित कर सुखो के संसार में ले चलेगी...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अपने जीवन रूपी गाड़ी को श्रीमत रूपी पटरी पर चलाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा इस पुरानी विकारी दुनिया से मन बुद्धि को निकाल श्रीमत का हाथ पकड़ सतयुगी दुनिया की और बढ़ती चली जा रही हूँ...* दिव्य गुणो से सजती जा रही हूँ... प्यारे बाबा संग निखरती जा रही हूँ...

 

  *मीठा बाबा स्वर्ग सुखों से जीवन को आबाद कर खुशियों की शहजादी बनाते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... इस दुःख भरी दुनिया से उपराम होकर मेरी महकती यादो में खो जाओ... *श्रीमत का हाथ सदा पकड़े रहो... तो काँटों से महकते फूल बन खिल उठेंगे... ईश्वर पिता का साथ सुखो के जन्नत में ले चलेगा...* जहाँ देवता बन मुस्करायेंगे...

 

_ ➳  *रावण की दुनिया से निकल एक राम की यादों में महकते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा प्यारे बाबा से सारे गुण और शक्तियो से भरकर भरपूर हो गई हूँ... *इस मिटटी के नातो से निकल कर अपने सत्य स्वरूप के नशे में खो गई हूँ... और श्रेष्ठ कर्म से खिलती जा रही हूँ...*

 

  *श्रीमत के झूले में झुलाकर दिव्यता से महकाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... जिस दुनिया सा इतना दिल लगाकर दुखी हुए... खाली हो गए... अब उसका अंत आया की आया... *अब समय साँस संकल्पों को मीठे बाबा की यादो और श्रीमत के पालन में लगाओ... तो यह पवित्र जीवन सुख और शांति से खिल उठेगा... घर आँगन सुखो से लहलहायेगा...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सुन्दर परी बनकर पवित्रता की खुशबू चारों ओर फैलाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी श्रीमत से खूबसूरत होती जा रही हूँ... मन बुद्धि को इस संसार से उपराम बनाती जा रही हूँ... *मीठे बाबा आपने जो सुंदर कर्म सिखाये है... पवित्रता का दामन थाम सुन्दरतम होती जा रही हूँ...*

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- श्रीमत पर तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है*"

 

_ ➳  रामराज्य शब्द स्मृति में आते ही एक ऐसी दैवी दुनिया का चित्र आंखों के आगे उभर आता है जो सुखमय दुनिया मेरे प्रभु राम, मेरे परम प्रिय परमपिता परमात्मा शिव बाबा ने हम बच्चों के लिये बनाई थी। जिसमे अपरमअपार सुख था, शांति थी, समृद्धि थी। *एक ऐसी दुनिया जहाँ सब मिल जुल कर बड़े प्यार से रहते थे। किसी के मन मे किसी के प्रति कोई ईर्ष्या - द्वेष कोई छल - कपट नही था*। उसी दैवी दुनिया अर्थात उस रामराज्य के बारे में विचार करते - करते मैं मन बुद्धि से पहुंच जाती हूँ उसी दैवी दुनिया में।

 

_ ➳  स्वर्ण धागों से बनी हीरे जड़ित अति शोभनीय ड्रेस पहने एक राजकुमारी के रूप में मैं स्वयं को प्रकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण उस देव भूमि, उस रामराज्य में देख रही हूँ जहां हरे भरे पेड़ पौधे, टालियों पर चहचहाते रंग-बिरंगे खूबसूरत पक्षी, *वातावरण में गूंजती कोयल की मधुर आवाज, फूलों पर इठलाती रंग बिरंगी तितलियां, बागों में नाचते सुंदर मोर, कल-कल करते सुगंधित मीठे जल के झरने, रस भरे फलों से लदे वृक्ष, सतरंगी छटा बिखेरती सूर्य की किरणे मन को आनन्द विभोर कर रही हैं*।

 

_ ➳  प्रकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस देव भूमि पर सोलह कला सम्पूर्ण, मर्यादा पुरुषोत्तम देवी-देवताओ को विचरण करते, पुष्पक विमानों मे बैठ उन्हें विहार करते मैं देख रही हूं। *लक्ष्मी नारायण की इस पुरी में राजा, प्रजा सभी असीम सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर हैं*। चारों ओर ख़ुशी का माहौल हैं। दुख, अशांति का यहां नाम निशान भी दिखाई नही देता। ऐसे देवलोक के रमणीक नजारों को देख मैं मंत्रमुग्घ हो रही हूँ।

 

_ ➳  मन बुद्धि से इस दैवी दुनिया की यात्रा कर मैं असीम आनन्द से भरपूर हो गई हूं। अपने देवताई स्वरूप का भरपूर आनन्द लेने के बाद अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होती हूँ और विचार करती हूँ कि यही भारत जब रामराज्य था तो कितना समृद्ध था। *किन्तु विकारों रूपी रावण की प्रवेशता ने इस समृद्ध भारत को कितना दुखी और कंगाल बना दिया और अब जबकि मेरे प्रभु राम इस रावण राज्य को फिर से रामराज्य बनाने के लिए आये हैं तो मुझे भी इस रामराज्य की स्थापना में अपने प्रभु राम का सहयोगी बन भारत को रामराज्य बनाने की सेवा में लग जाना चाहिए*।

 

_ ➳  इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए अब मैं अपने लाइट के फ़रिशता स्वरूप को धारण कर बापदादा के साथ कम्बाइंड हो कर विश्व ग्लोब पर आ जाता हूँ। विश्व की सर्व आत्मायें मेरे सम्मुख हैं। *अब मैं उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप से परिचित करवा रहा हूँ। संकल्पो के माध्यम से उन्हें बता रहा हूँ कि आपका वास्तविक स्वरूप बहुत आकर्षक है, बहुत ही प्यारा है*। आप सभी बीजरूप निराकार परम पिता परमात्मा शिव की अजर, अमर, अविनाशी सन्ताने हो।

 

_ ➳  देह के भान में आकर आप कुरूप बन गये हो। आपका देवताई स्वरूप संपूर्ण सतोप्रधान, सर्वगुण सम्पन्न था। विकारों रूपी रावण की प्रवेशता ने आपका सुख और पवित्रता का वर्सा छीन कर आपको दुखी बना दिया है। *सो हे आत्मन - अब जागो! अज्ञान रूपी निद्रा का त्याग कर परमात्मा शिव द्वारा दिए इस सत्य ज्ञान को स्वीकार कर उसे अपने जीवन में धारण करो*। ये सत्य ज्ञान ही आपके जीवन को फिर से श्रेष्ठ बनायेगा और भारत फिर से रामराज्य बन जायेगा।

 

_ ➳  विश्व की सर्व आत्माओं को रामराज्य में चलने का संदेश दे कर, अपने फ़रिशता स्वरूप को छोड़ अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर भारत को रामराज्य बनाने की सेवा में अपना सब कुछ सफल कर रहा हूँ। *श्वांसों - श्वांस अपने शिव पिता परमात्मा की याद में रह कर, मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्र बन, पवित्रता का सहयोग दे कर, अपने शिव पिता परमात्मा के साथ भारत को पावन बनाने के कार्य मे उनका मददगार बन रहा हूँ*। जिस सत्य ज्ञान को पाकर मेरे जीवन में इतना सुखद परिवर्तन आ गया उस सत्य ज्ञान को सारे विश्व की सर्व आत्माओं तक पहुंचा कर उनके जीवन में भी सुखदाई परिवर्तन लाने के निमित्त बन, उन्हें भी रामराज्य लाने और उसमें राज्य करने के लिए उन्हें प्रेरित कर रहा हूँ।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं पुरुषार्थ के सूक्ष्म आलस्य का भी त्याग करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं ऑलराउण्डर आत्मा हूँ।*

   *मैं अलर्ट आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा समय के महत्व को सदा सामने रखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व प्राप्तियों का खाता फुल जमा करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व प्राप्ति संपन्न हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  अपने को सदा सेवाधारी समझकर सेवा पर उपस्थित रहते हो नासेवा की सफलता का आधारसेवाधारी के लिए विशेष क्या हैजानते हो? सेवाधारी सदा यही चाहते हैं कि सफलता हो लेकिन सफल होने का अधार क्या हैआजकल विशेष किस बात पर अटेन्शन दिला रहे हैं? (त्याग पर) *बिना त्याग और तपस्या के सफलता नहीं। तो सेवाधारी अर्थात् त्याग मूर्त और तपस्वी मूर्त*।

 

_ ➳  *तपस्या क्या है? एक बाप दूसरा न कोईयह है हर समय की तपस्या।*

 

_ ➳  और त्याग कौनसा हैउस पर तो बहुत सुनाया है लेकिन *सार रूप में सेवाधारी का त्याग - जैसा समयजैसी समस्यायें होजैसे व्यक्ति हों वैसे स्वयं को मोल्ड कर स्व कल्याण और औरों का कल्याण करने के लिए सदा इजी रहें।* जैसी परिस्थिति हो अर्थात् कहाँ अपने नाम का त्याग करना पड़ेकहाँ संस्कारों काकहाँ व्यर्थ संकल्पों काकहाँ स्थूल अल्पकाल के साधनों का... तो उस परिस्थिति और समय अनुसार अपनी श्रेष्ठ स्थिति बना सकें,  *कैसा भी त्याग उसके लिए करना पड़े तो कर लेंअपने को मोल्ड कर लेंइसको कहा जाता है - त्याग मूर्त'।* त्यागतपस्या फिर सेवा। त्याग और तपस्या ही सेवा की सफलता का आधार है। *तो ऐसे त्यागी जो त्याग का भी अभिमान न आये कि मैंने त्याग किया। अगर यह संकल्प भी आता तो यह भी त्याग नहीं हुआ*।

 

✺   *"ड्रिल :- त्याग और तपस्या के आधार पर सेवा में सफलता प्राप्त करना।"*

 

_ ➳  देह रूपी पारदर्शी डिबिया में दमकती, मैं आत्मा मणि, अपने गुणों व शक्तियों के प्रकाश से इस देह को भी आभा युक्त कर रही हूँ... *(दृश्य चित्र बनाकर कुछ देर महसूस कीजिए इस दृश्य को)* मैं आत्मा, उदय होता हुआ सूर्य और मेरे आसपास ये देह रूपी बादल... आहिस्ता-आहिस्ता ये बादल मेरे चारों और से हटने लगे है... और अब मैं आत्मा, अपने सम्पूर्ण प्रकाशमान रूप में... मेरा प्रकाश आसपास के वातावरण में प्रकाश के दरिया के रूप प्रवाहित हो रहा है... देखे स्वयं कों, प्रकाश के सागर में तैरते हुए... इस सागर की रंग बिरंगी लहरें कभी मुझे गहराई में लेकर जा रही है और कभी मैं लहरों के ऊपर अठखेलियाँ कर रही हूँ... *तपस्या की लगन में डूबी, एक बाप दूसरा न कोई इसी एक सकंल्प को लिए मैं मस्तक मणि, जा पहुँचती हूँ परम धाम में*...

 

_ ➳  असंख्य सुन्दर मणियों से भरा हुआ जैसे कोई पारदर्शी -सा, भव्य और  विशाल शीशे का जार... जार के ऊपर चमकता लाल रंग का शिव रत्नाकर, चमचमाती मणि के रूप में... और इस मणि के सबसे करीब, अपनी सम्पूर्ण आभा बिखेरता मैं नन्हा सा प्रकाश कण... अपनी किस्मत पर इठलाता हुआ... बस एक की ही लगन में मगन होता हुआ... फरिश्ता रूप में मैं रूहानी मणि उतरती हूँ अब सूक्ष्म लोक में... और बापदादा का हाथ पकडे उसी झील के किनारे जो, मेरे और बापदादा के रूहानी स्नेह की साक्षी है... *मैं देख रही हूँ आकाश में, बादलों के पीछे से झाँकने का प्रयास करता सूरज, और सूरज की लालिमा से सिन्दूरी रंग में रंगे ये बादल... बादल और सूरज दोनों ही अथक सेवाधारी है...*

 

_ ➳  तभी बापदादा मेरे हाथ पकडे मुझे सामने के पर्वत पर चलने का इशारा कर रहे है... मैं फरिश्ता शिखर पर जाकर बैठ गया हूँ बादलों के ढेर के ऊपर और छोटी-छोटी सी गेंद बनाकर फेंक रहा हूँ उन्हें झील के पानी में... अपना वजूद मिटाकर पानी होते ये बादल... मगर दूसरे ही पल फिर झील से धुएँ के रूप में फिर से बनकर उडते ये बादल... *सर्वस्व त्याग का पाठ पढा रहे हैं... धरा की तपन मिटाने की सेवा और उस एक धुन में सर्वस्व त्याग का अनोखा उदाहरण बन गये है ये... तभी बाप दादा मेरे हाथों में पकडे हुए छोटे छोटे नन्हें रंगीन गुब्बारों की तरफ इशारा करके मानों पूछ रहें हों*, बच्चे- "ये नाम, संस्कार, व्यर्थ संकल्पों और अल्पकाल के साधनों का त्याग कब तक करोगे...

 

_ ➳  और मैं, तुलना कर रहा हूँ, इन बादलों की त्यागवृत्ति से स्वयं की... कितना लचीलापन है इनमें, हवाओं के अनुसार स्वयं को किसी भी आकार में ढाल लेते है ये... *जो स्वयं को कैसे भी त्याग के लिए मोल्ड कर ले, ऐसी ही त्याग वृत्ति मुझे धारण करनी है, और ऐसा निश्चय कर मैंने वो सभी रंगीन गुब्बारें हवा में छोड दिए... आकाश में दूर दूर तक फैल गये है ये संस्कार, व्यर्थ संकल्पों और अल्पकाल के साधन रूपी गुब्बारें*... हवाओं में कलाबाजियाँ खाते हुए... और मैं देख रहा हूँ इनको खुद से दूर जाते हुए... दूर... बहुत दूर... और देखते ही देखते आँखों से ओझल हो गये है वे सभी...

 

_ ➳  *मैं देख रहा हूँ अपने दोनो हाथों को, कितना आराम महसूस कर रहे हैं मेरे दोनो हाथ... मुद्दतों के बाद आज मैं अपनी हथेली खोल रहा हूँ, बन्द कर रहा हूँ, आजादी के साथ*... असीम सुख का एहसास... *त्याग के सुख की गहरी अनुभूति हो रही है आज मुझे*... एक लम्बी और गहरी स्वाँस के साथ, मैं देख रहा हूँ बापदादा की ओर... और बस देखे जा रहा हूँ एकटक, कृतज्ञता आँखों में भर कर... जैसे कोई चातक पक्षी दिन रात बादलों को निहारता है... और बापदादा बरसते बादलों की तरह स्नेह बरसा रहे हैं मेरे ऊपर... *त्याग के भी त्याग का सुख आज महसूस हुआ है मुझ आत्मा को*... सर्व के कल्याण की भावना मन में समाये, मैं आत्मा वापस लौट आयी हूँ, अपनी देह रूपी डिबियाँ में... *त्याग और तपस्या के आधार पर सेवा में सफलता प्राप्त करने का दृढ निश्चय मन में लिए*... ओम शान्ति...

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━