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 21 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बेहद के बाप के सतह सर्व समबंधो की अनुभूति की ?*

 

➢➢ *याद से पुरानी खाद निकाली ?*

 

➢➢ *कलियुगी दुनिया के दुःख अशांति का नज़ारा देखा ?*

 

➢➢ *वाणी के सतह वृत्ति से सेवा की ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *आपके बोल, कर्म और वृत्ति से हल्केपन का अनुभव हो। ऐसे नहीं, मैं तो हल्का हूँ लेकिन दूसरे मेरे को नहीं समझते, पहचानते नहीं। अगर नहीं पहचानते तो आप अपने विश्व पॉवर से उन्हों को भी पहचान दो। 95 परसेन्ट सबके दिलपसन्द बनो।* आपके कर्म, वृत्ति उसको परिवर्तन करे। इसमें सिर्फ सहनशक्ति को धारण करने की आवश्यकता है।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं संगमयुगी कल्याणकारी आत्मा हूँ"*

 

  अपने को सदा संगमयुगी कल्याणकारी आत्मायें अनुभव करते हो? संगमयुग एक ही इस सृष्टि-चक्र में ऐसा युग है जो चढ़ती कला का युग है। और युग धीरे-धीरे नीचे उतारते हैं। सतयुग से कलियुग में आते हो तो कितनी कलायें कम हो जाती हैं? तो सभी युगों में उतरते हो और संगमयुग में चढ़ते हो। चढ़ने के लिए भी लिफ्ट मिलती है। सभी को लिफ्ट मिली है ना। बीच में अटक तो नहीं जाती है? ऐसे तो नहीं-कभी अटक जाओ, कभी लटक जाओ। ऐसी लिफ्ट मिलती है जो कभी भी न लटकाने वाली है, न अटकाने वाली है। *देखो, कितने लक्की हो जो कल्याणकारी युग में आये और कल्याणकारी बाप मिला। आपका भी आक्यूपेशन है विश्व-कल्याणकारी। तो बाप भी कल्याणकारी, युग भी कल्याणकारी, आप भी कल्याणकारी और आपका आक्यूपेशन भी विश्व-कल्याणकारी।*

 

  तो कितने लक्की हो! अच्छा, यह लक्क कितना समय चलेगा? सारा कल्प या आधा कल्प? जो कहते हैं आधा कल्प, वह हाथ उठाओ। जो कहते हैं सारा कल्प, वह हाथ उठाओ। सभी राइट हो। क्योंकि आधा कल्प राज्य करेंगे, आधा कल्प पूज्य बनेंगे। तो यह भी लक्क ही है। *सदा मैं विश्व-कल्याणकारी आत्मा हूँ-इस स्मृति में रहने से जो भी कर्म करेंगे वह कल्याणकारी करेंगे। कल्याणकारी समझने से संगमयुग जो कल्याणकारी है वह भी याद आता है और कल्याणकारी बाप भी स्वत: याद आता है। सिर्फ कल्याणकारी नहीं, विश्व-कल्याणकारी बनना है।*

 

  सबसे बड़े भाग्य की निशानी यह है जो संगमयुग पर साधारण आत्मा बने हो। अगर साहूकार होते तो बाप के नहीं बनते, सिर्फ कलियुग की साहूकारी ही भाग्य में मिलती। तो साधारण बनना अच्छा है ना। *स्थूल धन से साधारण हो लेकिन ज्ञान-धन से साहूकार हो। तो खुशी है ना कि बाप ने सारे विश्व में से हमें अपना बनाया। सारा दिन खुशी में रहते हो? मुरली रोज सुनते हो? कभी मिस तो नहीं करते? मिस करते हो तो फालो फादर नहीं हुआ ना। ब्रह्मा बाप ने एक दिन भी मुरली मिस नहीं की।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा, सदा हर कदम में, हर संकल्प में उडती कला वाले बच्चों को देख रहे हैं। सेकण्ड में अशरीरी भव का वरदान मिला और सेकण्ड में उडा।' *अशरीरी अर्थात ऊँचा उडना। शरीर भान में आना अर्थात पिंजडे का पंछी बनना।*

 

✧  इस समय सभी बच्चे अशरीरी भव के वरदानी, उडते पंछी बन गये हो। यह संगठन स्वतन्त्र आत्मायें अर्थात उडते पंछियों का है। सभी स्वतन्त्र हो ना? *ऑर्डर मिले अपने स्वीट होम में चले जाओ तो कितने समय में जा सकते हो?*

 

✧  सेकण्ड में जा सकते हो ना। *आर्डर मिले, अपने मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज द्वारा, अपनी सर्वशक्तियों की किरणों द्वारा अंधकार में रोशनी लाओ, ज्ञान सूर्य बन, अंधकार को मिटा लो,* तो सेकण्ड में यह बेहद की सेवा कर सकते हो? ऐसे मास्टर ज्ञान सूर्य बने हो?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *एक ही विश्व की हास्पिटल है तो चारों ओर के रोगी कहाँ जायेंगे? एमर्जेन्सी केसेज़ की लाइन होगी। उस समय क्या करेंगे? अमर भव का वरदान तो देंगे ना।* स्व अभ्यास के आक्सीजन द्वारा साहस का श्वास देना पड़ेगा। *होपलेस केस अर्थात् चारो ओर के दिल शिकस्त के केसेज़ ज्यादा आयेंगे। ऐसी होपलेस आत्मओं को साहस दिलाना यही श्वाँसस भरना है। तो फटाफट आक्सीजन देना पड़ेगा।* उस स्व अभ्यास के आधार पर ऐसी आत्माओं को शक्तिशाली बना सकेंगे! *इसलिए फुर्सत नहीं है, यह नहीं कहो। फुर्सत है तो अभी है फिर आगे नहीं होगी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पवित्रता से खुबसूरत देवी-देवता बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अमृतवेले के समय अमृत पान करने चार धामों की यात्रा पर निकल पड़ती हूँ...* मन-बुद्धि के रॉकेट में बैठ अपने घर मधुबन पहुँच जाती हूँ... बाबा का कमरा, बाबा की कुटिया और हिस्ट्री हाल की रूहानी यात्रा करते हुए मैं आत्मा शांति स्तम्भ के सामने बैठ जाती हूँ... *मुस्कुराते हुए, दोनों हाथों को फैलाए मेरे प्राण प्यारे बाबा मुझे अपनी बाँहों में ले लेते हैं और शांति की ठंडी-ठंडी किरणें बरसाते हुए मीठी शिक्षाएं देते हैं...*

 

  *पवित्रता के सागर मेरे प्यारे बाबा पवित्र किरणों को बरसाते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे.... ईश्वर पिता की गोद में बैठ कमल फूल सी पवित्रता से सज जाओ... *मनसा वाचा कर्मणा पवित्र होकर सम्पूर्ण पवित्रता से विश्व मालिक बन खुशियो में झूम जाओ... पावनता से सजधज कर ईश्वर पिता के सहयोगी बन... सदा के सुखो में मुस्कराओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा लक्ष्य सोप से अपने मटमैलेपन को धोकर पवित्रता का कवच धारण करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी फूलो सी गोद में, रूहानी गुलाब सी खिल उठी हूँ... *आपकी यादो में पायी पावन खुशबु से... पूरे विश्व को सुवासित कर रही हूँ... पवित्रता की सुगन्ध में हर दिल को महका रही हूँ...*

 

  *पवित्रता के सितारों से सजाकर मेरे जीवन को कंचन बनाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *फूल से बच्चों को दुखो के जंगल में भटकते देख... विश्व पिता को भला कैसे चैन आये... बच्चों के सुख की चाहना दिल में लिये धरा पर उतर आये... फिर से पावनता में खिलाकर अनन्त सुखो का अधिकारी सजाये...* तब कही विश्व पिता करार सा पाये... पवित्रता की चुनर ओढ़ा कर देव तुल्य बनाये...

 

_ ➳  *पवित्रता के मैनर्स धारण कर हीरे जैसा नया जीवन पाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा देह के भान से निकल पवित्रता से सजकर पुनः देवताई सुखो की अधिकारी बन रही हूँ...* प्यारे बाबा विश्व परिवर्तन के महान कार्य में... पावनता से सहयोगी बनकर ईश्वरीय दिल जीतने वाली भाग्यवान हो गयी हूँ...

 

  *रूहानी नजरों से निहाल कर पावन बनाते हुए मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... देह के झूठे मटमैले आवरण से बाहर निकल... अपने दमकते स्वरूप को स्मृतियों में भर लो... *ईश्वरीय बाँहों में पावनता से भरपूर हो जाओ... विकारो की कालिमा से मुक्त होकर, उज्ज्वल धवल तेजस्वी रूप में खिल कर... पावन तरंगो से विश्व धरा को तरंगित करो...*

 

_ ➳  *पावनता के रिमझिम से अतीन्द्रिय सुखों में झूमती हुई, बाबा को शुक्रिया करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा पावनता को पाकर कितनी अनोखी और अमूल्य हो गयी हूँ... आपने मुझे कौड़ी से हीरे सा बनाकर दिल तख्त पर सजा लिया है...* मुझे दिव्यता से भरकर देवताई सुखो से सजा दिया है... मै आत्मा आपकी रोम रोम से ऋणी हूँ...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- याद से पुरानी खाद निकालनी है*"

 

_ ➳  एक मंदिर के सामने से गुजरते हुए, मन्दिर के अंदर एकत्रित भक्तो की भीड़ को देख कर मेरे कदम वही रुक जाते हैं और मन ही मन *मैं विचार करती हूं कि कितनी आकर्षणमयता है इन देवी देवताओं के जड़ चित्रों में, कि इनके दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं* तभी तो इनके दर्शन के लिए भक्त घण्टो लम्बी - लम्बी कतारों में खड़े रहते हैं। यही विचार करते - करते मैं अपना देवताई स्वरूप धारण कर मन्दिर के अंदर पहुंच जाती हूँ और *अष्टभुजाधारी दुर्गा की जड़ मूर्ति में जा कर विराजमान हो जाती हूँ*।

 

_ ➳  मैं देख रही हूं मेरे सामने मेरे भक्तों की भीड़ लगी हुई है जो मेरी जयजयकार करते हुए मुझ पर पुष्पों की वर्षा कर रहें हैं। ढोल, मंजीरे बजाते हुए मेरी आरती गा रहें हैं। *अपना वरदानीमूर्त हाथ ऊपर उठाये मैं उन सबकी मनोकामनाओं को पूर्ण कर रही हूं*। मेरे दर्शन पा कर भाव - विभोर हो कर अब सभी भक्त वापिस अपने घर लौट रहे हैं।

 

_ ➳  अपने भक्तों को दर्शन दे कर,उनकी झोली वरदानों से भरपूर करके मैं मन्दिर से बाहर आ जाती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित हो कर चलते - चलते मैं फिर से विचार करती हूँ कि मेरे चैतन्य कर्मो का यादगार ही तो मेरे यह जड़ चित्र है। और *इस समय धारण किये हुए दैवी गुणों के कारण ही तो द्वापर में मेरा पूजन और गायन होगा*। इसलिए अब मुझे याद की अग्नि से आत्मा में पड़ी खाद को निकाल, सम्पूर्ण पावन बनना है और साथ ही साथ दैवी गुणों को धारण कर सदा देवताओ जैसा मुस्कराते रहना है।

 

_ ➳  मन में लक्ष्मी नारायण जैसा श्रेष्ठ बनने का दृढ़ संकल्प करते हुए मैं चलते - चलते अपने घर पहुंच जाती हूँ। आत्मा में पड़ी 63 जन्मो के विकर्मों की खाद को जल्दी से जल्दी योग अग्नि में भस्म करने के किये अब मैं अशरीरी हो, अपने पतित पावन, पवित्रता के सागर शिव बाबा की अव्यभिचारी याद में बैठ जाती हूँ। *बाबा की मीठी शक्तिशाली याद मुझमे असीम शक्ति का संचार करने लगती है और मैं आत्मा लाइट माइट बन हल्की हो कर अपनी साकारी देह से बाहर निकल आती हूँ*।देह और देह के हर बन्धन से मुक्त मैं आत्मा अब धीरे धीरे ऊपर की ओर उड़ रही हूँ।

 

_ ➳  मैं ज्योति बिंदु चमकता हुआ सितारा प्रकृति के पांचों तत्वों को पार कर, फरिश्तों की दुनिया से परे अब पहुंच गई अपने शिव पिता परमात्मा के पास उनके घर परमधाम। यहां मैं मास्टर बीज रूप आत्मा बीज रूप अपने शिव पिता परमात्मा के सम्मुख हूँ। *बिंदु का बिंदु से मिलन हो रहा है। कितना आलौकिक और दिव्य नजारा है। चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश दिखाई दे रहा है। बिंदु बाप से आ रही सर्वशक्तियों की ज्वलंत किरणे निरन्तर मुझ बिंदु आत्मा पर पड़ रही हैं*। मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ा हुआ विकारों का किचड़ा इन ज्वलंत शक्तिशाली किरणों के पड़ने से भस्म हो रहा है। आत्मा में पड़ी खाद जैसे - जैसे योग अग्नि में जल रही है वैसे - वैसे मैं आत्मा हल्की और चमकदार बनती जा रही हूँ।

 

_ ➳  हल्की और चमकदार बन कर मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया मे लौट रही हूं। अपने साकारी देह में विराजमान हो कर अब मैं फिर से इस सृष्टि रंग मंच पर अपना पार्ट बजा रही हूं। *कर्मयोगी बन हर कर्म करते बाबा की याद से मैं स्वयं को प्यूरीफाई कर रही हूं। सदा कम्बाइंड स्वरूप में रहने से परमात्म लाइट निरन्तर मुझ आत्मा में समाकर मुझे पावन बना रही है*। पावन बनने के साथ साथ अपने लक्ष्य को सदा स्मृति में रख अब मैं दैवी गुणों को जीवन मे धारण कर देवताई सम्राज्य में जाने का पुरुषार्थ कर रही हूँ।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं कलियुगी दुनिया के दुःख अशांति का नजारा देखते हुए सदा साक्षी भाव मे रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं बेहद की वैरागी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव धरनी तैयार करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा वाणी के साथ वृत्ति से सेवा करती हूँ  ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

_ ➳  ब्रह्मा बाप को देखा - *ब्रह्मा बाप ने अपने को कितना नीचे किया - इतना निर्मान होकर सेवाधारी बना जो बच्चों के पाँव दबाने के लिए भी तैयार। बच्चे मेरे से आगे हैंबच्चे मेरे से भी अच्छा भाषण कर सकते हैं।* पहले मैं'' कभी नहीं कहा। आगे बच्चे, पहले बच्चेबड़े बच्चे कहातो स्वयं को नीचे करना नीचे होना नहीं हैऊँचा जाना है। तो इसको कहा जाता है - सच्चे नम्बरवन योग्य सेवाधारी'। लक्ष्य तो सभी का ऐसा ही है ना!

 

✺   *"ड्रिल :- ब्रह्मा बाप समान निर्माणचित होकर सेवा करना।"*

 

_ ➳  गुलाबी गुलाबी सा मौसम, सर्द ठंडी हवाएं, लम्बे से खजूर के पेड़ पर इठलाती हुई सर्द हवाएँ और गुलाबी समन्दर की अठखेलियां करती हुई लहरे... और उस स्थान पर मैं एक ऊँचे से मिट्टी के पहाड़ पर बैठी हुई हूँ... जहां से मैं ये वातावरण फील करती हूं... चारों तरफ भीनी भीनी मोगरे के फूलों की खुशबू फैल रही है... और जैसे-जैसे यह खुशबू हवाओं में बिखर रही है... यहां का वातावरण एकदम खुशनुमा और शीतलता पूर्वक लग रहा है... और मैं इस अवस्था में परमपिता से योग लगा रही हूं... *हल्की खुली हुई आंखों से मैं अपने आपको आत्मिक रूप में देख रही हूं... और परमपिता से सीधा संपर्क में आने से मेरी आत्मा से अनेक रंग बिरंगी किरणें निकलकर इस वातावरण में फैल रही है...*

 

_ ➳  और कुछ समय बाद मैं अपने आप को खुशबू में परिवर्तन कर उड जाती हूं... और एक ऐसे स्थान पर आ पहुँचती हूं... यहां से मुझे इस दृश्य का एकदम साफ नजारा दिखाई दे रहा है... मैं अपनी खुशबू को बहुत गहराई से अनुभव कर रही हूं... और *अपनी खुशबू को एक ऐसे स्थान पर अनुभव करती हूं... जहां पर एक आश्रम में गुरु अपने शिष्यों को नई शिक्षा दे रहे हैं... जिसमे गुरु आश्रम में स्वयं झाड़ू निकाल रहे हैं और सभी विद्यार्थी खड़े होकर उन्हें देख रहे हैं... मैं अपनी खुशबू से और बाबा से साकाश लेते हुए उस आश्रम में अपनी पवित्र खुशबूनुमा किरणें फैला रही हूं...*

 

_ ➳  मेरी खुशबू जैसे ही गुरूजी के पास जाकर उन्हें छूती है तो उन्हें मेरे वहां होने का आभास होता है... और मेरी भावनाओं को समझते हुए मुझे कहते हैं *कि कई बार हमें दूसरों को उनसे नीचे दिखाना पड़ता है क्योंकि इससे उनकी स्थिति  हमसे ऊपर होती है... और वह अपने आप को और भी तीव्र पुरुषार्थी समझने लगते हैं... और इस आभास से वह आगे बढ़ने का रास्ता सहज ही खोज लेते हैं... इसलिए मैं आज यहां अपने शिष्यों को स्वयं आश्रम के छोटे-छोटे काम करना सिखा रहा हूं... मुझे देखकर उन्हें यह आभास हो रहा है कि ये हमसे ऊंची स्थिति में होने के कारण भी इतना छोटा काम कर रहे हैं... ताकि हमें कुछ सिखा सके... जिससे हम अपने आपको अब और आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे...* 

 

_ ➳  इतना सुनकर मैं वहां से अपनी खुशबू बिखेरते हुए उसी स्थान पर आ जाती हूं... जहां पर गुलाबी गुलाबी मौसम हो रहा है... समुंद्र की गुलाबी लहरें हवाओं से अठखेलियां खेल रही है... मैं अभी खुली हुई आंखों से अपने परमपिता से योग लगा रही हूं और अपनी गुलाबी किरणें इस सुंदर वातावरण में बिखेर रही हूं... *मैं बाबा से आती हुई किरणों को अपने अंदर समाती जा रही हूं... और बाबा से मन ही मन यह कह रही हूं... बाबा आपकी यह अद्भुत दी हुई अनमोल शिक्षाएं मैं अपने अंदर हमेशा के लिए संभाल लूंगी... और अपने चाल चलन और पुरुषार्थ से हमेशा आपका नाम बाला करूंगी... इन संकल्पों से मेरी आंतरिक उर्जा बढ़ती जा रही है... मेरा यह शरीर हवा के जैसा हल्का लग रहा है... और मुझे आभास हो रहा है... मानो मैं स्वयं परमपिता की कोमल गोद में बैठकर उनसे रूह रूहान कर रही हूं...*

 

_ ➳  और मैं अपने सामने एक हवा के समान हल्की स्थिति को अनुभव करते हुए... ब्रह्मा बाबा को अपने सामने ईमर्ज करती हूं... और उनसे दृष्टि लेते हुए मैं अपने आप को पूर्ण रूप से सफेद प्रकाशमयी अवस्था को अनुभव करती हूं... और *मैं हमेशा यह प्रयास करने का संकल्प लेती हूं... कि आज से जो भी आत्माएं मेरे सामने आएंगी मेरे साथ संपर्क में आएंगे उन्हें हमेशा परमात्मा के बच्चे कहकर संबोधित करूंगी... सदा निर्माणचित् अवस्था में स्थित रहूंगी... अपने में इन संस्कारों का निर्माण करूँगी... और इन कुछ संकल्पों के बाद मैं अपने आप को उस गुलाबी वातावरण के अंदर पूरी तरह समा लेती हूं... और परमात्मा की गोद में झूला झूलने लगती हूं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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