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 20 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *किसी भी देहधारी में अपनी बुधी लटकाई तो नहीं ?*

 

➢➢ *शांत स्वधर्म में स्थित रहे ?*

 

➢➢ *निर्मानता द्वारा नव निर्माण किया ?*

 

➢➢ *विश्व सेवा के तख़्तनशीन बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जितना स्थापना के निमित्त बने हुए ज्वाला-रुप होंगे उतना ही विनाश-ज्वाला प्रत्यक्ष होगी। संगठन रुप में ज्वाला-रुप की याद विश्व के विनाश का कार्य सम्पन्न करेगी। इसके लिए *हर सेवाकेन्द्र पर विशेष योग के प्रोग्राम चलते रहे तो विनाश ज्वाला को पंखा लगेगा। योग-अग्नि से विनाश की अग्नि जलेगी, ज्वाला से ज्वाला प्रज्जवलित होगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं एक बल, एक भरोसा वाली निश्चयबुद्धि आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को एक बल एक भरोसा-ऐसे अनुभव करते हो? एक बाबा दूसरा न कोई-यह पक्का है ना। या बाबा भी है तो बच्चे भी हैं, सम्बन्धी भी हैं? जब बच्चे हैं, पति है, सासू-ससुर हैं - इतने सारे हैं तो एक कैसे हुआ? सामने हैं, देख रहे हैं, सेवा कर रहे हैं, फिर एक कैसे हुआ? *ये मेरे नहीं हैं लेकिन बाप ने सेवा के लिये दिये हैं-ऐसी दृष्टि-वृत्ति रखने से एक ही याद रहेगा। चाहे कितने भी हों, कौन भी हों, लेकिन सभी बाप के बच्चे हैं और हमको सेवा के लिये ये आत्मायें मिली हैं। बाप ने सेवा अर्थ निमित्त बनाया है। घर में नही रहे हुए हो लेकिन सेवा-स्थान पर रहे हुए हो।*

 

  *मेरा सब तेरा हो गया। मेरा कुछ नहीं, शरीर भी मेरा नहीं। जब मेरा है ही नहीं तो बोडी-कोन्सेस कैसे हो सक्ता है।मेरे में ही आकर्षण होती है। जब मेरा समाप्त हो जाता है तो मन और बुद्धि को अपनी तरफ खींच नहीं सकते हैं। ब्राह्मण जीवन अर्थात् मेरे को तेरे में बदलना।* तो बार-बार यह चेक करो कि तेरा, मेरा तो नहीं बन गया? अगर मेरापन नहीं होगा, तेरा ही है तो डबल लाइट होंगे। अगर थोड़ा भी बोझ अनुभव करते हो तो समझो-मेरापन मिक्स हो गया है। भक्ति में कहते हैं कि सब-कुछ तेरा।

 

  ब्राह्मण जीवन में कहना नहीं है, करना है। यह करना सहज है ना। बोझ देना सहज होता है या लेना सहज होता है? *तेरा कहना माना बोझ देना और मेरा कहना माना बोझ लेना। तो अभी एक बल एक भरोसा। बस, एक ही एक। एक लिखना सहज है ना।* तो यह तेरा-तेरा कहने वाला ग्रुप है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  अभी समय अनुसार अनेक प्रकार के लोग चेकिंग करने आयेंगे। संगठित रूप में जो चैलेन्ज करते हो कि हम सब ब्राह्मण एक की याद में एकरस स्थिति में स्थित होने वाले हैं - *तो ब्राह्मण संगठन की चेकिंग होगी।*

 

✧  इन्डीविज्युवल तो कोई बडी बात नहीं है लेकिन आप सब विश्व कल्याणकारी विश्व परिवर्तक हो - *विश्व संगठन, विश्व कल्याणकारी संगठन विश्व को अपनी वृत्ति वा वायब्रेशन द्वारा वा अपने स्मृति स्वरूप के समर्थी द्वारा कैसे सेवा करते हैं - उसकी चेकिंग करने बहुत आयेंगे।* आज की साइंस द्वारा साइलेन्स शक्ति का नाम बाला होगा।

 

✧  योग द्वारा शक्तियाँ कौन-सी और कहाँ तक फैलती है उनकी विधि और गति क्या होती है यह सब प्रत्यक्ष दिखाई देंगे। ऐसे संगठन तैयार हैं? *समय प्रमाण अब व्यर्थ की वातों को छोड समर्थी स्वरूप वनो।* ऐसे विश्व सेवाधारी बनो। इतना बडा कार्य जिसके लिए निमित बने हुए हो उसको स्मृति में रखो।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ 'कर्मभोग है', 'कर्मबन्धन है', 'संस्कारों का बन्धन है', संगठन का बन्धन है' - इस व्यर्थ संकल्प रूपी जाल को अपने आप ही इमर्ज करते हो और अपने ही जाल में स्वयं फंस जाते हो, फ़िर कहते है कि अभी छुड़वाओ। *बाप कहते हैं कि तुम हो ही छूटे हुए। छोड़ो तो छूटो।* अब निर्बन्धनी हो या बन्धनी हो। *पहले ही शरीर छोड़ चुके हो, मरजीवा बन चुके हो।* यह तो सिर्फ विश्व की सेवा के लिए शरीर रहा हुआ है, पुराने शरीरों में बाप शक्ति भर कर चला रहे हैं। ज़िम्मेवारी बाप की है, फिर आप क्यों ले लेते हो। *ज़िम्मेवारी सम्भाल भी नहीं सकते हो लेकिन छोड़ते भी नहीं हो। ज़िम्मेवारी छोड़ दो अर्थात् मेरा-पन छोड़ दो।* मेरा पुरुषार्थ, मेरा इन्वेन्शन, मेरी सर्विस, मेरी टचिंग, मेरे गुण बहुत अच्छे हैं, मेरी हैन्डलिंग-पॉवर बहुत अच्छी है। मेरी निर्णय शक्ति बहुत अच्छी है। मेरी समझ ही यथार्थ है। बाकी सब मिसअन्डरस्टैन्डिग में हैं। *यह मेरा-मेरा आया कहाँ से? यही रॉयल माया है, इससे मायाजीत बन जाओ तो सेकेण्ड में प्रकृति जीत बन जावेंगे। प्रकृति का आधार लेंगे लेकिन अधीन नहीं बनेंगे। प्रकृतिजीत ही विश्व जीत व जगतजीत है। फिर एक सेकेण्ड का डायरेक्शन अशरीरी भव का सहज और स्वत: हो जावेगा।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  एक बाप को याद करना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मधुबन की पहाड़ी पर बैठ चारों ओर की सुन्दरता को निहार रही हूँ... बर्फ की चादर ओढ़ी पहाड़ियां चांदी की परत जैसी चमक रही हैं... सूरज की किरणें ठंडी ठंडी हवाओं के साथ खेल रही हैं... मैं आत्मा इन पहाड़ियों को देख विचार करती हूँ की मैं आत्मा इस देह, और देहधारियों के चक्रव्यूह में कई जन्मों से फंसी हुई थी...* मेरा प्यारा बाबा मुझे दुखों की पहाड़ियों से निकाल अपनी मखमली गोदी में बिठा दिया है... और मधुबन सा मेरा जीवन संवार दिया है... मैं आत्मा प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ... मीठे बाबा पहाड़ी पर बैठ मुझसे मीठी मीठी रूह-रिहान करते हैं...

 

   *किसी भी देहधारी के नाम रूप में ना फंसने की समझानी देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... अपने खुबसूरत मणि स्वरूप में स्थित होकर मीठे बाबा संग यादो में झूल जाओ... और अतीन्द्रिय सुख का आनन्द लो... *अब इस मिटटी के मटमैले आवरण के आकर्षण में नही फंसो... अशरीरी बनकर पिता को याद करो तो सदा के आयुष्मान निरोगी और सर्व सुखो से भरपूर हो जाओगे..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अशरीरी बनकर एक बाप की याद में डूबकर कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपकी यादो में देह के भान से मुक्त होकर चमकती मणि सी खिल उठी हूँ... प्यारे बाबा आपने मेरा जीवन अनन्त खुशियो से सजीला कर दिया है... *मै आत्मा अपने दमकते रूप को पाकर सदा के सुखो से सज संवर गयी हूँ..."*

 

   *ज्ञान के सागर ऑलमाइटी अथॉरिटी बेहद बाबा बेहद स्वर्ग का वर्सा देते हुए कहते हैं:-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... अब इस देह की दुनिया से निकल, अपने आत्मिक अप्रतिम सौंदर्य को यादो में भर लो... अनन्त गुणो और शक्तियो से सम्पन्न प्यारी आत्मा हो, इस नशे से हर रग को भर लो... *ईश्वर पिता की यादो में देह के मटमैले आवरण को त्याग दो... और आत्मिक खूबसूरती को पाकर प्रेम सुख शांति की दुनिया को बाँहों में भरो..."*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा की वाणी की वीणा से शक्तियों को भरते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपकी प्यारी सी गोद में किस कदर फूलो सी महक उठी हूँ... देह समझ जो खजाने खोई थी.... आत्मा के भान में आकर सब कुछ पुनः पा रही हूँ... *हर दुःख से मुक्त होकर, सदा की सुखदायी और निरोगी बनकर मुस्करा रही हूँ..."*

 

   *प्यारे बाबा रूहानी यादों के रंगों से मेरे जीवन को उज्जवल बनाते हुए कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वरीय साथ का यह प्यारा और अमूल्य समय किसी देहधारी की यादो में न खपाओ... *हर बन्धन से मुक्त होकर, ईश्वरीय नशे में गहरे डूब जाओ... और मीठे बाबा की यादो में खोकर, विश्व की बादशाही, अथाह सुखो की दौलत और खुबसूरत निरोगी स्वस्थ जीवन पाओ..."*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा की यादों से जिन्दगी को हसीन बनाते हुए मैं आत्मा खुशियों में लहराते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा अपने आपको जानकर, अपने मीठे बाबा को जानकर, सुखो की, खुशियो की, जादूगर हो गई हूँ...* प्यारे बाबा... आपने तो सारे ब्रह्माण्ड की खुशियो से मुझे सजा दिया है... सब कुछ मेरे कदमो तले बिखेर दिया है... मुझे सत्य का पता देकर, सुखो की खान का मालिक बना दिया है...."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- किसी भी देहधारी में अपनी बुद्धि नही लटकानी है*"

 

_ ➳  अपने लाइट के सूक्ष्म आकारी शरीर के साथ मैं फरिश्ता अपनी साकार देह से बाहर आता हूँ ओर ऊपर आकाश की ओर उड़ जाता हूँ। *साकारी दुनिया के हर नज़ारे को साक्षी होकर देखता हुआ मैं सारे विश्व का चक्कर लगाते हुए एक श्मशान के ऊपर से गुजरता हुआ, वहां जल रही चिताओं को देख नीचे उतरता हूँ और श्मशान के अंदर प्रवेश कर जाता हूँ*। मैं देखता हूँ एक अर्थी को उठाये कुछ मनुष्य उस श्मशान भूमि में प्रवेश करते हैं और उसे जमीन पर रख उस पर लकड़ियों का ढ़ेर लगाकर उसे अग्नि देकर उसका दाह संस्कार कर वापिस लौट जाते हैं। वहाँ खड़ा ऐसे ही ना जाने कितने मृत शरीरों को मैं अग्नि में जलते देख रहा हूँ। 

 

_ ➳  इस दृश्य को देख मैं उस श्मशान भूमि से बाहर आता हूँ और मन ही मन विचार करता हूँ कि जिन देह के सम्बन्धियों से प्रीत निभाने के लिए मनुष्य अपने पूरा जीवन लगा देता है, उनके मोह में फंस कर कितने विकर्म करता है उसके वही सम्बन्धी उसके मरते ही उससे हर सम्बन्ध तोड़, उसे अग्नि देकर कैसे वापिस लौट जाते हैं। *इस श्मशान से आगे की यात्रा तो आत्मा को अकेले ही तय करनी होती है। केवल श्मशान तक साथ देने वाले इन देह के सम्बन्धियों से दिल लगाकर हर मनुष्य कैसे अपने आप को ठग रहा है*! इस बात से भी बेचारे मनुष्य कितने अनजान है कि इस नश्वर संसार में अगर कोई प्रीत की रीत निभा सकता है तो वो केवल एक निराकार परमात्मा है, कोई देहधारी नही।

 

_ ➳  मन ही मन अपने आप से बातें करता मैं फ़रिश्ता अपने श्रेष्ठ भाग्य के बारे में विचार कर हर्षित होता हूँ कि कितना महान सौभाग्य है मेरा जो सर्व सम्बन्धों से भगवान ने मुझे अपना बना लिया। *इसलिए दिल को आराम देने वाले अपने दिलाराम बाबा से मैं मन ही मन प्रोमिस करता हूँ कि किसी भी देहधारी से दिल ना लगाते हुए, केवल अपने दिलाराम बाबा से ही मैं दिल की प्रीत रखूँगा और उस प्रीत की रीत निभाने में कभी कोई कमी नही आने दूँगा*। स्वयं से और अपने प्यारे मीठे बाबा से प्रोमिस करके दिल को सुकून देने वाले अपने दिलाराम बाबा को मैं याद करते ही महसूस करता हूँ जैसे मेरे दिलाराम बाबा अपने स्नेह की मीठी फुहारे मुझ पर बरसाते हुए, अपने लाइट माइट स्वरूप में मेरे सामने आकर उपस्थित हो गए हैं।

 

_ ➳  अपने हाथ मे मेरा हाथ थामे मेरे मीठे बाबा अब मुझे अपने अव्यक्त वतन की ओर ले कर जा रहें हैं। बापदादा के साथ, प्रकृति के खूबसूरत नजारों का आनन्द लेता हुआ उनका हाथ थामे मैं ऊपर आकाश को पार करता हुआ, उससे भी ऊपर उड़ते हुए बापदादा के साथ सूक्ष्म वतन में पहुँचता हूँ।

*अपने प्यारे बापदादा के पास बैठ, उनके नयनों में समाये अथाह प्यार के सागर में डुबकी लगाकर, उनका असीम प्यार पाकर , और उनसे सर्व सम्बन्धो का अविनाशी सुख लेकर अपने निराकारी स्वरूप में स्थित होकर मैं चमकती हुई मस्तक मणि अब अपने अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु स्वरूप को धारण कर, अब सूक्ष्म वतन से ऊपर अपने परमधाम घर की ओर चल पड़ती हूँ*।

 

_ ➳  अपने इस परमधाम घर में पहुँच कर, यहाँ चारों और फैले अथाह शान्ति के वायब्रेशन्स को अपने अंदर गहराई तक समाती हुई, गहन शांति की अनुभूति करके  *मैं धीरे - धीरे अपने दिलाराम बाबा के पास पहुँचती हूँ और उनके समीप पहुँच कर जैसे ही मैं उन्हें टच करती हूँ उनकी शक्तियों का शीतल झरना मुझ आत्मा के ऊपर बरसने लगता है औऱ मुझे असीम आनन्द देने के साथ - साथ असीम शक्ति से भरपूर कर देता है*। अपने दिलाराम बाबा की किरणों को बार - बार छूते हुए, उनके प्यार का सुखद अनुभव करके मैं आत्मा वापिस सृष्टि ड्रामा पर अपना पार्ट बजाने के लिए अब परमधाम से नीचे आ जाती हूँ। 

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपने दिलाराम बाबा के निस्वार्थ प्यार की छाप को अपने दिल दर्पण पर अंकित कर, उस प्यार के मधुर अहसास को घड़ी - घड़ी याद कर, अब मैं अपने दिलाराम बाबा के प्यार के झूले में हर पल झूल रही हूँ। *देह और देह की दुनिया मे रहते हुए, देह के सम्बन्धों से ममत्व निकाल, अब किसी भी देहधारी से दिल ना लगाते हुए, सर्व सम्बन्धों का सुख अपने दिलाराम बाबा से लेते हुए,

अतीन्द्रीय सुख का सुखद अनुभव मैं हर समय कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं निर्मानता द्वारा नाव निर्माण करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं निराशा और अभिमान से मुक्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा विश्व सेवा की तख्तनशीन हूँ  ।*

   *मैं आत्मा राज्य तख्तनशीन हूँ  ।*

   *मैं विश्व सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ *जैसे लौकिक दुनिया में भी उच्च रॉयल कुल की आत्मायें कोई साधारण चलन नहीं कर सकतीं वैसे आप सुकर्मी आत्मायें विकर्म कर नहीं सकतीं।* जैसे हद के वैष्णव लोग कोई भी तामसी चीज स्वीकार कर नहीं सकते, ऐसे विकर्माजीत विष्णुवंशी - विकर्म वा विकल्प का तमोगुणी कर्म वा संकल्प नहीं कर सकते। यह ब्राह्मण धर्म के हिसाब से निषेध है। *आने वाली जिज्ञासु आत्माओं के लिए भी डायरेक्शन लिखते हो ना कि सहज योगी के लिए यह-यह बातें निषेध हैं तो ऐसे ब्राह्मणों के लिए वा अपने लिए क्या-क्या निषेध हैं वह अच्छी तरह से जानते हो?* जानते तो सभी हैं और मानते भी सभी हैं लेकिन चलते नम्बरवार हैं।

✺ *"ड्रिल :- अच्छे से मनन करना कि मुझ ब्राह्मण आत्मा के लिए क्या क्या निषेध है।*

➳ _ ➳ *मैं आत्मा इंद्रियों की विषयासक्ति में फंसे हुए चंचल मन को खींचकर आत्म चिंतन में लगाती हूं... भृकुटी के अकाल तख्त पर विराजमान बिंदु रूप-ज्योति स्वरुप आत्मा पर मन को एकाग्र करती हूं...* व्यर्थ विचारों के आवेग पर अंकुश लगाकर मैं आत्मा बाबा का आह्वान करती हूं... बाबा मुझे अपने साथ हिस्ट्री हॉल लेकर चलते हैं... बाबा हिस्ट्री हॉल में संदली पर बैठकर मुरली चला रहे हैं... बाबा मुरली के माध्यम से मुझे गुह्य-गुह्य बातें समझा रहे हैं...

➳ _ ➳ बाबा कहते हैं कि बच्चे इस लौकिक दुनिया में भी उच्च रॉयल कुल की आत्मायें हमेशा उच्च रॉयल चलन ही चलती हैं वो कभी भी साधारण चलन नहीं चलते हैं... वैसे तुम तो विकर्माजीत विष्णुवंशी कुल की आत्मायें हो तो तुम कभी कोई भी विकर्म वा विकल्प का तमोगुणी कर्म वा संकल्प नहीं कर सकते... *तुम श्रेष्ठ, ऊँचे ते ऊँचे ब्राह्मण कुल की आत्मा हो... विकारों के वश होकर कोई भी तमोगुणी कर्म करना ब्राह्मण धर्म के हिसाब से निषेध है...* सहज योगी आत्मा बनना है तो सम्पूर्ण पवित्र बनो... सतोगुणी संस्कारों को धारण करो...

➳ _ ➳ बाबा मुरली चलाते हुए साथ-साथ मुझे दृष्टि देते जा रहे हैं... मैं आत्मा मगन होकर बाबा की मुरली के एक-एक महावाक्य ध्यान से सुन रही हूँ... और स्वयं में धारण कर रही हूँ... *मैं आत्मा चेक करती हूँ कि अमृतवेले से लेकर रात तक मैं आत्मा श्रेष्ठ कर्म कर रही हूँ या कोई व्यर्थ कर्म करती हूँ... क्या मैं आत्मा जो भी ब्राह्मणों के लिए निषेध है उन कार्यों को तो नहीं कर रही हूँ... क्या मैं श्रीमत पर चल रही हूँ?* या मैं परमत, मनमत में आ जाती हूँ...

➳ _ ➳ मैं आत्मा अपने एक-एक कर्मेन्द्रिय को चेक करती हूँ... क्या मेरी आंखे न देखने वाली चीजों को तो नहीं देखती हैं... क्या मेरा मुख दूसरों के अवगुणों का वर्णन तो नहीं करती है... मेरे कान व्यर्थ बातों को तो नहीं सुन रहा... क्या मेरी जिह्वा निषेधित पदार्थों को खाने में, बाहर के खाने का लोभ तो नहीं रखती... *काम, क्रोध, अंहकार जैसे विकारों का अंश तो बाकी नहीं है... परचिन्तन, परदर्शन में पड़कर क्या मैं आत्मा अपना अमूल्य समय व्यर्थ तो नहीं गंवा रही हूँ...*

➳ _ ➳ मैं आत्मा स्वयं की चेकिंग करती हुई साथ-साथ चेंज करती जाती हूँ... बाबा की दृष्टि से, मस्तक से दिव्य किरणों रूपी फव्वारे मुझ पर पड़ रहे हैं... मुझ आत्मा से सारी नकारात्मक एनर्जी बाहर निकल रही है... मुझ आत्मा की दृष्टि, वृत्ति, बोल, कर्म, चलन से साधारणता खत्म हो रही है... मैं आत्मा बाबा के दिव्य किरणों से दैवीय गुणों को धारण कर रही हूँ... मैं आत्मा अपनी कर्मेन्द्रियों पर अपना अधिकार जमाकर स्वराज्य अधिकारी बन गई हूँ... और उनको अपने आर्डर और श्रीमत प्रमाण चला रही हूँ... *अब मैं आत्मा जो भी ब्राह्मणों के लिए श्रीमत रूपी मर्यादाएं हैं उन पर ख़ुशी-ख़ुशी चल रही हूँ... और बाबा का हाथ और साथ पाकर हर कर्म को सुकर्म बनाकर सफलता प्राप्त कर रही हूँ...*
 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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