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 18 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *ज्ञान और योग की धारणा कर दूसरों को सुनाया ?*

 

➢➢ *विकारों की दलदल से आत्माओं को निकाला ?*

 

➢➢ *अपनी पावरफुल स्थिति द्वारा मनसा सेवा का सर्टिफिकेट प्राप्त किया ?*

 

➢➢ *मनसा - वाचा - कर्मणा तीनो सेवाएं साथ साथ करते रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  संघठित रूप में शक्तिशाली वायुमण्डल बनाने की जिम्मेवारी समझकर रहना। *जब देखो कि कोई व्यक्त भाव में ज्यादा है तो उनको बिना कहे अपना ऐसा अव्यक्ति शान्त रूप धारण कर लो जो वह इशारे से समझकर शान्त हो जाए, इससे वातावरण अव्यक्त बन जायेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं परिवर्तन शक्ति द्वारा सबसे दुआयें लेने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  *सदा परिवर्तन शक्ति को यथार्थ रीति से कार्य में लगाने वाली श्रेष्ठ आत्मा हो ना। इसी परिवर्तन शक्ति से सर्व की दुआयें लेने के पात्र बन जाते।* जैसे घोर अन्धकार जब होता है, उस समय कोई रोशनी दिखा दे तो अन्धकार वालों के दिल से दुआयें निकलती हैं ना।

 

  ऐसे जो यथार्थ परिवर्तन शक्ति को कार्य में लगाते हैं, उनको अनेक आत्माओं द्वारा दुआयें प्राप्त होती हैं और सबकी दुआयें आत्मा को सहज आगे बढ़ा देती हैं। *ऐसे, दुआयें लेने का कार्य करने वाली आत्मा हूँ - यह सदा स्मृति में रखो तो जो भी कार्य करेंगे, वह दुआयें लेने वाला करेंगे। दुआयें मिलती ही हैं श्रेष्ठ कार्य करने से।*

 

  *तो सदा यह स्मृति रहे कि 'सबसे दुआयें लेने वाली आत्मा हूँ'- यही स्मृति श्रेष्ठ बनने का साधन है, यही स्मृति अनेकों के कल्याण के निमित्त बन जाती हैं। तो याद रखना कि परिवर्तन शक्ति द्वारा सर्व की दुआयें लेने वाली आत्मा हूँ।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *एक बल, एक भरोसा - ऐसी श्रेष्ठ आत्मा हैं, ऐसे अनुभव करते हो?* एक बल, एक भरोसा है या अनेक बल, अनेक भरोसे हैं? एक बल कौन-सा है? साइलेन्स का बल, योग का बल। आज साइन्स की शक्ति का प्रभाव है लेकिन वह भी निकली कहाँ से? शान्ति की शक्ति से निकली ना?

 

✧  एक बाप में भरोसा अर्थात निश्चय होने से यह साइलेन्स का बल, योग का बल स्वतः ही अनुभव होता है तो साइलेन्स की शक्ति वाले हैं, योग बल वाले हैं - यह स्मृति रहती है? *शान्ति की शक्ति सर्व श्रेष्ठ शक्ति है।* क्योंकि और सभी शक्तियाँ कहाँ से निकलती हैं? शान्ति की शक्ति से ना!

 

✧  तो शान्ति की शक्ति द्वारा जो चाहो वह कर सकते हो। असम्भव को भी सम्भव कर सकते हो। *जो दुनिया वाले आज असम्भव कहते हैं आपके लिए वह सम्भव है ना!* तो सम्भव होने के कारण सहज लगता है। मेहनत नहीं लगती।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  अभी तो बापदादा साथ चलने के लिए सूक्ष्मवतन में अपना कर्तव्य कर रहे हैं लेकिन यह भी कब तक? जाना तो अपने ही घर में है ना? इसलिए अभी जल्दी-जल्दी अपने को ऊपर की स्थिति में स्थित करने का प्रयत्न करो। *साथ चलना, साथ रहना और फिर साथ में राज्य करना है ना? साथ कैसे होगा? समान बनने से। समान नहीं बनेंगे तो साथ कैसे होगा? अभी साथ उड़ना है, साथ रहना है- यह स्मृति रखो तब अपने को जल्दी समान बना सकेंगे।* नहीं तो कुछ दूर पड़ जायेंगे। वायदा भी है ना कि साथ रहेंगे, साथ चलेंगे और साथ ही राज्य करेंगे!

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सत्य बाप द्वारा सत्य देवता बनना"*

 

_ ➳  *अमृतवेले के रूहानी समय में मैं आत्मा बगीचे के झूले में बाबा की गोदी में बैठी हूँ... बाबा की गोदी के झूले में झूलती हुई उनके रूहानी प्यार में समाती जा रही हूँ...* अभी तक जिस भगवान को ढूंढ रही थी, दुनिया वाले जिसे अभी भी ढूंढ रहे हैं, अब मैं भाग्यशाली आत्मा उनकी गोद में बैठ उनकी पालना और शिक्षाएं ले रही हूँ... मीठे बाबा प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मुझे वरदानों, खजानों से भरपूर करते हैं... *मैं आत्मा बाबा का दिल से शुक्रिया करती हुई उनसे रूह-रिहान करती हूँ... बाबा मुझे अपनी श्रेष्ठ मत देकर श्रेष्ठ बनाते हैं...*

 

  *प्यार के मीठे तराने सुनाकर प्रेम रस में मुझे भिगोते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... साधारण मनुष्य मात्र से खुबसूरत देवताई राज्य भाग्य वाले... महानतम भाग्य को पा रहे हो... तो श्रीमत के हाथ को सदा थाम कर दिल से शुक्रिया के नगमे गुनगुनाते रहो... *सच्चे प्यार के सागर से हर पल प्रेम सुधा का रसपान करो... और रूहानी प्रेम की बदली बन विश्व धरा को सिक्त करो...."*

 

_ ➳  *प्यारे प्रभु का साथ पाकर उनके हाथों में हाथ डालकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपके सच्चे प्यार की चन्दन महक में खोयी सी विश्व धरा को प्रेम तरंगो से सराबोर कर रही हूँ... *श्रीमत के मखमली हाथो में बेफिक्र सी खुशियो के अनन्त आसमाँ में झूम रही हूँ... सच्चे प्रेम में खोकर मदमस्त हो गई हूँ..."*

 

  *प्यार के चन्दन से मेरे जीवन फुलवारी को महकाकर खुशियों से मेरी झोली भरते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... जिस ईश्वर पिता की खोज में दर दर भटक रहे थे... *आज उनकी फूलो सी गोद में देवताई स्वरूप को पा रहे हो... तो ऐसे मीठे बाबा पर दिल का सारा स्नेह उंडेल कर... सच्चे प्रेम का पर्याय बन जाओ... श्रीमत को दिल की गहराइयो से अपनाकर जीवन को सुखो के स्वर्ग में बदल दो..."*

 

_ ➳  *बाबा की श्रीमत पर चलते हुए दैवीय गुणों की धारणा करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आपकी बाँहों में अनन्त सुखो की हकदार हो गई हूँ... प्यारे बाबा सुख की एक बून्द को कभी व्याकुल *मै आत्मा,आज आपकी यादो में देवताओ सा निखर रही हूँ...मनुष्य मत पर पाये दुखो के दलदल से निकल श्रीमत से सम्पूर्ण सुखी हो गयी हूँ..."*

 

  *अपने पलकों पर बिठाकर मेरे भाग्य को संवारते हुए मीठे प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता मनुष्य से देवताओ सा श्रृंगार कर... स्वर्गधरा पर सजा रहे है... *ऐसे मीठे पिता का रोम रोम से शुक्रिया कर... सच्चे प्यार से दिल, सदा का आबाद करो... सच्ची मत को अपनाकर... दिव्यता से सम्पन्न हो, अनोखे सुखो को दामन में भर लो..."*

 

_ ➳  *बाबा के प्यार की लहरों में लहराती हुई स्वर्ग सुखों की अधिकारी बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... *मैं आत्मा किन शब्दों में आपकी दरियादिली का शुक्रिया करूँ... मीठे बाबा मेरे, मै आत्मा तो दुखो को ही अपनी तकदीर मान ली थी... आपने तो मुझे देवतुल्य बना दिया है...* और असीम मीठे सुखो से मेरा जीवन संवार दिया है..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कर्म, अकर्म और विकर्म की गुह्य गति को बुद्धि में रख अब कोई विकर्म नही करने है*

 

_ ➳ कर्मो की जिस गुह्य गति का ज्ञान भगवान से मुझे मिला है उस कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को बुद्धि में रख अब मुझे अपने हर कर्म पर अटेंशन देते हुए इस बात का पूरा ध्यान रखना है कि अनजाने में भी मुझ से ऐसा कोई कर्म ना हो जो विकर्म बने। *अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाने के लिए सबसे पहले मुझे अपने हर संकल्प को शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना है। और इसके लिये अपने प्यारे पिता की आज्ञाओं को अपने जीवन मे धारण कर कदम - कदम श्रीमत पर चलने का मुझे पूरा अटेंशन रखना है*। मन ही मन स्वयं से बातें करती मैं अपने आप से और अपने प्यारे बाबा से प्रोमिस करती हूँ कि बिना सोचे समझे कोई भी कर्म अब मैं कभी नही करूँगी। हर कर्म करने से पहले चेक करूँगी कि वो श्रीमत प्रमाण है या नही!

 

_ ➳  कर्म - अकर्म - विकर्म की गति को बुद्धि में रख अपने हर कर्म को श्रेष्ठ बनाने की प्रतिज्ञा अपने प्यारे पिता से करके अब मैं कर्मो की अति गुह्य गति का ज्ञान देने वाले ज्ञानसागर अपने शिव बाबा की अति मीठी याद में मन बुद्धि को स्थिर करके बैठ जाती हूँ और अपने मन बुद्धि का कनेक्शन परमधाम में रहने वाले अपने पिता से जोड़ लेती हूँ। *जैसे बिजली का स्विच ऑन करते ही सारे घर मे प्रकाश फैल जाता है ऐसे ही स्मृति का स्विच ऑन करते ही परमधाम से परमात्म शक्तियों की लाइट सीधी मुझ आत्मा के ऊपर पड़नी शुरू हो जाती है और मेरे चारों तरफ एक अद्भुत दिव्य अलौकिक प्रकाश फैल जाता है*। इस सतरंगी प्रकाश के खूबसूरत झरने के नीचे बैठी मैं महसूस करती हूँ जैसे धीरे - धीरे मैं शरीर के भान से मुक्त होकर एक बहुत ही न्यारी लाइट स्थिति में स्थित होती जा रही हैं। स्वयं को मैं बहुत ही हल्का अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  ये हल्केपन का निराला अनुभव मुझे देह के हर बंधन से मुक्त कर रहा है। देह रूपी डाली का आधार छोड़ मैं आत्मा पँछी बड़ी आसानी से ऊपर की ओर उड़ान भर रही हूँ और देह से निकल कर चमकती हुई अति सूक्ष्म ज्योति बन अपनी किरणों को बिखेरती हुई आकाश की ओर उड़ती जा रही हूँ। *देह और देह की इस साकारी दुनिया को पार कर, मैं आकाश से ऊपर अब फरिश्तों की आकारी दुनिया से होकर अपनी निराकारी दुनिया में पहुँच गई हूँ*। आत्माओं की इस निराकारी दुनिया अपने इस शान्तिधाम घर मे आकर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ। *कुछ क्षणों के लिए गहन शांति के गहरे अनुभवों में खोकर, अब मैं शांति के सागर, सुख के सागर, प्रेम और पवित्रता के सागर अपने पिता के पास पहुँच कर, मन बुद्धि के नेत्रों से उन्हें निहार रही हूँ*।

 

_ ➳  अपने पिता के अति सुन्दर मनभावन स्वरूप को मैं देख रही हूँ जो मेरे ही समान एक प्वाइंट ऑफ लाइट, एक अति सूक्ष्म बिंदु हैं किंतु गुणों में वो सिंधु हैं। उनके सानिध्य में, उनसे आ रही सर्वशक्तियों की किरणों के फव्वारे के नीचे बैठ मैं स्वयं को उनकी शक्तियों से भरपूर कर रही हूँ। *अपने परमधाम घर में अपने परमपिता परमात्मा शिव बाबा के सामने निराकारी, निर्विकारी और निर्संकल्प स्थिति में स्थित हो कर मैं गहन शांति का अनुभव कर रही हूँ*। बाबा से सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की अनन्त सतरंगी किरणे निकल कर मुझ आत्मा में समा रही हैं और मैं स्वयं में इन गुणों और शक्तियों को भरकर स्वयं को सर्वगुण और सर्वशक्तिसम्पन्न बना रही हूँ। *बीज रूप अवस्था की मैं गहन अनुभूति कर रही हूँ जो मुझे अतीन्द्रिय सुख प्रदान कर रही है*।

 

_ ➳  अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने का भरपूर आनन्द लेकर और शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित हो कर अब मैं पुनः लौट रही हूँ फिर से देहधारियों की साकारी दुनिया में। फिर से अपने साकार तन में, साकार दुनिया मे, साकार सम्बन्धो के बीच अपने ब्राह्मण स्वरुप में मैं स्थित होकर देह और देह की दुनिया मे फिर से अपना पार्ट बजा रही हूँ।*किन्तु देह और देहधारियों के बीच में रहते हुए भी अपने सत्य स्वरूप में टिक कर अपनी दिव्यता और रूहानियत का अनुभव करते हुए अब मैं उपराम स्थिति में स्थित होकर, कर्म - अकर्म - विकर्म की गुह्य गति को बुद्धि में रख कर ही हर कर्म कर रही हूँ*। कर्म - अकर्म - विकर्म की गति बुद्धि में रहने से अब हर कर्म मैं सोल कॉन्शियस होकर कर रही हूँ इसलिये मेरा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ बनता जा रहा है।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं अपनी पावरफुल स्थिति द्वारा मन्सा सेवा का सर्टिफिकेट प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं स्व अभ्यासी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा मनसा-वाचा-कर्मणा तीनों सेवाएं साथ-साथ करती हूँ  ।*

✺   *मैं समझदार आत्मा हूँ  ।*

✺   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  वह प्रकृति का खेल तो देख लिया। लेकिन बापदादा पूछते हैं कि आप लोगों ने सिर्फ प्रकृति का खेल देखा या अपने उड़ती कला के खेल में बिजी रहेया सिर्फ समाचार सुनते रहे? समाचार तो सब सुनना भी पड़ता है, परन्तु जितना समाचार सुनने में इन्ट्रेस्ट रहता है *उतना अपनी उड़ती कला की बाजी में रहने का इन्ट्रेस्ट रहाकई बच्चे गुप्त योगी भी हैंऐसे गुप्त योगी बच्चों को बापदादा की मदद भी बहुत मिली है और ऐसे बच्चे स्वयं भी अचलसाक्षी रहे और वायुमण्डल में भी समय पर सहयोग दिया।* जैसे स्थूल सहयोग देने वालेचाहे गवर्मेन्टचाहे आस-पास के लोग सहयोग देने के लिए तैयार हो जाते हैं,

 

 _ ➳  ऐसे *ब्राह्मण आत्माओं ने भी अपना सहयोग - शक्तिशान्ति देने कासुख देने का जो ईश्वरीय श्रेष्ठ कार्य हैवह किया?* जैसे वह गवर्मेन्ट ने यह कियाफलाने देश ने यह किया... फौरन ही अनाउन्समेंट करने लग जाते हैंतो बापदादा पूछते हैं - आप ब्राह्मणों ने भी अपना यह कार्य किया? *आपको भी अलर्ट होना चाहिए। स्थूल सहयोग देना यह भी आवश्यक होता हैइसमें बापदादा मना नहीं करते लेकिन जो ब्राह्मण आत्माओं का विशेष कार्य हैजो और कोई सहयोग नहीं दे सकता* ऐसा सहयोग अलर्ट होके आपने दियादेना है ना! या सिर्फ उन्हों को वस्त्र चाहिएअनाज चाहिए? *लेकिन पहले तो मन में शान्ति चाहिएसामना करने की शक्ति चाहिए। तो स्थूल के साथ सूक्ष्म सहयोग ब्राह्मण ही दे सकते हैं* और कोई नहीं दे सकता है। तो यह कुछ भी नहीं है, *यह तो रिहर्सल है। रीयल तो आने वाला है। उसकी रिहर्सल आपको भी बाप या समय करा रहा है।*

 

✺   *ड्रिल :-  "प्राकृतिक हलचल के समय स्थूल के साथ सूक्ष्म शक्तियों के सहयोग देने का अनुभव"*

 

 _ ➳  *भृकुटि की गुफा में बैठी मैं महातेजस्वी, परम पवित्र अति तेजोमय स्वराज अधिकारी आत्मा हूँ... तपस्वियों में अति श्रेष्ठ तपस्वी मैं आत्मा हूँ...* देख रही और महसूस कर रही हूँ... मैं आत्मा अपने इस महान तेजस्वी स्वरूप को बहुत गहराई से... कितना तेजस्वी मुझ आत्मा का यह स्वरूप है... जैसे प्रकाश की एक तेजोमय दिव्य किरण हो... *देख रही हूँ मैं आत्मा स्वयं को त्याग और तपस्या की अति श्रेष्ठ पवित्र भूमि मधुबन घर में, शांतिवन बाबा के कमरे में बैठे हूए...* संध्या का यह समय है... अपने निराकारी तेजोमय स्वरूप में स्थित मैं तेजोमय आत्मा गहराई से अपने स्वरूप का अनुभव करते हुए एक शिव पिता की याद में स्थित हो जाती हूँ... देख रही हूं बाबा से अनंत शक्तियों की अविरल धाराएं मुझ पर गिर रही है... मैं आत्मा वरदानों और शक्तियों से भरपूर होती जा रही हूँ... अनुभव हो रहा है जैसे इस देह में होते भी इसमें नहीं हूँ... *देह भान से मैं आत्मा ऊपर उठ चुकी हूँ... एक शक्तिशाली स्थिति का अनुभव मैं आत्मा कर रही हूँ...* और मुझ से ये शकितयों की किरणें चारों ओर फैल रही है...

 

 _ ➳  तभी एकाएक कुछ दृश्य मुझ आत्मा के सामने आते है... *कुछ आवाजें कानों में गुंजने लगती है... हमें बचाओं... कोई तो हमारी मदद करों...* और एक दर्दनाक दृश्य मुझ आत्मा के सामने उभरता है... भूकम्प, बाढ, चक्रवात के कारण कुछ जगह पर भारी नुकसान हुआ है... लोग यहाँ वहाँ भाग रहे है... अपने परिजनों को ढूंढ रहे है... खून से लथपथ लाशें यहाँ वहाँ गिरी है... सबकी आँखों में दर्द है... लोग यहाँ-वहाँ भाग रहे है... और *तभी कुछ लोग उनकी मदद के लिए आ रहे है...* तभी ये दृश्य गायब हो जाता हैं... और *ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे बाबा कह रहे हो बच्चे इन आत्माओं को स्थूल के साथ सुक्ष्म शक्तियों का भी सहयोग दो...* इनकों शांति दो... मैं आत्मा बिना देरी किए अपनी सूक्ष्म लाइट की ड्रेस धारण कर, अपना श्रेष्ठ ईश्वरीय कार्य (सुख, शांति देने ) करने उस स्थान पर पहुंच जाता हूँ... देख रहा हूँ... चारों तरफ यही समाचार फैला हुआ हैं... *और अन्य जगह से लोग यहाँ मदद देने के लिए आ रही है...* गवर्नमेंट भी स्थूल सहयोग अनाज कपड़ा, दवाएं पहुंचा रही है... *आपदा ग्रसित आत्माओं को स्थूल साधनों द्वारा मदद मिल रही है...*

 

 _ ➳  *लेकिन फिर भी प्राकृतिक आपदाओं से ग्रसित आत्माओं की आखों में आँसू और दर्द है... बेचैनी है... अन्दर से बेहद अशांत है...* उनकी नजरें ये दर्दनाक मंजर देखकर काँप उठी है... लेकिन *मैं आत्मा ये प्रकृति का खेल साक्षी होकर देख रही हूँ... एक अचल अवस्था में...* और अब मैं श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा अनुभव कर रहा हूँ स्वयं को बाबा की छत्रछाया के नीचे, बाबा से निकलती सुख, शांति की किरणें मुझ फरिशते पर पड़ रही है और *मुझ आत्मा से ये सुख, शांति की किरणें इन सभी आपदा से ग्रसित आत्माओं पर और प्रकृति को जा रही है...* मेरे साथ और भी ब्राह्मण आत्माएं फरिशता ड्रेस धारण कर इन सभी आत्माओं को शांति की किरणों द्वारा सहयोग दे रही है... जैसे-जैसे ये किरणें इन आत्माओं पर पड़ रही है... *इन आत्माओं का मन शांत हो रहा है... इनके अन्दर सामना करने की शक्ति आ गई है... ये आत्माएँ मजबूत बन रही है... इनकी सारी हलचल समाप्त हो गई है...* अब ये आत्माएँ दर्द से बाहर निकल गई है... और मानसिक तौर पर मजबूत हो गई है... और अब प्रकृति की हलचल भी समाप्त हो गई है... चारों तरफ शांति हो गई है... आपदा से ग्रसित आत्माएँ भी हल्का अनुभव कर रही है...  *स्थूल के साथ अब इन आत्माओं को सूक्ष्म में भी सहयोग मिल रहा है...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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