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 19 / 10 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *अपनी एम ऑब्जेक्ट सदा याद रखी ?*

 

➢➢ *अविनाशी ज्ञान रत्नों के जोहरी बनकर रहे ?*

 

➢➢ *अशरीरी पन के इंजेक्शन द्वारा मन को कण्ट्रोल किया ?*

 

➢➢ *अपने पूर्वज स्वरुप को स्मृति में रकः सर्व आत्माओं पर रहम किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे साकार में आने जाने की सहज प्रैक्टिस हो गई है वैसे आत्मा को अपनी कर्मातीत अवस्था में रहने की भी प्रैक्टिस हो। अभी-अभी कर्मयोगी बन कर्म में आना, कर्म समाप्त हुआ फिर कर्मातीत अवस्था में रहना, इसका अनुभव सहज होता जाए। *सदा लक्ष्य रहे कि कर्मातीत अवस्था में रहना है, निमित्त मात्र कर्म करने के लिए कर्मयोगी बने फिर कर्मातीत।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं अनेक बार की विजयी आत्मा हूँ"*

 

  अनेक बार की विजयी आत्मायें हैं, ऐसा अनुभव करते हो? विजयी बनना मुश्किल लगता है या सहज? *क्योंकि जो सहज बात होती है वह सदा हो सकती है, मुश्किल बात सदा नहीं होती। जो अनेक बार कार्य किया हुआ होता है, वह स्वत: ही सहज हो जाता है। कभी कोई नया काम किया जाता है तो पहले मुश्किल लगता है लेकिन जब कर लिया जाता है तो वही मुश्किल काम सहज लगता है।*

 

  तो आप सभी इस एक बार के विजयी नहीं हो, अनेक बार के विजयी हो। *अनेक बार के विजयी अर्थात् सदा सहज विजय का अनुभव करने वाले। जो सहज विजयी हैं उनको हर कदम में ऐसे ही अनुभव होता कि यह सब कार्य हुए ही पड़े हैं, हर कदम में विजयी हुई पड़ी है। होगी या नहीं - यह संकल्प भी नहीं उठ सकता।* जब निश्चय है कि अनेक बार के विजयी हैं तो होगी या नहीं होगी - यह क्वेश्चन नहीं। 'निश्चय की निशानी है नशा और नशे की निशानी है खुशी'। जिसको नशा होगा वह सदा खुशी में रहेगा। हद के विजयी में भी कितनी खुशी होती है। जब भी कहाँ विजय प्राप्त करते हैं, तो बाजे-गाजे बजाते हैं ना।

 

  तो जिसको निश्चय और नशा है तो खुशी जरूर होगी। वह सदा खुशी में नाचता रहेगा। शरीर से तो कोई नाच सकते हैं, कोई नहीं भी नाच सकते हैं लेकिन मन में खुशी का नाचना - यह तो बेड पर बीमार भी नाच सकता है। कोई भी हो, यह नाचना सबके लिए सहज है। *क्योंकि विजयी होना अर्थात् स्वत: खुशी के बाजे बजना। जब बाजे बजते हैं तो पांव आपेही चलते रहते हैं। जो नहीं भी जानते होंगे, वह भी बैठे-बैठे नाचते रहेंगे। पांव हिलेगा, कांध हिलेगा। तो आप सभी अनेक बार के विजयी हो - इसी खुशी में सदा आगे बढ़ते चलो।* दुनिया में सबको आवश्यकता ही है खुशी की। चाहे सब प्राप्तियां हों लेकिन खुशी की प्राप्ति नहीं है। तो जो अविनाशी खुशी की आवश्यकता दुनिया को है, वह खुशी सदा बांटते रहो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  ज्ञानी तू आत्मा हो ना? ज्ञानी का अर्थ ही है समझदारा और आप तो तीनों कालों के समझदार हो, इसलिए *होली मनाना अर्थात इस गलती को जलाना।* जो भूलना है वह सेकण्ड में भूल जाये और जो याद करना है वह सेकण्ड में याद आए। कारण सिर्फ बिन्दी के बजाए क्वेचन मार्क है।

 

✧  क्यों सोचा और क्यू शुरू हो जाती है। ऐसा, वैसा, क्यों, क्या बडी क्यू शुरू हो जाती है। सिर्फ क्वेचन मार्क लगाने से। और बिन्दी लगा दो तो क्या होगा? *आप भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और व्यर्थ को भी बिन्दी, फुलस्टॉप स्टॉप भी नहीं, फुलस्टॉप।* इसको कहा जाता है होली।

 

✧  और इस होली से सदा बाप के संग के रंग की होली, मिलन मानते रहेंगे। सबसे पक्का रंग कौन-सा है? यह स्थूल रंग भल कितने भी पक्के हो लेकिन *सबसे पक्का रंग है बाप के संग का रंगा तो इस रंग से मनाओ।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ बापदादा ने पहले भी समझाया है कि मुख्य ब्राह्मण जीवन के खज़ाने हैं- संकल्प, समय और वैसे श्वाँस भी बहुत अमूल्य है। एक श्वाँस भी कामन न हो। व्यर्थ नहीं हो। भक्ति में कहते हैं श्वाँसों-श्वाँस अपने इष्ट को याद करो। श्वाँस व्यर्थ नहीं जाये। *मुख्य संकल्प, समय और श्वाँस - आज्ञा प्रमाण सफल होता है? व्यर्थ तो नहीं जाता क्योंकि व्यर्थ जाने से जमा नहीं होता।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बहुत-बहुत साधारण रहना"*

 

_ ➳  प्रकृति का खुबसूरत उपहार.. गंगा नदी के किनारे टहलते टहलते... मै आत्मा ईश्वरीय चिंतन में मगन हूँ... और अपने ज्ञान गंगा बनने के मीठे भाग्य पर पुलकित हूँ... कैसे यह साधारण जीवन ईश्वरीय हाथो में श्रेष्ठ कृति बन रहा है... इस चिंतन में, मीठे बाबा कलाकार की मीठी यादो में डूब जाती हूँ... मीठे बाबा मुझ आत्मा के यादो के पल्लू से सदा बंधे, सम्मुख हाजिर हो गए है... *अपने कौड़ी से जीवन को हीरों से सजाते देख, मै आत्मा जादूगर पिता का,भीगी पलको से शुक्रिया किये जा रही हूँ.*..

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा की ज्ञान धन से लबालब करते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वर पिता को पाकर, महान भाग्य की बदौलत, *सेकण्ड में ईश्वरीय खजानो के मालिक बनते हो... और जीवन मुक्ति का वर्सा पाकर मुस्कराते हो*... सारा संसार ईश्वर के दर्शन मात्र को तरसता है... और आप सहज ही सारी दौलत को बाँहों में भरकर मुस्कराते हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के ज्ञान रत्नों को अपनी झोली में समेटते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा सुख और वेभवो के पीछे भटककर सांसो को यूँ ही व्यर्थ गंवा रही थी... कि मेरे *ईश्वरीय भाग्य के जादू ने आपकी दौलत का वारिस बनाकर*... मुझे सुखो की महारानी बना दिया है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपनी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बनाते हुए पुनः बोले :-* "मीठे लाडले बच्चे... कितने सुंदर भाग्य से सजे हुए महान आत्मा हो... *कि बिना एक कौड़ी खर्च के विश्व की बादशाही को पाकर सच्ची मुस्कान से सजे हो*... अपने इस महान भाग्य की ख़ुशी और नशे में झूम जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा को रोम रोम से शुक्रिया कर रही हूँ और कह रही हूँ :-* " मीठे मीठे बाबा मेरे... सुखो की बून्द को भी कभी तरसती मै आत्मा... *आज आपकी यादो में अनन्त सुखो की मल्लिका बन रही हूँ.*.. जनमो ईश्वर की आराधना कर रही थी... आज आपको सम्मुख पाकर अपने मीठे भाग्य पर बलिहार हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा में मेरे मीठे भाग्य के नशे को जगाते हुए कह रहे है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता की मीठी यादो में खोकर... असीम सुखो की जन्नत को अपना राज्य बनाओ... *अपने महानतम भाग्य के नशे में डूबे हुए ईश्वरीय खजाने को गिनते रहो..*. कहाँ दर दर भटक रहे थे, आज गोद में फूलो सा खिल रहे हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा खुशियो में चहकते हुए मीठे बाबा से कहती हूँ :-* "प्राणप्रिय बाबा मेरे... मै आत्मा कितने तीर्थ, कितनी यात्राओ में शरीर को थकाती व्याकुल हो... आपको खोज रही थी... आप यूँ आएंगे और साथ ही जीवन मुक्ति के भाग्य से मुझे सजायेंगे... यह तो कल्पनाओ से भी परे था... " भगवान को अपनी खुशियो भरी दास्ताँ सुनाकर... मै आत्मा सृष्टि पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बुद्धि में सदा अपनी एम ऑब्जेक्ट याद रखनी है*

 

_ ➳  अपनी एम ऑब्जेक्ट लक्ष्मी नारायण के चित्र के सामने बैठी, उनके अनुपम सौंदर्य को देख मैं मन ही मन हर्षित हो रही हूँ और मंत्रमुग्ध होकर उनके इस अनुपम सौंदर्य को निहारते हुए अपने आप से बातें कर रही हूँ कि कितनी कशिश है इन चित्रों में, जो देखने वाले को अपनी और आकर्षित कर लेते हैं और मन करता है कि बस इनके सामने बैठ इन्हें निहारते ही रहें। *मन को कितना सुकून देती है इनके चेहरे की दिव्य मुस्कराहट, रूहानियत से छलकते नयन और अपने भक्तों की हर इच्छा, हर मनोकामना को पूर्ण करते इनके वरदानी हस्त। दिव्य गुणों से सजे इन लक्ष्मी नारायण जैसा बनना ही मेरी ऐम ऑब्जेक्ट है और इस एम ऑब्जेक्ट को सदा स्मृति में रखते हुए अब मुझे अपने अंदर इनके समान गुणों और विशेषताओ को स्वयं में धारण करने का ही पुरुषार्थ करना है*। 

 

_ ➳  मन को दृढ़ता के साथ यह संकल्प देकर, अब मैं लक्ष्मी नारायण को ऐसा बनाने वाले अपने प्यारे पिता को याद करती हूँ और अपने मन बुद्धि को सभी बातों के चिंतन से हटाकर, अशरीरी स्थिति में स्थित होने का अभ्यास करते हुए पहुँच जाती हूँ अंतर्मुखता की गुफा में। *एकान्तवासी बन एक की याद को अपने मन मे बसाये मैं चल पड़ती हुई अंतर्मन की एक बहुत ही खूबसूरत रूहानी यात्रा पर जो बहुत ही आनन्द और सुख देने वाली है। मन बुद्धि की इस यात्रा पर मैं आत्मा ज्योति बन कर एक अति सूक्ष्म सितारे की भांति चमकती हुई, नश्वर देह का त्याग करके ऊपर खुले आसमान की ओर उड़ जाती हूँ*। प्रकृति के सुंदर नजारों का आनन्द लेती मैं आत्मा खुले आसमान की सैर करते अब उसे पार कर अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त वतन में प्रवेश करती हूँ। सफेद प्रकाश से सजी फरिश्तो की इस दुनिया में पहुँच कर अपने फरिश्ता स्वरूप को मैं धारण करती हूँ।

 

_ ➳  अपने लाइट माइट स्वरूप में स्थित होकर, अपनी इस आकारी दुनिया की सैर करते हुए, इस अव्यक्त वतन के सुन्दर नजारों का आनन्द लेते हुए अब मैं अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा के सामने पहुँच जाती हूँ। *बाबा की भृकुटि में चमक रहे अपने ज्ञानसूर्य शिव बाबा को मैं देख रही हूँ। ब्रह्मा बाबा की भृकुटि से निकल रहा प्रकाश का तेज प्रवाह पूरे वतन में अपनी लाइट और माइट फैला रहा है। बापदादा से आ रही इस लाइट माइट को अब मैं बापदादा के सामने बैठ स्वयं में ग्रहण कर रही हूँ*। बापदादा से आ रही प्रकाश की किरणें मेरे मस्तक पर पड़ रही हैं और मुझ आत्मा को छू कर, मुझमे अपना असीम बल भर रही हैं। अपनी चमक को और अपनी शक्तियों को मैं कई गुणा बढ़ता हुआ महसूस कर रही हूँ। *बापदादा से अनन्त शक्तियाँ अपने अंदर भरते हुए मैं देख रही हूँ बापदादा के साथ उनके बिल्कुल समीप मम्मा, बाबा लक्ष्मी नारायण के स्वरूप में मेरे जैसे सामने आकर खड़े हो गए हैं*।

 

_ ➳  मन को लुभाने वाला मम्मा बाबा का यह सम्पूर्ण देवताई स्वरूप देख कर मैं खुशी से फूली नही समा रही। दिव्य आभा से दमकते उनके मुखमण्डल पर फैली मुस्कराहट और नयनो में दिव्यता की झलक मन को जैसे गहन सुकून दे रही है। *अपने लक्ष्य को साक्षात अपने सामने देख कर, मेरे भविष्य देवताई स्वरूप का चित्र बार - बार मेरी आँखों के सामने आ रहा है। अपने अति सुंदर मनमोहक भविष्य देवताई स्वरूप को पाने के लिए स्वयं से मैं वैसा ही पुरुषार्थ करने की अपने मन में प्रतिज्ञा करती हूँ और अपने बिंदु स्वरूप में स्थित होकर अपने आसुरी अवगुणों को योग अग्नि में भस्म करने और दैवी गुण धारण करने का परमात्म बल स्वयं में भरने के लिए अपनी निराकारी दुनिया की ओर चल पड़ती हूँ*।

 

_ ➳  सेकेण्ड में मैं वाणी से परे अपने निर्वाणधाम घर मे प्रवेश करती हूँ। देख रही हूँ अब मैं स्वयं को अपने निराकार बिंदु बाप के सामने जिनसे सर्वगुणों और सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे निकलकर पूरे परमधाम घर मे फैल रही हैं। इन किरणों में समाए सर्व गुणों और सर्वशक्तियों के शक्तिशाली वायब्रेशन धीरे - धीरे मुझ आत्मा को स्पर्श करके मुझे शक्तिशाली बना रहे हैं। *ज्ञानसूर्य शिव बाबा से निकल रही सर्वशक्तियों की इन शक्तिशाली किरणों से योग अग्नि प्रज्वलित हो रही है जो मेरे सभी पुराने स्वभाव, संस्कारो को जलाकर भस्म कर रही है। विकारों की कट उतरने से स्वयं को मैं बहुत हल्का अनुभव कर रही हूँ*। इसी हल्केपन के साथ, परमात्म बल से भरपूर होकर अब मैं अपने लक्ष्य को पाने का पुरुषार्थ करने के लिए वापिस साकारी दुनिया में लौट कर, अपने साकार तन में प्रवेश करती हूँ।

 

_ ➳  अब मैं अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हूँ और अपनी एम ऑब्जेक्ट को सामने रख, अपने उस लक्ष्य को पाने का तीव्र पुरुषार्थ कर रही हूँ। बाबा से मिली सर्वशक्तियों का बल मुझे मेरे पुराने स्वभाव संस्कारो को मिटाने और नए दैवी गुणों को धारण करने की विशेष शक्ति दे रहा है। *अपने पुराने आसुरी स्वभाव संस्कारों को अब मैं सहजता से छोड़ती जा रही हूँ। शूद्रपन के संस्कारों को परिवर्तन करने के लिए अपने अनादि और आदि दैवी संस्कारों को सदैव बुद्धि में इमर्ज रखते हुए, उन्हें जीवन मे धारण कर, अपनी मंजिल की ओर मैं निरन्तर आगे बढ़ती जा रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं अशरीरीपन के इन्जेक्शन द्वारा मन को कन्ट्रोल करने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं एकाग्रचित आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा अपने पूर्वज स्वरूप को सदा स्मृति में रखती हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा सर्व आत्माओं पर रहम करती हूँ  ।*

✺   *मैं रहमदिल आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  (ड्रिल बहुत अच्छी लग रही थी) यह रोज हर एक को करनी चाहिए। ऐसे नहीं हम बिजी हैं। *बीच में समय प्रति समय एक सेकण्ड चाहे कोई बैठा भी होबात भी कर रहा होलेकिन एक सेकण्ड उनको भी ड्रिल करा सकते हैं* और स्वयं भी अभ्यास कर सकते हैं। कोई मुश्किल नहीं है। *दो-चार सेकण्ड भी निकालना चाहिए इससे बहुत मदद मिलेगी।* नहीं तो क्या होता हैसारा दिन बुद्धि चलती रहती है नातो विदेही बनने में टाइम लग जाता है और बीच-बीच में अभ्यास होगा तो जब चाहें उसी समय हो जायेंगे क्योंकि *अन्त में सब अचानक होना है। तो अचानक के पेपर में यह विदेही पन का अभ्यास बहुत आवश्यक है।* ऐसे नहीं बात पूरी हो जाए और विदेही बनने का पुरुषार्थ ही करते रहें। तो सूर्यवंशी तो नहीं हुए ना! इसलिए *जितना जो बिजी हैउतना ही उसको बीच-बीच में यह अभ्यास करना जरूरी है।* फिर सेवा में जो कभी-कभी थकावट होती है, कभी कुछ-न -कुछ आपस में हलचल हो जाती हैवह नहीं होगा। अभ्यासी होंगे ना। *एक सेकण्ड में न्यारे होने का अभ्यास होगातो कोई भी बात हुई एक सेकण्ड में अपने अभ्यास से इन बातों से दूर हो जायेंगे। सोचा और हुआ।*

 

 _ ➳  युद्ध नहीं करनी पड़े। युद्ध के संस्कारमेहनत के संस्कार सूर्यवंशी बनने नहीं देंगे। लास्ट घड़ी भी युद्ध में ही जायेगीअगर विदेही बनने का सेकण्ड में अभ्यास नहीं है तो। और जिस बात में कमजोर होंगेचाहे स्वभाव मेंचाहे सम्बन्ध में आने मेंचाहे संकल्प शक्ति मेंवृत्ति में, वायुमण्डल के प्रभाव मेंजिस बात में कमजोर होंगे, उसी रूप में जानबूझकर भी माया लास्ट पेपर लेगी। इसीलिए *विदेही बनने का अभ्यास बहुत जरूरी है।* कोई भी रूप की माया आये, समझ तो है ही। *एक सेकण्ड में विदेही बन जायेंगे तो माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा।* जैसे कोई मरा हुआ व्यक्ति होउसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ना। *विदेही माना देह से न्यारा हो गया तो देह के साथ ही स्वभाव, संस्कार, कमजोरियां सब देह के साथ हैंऔर देह से न्यारा हो गयातो सबसे न्यारा हो गया।* इसलिए यह ड्रिल बहुत सहयोग देगी, *इसमें कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए। मन को कन्ट्रोल कर सकेंबुद्धि को एकाग्र कर सकें।* नहीं तो आदत होगी तो परेशान होते रहेंगे। पहले एकाग्र करेंतब ही विदेही बनें। अच्छा। आप लोगों का तो अभ्यास 14 वर्ष किया हुआ है ना! (बाबा ने संस्कार डाल दिया है) फाउण्डेशन पक्का है।

 

✺   *ड्रिल :-  "सारे दिन के बीच-बीच में सेकण्ड में विदेही बनने का अभ्यास करना"*

 

 _ ➳  आवाज से परे, सुनहरी लाल प्रकाशमय निराकार दुनिया में, मैं आत्मा स्वयं को अनुभव कर रही हूँ... *मैं आत्मा स्थूल, सुक्ष्म देह से मुक्त, इस मुक्तिधाम के एकदम मुक्त अवस्था का अनुभव कर रही हूँ...* मैं सतचित आंनद स्वरूप आत्मा स्वधर्म में स्थित, स्वरूप में स्थित निजानंद में हूँ... *सामने महाज्योती सर्वशक्तिमान... सर्वशक्तिमान से अनंत शक्तियाँ मुझ निराकार आत्मा में समा रही है...* एक-एक शक्ति को गहराई से अनुभव कर रही हूँ मैं आत्मा... *अपने अंदर समाती एक-एक का स्वरूप बनती जा रही हूँ...* शिवपिता की किरणों में समाया हुआ अनुभव कर रही हूँ मैं विदेही आत्मा... मैं आत्मा अंनत शक्तियों से सम्पन्नता भरपूरता का अनुभव कर रही हूँ... *इसी नव उर्जा के साथ मैं आत्मा धरती की ओर प्रस्थान करती हूँ...* साकारी दुनिया में साकारी देह में मैं आत्मा अवतरित होती हूँ... और मैं आत्मा देख रही हूँ... *स्वयं को इस कर्म क्षेत्र पर भिन्न-भिन्न कार्यकलाप करते हुए...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अब स्वयं को गृह के कार्य करते हुए देख रही हूँ... सभी कार्य करते, *मैं आत्मा एक सेकंड में समस्त चेतना को एकाग्र कर लेती हूँ भृकुटि के मध्य में... सामने आंनद का सागर मेरा बाबा है...* आंनद के सागर से अंनत आंनद की किरणों की बारिश मुझ आत्मा पर हो रही हैं... मैं आत्मा स्वयं को आंनद स्वरूप अनुभव कर रही हूँ... *पूरे घर में आंनद की किरणों की बारिश मुझ आत्मा से हो रही है... आसपास की हर आत्मा आंनद की अनुभूति कर रही हैं...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा देख रही हूँ... एक भीड़ भरे स्थान से गुजरते हुए... चारों तरफ शोर ही शोर हैं... अलग-अलग तरह के वायब्रेशन्स से वायुमंडल प्रभावित है... *एक पावरफुल बेक्र के साथ मैं आत्मा मन में चल रहे संकल्पों को स्टाप करती हूँ... और स्थित हो जाती हूँ... अपने स्वधर्म में... और गहराई से अनुभव कर रही हूँ...* मैं अपने इस शांत स्वरूप को, शांति के सागर की छत्रछाया में, मुझ शांत स्वरूप आत्मा से *शांति की बारिश चारों ओर हो रही है... सभी आत्माएँ इस शांति की बारिश में भीगकर शांति की अनुभूति कर रही है...*

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा देख रही हूँ... स्वयं को आफिस में वर्क करते हुए... *इस व्यवस्था के बीच, मैं आत्मा मन में उठ रही विचारों रूपी लहरों को, अन्तरमुखता रूपी सागर के तल में जाकर कहती हूँ कीप क्वाइट...* और सेकेंड में देह से न्यारी मैं विदेही आत्मा पहुंच जाती हूँ... बाबा की कुटिया में चारों तरफ लाल प्रकाश बीच में *मैं आत्मा सुख के सागर बाबा की शक्तिशाली किरणों में स्वयं को सुख स्वरूप अनुभव कर रही हूँ...* मुझ आत्मा से सुख की किरणें चारों ओर फैल रही है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा बगीचे में अन्य आत्माओं के साथ स्वयं को वार्तालाप करते हुए देख रही हूँ... *ट्रैफिक की आवाज सुन मैं आत्मा एक दम एलर्ट मन में चल रही संकल्पों की धारा को एकाग्रता की शक्ति से मोड कर परमधाम में शिव पिता से जोड़ देती हूँ...* प्रेम के सागर से प्रेम की बरसात मुझ आत्मा पर हो रही है... और मुझ से ये किरणें अन्य आत्माओं पर पड़ रही है... *वे सभी भी ईशवरीय प्रेम का अनुभव कर रही है...*

 

 _ ➳  मैं आत्मा गाड़ी में बैठी हूँ... *मैं आत्मा मन में चल रहे संकल्पों के ट्रैफिक को एक सेकंड में आत्मिक स्थिति रूपी लाल बत्ती जलाकर स्टाप करती हूँ...* अनुभव कर रही हूँ, मैं निराकार आत्मा स्वयं को पवित्रता के सागर के झरने के नीचे... *पवित्रता की अनंत किरणें मुझ आत्मा में समा रही हैं... और मुझ से निकल चारों ओर फैल रही है...* सभी आत्माएं और प्रकृति भी इन किरणों को पाकर सुख-शांति का पवित्रता का अनुभव कर रही है...

 

 _ ➳  मैं आत्मा देख रही हूँ स्वयं को खेतों में कार्य करते हुए... मैं आत्मा खेतों में बीज बो रही हूँ... तभी *मैं आत्मा मन में उठ रही संकल्पों रूपी शाखाओं के विस्तार को एक सेकेंड में समेट परमधाम में अपनी मास्टर बीजरुप स्थिति का अनुभव कर रही हूँ...* बीजरुप बाबा की शक्तिशाली किरणों के नीचे *मैं आत्मा स्वयं को बेहद शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ... विदेही हूँ ये स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ... देह से न्यारे होने से... सब से न्यारी हो गयी हूँ... अब एकाग्रता की शक्ति भी बढ़ गयीं है... कंट्रोलिंग पॉवर भी बढ़ गयी है... देह के कमजोर संस्कार स्वभाव धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे है...* और बार-बार के विदेही होने के अभ्यास से, मैं आत्मा माया के किसी भी प्रकार के प्रभाव से मुक्त हूँ...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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