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 20 / 08 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *एक बाप के ही फरमान पर चले ?*

 

➢➢ *पढाई और पढाने वाले को सदा याद रखा ?*

 

➢➢ *साधनों को सहारा बनाने की बजाये निमित मात्र कार्य में लगाया ?*

 

➢➢ *रूहानी शान में रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *कोई भी आपके समीप सम्पर्क में आये तो महसूस करे कि यह रुहानी हैं, अलौकिक हैं। उनको आपका फरिश्ता रुप ही दिखाई दे।* फरिश्ते सदा ऊंचे रहते हैं। फरिश्तों को चित्र रुप में भी दिखायेंगे तो पख दिखायेंगे क्योंकि उड़ते पंछी हैं।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं कोटो में कोई और कोई में भी कोई श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को सदा कोटों में कोई और कोई में भी कोई श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करते हों? कि कोटों में कोई जो गाया हुआ है वो और कोई है? या आप ही हो? *तो कितना एक-एक आत्मा का महत्व है अर्थात् हर आत्मा महान् है। तो जो जितना महान् होता है, महानता की निशानी जितना महान् उतना निर्माण। क्योंकि सदा भरपूर आत्मा है।* जैसे वृक्ष के लिये कहते हैं ना जितना भरपूर होगा उतना झुका हुआ होगा और निर्माणता ही सेवा करती है।

 

  जैसे वृक्ष का झुकना सेवा करता है, अगर झुका हुआ नहीं होगा तो सेवा नहीं करेगा। तो एक तरफ महानता है और दूसरे तरफ निर्माणता है। और जो निर्माण रहता है वह सर्व द्वारा मान पाता है। स्वयं निर्माण बनेंगे तो दूसरे मान देंगे। जो अभिमान में रहता है उसको कोई मान नहीं देते। उससे दूर भागेंगे। *तो महान् और निर्माण है या नहीं है-उसकी निशानी है कि निर्माण सबको सुख देगा। जहाँ भी जायेगा, जो भी करेगा वह सुखदायी होगा। इससे चेक करो कि कितने महान् हैं? जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये सुख की अनुभूति करे।* ऐसे है या कभी दु:ख भी मिल जाता है? निर्माणता कम तो सुख भी सदा नहीं दे सकेंगे। तो सदा सुख देते, सुख लेते या कभी दु:ख देते, दु:ख लेते? चलो देते नहीं लेकिन ले भी लेते हो? थोड़ा फील होता है तो ले लिया ना।

 

  अगर कोई भी बात किसी की फील हो जाती है तो इसको कहेंगे दु:ख लेना। लेकिन कोई दे और आप नहीं लो, यह तो आपके ऊपर है ना। जिसके पास होगा ही दु:ख वो क्या देगा? दु:ख ही देगा ना। लेकिन अपना काम है सुख लेना और सुख देना। ऐसे नहीं कि कोई दु:ख दे रहा है तो कहेंगे मैं क्या करुँ? मैंने नहीं दिया लेकिन उसने दिया। *अपने को चेक करना है-क्या लेना है, क्या नहीं लेना है। लेने में भी होशियारी चाहिये ना। इसलिये ब्राह्मण आत्माओंका गायन है-सुख के सागर के बच्चे, सुख स्वरूप सुखदेवा हैं। तो सुख स्वरूप सुखदेवा आत्मायें हो। दु:ख की दुनिया छोड़ दी, किनारा कर लिया या अभी तक एक पांव दु:खधाम में है, एक पांव संगम पर है?* ऐसे तो नहीं कि थोड़ा-थोड़ा वहाँ बुद्धि रह गई है? पांव नहीं है लेकिन थोड़ी अंगुली रह गई है? जब दु:खधाम को छोड़ चले तो न दु:ख लेना है न दु:ख देना है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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सभी एवररेडी हो ना! आज किसको कहाँ भेजें तो एवररेडी हो ना! *जब हिम्मत रखते हैं तो मदद भी मिलती है। एवररेडी जरूर रहना चाहिए।* और जब समय ऐसा आयेगा तो फिर ऑर्डर तो करना ही होगा। बाप द्वारा ऑर्डर होना ही है। कब करेंगे वह डेट नहीं बतायेंगे। डेट बतावें फिर तो सब नम्बरवन पास हो जाएँ। यहाँ डेट का ही 'अचानक' एक ही क्वेचन आयेगा! एवररेडी हो ना। कहें यहाँ ही बैठ जाओ तो बाल-बच्चे, घर आदि याद आयेगा? सुख के साधन तो वहाँ हैं लेकिन स्वर्ग तो यहाँ बनाना है। तो *सदा एवररेडी रहना। यह है ब्राह्मण जीवन की विशेषता।* अपनी बुद्धि की लाइन क्लीयर हो। सेवा के लिए निमित मात्र स्थान बाप ने दिया है। तो निमित बनकर सेवा में उपस्थित हुए हो। फिर बाप का इशारा मिला तो कुछ भी सोचने की जरूरत ही नहीं है। *डायरेक्शन प्रमाण सेवा अच्छी कर रहे हो। इसलिए न्यारे और बाप के प्यारे हो।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *कहा भी जाता है - 'सच्चे दिल पर साहेब राजी'। विशाल दिमाग पर राजी नहीं कहा जाता है। विशाल दिमाग- यह विशेषता जरूर है, इस विशेषता से ज्ञान की प्वांट्स को अच्छी रीति धारण कर सकते हैं लेकिन दिल से याद करने वाले प्वाइंट अर्थात् बिन्दु रूप बन सकते हैं।* वह प्वाइंट रिपीट कर सकते हैं लेकिन पाइंट रूप बनने में सेकण्ड नम्बर होंगे, *कभी सहज कभी मेहनत से बिन्दु रूप में स्थित हो सकेंगे। लेकिन सच्ची दिल वाले सेकण्ड में बिन्दु बन बिन्दुस्वरूप बाप को याद कर सकते हैं।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  रूहानी पढ़ाई को कभी मिस न कर, पढ़ाई से विश्व की बादशाही पाना"*

 

_ ➳  ईश्वर पिता की खोज में मै आत्मा... देहधारी गुरुओ में खोयी हुई थी... पर कभी कहीं एक अहसास भी न पाया... जब भगवान ने स्वयं मिलना चाहा, तब ही मुझे उनका परिचय मिल  पाया... यह अपने आप में कितनी अनोखी बात है... कि सिर्फ दर्शन मात्र को प्यासी मै आत्मा... आज ईश्वर पिता की मीठी गोद में बेठ पढ़ रही हूँ... देवताओ सी धनी और सुखी बन रही हूँ... *मेने तो बून्द भर चाही थी... मीठे बाबा ने सारे सागर मुझ पर उंडेल कर, महा भाग्य से सजा दिया है.*.. यही मीठा चिंतन करते करते.... रुहरिहानं करने मै आत्मा... मीठे बाबा की कुटिया में पहुंच रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान धन से मालामाल करते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *भगवान स्वयं शिक्षक बन गया है यह कितना प्यारा भाग्य है.*.. यह रूहानी पढ़ाई ही गुणो से भरकर दिव्य बनाएगी... इसलिए इस पढ़ाई को कभी भी मिस नही करना है... इस पढ़ाई को पढ़कर और श्रीमत की धारणा से विश्व की बादशाही सहज ही प्राप्त होगी...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की शिक्षाओ को अपने मन बुद्धि में भरते हुए कहती हूँ :-* "प्यारे प्यारे बाबा मेरे... मै आत्मा आपको शिक्षक रूप में पाकर कितनी धन्य धन्य हो गयी हूँ... मेरी पतित बुद्धि को सवांरने स्वयं भगवान आया है... *ईश्वर को ही शिक्षक रूप में पा लिया है, मेने अब भला और क्या चाहिए मुझे.*.."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को अपने प्यार में शक्तिशाली बनाते हुए कहते है :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वरीय पढ़ाई से ही देवताई सुखो के अधिकारी बनकर विश्व राज्य को पाओगे... इस रूहानी पढ़ाई में ही सच्चे सुख समाये है... *इसलिए इस ज्ञान धन को कभी भी छोड़ना नही, जब तक जीना हे, सदा पढ़ते ही रहना है.*.."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की छत्रछाया में देवताई भाग्य पाकर कहती हूँ :-* " प्यारे दुलारे बाबा मेरे... मै आत्मा आपकी ज्ञान मणियो को अपने दामन में सजाकर, कितने मीठे सुखो से भरती जा रही हूँ... ईश्वर पिता के साये में बेठ पढ़ रही हूँ... और *अपने मन बुद्धि को देवताई सुख और खुशियो की मालिक बनती जा रही हूँ.*..

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अतुलनीय खजानो के मालिक बनाते हुए कहते है :-* " मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... सदा सच्ची खुशियो से सजे रहो... *मीठे बाबा के प्यार में पलकर, असीम सुखो से भरे सतयुगी राज्य भाग्य को अपनी बाँहों में भर लो.*.. देवताई सुख दिलाने वाली इस रूहानी पढ़ाई को कभी भी पढ़ना नही छोडो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा सच्ची खुशियो में झूमते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा *आपके सच्चे प्यार सच्चे ज्ञान और सच्ची यादो को पाकर कितनी धनवान्,कितनी सुखदायी और भाग्यवान बन गयी हूँ.*.. ईश्वरीय हाथो में पलकर, विश्व की बादशाही को पाने वाली, तकदीर वान आत्मा बन गयी हूँ..." मीठे बाबा के ज्ञान रत्नों की दिल में समाकर मै आत्मा स्थूल जगत में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक बाप के फरमान पर ही चलना और एक बाप से ही सुनना*"

 

_ ➳  "मेरे तो शिवबाबा एक, दूसरा ना कोई" इस गीत को गुनगुनाते हुए मैं अपने घर के आंगन में टहल रही हूँ और सोच रही हूँ कि जब से मुझे बाबा मिले हैं मेरा जीवन कितना सुंदर हो गया है। जिस जीवन मे दुःख, निराशा के सिवाय कुछ नही था वो जीवन मेरे भगवान बाबा ने आ कर कितना सुखदाई बना दिया है। *बाबा के साथ ने जीवन को ऐसा हरा भरा कर दिया है जैसे बारिश की बूंदे मुरझाये हुए पेड़ पौधों को हरा भरा कर देती हैं*। मेरे दिलाराम बाबा का प्यार ही तो मेरे इस जीवन की बहार है और अब मुझे अपने इस जीवन को बहार को पूरा संगमयुग ऐसे ही बरकरार रखना है इसलिए अपने दिलाराम शिव बाबा के फ़रमान पर चलना और केवल उनसे ही अब मुझे सुनना है।

 

_ ➳स्वयं से बातें करते, अपने शिव पिता परमात्मा के प्यार के सुखद एहसास में मैं खो जाती हूँ और उनके प्यार का वो सुखद एहसास मुझे अपनी ओर खींचने लगता है। *ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं एक पतंग हूँ और मेरी डोर मेरे शिव पिता के हाथ में है जो मुझे धीरे धीरे ऊपर खींच रहें हैं*। उनके प्रेम की डोर में बंधी मैं देह और देह की दुनिया को भूल ऊपर की और उड़ रही हूँ। नीले गगन में उन्मुक्त हो कर उड़ने का मैं आनन्द लेती हुई उस गगन को भी पार कर, उससे ऊपर सूक्ष्म लोक से भी परे मैं पहुंच जाती हूँ लाल प्रकाश  से प्रकाशित निराकारी आत्माओं की दुनिया में जो मेरे शिव पिता परमात्मा का घर है। शान्ति की इस दुनिया मे पहुंचते ही गहन शांति की अनुभूति में मैं खो जाती हूँ।

 

_ ➳यह गहन शांति का अनुभव मुझे हर संकल्प, विकल्प से मुक्त कर रहा है। मुझे केवल मेरा चमकता हुआ ज्योति बिंदु स्वरूप और अपने शिव पिता का अनन्त प्रकाशमय महाज्योति स्वरूप दिखाई दे रहा है। *महाज्योति शिव बाबा से आ रही अनन्त शक्तियों की किरणें मुझ ज्योति बिंदु आत्मा पर पड़ रही है और मुझमे अनन्त शक्ति भर रही है*। मेरे शिव पिता परमात्मा से आ रही सतरंगी किरणे मुझ आत्मा में निहित सातों गुणों को विकसित कर रही हैं। देह अभिमान में आ कर, अपने सतोगुणी स्वरूप को भूल चुकी मैं आत्मा अपने एक - एक गुण को पुनः प्राप्त कर फिर से अपने सतोगुणी स्वरूप में स्थित होती जा रही हूँ। *हर गुण, हर शक्ति से मैं स्वयं को सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ*।

 

_ ➳बाबा से आ रही सर्वगुणों, सर्वशक्तियों की शक्तिशाली किरणों का प्रवाह निरन्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे बाबा अपने इन सर्वगुणों और सर्वशक्तियों को मुझ आत्मा में प्रवाहित कर मुझे आप समान बना रहे हैं। *इन शक्तिशाली किरणों की तपन से विकारों की कट जल कर भस्म हो रही है और मेरा स्वरूप अति उज्ज्वल बनता जा रहा हैं*। सातों गुणों और सर्वशक्तियों से भरपूर, अति उज्ज्वल, स्वरूप ले कर अब मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया मे लौट रही हूँ। साकारी तन में विराजमान हो कर भी अब  मुझ आत्मा के गुण और शक्तियां सदा इमर्ज रूप में रहते हैं।

 

_ ➳  "एक बाप के ही फरमान पर चलना और बाप से ही सुनना" इसे अपने जीवन का मंत्र बना कर अपने शिव पिता परमात्मा के स्नेह में मैं सदा समाई रहती हूँ। सिवाय शिव बाबा की मधुर वाणी के अब और किसी के बोल मेरे कानों को अच्छे नही लगते। *सिवाय श्रीमत के अब किसी की मत पर चलना मुझे ग्वारा नही*। सर्व सम्बन्ध एक बाप के साथ जोड़, अब मैं देह और देह की दुनिया से किनारा कर चुकी हूँ। चलते - फिरते, उठते - बैठते हर कर्म करते बाबा की छत्रछाया के नीचे मैं स्वयं को अनुभव करती हूँ। *कदम - कदम पर बाबा की श्रीमत ढाल बन कर मेरे साथ रहती है और मुझे माया के हर वार से सदा सेफ रखती है*

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं साधनों को सहारा बनाने के बजाए निमित्त मात्र कार्य मे लगाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा साक्षीद्रष्टा आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव रूहानी शान में रहती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा अभिमान की फीलिंग आने से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं स्वमानधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  *अपने बोल कैसे होयह अपशब्द, व्यर्थ शब्द, जोर से बोलना..... ये जोर से बोलना भी वास्तव में अनेकों को डिस्टर्ब करना है।* ये नहीं बोलो- मेरा तो आवाज ही बड़ा है। मायाजीत बन सकते हो और आवाज जीत नहीं बन सकते! तो ऐसे किसी को भी डिस्टर्ब करने वाले बोल और व्यर्थ बोल नहीं बोलो। बात होती है दो शब्दों की लेकिन आधा घण्टा उस बात को बोलते रहेंगेबोलते रहेंगे। तो ये जो लम्बा बोल बोलते होजो चार शब्दों में काम हो सकता है वो १२-१५ शब्द में नहीं बोलो।

➳ _ ➳  *आप लोगों का स्लोगन है कम बोलोधीरे बोलो।* तो जो कहते हैं ना हमारा आवाज बहुत बड़ा हैहम चाहते नहीं हैं लेकिन आवाज ही बड़ा हैतो वो गले में एक स्लोगन लगाकर डाल लेवे। होता क्या हैआप लोग तो अपनी धुन में जोर से बोल रहे हो लेकिन आने-जाने वाले सुन करके ये नहीं समझते हैं कि इसका आवाज बड़ा है। वो समझते हैं पता नहीं झगड़ा हो रहा है। तो ये भी डिससर्विस हुई।

➳ _ ➳  इसलिए आज का पाठ दे रहे हैं - व्यर्थ बोल या किसी को भी डिस्टर्ब करने वाले बोल से अपने को मुक्त करो। व्यर्थ बोल मुक्त। फिर देखो अव्यक्त फरिश्ता बनने में आपको बहुत मदद मिलेगी।  *बोल की इकानामी करोअपने बोल की वैल्यु रखो।* जैसे महात्माओं को कहते हैं ना-सत्य वचन महाराज तो आपके बोल सदा सत वचन अर्थात् कोई न कोई प्रीत कराने वाले वचन हो। किसको चलते-फिरते हंसी में कह देते हो - ये तो पागल हैये तो बेसमझ हैऐसे कई शब्द बापदादा अभी भूल गये हैं लेकिन सुनते हैं। तो *ब्राह्मणों के मुख से ऐसे शब्द निकलना ये मानों आप सतवचन महाराज वालेकिसी को श्राप देते हो। किसको श्रापित नहीं करो, सुख दो।*

➳ _ ➳  *युक्तियुक्त बोल बोलो और काम का बोलोव्यर्थ नहीं बोलो।* तो जब बोलना शुरु करते हो तो एक घण्टे में चेक करो कि कितने बोल व्यर्थ हुए और कितने सत वचन हुए? *आपको अपने बोल की वैल्यु का पता नहीं, तो बोल की वैल्यु समझो। अपशब्द नहीं बोलो, शुभ शब्द बोलो।*

✺   *ड्रिल :-  "व्यर्थ बोल मुक्त बन, युक्तियुक्त बोल बोलना"*

➳ _ ➳  *बाबा के महावाक्य हैं "मीठे बच्चे" यह बोल सुनते ही मन ख़ुशी में झूमने लगता हैं...* कितना प्यार भरा संबोधन बाबा के बच्चों के प्रति... मीठे बच्चे... लाडले बच्चे... सिकीलधे बच्चे... अनहद प्यार... प्यार के सागर में हम बच्चे हिंडोले लेते ही रहते है... प्यार का सागर मेरा पिता... मैं उनकी संतान... मास्टर प्यार की सागर... उनके गुणों को ग्रहण करती जा रही हूँ... मुरली रूपी महावाक्यों को अपने स्मृति पटल पर सुनहरे अक्षरों से अंकित करती मैं आत्मा... *संगमयुगी श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ योगी आत्मा बनने के पुरुषार्थ में मंसा वाचा कर्मणा समर्पित होती जा रही हूँ...* कल्पवृक्ष के बीजरूप मैं आत्मा... अपने वचनों से सभी आत्माओं को सुख शांति का वर्सा देती जा रही हूँ...

➳ _ ➳  *बाबा के कमरे में... आशीर्वादों से परिपूर्ण होने की आशा लिए बैठी मैं आत्मा... एकाग्रचित होकर सिर्फ एक बाप को याद करती हूँ...* चंचल मन... व्यर्थ की... पास्ट की बातों में उलझ जाता है... मैं बार बार चंचल मन को कंट्रोल करने की कोशिश में असफल हो जाती हूँ... और दुःखी व्यथित नैनों से बापदादा को निहारती रहती हूँ... मन के भाव को जान बापदादा मुझे एक सीन दिखा रहे हैं... मैं आत्मा देखती हूँ अपने आपको गुस्से में लाल लाल... अपवित्र... असभ्य बोल युक्त वाणी... अपशब्दों की झड़ी लगाये हुए... *तलवार की धार के जैसी बोली... और सुनने वाला अश्रुओं से भीगा हुआ... अशांति का माहौल... दुःख का साम्राज्य छा गया था...*

➳ _ ➳  मैं आत्मा अश्रुभीनी आँखों से यह सीन देख रही थी... क्या मेरा ऐसा दुःव्यवहार था... क्या मैं ऐसे श्रापित बोल बोलती थी... *कहाँ मैं संगमयुगी ब्राह्मण आत्मा और कहाँ मैं गुस्से के विकारों में लथपथ...* बाबा के कमरे में बैठी मैं आत्मा... यह सीन देख कर आँखों से गंगा जमना बह रही थी... ऐसा मेरा विकारी रूप देख कर मैं आत्मा विचलित नजरों से बापदादा को देखती हूँ... और मन ही मन अपने दुष्कर्तव्यों की क्षमा याचना मांगती हूँ... *अश्रुभीनि आँखों से मैं आत्मा... भावपूर्ण... सच्चे मन से सभी आत्माओं से माफ़ी मांगती हूँ... और देखती हूँ बापदादा के चेहरे पर ख़ुशी की झलक दिखाई दे रही हैं...*

➳ _ ➳  बापदादा से प्यार भरी झरमर बरसती किरणों को अपने में धारण कर मैं आत्मा... अपने विकारों से मुक्त होती जा रही हूँ... गुस्से के... अपवित्र बोल के कड़े संस्कारों को बापदादा की परम पवित्र किरणों से स्वाहा करती जा रही हूँ... *मुरली रूपी ज्ञान धारा को अपने ब्राह्मण योगी जीवन में चरितार्थ करती जा रही हूँ... अपने ही कुसंस्कारों की अर्थी जलाकर मैं आत्मा पवित्रता... शांति के शिखर पर बैठ जाती हूँ...* मन की गहराईयों में भी अंश मात्र सूक्ष्म पाप के बीज न रहे ऐसे अपने आप को अग्नि परीक्षा रूपी योग अग्नि में स्वाहा करती जा रही हूँ...

➳ _ ➳  *बाबा के कमरे में बैठी मैं आत्मा... आज बापदादा से एक प्रॉमिस करती हूँ और कहती हूँ, "बाबा आज से जो बाप के बोल वह मेरे बोल... जो बाप का संकल्प वह मेरा संकल्प..."* संगमयुगी ब्राह्मण आत्मा के मुख से सदा ही शुभ भावना रूपी मोती ही बरसेंगे... *अकल्याणकारी पर भी कल्याण की दृष्टि रख अपने पूर्वज होने का सबूत दूँगी...* विश्वकल्याणकारी स्टेज की उच्च शिखर पर विराजमान मैं सतयुगी आत्मा... आशीर्वादों... वरदानों से सब को भरपूर करती रहूँगी... *वरदानी मूर्त बन कर स्वयं में बापदादा की प्रत्यक्षता करवाती रहूँगी...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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