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 22 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *इस पुरानी दुनिया में कोई भी आश तो नहीं रखी ?*

 

➢➢ *पार्टी आदि में जाते बहुत युक्ति से चले ?*

 

➢➢ *बुराए में भी बुराई को न देख अच्छाई का पाठ पड़ा ?*

 

➢➢ *साइलेंस की शक्ति से बुराई को अच्छाई एं परिवर्तित किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  विशेष याद की यात्रा को पॉवरफुल बनाओ, ज्ञान-स्वरुप के अनुभवी बनो। *आप श्रेष्ठ आत्माओं की शुभ वृत्ति व कल्याण की वृत्ति और शक्तिशाली वातावरण अनेक तड़पती हुई, भटकती हुई, पुकार करने वाली आत्माओं को आनन्द, शान्ति और शक्ति की अनुभूति करायेगी।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं श्रेष्ठ भाग्य की खुशी के गीत गाने वाली श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  सदा अपने श्रेष्ठ भाग्य के गीत स्वत: ही मन में बजते रहते हैं? यह अनादि अविनाशी गीत है। इसको बजाना नहीं पड़ता लेकिन स्वत: ही बजता है। सदा यह गीत बजना अर्थात् सदा ही अपने खुशी के खजाने को अनुभव करना। सदा खुश रहते हो? ब्राह्मणों का काम ही है खुश रहना और खुशी बांटना। इसी सेवा में सदा बिजी रहते हो? वा कभी भूल भी जाते हो? जब माया आती है फिर क्या करते हो? *जितना समय माया रहती है उतना समय खुशी का गीत बन्द हो जाता है। बाप का सदा साथ है तो माया आ नहीं सकती। माया आने के पहले बाप का साथ अलग करके अकेला बनाती है, फिर वार करती है। अगर बाप साथ है तो माया नमस्कार करेगी, वार नहीं करेगी।*

 

  तो माया को जब अच्छी तरह से जान गये हो कि यह दुश्मन है, तो फिर आने क्यों देते हो? साथ छोड़ देते हो ना, इसलिए माया को आने का दरवाजा मिल जाता है। *दरवाजे को डबल लॉक लगाओ, एक लॉक नहीं। आजकल एक लॉक नहीं चलता। तो डबल लॉक है-याद और सेवा। सेवा भी निःस्वार्थ सेवा-यही लॉक है। अगर निःस्वार्थ सेवा नहीं तो वह लॉक ढीला लॉक हो जाता है, खुल जाता है। याद भी शक्तिशाली चाहिए। साधारण याद है तो भी लॉक नहीं कहेंगे।* तो सदा चेक करो-याद तो है लेकिन साधारण याद है या शक्तिशाली याद है? ऐसे ही, सेवा करते हो लेकिन निःस्वार्थ सेवा है या कुछ न कुछ स्वार्थ भरा है? सेवा करते हुए भी, याद में रहते हुए भी यदि माया आती है तो जरूर सेवा अथवा याद में कोई कमी है। 

 

  सदा खुशी के गीत गाने वाली श्रेष्ठ भाग्यवान आत्माएं हैं-इस स्मृति से आगे बढ़ो। यथार्थ योग वा यथार्थ सेवा-यह निशानी है निर्विग्न रहना और निर्विग्न बनाना। निर्विग्न हो या कभी-कभी विघ्न आता है? फिर कभी पास हो जाते हो, कभी थोड़ा फेल हो जाते हो। कोई भी बात आती है, उसमें अगर किसी भी प्रकार की जरा भी फीलिंग आती है-यह क्यों, यह क्या..... तो फीलिंग आना माना विघ्न। *सदैव यह सोचो कि व्यर्थ फीलिंग से परे, फीलिंग-प्रूफ आत्मा बन जायें। तो मायाजीत बन जायेंगे। फिर भी, देखो-बाप के बन गये, बाप का बनना-यह कितनी खुशी की बात है! कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा कि भगवान् के इतने समीप सम्बन्ध में आयेंगे! लेकिन साकार में बन गये!* तो क्या याद रखेंगे? सदा खुशी के गीत गाने वाले। यह खुशी के गीत कभी भी समाप्त नहीं हो सकते हैं।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *संकल्प किया और स्थित हुआ - इसी को कहा जाता है बाप समान सम्पूर्ण अवस्था, कर्मातीत अंतिम स्टेज।* तो अपने आप से पूछो - अन्तिम स्टेज के कितना समीप पहुँचे हो? *जितना संपूर्ण अवस्था के नजदीक होंगे  अर्थात् बाप के नजदीक होंगे उसी अनुसार भविष्य प्रालब्ध में भी राज्य अधिकारी होंगे।*

 

✧  साथ-साथ आदि भक्त जीवन में भी समीप सम्बन्ध में होंगे। पूज्य अथवा पूजारी दोनों जीवन में साकार बाप के समीप होंगे अर्थात आदि आत्मा के सारे कल्प में सम्बन्ध वा सम्पर्क में रहेंगे। *हीरो पार्टधारी आत्मा के साथ-साथ आप आत्माओं का भी भिन्न नाम-रूप से विशेष पार्ट होगा।*

 

✧  अब के सम्पूर्ण स्थिति के नज़दीक से अर्थात बापदादा की समीपता के आधार से सारे कल्प की समीपता का आधार है इसलिए *जितना चाहो उतना अपनी कल्प की प्रालब्ध बनाओ।* समीपता का आधार श्रेष्ठता है।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *सेवा का कितना भी विस्तार हो लेकिन स्वयं की स्थिति सार रूप में हो। अभी-अभी डायरेक्शन मिले एक सेकण्ड में मास्टर बीज हो जाओ तो हो जाओ। टाइम न लगे। सेकण्ड की बाज़ी है। एक सेकण्ड की बाज़ी से सारे कल्प की तकदीर बना सकते हो। जितनी चाहो उतनी बनाओ।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप का मददगार बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा अमृतवेले उठ मीठे बाबा से मिलने की तमन्ना में फ़रिश्ता बन उड़ चलती हूँ मधुबन बाबा की कुटिया में... मीठे बाबा अपनी मीठी मुस्कान से मेरा स्वागत करते हैं और अपनी मीठी दृष्टि से मुझे निहाल करते हैं...* बाबा की दृष्टि से मुझ आत्मा के सूक्ष्म विकार, पुराने स्वभाव-संस्कार दैवीय गुणों में परिवर्तित होने लगे हैं... मुझ आत्मा की काया दिव्यता से चमकने लगी है... *फिर प्यारे बाबा मुझे अपने साथ रूहानी सैर पर ले जाते हैं और तीनों कालों के दर्शन कराते हैं... फिर ज्ञान सागर बाबा मुझ पर ज्ञान की बरसात करते हैं...*

 

  *भारत को दैवी स्वराज्य बनाने में मददगार बन श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे...  ईश्वर पिता आप बच्चों के सुखो के लिए हथेली पर स्वर्ग धरोहर लाया है... *स्वर्ग के फाउंडेशन में मददगार बन सदा का सुनहरा भाग्य बनाओ... ईश्वरीय राहो पर चलकर असीम खुशियो में मुस्कराओ...* श्रीमत के हाथो में हाथ देकर, सदा के सुखो में झूम जाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा बेहद के सर्विस में जुटकर बाबा की राईट हैण्ड बन विश्व का कल्याण करते हुए कहती हूँ:-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपकी यादो में उज्ज्वल भविष्य को पाती जा रही हूँ... *ईश्वर पिता की मदद कर, मीठा प्यारा भाग्य सजा रही हूँ... श्रीमत के साये में विकारो की कालिमा से महफूज होकर,सदा की निश्चिन्त हो गयी हूँ..."*

 

  *मेरे भाग्य के सितारे को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे...  ईश्वर पिता को खोज खोज कर थक से निकले थे कभी, आज उसकी मदद करने वाले खुबसूरत भाग्य के मालिक हो गए हो... *श्रेष्ठ भाग्य को लिखने की कलम पा गए हो... और अनन्त खुशियो को बाँहों में भरकर मुस्करा रहे हो... भगवान की मदद करने वाले महान हो गए हो..."*

 

_ ➳  *मीठे बाबा के प्यार के फव्वारे में खुशियों की चरमसीमा पर पहुंचकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा अपनी ही मदद को बेजार थी कभी... आपकी मदद को हर पल तरस रही थी... *आज आपका सारा प्यार आँचल में भरकर मुस्करा रही हूँ... मीठे बाबा भाग्य से युँ सम्मुख पाकर आपके प्यार में बावरी हो गयी हूँ... और असीम खुशियो में नाच रही हूँ..."*

 

  *काँटों के जंगल को फूलों का बगीचा बनाकर रूहानी फूलों का गुलदस्ता तैयार करते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वर पिता की श्रीमत पर चलकर जीवन को नये आयामो पर पहुँचाओ... मनुष्य मत ने कितना निस्तेज और बेहाल किया है... *अब श्रीमत के हाथो में पलकर फूलो सा खिलखिलाओ... दिव्य गुणो से सज संवर कर देवताई सौभाग्य को पाओ... सदा खुशियो में गुनगुनाओ..."*

 

_ ➳  *करावनहार के हाथों को थाम श्रीमत के मार्ग पर चलते हुए मंजिल के समीप पहुंचती हुई मैं आत्मा कहती हूँ:-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा अदनी सी, भगवान की कभी मददगार बनूंगी, ऐसा तो मीठे बाबा ख्वाबो में भी न सोचा था... *आज आपकी मदद का भाग्य पाकर, सतयुगी सुखो का हक पा रही हूँ... श्रीमत का हाथ और ईश्वरीय प्यार पाकर, अपना भाग्य शानदार बना रही हूँ..."*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कभी भी कुल कलंकित नही बनना है*"

 

_ ➳  अपने प्यारे बापदादा की आशाओं को पूरा करने की मन ही मन स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा करते हुए मैं अपने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों को स्मृति में लाती हूँ और अपने ऊँचे ब्राह्मण कुल के बारे में विचार करती हूँ कि कितना महान और ऊँचा कुल हैं मेरा, जिसे स्वयं भगवान ने अपने मुख कमल से रचा है। *वो ब्राह्मण कुल जिसे लौकिक रीति से भी आज दिन तक सम्माननीय माना जाता है। आज भी हर शुभ कार्य ब्राह्मण के हाथों सम्पन्न करवाया जाता है*। वास्तव में ये गायन, ये पूजन हम ब्राह्मण बच्चो के श्रेष्ठ कर्मो का ही तो यादगार है जो आज भी भक्ति मार्ग में ब्राह्मण कुल को सर्वश्रेष्ठ कुल मान कर ब्राह्मण को देवता का दर्जा दिया जाता है। *कितनी महान भाग्यवान हूँ मै आत्मा जो भगवान द्वारा रचे सबसे ऊँचे ब्राह्मण कुल का मैं हिस्सा हूँ*।

 

_ ➳  अपने इस ऊँच ब्राह्मण कुल की मर्यादा को सदा बनाये रखना मेरा परम कर्तव्य है, मन ही मन स्वयं से मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि अपने इस ऊँच ब्राह्मण कुल को सदा स्मृति में रखते हुए मैं हर कर्म ऊँचा और श्रेष्ठ ही करूँगी। *कभी भी कुल कलंकित बनने वाला कोई कर्म मैं नही करुँगी। इसी दृढ़ प्रतिज्ञा और दृढ़ संकल्प के साथ अपने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, अपने ऊँच ब्राह्मण कुल के जन्मदाता अपने प्यारे पिता का दिल से शुक्रिया अदा करके, मन को सुकून देने वाली उनकी मीठी याद में मैं अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करती हूँ* और कुछ ही पलों में नश्वर देह के भान से मुक्त एक अति न्यारी और प्यारी अशरीरी स्थिति में स्थित हो जाती हूँ।

 

_ ➳  हर बन्धन से मुक्त यह अति प्यारी अवस्था एक विचित्र हल्केपन का मुझे अनुभव करवा रही है। धरती का आकर्षण पीछे छूटता जा रहा है और कोई चुम्बकीय शक्ति मुझे ऊपर खींच रही है। *ऐसा लग रहा है जैसे मुझ आत्मा को पंख मिल गए है और मैं आत्मा उड़ रही हूँ। अपने सामने आने वाली हर वस्तु को साक्षी भाव से देखते हुए मैं इस उन्मुक्त उड़ान का भरपूर आनन्द ले रही हूँ और धीरे - धीरे उड़ती हुई ऊपर आकाश की ओर जा रही हूँ*। विशाल अंतहीन नीलगगन की सैर करते हुए इस नीलगगन के उस पार, फरिश्तो की दुनिया से ऊपर उस विशाल ब्रह्म तत्व में मैं प्रवेश करती हूँ जो मुझ आत्मा का घर है। *उस मूल वतन घर में जहाँ मेरे पिता रहते हैं वहाँ मैं आत्मा अब स्वयं को देख रही हूँ*।

 

_ ➳  शांति की एक ऐसी दुनिया जहाँ कोई आवाज नही, कोई संकल्प नही बस एक बेआवाज चुपी ही चारों और छाई हुई है। ऐसे अपने इस शांति धाम घर में आकर उस गहन शांति का मैं अनुभव कर रही हूँ जिस शांति की तलाश में मैं अनेकों जन्मों से भटक रही थी। *यहाँ चारों और फैले शांति के शक्तिशाली वायब्रेशन मुझे डीप साइलेन्स का विचित्र अनुभव करवा रहें हैं। इस डीप साइलेन्स में एक ऐसे सुख का मै अनुभव कर रही हूँ जिसका वर्णन नही किया जा सकता। गहन शांति की यह सुखमय अनुभूति एक अद्भुत शक्ति का मेरे अंदर संचार कर रही है*।

 

_ ➳  साइलेन्स की इस अनोखी शक्ति को स्वयं में भरकर अब मैं अपने प्यारे पिता के समीप पहुँचती हूँ और उनकी सर्वशक्तियों की किरणों की छत्रछाया के नीचे बैठ स्वयं को उनकी शक्तियों से भरपूर करके वापिस साकार लोक में लौट आती हूँ। अपने साकार शरीर रूपी रथ का आधार लेकर मैं अब फिर से सृष्टि पर अपना पार्ट बजा रही हूँ। "मैं सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण कुलभूषण आत्मा हूँ" इस श्रेष्ठ स्वमान को सदा स्मृति में रखते हुए अब मैं हर कर्म अपने जीवनदाता प्यारे शिव पिता की श्रीमत अनुसार कर रही हूँ*। इस बात का मैं विशेष ध्यान रखती हूँ कि अनजाने में भी मुझ से कभी कोई ऐसा कर्म ना हो जिससे  मेरे इस ऊँच ब्राह्मण कुल को कलंक लगे। *बाबा की शिक्षाओं को सदा स्मृति में रखते हुए, अपने ऊँच ब्राह्मण कुल के नशे में रहते हुए अपने हर कर्म को श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनाने और अपने कुल का नाम सदा ऊँचा रखने का ही पुरुषार्थ अब मैं कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं बुराई में भी बुराई को न देखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अच्छाई का पाठ पढ़ने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं अनुभवी मूर्त आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा साइलेन्स की शक्ति को यूज़ करती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा बुराई को अच्छाई में परिवर्तन कर देती हूँ  ।*

   *मैं सदा प्रसन्नचित्त आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ अमृतवेले से लेकर हर कर्म में चेक करो कि सुकर्म किया वा व्यर्थ कर्म किया वा कोई विकर्म भी किया? *सुकर्म अर्थात् श्रीमत के आधार पर कर्म करना। श्रीमत के आधार पर किया हुआ कर्म स्वत:ही सुकर्म के खाते में जमा होता है। तो सुकर्म और विकर्म को चेक करने की विधि यह सहज है। इस विधि के प्रमाण सदा चेक करते चलो।* अमृतवेले के उठने के कर्म से लेकर रात के सोने तक हर कर्म के लिए श्रीमत' मिली हुई है। उठना कैसे है, बैठना कैसे है, सब बताया हुआ है ना! अगर वैसे नहीं उठते तो अमृतवेले से श्रेष्ठ कर्म की श्रेष्ठ प्रालब्ध बना नहीं सकते। अर्थात् व्यर्थ और विकर्म के त्यागी नहीं बन सकते।

✺ *"ड्रिल :- अमृतवेले से लेकर रात्रि तक हर कर्म को अच्छे से चेक करना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा अपनी शिव मां की गोद में एक छोटा सा बच्चा बनकर खेल रही हूं... और मेरी मां मुझे सहला रही है, मुझे नींद दिलाने की कोशिश कर रही है, परंतु मैं गोद से नीचे उतरकर खेलने के लिए आतुर हो रही हूं... मेरी शिव मां मुझे खेलने के लिए इस धरा पर छोड़ देती है, मैं खेलने के लिए खुले मैदान में दौड़ने लगती हूं और अपने संगी-साथियों को इकट्ठा करती हूं... मेरे साथी मेरे पुकारने पर इकट्ठा हो जाते हैं और मैं उनको खेलने के लिए प्रेरित करती हूं... *जैसे ही हम खेलना प्रारंभ करते हैं तो हम इधर-उधर दिशाओं में भागने लगते हैं... जब हम इधर उधर दिशाओं में भाग रहे होते हैं तो मेरी शिव माँ मेरे लिए चिंतित होती है...*

➳ _ ➳ मेरी शिव मां अपनी चिंता को मिटाने के लिए एक तरकीब अपनाती है... हमारे पास आकर हमें एक जगह एकत्रित करती है और हमें एक जगह खड़े होने के लिए कहती है... *हम देखते हैं कि मेरी मां हमारे चारों तरफ़ एक लकीर खींच देती है और कहती है कि तुम्हें इस लकीर से बाहर नहीं आना है, जो भी खेल खेलना है इस लकीर के अंदर ही रहकर खेलना है... और कहती है... अगर तुमने किसी भी कारण इस लकीर से बाहर कदम रखे, तो तुम अपनी मां की आज्ञा की अवहेलना करोगे, जिससे तुम्हें हानि भी हो सकती है...* मेरी शिव मां कहती है... अगर तुम्हें अपने आपको हमेशा सुरक्षित महसूस करना है तो हमेशा इस मर्यादा रूपी लकीर के अंदर रहकर ही खेलना होगा, जिससे तुम हमेशा सभी परेशानियों से दूर रहोगे...

➳ _ ➳ मेरी शिव मां के ऐसे करने पर हम बहुत आश्चर्यचकित और हर्षित होते हैं... आश्चर्यचकित इसलिए होते हैं कि मां को शायद यह लगता है कि हम अपना ध्यान नहीं रख सकते और हर्षित इसलिए होते हैं कि हम उस लकीर के अंदर अब अपने आप को सुरक्षित अनुभव करने लगते हैं और बेफिक्र होकर खेलने के लिए आतुर हो रहे हैं... मेरी मां हमें सुरक्षित घेरे के अंदर छोड़कर बेफिक्र होकर अपना काम करने लगती है... और हम भी बड़े हर्ष और उल्लास से खेल खेलना प्रारंभ करते हैं... खेलते खेलते जब किसी समय हमारा पैर एकदम से लकीर के बाहर जाता है, तो हमें अपनी मां की बात याद आती है और तुरंत ही हम उस लकीर के अंदर आ जाते हैं... *एक समय ऐसा भी आया कि हमें लगा हमारी शिव मां हमें नहीं देख रही है... और हम चुपके से उस लकीर से बाहर निकल जाते हैं और खेलते-खेलते हम ऐसे स्थान पर आ जाते हैं जहां चारों तरफ कांटे ही कांटे होते हैं... और उनमें से एक कांटा मेरे पैर को लग जाता है...*

➳ _ ➳ जब मेरे पैर को कांटा लग जाता है और मैं दुखी होकर रोने लगती हूं तो मुझे अपनी शिव मां की कही हुई बात याद आती है और उनके द्वारा खींची हुई लकीर का मतलब भी समझ आ जाता है... जैसे ही मैं रोना स्टार्ट करती हूं, तुरंत मेरी शिव माँ मेरे पास आकर वह कांटा निकाल देती है और मुझे गोद में उठा कर वापिस अपने पास ले आती है... और मेरी मां मेरी उस मर्यादा रूपी लकीर से बाहर निकलने के लिए मुझे प्यार से डांटती है और समझाती है... *अगर तुम उस मर्यादा रूपी लकीर के अंदर ही खेलते, तो तुम्हें किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती... और हमेशा सुरक्षित ही अनुभव करते... उनका ऐसा समझाने पर मैं पूर्ण रीति से समझ जाती हूं और अपनी मां को कहती हूं... मां अब मैं कभी भी इस मर्यादा रूपी लकीर से बाहर नहीं आऊंगी...*

➳ _ ➳ मेरी शिव माँ मुझे इतना समझाते हुए अपने सामने बिठा लेती है... और इसको और भी गहराई से समझाते हुए कहती है... ऐसे ही तुम्हें परमात्मा द्वारा दिए हुए श्रीमत रूपी लकीर के अंदर ही रहकर अपना हर कर्म करना चाहिए, परमात्मा जो तुम्हे श्रीमत देते हैं, पूरा दिन आपको उसके अनुसार ही चलना चाहिए और *चेक करना चाहिए कि कभी कोई कर्म तुमने मर्यादा की लकीर से हटकर तो नहीं किया... और साथ ही यह भी चेक करना है कि मेरा कोई भी संकल्प व्यर्थ तो नहीं गया, कोई भी कार्य किसी को हानि तो नहीं पहुंचाता... अगर हमारा कोई भी कार्य श्रीमत की लकीर से बाहर निकलकर हुआ, तो हम हमारे परमात्मा का भी नाम खराब करते हैं... हम श्रीमत रूपी मर्यादा की लकीर के अंदर जो भी कर्म करेंगे, वह हर कर्म हमारा सुकर्म ही होगा,* और अगर बाहर निकलकर किया तो वह कर्म, विकर्म कहलाएगा... इसलिए हमें लकीर के अंदर रहकर सिर्फ सुकर्म ही करने हैं... और अपनी शिव मां की यह बातें सुनकर मैं अपने पुरुषार्थ में लग जाती हूं... और यह संकल्प करती हूं कि मैं अब जो भी कर्म करूंगी वह सुकर्म ही करूंगी, मर्यादा की लकीर में रहकर ही करूंगी...

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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