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 19 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *पढाई के समय बहाना तो नहीं दिया ?*

 

➢➢ *"मेरा तो एक शिवबाबा... दूसरा ना कोई" - यह पाठ पक्का किया ?*

 

➢➢ *सदा एक बाप के स्नेह में समाये रहे ?*

 

➢➢ *हद के मान शान के पीछे दौड़ लगाने की बजाये स्वमान में स्थित रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे लाइट के कनेक्शन से बड़ी-बड़ी मशीनरी चलती है। आप सभी हर कर्म करते कनेक्शन के आधार से स्वयं भी डबल लाइट बन चलते रहो। *जहाँ डबल लाइट की स्थिति है वहाँ मेहनत और मुश्किल शब्द समाप्त हो जाता है। अपनेपन को समाप्त कर ट्रस्टीपन का भाव और ईश्वरीय सेवा की भावना हो तो डबल लाइट बन जायेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विशेष आत्मा हूँ"*

 

〰✧  सदा यह नशा रहता है कि हम विशेष आत्मायें हैं? *तो गाया हुआ है कोटों में कोई, कोई में भी कोई तो पहले सुनते थे लेकिन अभी अनुभव कर रहे हो कि हम ही कोटों में कोई आत्मायें थी और हैं और सदा बनेंगी। कभी सोचा था कि इतना विशेष पार्ट इस ड्रामा के अन्दर हमारा नूँधा हुआ है!* लेकिन अभी प्रैक्टिकल में अनुभव कर रहे हो।

 

  पक्का निश्चय है ना। कल्प-कल्प कौन बनता है? क्या कहेंगे? *हम ही थे, हम ही हैं और हम ही रहेंगे। तीनों काल का ज्ञान अभी आ गया है। त्रिकालदर्शी बन गये ना। एक सेकेण्ड में तीनों काल को देख सकते हो? क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे-स्पष्ट है ना। कल पुजारी, आज पूज्य बन रहे हैं। जब त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित होते हो तो कितना मजा आता है।* जैसे कोई भी देश में जब टॉप पॉइंट पर खड़े होकर सारे शहर को देखते हैं तो मजा आता है ना। ऐसे ही यह संगमयुग टॉप पॉइंट है तो इस पर खड़े होकर देखो तो मजा आयेगा। कल थे और कल बनने वाले हैं। इतना स्पष्ट अनुभव होता है? कल क्या बनने वाले हो? देवता। कितने बार बने हो? अनेक बार बने हो।

 

  तो कितना सहज और स्पष्ट हो गया। फलक से कहते हो ना-हम ही तो थे और कौन होंगे। *अभी तो यही दिल कहता है ना कि और कौन बनेगा, हम थे, हम ही बन रहे हैं इसको कहते हैं मास्टर नॉलेजफुल। फुल नॉलेज आ गई है ना। एक काल की नहीं, तीनों काल की।* तो जैसे बाप नॉलेजफुल है, बाप की महिमा में फुल के कारण सागर कहते हैं। सागर सदा फुल रहता है। तो नॉलेजफुल बन गये। एक काल के भी ज्ञान की कमी नहीं। भरपूर। इतना नशा है?

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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सदा फॉलो फादर करने के लिए अपनी बुद्धि को दो स्थितियों में स्थित रखो। *बाप को फॉलो करने की स्थिति है - सदा अशरीरी भव। विदेही भव, निराकारी भवा दाता अर्थात ब्रह्मा बाप को फॉलो करने के लिए सदा अव्यक्त स्थिति भव, फरिश्ता स्वरूप भव, आकारी स्थिति भव इन दोनों स्थिति में स्थित रहना फॉलो फादर बनना है।* इससे नीचे व्यक्त भाव - नीचे ले आने का आधार है। इसलिए सबसे परे इन दो स्थितियों में सदा रहो। तीसरी के लिए ब्राह्मण जन्म होते ही बापदादा की शिक्षा मिली हुई है कि इस गिरावट की स्थिति में संकल्प से वा स्वप्न में भी नहीं जाना। यह पराई स्थिति है। जैसे अगर कोई बिना आज्ञा के परदेश चला जाए तो क्या होगा? बापदादा ने भी यह आज्ञा की लकीर खींच दी है। इससे बाहर नहीं जाना है। अगर अवज्ञा करते हैं तो परेशान भी होते हैं। पश्चाताप भी करते हैं। इसलिए सदा शान में रहने का, सदा प्राप्ति स्वरूप स्थिति में स्थित होने का सहज साधन है - 'फॉलो फादर"।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *तो जहाँ खुशी नहीं, वहाँ उमंग-उत्साह नहीं होता और योग लगाते भी अपने से सन्तुष्ट नहीं होते,* थके हुए रहते है। सदा सोच की मूड में रहते, सोचते ही रहते। *खुशी क्यों नहीं आती, इसका भी कारण है। क्योंकि सिर्फ यह सोचते हो कि मैं आत्मा हूँ,* बिन्दु हूँ, ज्योतिस्वरूप हूँ, बाप भी ऐसा ही है। *लेकिन मैं कौन-सी आत्मा हूँ। मुझ आत्मा की विशेषता क्या है?* जैसे मैं पद्मापद्म भाग्यवान आत्मा हूँ, मैं आदि रचना वाली आत्मा हूँ, मैं बाप के दिलतख्तनशीन होने वाली आत्मा हूँ। *यह विशेषतायें जो खुशी दिलाती हैं, वह नहीं सोचते हो।* सिर्फ बिन्दी हूँ, शान्तस्वरूप हूँ - तो निल में चले जाते हो। इसलिए माथा भारी हो जाता हैं।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  ज्ञान को बुद्धि में रख सदा हर्षित रहना"*

 

_ ➳  एक खुबसूरत पहाड़ी पर बैठकर... पहाड़ो के सौंदर्य को निहारते हुए मै आत्मा... पहाड़ो की ऊंचाई देख... *अपनी ज्ञान की ऊँची अवस्था... और ऊँचा उठाने वाले मीठे बाबा को याद करती हूँ..*. और सोचके आनन्दित हो रही हूँ... कि कितना प्यारा भाग्य मुझ आत्मा ने पाया है... भगवान जीवन में शिक्षक बनकर... कितनी ऊँची तालीम से मुझे सजा रहा है... *देह की हदो से निकाल मुझे बेहद में बसा रहा है.*.. इन सुंदर पहाड़ो की तरहा मै आत्मा... विश्व जगत में अनोखी बनकर शान से मुस्करा रही हूँ... और मीठे बाबा को यादो में दिल से शुक्रिया कहती हूँ...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपने मीठे सुखो की याद दिलाते हुए कहते है;-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *अपने सच्चे सहारे मीठे बाबा को शिक्षक रूप में पाकर बेहद को जानने वाले मा त्रिकालदर्शी बन मुस्करा रहे हो.*.. विश्व के आदि मध्य अंत को जानने वाले ज्ञान की रौशनी से प्रकाशित हो... ऐसे मीठे भाग्य मे सदा आनन्दित रहो...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान धन को दिल में समाते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे मेरे बाबा... मै आत्मा अज्ञान के अंधेरो में और दुखो के जंगल में भटक रही थी... *आपने मुझे ढूंढ कर अपना बच्चा बनाया है... और देवताई राज्यभाग्य से मेरा दामन सजाया है..*. मै आत्मा इन मीठी खुशियो में झूम रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को सच्ची खुशियो से सजाकर अपने भाग्य का नशा दिलाते हुए कहते है ;-* "मीठे लाडले बच्चे... *कितना प्यारा और खुबसूरत सा भाग्य है... कि तीनो कालो तीनो लोको को जानने वाले, मा नॉलेजफुल बन मुस्करा रहे हो.*.. दुनिया किन अंधेरो में जी रही... और आप ज्ञान की चमक से सुखो भरे उजालो में आ गए हो...

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को टीचर रूप में पाकर अपने भाग्य पर पुलकित होते हुए मीठे बाबा से कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा देह के अँधेरे में खुद को भी खो गयी थी... *आपने मेरा सच्चा वजूद याद दिलाकर, मुझे सारे भ्रमो से मुक्त कर दिया है.*.. मुझे अपनी खोयी चमक से पुनः सजा दिया है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को ज्ञान रत्नों की माला से सजाकर कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... *देह की हदो से निकलकर, विश्व जगत को जानने वाले मा ज्ञान सागर बनकर मुस्करा रहे हो..*. ज्ञान रत्नों को सदा बुद्धि में गिनकर ख़ुशी में नाचते रहो... ईश्वरीय खजानो को पाने वाले मालामाल हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की खानों की मालिक बनकर ख़ुशी में झूमते हुए कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे बाबा मेरे... *आपने जीवन में आकर जीवन को खुशियो का मधुमास बनाया है..*.मै आत्मा आज देह के, दुखो के, सारे कष्टो को भूल अलौकिक आनन्द में मगन हूँ... और सच्चे ज्ञान को पाकर सदा के लिए हर्षित हूँ..."प्यारे बाबा को अपने खुशनुमा जीवन की कहानी सुनाकर मै आत्मा... अपने धरातल पर आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक बाप की अव्यभिचारी याद में रह आत्मा को सतोप्रधान बनाना है*"

 

_ ➳  सोने में पड़ी हुई खाद को निकालने के किये एक सुनार उसे अग्नि में कितनी अच्छी तरह तपाता है। ठीक उसी प्रकार मुझ आत्मा के ऊपर 63 जन्मो के विकारों की जो कट चढ़ चुकी है उसे भस्म करने के लिए उसे भी तो योग अग्नि में तपाना बहुत जरूरी है और यह *योग अग्नि तभी प्रज्ज्वलित होगी जब सिवाय एक पतित पावन बाप की याद के और कोई की याद मन मे नही होगी। केवल एक बाबा की अव्यभिचारी याद ही, आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जला कर भस्म कर सकती है* और आत्मा को सम्पूर्ण पावन, सतोप्रधान बना सकती है। ये सब बातें मैं मन ही मन में सोच रही हूं।

 

_ ➳  इन बातों पर विचार करते करते मैं अशरीरी स्थिति में स्थित हो जैसे ही अपने शिव पिता परमात्मा की अव्यभिचारी याद में बैठती हूँ मैं डीप साइलेन्स में पहुंच जाती हूँ। इस स्थिति में स्थित होते ही देह, देह से जुड़ी हर वस्तु से मैं स्वयं को पूर्णतया मुक्त अनुभव करने लगती हूं और *इसी विमुक्त अवस्था में मैं स्वयं को विदेही, निराकार और मास्टर बीज रुप स्थिति में अपने बीच रुप परम पिता परमात्मा, संपूर्णता के सागर, पवित्रता के सागर, सर्वगुण और सर्व शक्तियों के अखुट भंडार, ज्ञान सागर, पारसनाथ बाप के सामने परमधाम में पाती हूँ*। उनसे आ रही अनन्त शक्तियों की किरणों से उतपन्न होने वाली योग अग्नि में अब मुझ आत्मा के विकर्म विनाश हो रहें हैं और मैं सम्पूर्ण पावन सतोप्रधान बन रही हूं।

 

_ ➳  अपने इसी अनादि सतोप्रधान स्वरुप में मैं आत्मा परमधाम से अब नीचे आ जाती हूं। संपूर्ण सतोप्रधान देह धारण कर नई सतोप्रधान दुनिया में मैं प्रवेश करती हूं। *संपूर्ण सतोप्रधान चोले में अवतरित देवकुल की सर्वश्रेष्ठ आत्मा के रुप में इस सृष्टि चक्र पर मेरा पार्ट आरंभ होता है*। अब मैं आत्मा अपने पूज्य स्वरूप का अनुभव कर रही हूं। मैं देख रही हूं मंदिरों में, शिवालयों में भक्त गण मेरी भव्य प्रतिमा स्थापन कर रहे हैं। मेरी जड़ प्रतिमा से भी शांति, शक्ति और प्रेम की किरणे निकल रहीं हैं जो मेरे भक्तों को तृप्त कर रही हैं।

 

_ ➳  अपने देवताई और पूज्य स्वरूप का आनन्द ले कर अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होती हूँ। इस स्वरूप में टिकते ही अपने ब्राह्मण जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों की स्मृति मुझे आनन्द विभोर कर देती है। इस बात की स्मृति आते ही अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य पर मुझे नाज़ होता है कि *मेरा यह दिव्य आलौकिक जन्म स्वयं परमपिता परमात्मा शिव बाबा के कमल मुख द्वारा हुआ है*। स्वयं परमात्मा ने मुझे कोटों में से चुन कर अपना बनाया है। तो अब मेरा भी यह फर्ज बनता है कि अपने प्यारे मीठे बाबा की श्रीमत पर चल कर मैं ब्राह्मण सो फ़रिशता बनने का पार्ट जल्दी ही समाप्त करूँ ताकि इस पार्ट को पूरा करके अति शीघ्र उसी सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था को प्राप्त कर, अपने धाम वापिस लौट सकूं जिस सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था मे मैं आत्मा इस सृष्टि पर पार्ट बजाने आई थी।

 

_ ➳  इसलिये एक बाप की अव्यभिचारी याद में रह, आत्मा को सम्पूर्ण सतोप्रधान बनाने के लिए अब मैं अपने परमप्रिय परम पिता परमात्मा के प्रेम को ढाल बना कर, आसुरी दुनिया मे रहते हुए भी आसुरी सम्बन्धो के लगाव, झुकाव और टकराव से स्वयं को मुक्त कर रही हूं। *देह और देह की दुनिया मे रहते हुए भी मैं जैसे इस दुनिया मे नही हूँ। मैं आत्मा हूँ, परमपिता परमात्मा की अजर, अमर, अविनाशी सन्तान हूँ और मेरे सर्व सम्बन्ध एक के ही साथ हैं, इसी स्मृति में निरन्तर रह कर अब मैं आत्मा किसी भी देहधारी के नाम रूप में ना फंस कर, केवल पतित पावन अपने परम पिता परमात्मा की याद में रह स्वयं को पावन बना रही हूं*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं सदा एक बाप के स्नेह में समायी हुई आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व प्राप्तियों में सम्पन्न और सन्तुष्ट आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हद के मान-शान के पीछे दौड़ लगाने से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं सदा स्वमानधारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदैव श्रेष्ठ शान में रहती हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  कोई भी इच्छा होगी तो अच्छा बनने नहीं देगी। या इच्छा पूर्ण करो या अच्छा बनो। आपके हाथ में है। और देखा जाता है कि ये इच्छा ऐसी चीज है जैसे धूप में आप चलते हो तो आपकी परछाई आगे जाती है और आप उसको पकड़ने की कोशिश करोतो पकड़ी जाएगी? और आप पीठ करके आ जाओ तो वो परछाई कहाँ जायेगीआपके पीछे-पीछे आयेगी। तो *इच्छा अपने तरफ आकर्षित कर रुलाने वाली है और इच्छा को छोड़ दो तो इच्छा आपके  पीछे-पीछे आयेगी।*

➳ _ ➳  *मांगने वाला कभी भी सम्पन्न नहीं बन सकता। और कुछ नहीं मांगते हो लेकिन रायल मांग तो बहुत है।* जानते हो ना-रायल मांग क्या हैअल्पकाल का कुछ नाम मिल जायेकुछ शान मिल जायेकभी हमारा भी नाम विशेष आत्माओं में आ जायेहम भी बड़े भाइयों में गिने जायेंहम भी बड़ी बहनों में गिने जायें, आखिर हमको भी तो चांस मिलना चाहिए।

➳ _ ➳  लेकिन *जब तक मंगता हो तब तक कभी खुशी के खजाने से सम्पन्न नहीं हो सकते।* ये मांग के पीछे या कोई भी हद की इच्छाओं के पीछे भागना ऐसे ही समझो जैसे मृगतृष्णा है। इससे सदा ही बचकर रहो। छोटा रहना कोई खराब बात नहीं है। *छोटे शुभान अल्लाह हैं। क्योंकि बापदादा के दिल पर नम्बर आगे हैं।*

✺   *ड्रिल :-  "हद की इच्छाओं की मृगतृष्णा से मुक्त होने का अनुभव"*

➳ _ ➳  मैं आत्मा फरिश्ता स्वरुप की चमकीली ड्रेस पहनकर पहुंच जाती हूँ सूक्ष्मवतन में... जहां मेरे प्यारे बापदादा बड़े प्यार से मुझे बुला रहे हैं... *मैं फरिश्ता बापदादा की बाहों में समा जाती हूँ... बापदादा गुणों और शक्तियों से मेरा श्रृंगार कर रहे हैं... अब बापदादा मेरा हाथ पकड़कर मुझे सैर पर ले जा रहे हैं...* मैं बाबा की किरणें सारे विश्व में फैला रही हूँ... मीठे बापदादा मुझे कभी पहाड़ों पर ले जाते हैं... कभी लहलहाते खेतों में... कभी मैदान में तो कभी रेगिस्तान में...

➳ _ ➳  अचानक मेरी नजर रेगिस्तान में चलते हुए उन यात्रियों की ओर जाती है... जो प्यास से बेहाल हैं... सूरज की चमकती किरणें जैसे जैसे रेत पर पड़ती है... तो उन्हें वहां पानी होने का भ्रम होता है और वे पथिक... उस ओर भागते चले जा रहे हैं... जहां पहुंचकर उन्हें सिर्फ निराशा हाथ लगती है...  तभी *कुछ दूरी पर आगे पानी होने का वही भ्रम होता है... और निराशा भरी भाग-दौड़ का सिलसिला चलता रहता है*...

➳ _ ➳  मैं फरिश्ता चिंतन करती हूँ कि... मेरा मन भी तो इच्छाओं रूपी मृगतृष्णा में इसी तरह से भटक रहा था... इच्छाओं की गुलाम होकर मैं आत्मा भी इसी तरह से कष्ट पा रही थी... फिर *बाबा का मीठा ज्ञान सुनकर... उनका प्यार भरा हाथ अपने सिर पर पा कर... मैं आत्मा इच्छाओं की गुलामी से मुक्त होती जा रही हूँ... मैं आत्मा मन का मालिक बनती जा रही हूँ...* अंतहीन इच्छाओं के पीछे भागना तो ऐसे ही हो रहा था जैसे कि... मैं आत्मा अपनी परछाई को पकड़ने की नाकाम कोशिश कर रही थी...

➳ _ ➳  इच्छाओं की भागमभाग में कभी स्व पर ध्यान ही नहीं दिया था लेकिन... अब मैं आत्मा स्व पुरुषार्थ पर ध्यान दे रही हूँ... इच्छाओं के, आसक्तियों के बंधनों से मुक्त होती जा रही हूँ... *मैं आत्मा स्थूल इच्छाओं से स्वयं को मुक्त करती जा रही हूँ... साथ ही स्व चेकिंग के द्वारा हर प्रकार की रॉयल, सूक्ष्म इच्छाओं से भी... मुक्त होती जा रही हूँ... हद के नाम मान शान की... रॉयल कामनाओं का भी त्याग करती जा रही हूँ*...

➳ _ ➳  मैं आत्मा दाता पिता की संतान हूँ... *मैं सब प्रकार के रॉयल भिखारीपन से मुक्त हूँ... मैं आत्मा ईश्वरीय खजानों से, खुशी के खज़ाने से संपन्न हूँ*... मैं आत्मा पूरी तरह संतुष्ट हूँ... तृप्त हूँ... सदा ईश्वरीय नशे और ख़ुमारी में मगन हूँ... बापदादा के स्नेह में समाकर उनके विशेष स्नेह का अनुभव कर रही हूँ... बापदादा के दिलतख्त पर स्थित होकर अपने श्रेष्ठ भाग्य का अनुभव कर रही हूँ...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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