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 22 / 11 / 19  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ "हम अकेले आये थे... अकेले जाना है" - यह बुधी में रहा ?

 

➢➢ क्रिमिनल दृष्टि ख़तम की ?

 

➢➢ बाप की छत्रछाया में सदा मौज का अनुभव किया और कराया ?

 

➢➢ ड्रामा के राज़ को जान नाराज़ तो नहीं हुए ?

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  ✰ अव्यक्त पालना का रिटर्न

         ❂ तपस्वी जीवन

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〰✧  आप रूहानी रॉयल आत्मायें हो इसलिए मुख से कभी व्यर्थ वा साधारण बोल न निकलें। हर बोल युक्तियुक्त हो, व्यर्थ भाव से परे अव्यक्त भाव वाला हो तब रॉयल फैमली में आयेंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?

 

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अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए

             ❂ श्रेष्ठ स्वमान

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✺   "मैं निश्चिंत सेवाधारी हूँ"

 

  'सदा निश्चिन्त बन सेवा करने का बल आगे बढ़ाता रहता है'। इसने किया या हमने किया - इस संकल्प से निश्चिन्त रहने से निश्चिंत सेवा होती है और उसका बल सदा आगे बढ़ाता है।

 

  तो निश्चिंत सेवाधारी हो ना? गिनती करने वाली सेवा नहीं। इसको कहते हैं -निश्चिंत सेवा।

 

  तो जो निश्चिंत हो सेवा करते हैं, उनको निश्चित ही आगे बढ़ने में सहज अनुभूति होती है। यही विशेषता वरदान रूप में आगे बढ़ाती रहेगी।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?

 

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         रूहानी ड्रिल प्रति

अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं

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✧  एवररेडी का अर्थ ही है ऑर्डर हुआ और चल पडा। इतना मेरे-पन से मुक्त हो? सबसे बडा मेरा-पन सुनाया ना कि देहभान के साथ देह-अभिमान के सोने-चांदी के धागे बहुत है।

 

✧  इसलिए सूक्ष्म बुद्धि से, महीन बुद्धि से चेक करो कि कोई भी अल्पकाल का नशा ये धागा बन करके रोकने के निमित तो नहीं बनेगा? मोटी बुद्धि से नहीं सोचना कि मेरा कुछ नहीं है, कुछ नहीं है। फालो करने में सदा ब्रह्मा बाप को फालो करो।

 

✧  सर्वप्रति गुणग्राहक बनना अलग चीज है लेकिन फालो फादर कई है जो भाई-बहनों को फालो करने लगते हैं लेकिन वो किसको फालो करते हैं? वो फालो ब्रह्माबाप को करते हैं और आप फिर उनको करते! डायरेक्ट क्यों नहीं करते?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?

 

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         ❂ अशरीरी स्थिति प्रति

अव्यक्त बापदादा के इशारे

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〰✧  जो वाचा के महादानी हैं उनको क्या मिलता है? वह हैं मास्टर नालेज़फुल। उनके एक-एक शब्द की बहुत वैल्यु होती है। एक रत्न की वैल्यु अनेक रत्नों से अधिक होती है। तो जो ज्ञान-रत्नों का दान करते हैं उनका एक-एक रत्न इतना वैल्युएबुल हो जाता है जो उनके एक-एक वचन सुनने के लिए अनेक आत्मायें प्यासी होती हैं। अनेक प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने वाला एक वचन बन जाता है। मास्टर नालेज़फुल, वैल्युएबुल और तीसरा फिर सेन्सीबुल बन जाता है। उनके एक-एक शब्द में सेन्स भरा हुआ होता है। सेन्स अर्थात् सार के बिना कोई शब्द नहीं होता।

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- निराकार बाप साकार में आकर श्रृंगार करते हैं"

➳ _ ➳ मैं ब्राह्मण आत्मा सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठ बाबा की यादों में खोई हुई हूँ... प्यारे बाबा इतने दूर से आकर मुझे रोज पढ़ाते हैं... ज्ञान-योग से श्रृंगार करते हैं... हाथ पकडकर मुझे सबकुछ सिखाते हैं... रोज मीठी-मीठी समझानी देकर आगे बढ़ा रहे हैं... वरदानों, खजानों से मालामाल कर रहे हैं... निराकारी बाबा मुझे पढ़ाकर आप समान निर्विकारी बना रहे हैं... मनुष्य से देवता बना रहे हैं... मैं आत्मा अपने खूबसूरत भाग्य का चिन्तन करती हुई पहुँच जाती हूँ मीठे बाबा के पास...

❉ विजय माला में आने के लिए निश्चयबुद्धि बनने की शिक्षा देते हुए निराकार बाबा कहते हैं:- "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वर पिता इस धरा पर उतरकर, हथेली पर खजाने लिए बच्चों पर लुटाने आये है... टीचर रूप में अमूल्य ज्ञान की धारा लिये, बच्चों को काँटों से फूल सा पुनः खिलाने आये है... सदा इस निश्चय से भरकर यादो में खोये रहो... और विजयमाला मे पिरोकर विश्व के मालिक सा सज जाओ..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा गॉडली स्टूडेंट बन निराकार रूहानी बाबा से पढकर ज्ञान रत्नों को धारण करते हुए कहती हूँ:- "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा ईश्वर पिता से पढ़ने वाली खुबसूरत भाग्य की धनी हूँ... मेरी तकदीर जगाने विश्व पिता धरा पर उतर आया है... मै आत्मा निराकार पिता से मुक्ति जीवनमुक्ति का वर्सा पाने वाली महान तकदीर पा रही हूँ..."

❉ सत्य ज्ञान देकर अपने सारे खजाने मेरे नाम विल करते हुए मीठे बाबा कहते हैं:- "मीठे प्यारे फूल बच्चे... सदा निश्चयबुद्धि बनकर, ईश्वरीय खजानो से सम्पन्न होकर, देवताई सुखो से भर जाओ... निराकार बाबा ज्ञान रत्नों से सजाकर दिव्यता और शक्तियो का पुंज बना रहा है... सदा इस खुमारी में डूबे रहो... और साथी बनकर घर चलने की तैयारी में जुट जाओ..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा रूहानियत की झलक से भरपूर होकर खुशियों के आसमान में उडती हुई कहती हूँ:- "मेरे प्राणप्रिय बाबा... आपका मेरे जीवन में आना... और जीवन सुखो की जन्नत बन जाना,न जाने कौनसे पुण्य ने यह खुबसूरत दिन मन की आँखों को दिखलाया है... आपने मुझ पत्थरबुद्धि आत्मा को ज्ञान परी सा सजा दिया है... प्यारे बाबा मै आत्मा रोम रोम से आपकी शुक्रगुजार हूँ..."

❉ अपने यादों के साये के तले मेरे दामन में खुशियों के फूल बरसाते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:- "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... सम्पूर्ण निश्चयबुद्धि बनकर विजयमाला में आने का पुरुषार्थ करो... देह की दुनिया से परे अपने अविनाशी स्वरूप में खोकर ज्ञान रत्नों से मन बुद्धि को सजाओ... और देवताई सौंदर्य से सज धज कर... सुनहरे सुखो में जीवन मुक्त अवस्था को पाओ... ऐसे ईश्वरीय दीवाने बन मुस्कराओ..."

➳ _ ➳ मैं आत्मा सत्य ज्ञान की किरणों में मुस्कुराते हुए बाबा के प्रेम सागर में डूबकर कहती हूँ:- "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में असीम खुशियो में नाच रही हूँ... जीवन कितना खुबसूरत प्यारा और ईश्वरीय खजानो से सम्पन्न हो गया है... मै आत्मा निराकार पिता को पाकर, झूठ के दायरे से निकल सत्य की रौशनी से चमक उठी हूँ..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺ "ड्रिल :- बुद्धि में रहे हम अकेले आये थे अकेले जाना है"

➳ _ ➳ "मैं देह नही बल्कि इस देह में विराजमान एक चैतन्य ज्योति हूँ, एक शक्ति हूँ जो इस देह को चलाने वाली है। इस सत्य ज्ञान को पाकर ऐसा लगता है जैसे मुझे मेरे जीवन का सार मिल गया। आज दिन तक स्वयं को देह समझने के कारण देह के सम्बन्धो को ही सब कुछ माना और इस भूल ने मुझ आत्मा से जो विकर्म करवाये, उन विकर्मों के बोझ ने मेरी सुख, शांति को छीन मुझे कितना दुखी और अशांत बना दिया था। धन्यवाद मेरे शिव पिता परमात्मा का जिन्होंने आ कर ये सत्य ज्ञान मुझे दिया कि "मैं अकेली आत्मा हूँ देह नही और मेरे सर्व सम्बन्ध केवल मेरे पिता परमात्मा के साथ है"।

➳ _ ➳ अपने सत्य स्वरूप को पहचान कर, उस स्वरूप में टिकते ही अब मैं आत्मा सेकेंड में अपने उस एक परम पिता परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ कर, उस गहन सुख और शांति की अनुभूति कर लेती हूँ जिसकी तलाश मैं आज दिन तक दैहिक सम्बन्धों में कर रही थी। मन ही मन स्वयं से यह बातें करती हुई मैं जैसे ही अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित होती हूँ मैं स्पष्ट अनुभव करती हूँ कि मेरा वास्तविक स्वरूप कितना सुन्दर और कितना प्यारा है।

➳ _ ➳ अपने अति सुंदर, तेजोमय स्वरूप को मैं अब अपने मन बुद्धि रूपी नेत्रों से देख रही हूँ। एक चैतन्य दीपक इस देह रूपी मन्दिर में भृकुटि सिहांसन पर चमकता हुआ मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है जिसमे से अनन्त प्रकाश निकल रहा है। इस प्रकाश को मैं अपने चारों और फैलता हुआ देख रही हूँ। यह प्रकाश मेरे मन को गहन शांति की अनुभूति करवा रहा है। इस प्रकाश में समाये सर्व गुणों और सर्वशक्तियों के वायब्रेशन चहुँ और फैल कर मेरे आस - पास के वायुमण्डल को शुद्ध और शांतमय बना रहे हैं।

➳ _ ➳ आत्मिक स्वरुप में टिक कर, अपने मौलिक गुणों और शक्तियों का अनुभव मुझे एक अति सुंदर शांतचित स्थिति में स्थित करके, एक विचित्र अंतर्मुखता का अनुभव करवा रहा है। अंतर्मुखता की इस स्थिति में मैं चैतन्य दीपक सहजता से देह रूपी मन्दिर को छोड़ अब ऊपर आकाश की ओर जा रहा हूँ। आकाश को पार करके, उससे ऊपर सूक्ष्म लोक से भी परें मैं प्वाइंट ऑफ लाइट अब स्वयं को एक ऐसी विचित्र दुनिया में देख रही हैं जो लाल प्रकाश से आच्छादित है, जहां चारों और चमकते हुए जगमग करते चैतन्य दीपक दिखाई दे रहें हैं। देह और देह से जुड़ी कोई भी वस्तु यहां दिखाई नहीं दे रही। रूह रिहान भी आत्मा का आत्मा से। सम्बन्ध भी आत्मिक और दृष्टिकोण भी रूहानियत से भरा।

➳ _ ➳ इस अति सुंदर जगमग करते दीपकों की दुनिया में अब मैं देख रही हूँ अपने बिल्कुल सामने महाज्योति शिव बाबा को जिनसे निकल रही अनन्त प्रकाश की किरणों से पूरा परमधाम प्रकाशित हो रहा है। जैसे शमा को देखते ही परवाना स्वत: ही उसकी ओर खिंचने लगता है ऐसे ही मेरे महाज्योति शिव पिता के अनन्त गुणों और शक्तियों की किरणें मुझे अपनी ओर खींच रही हैं और मैं धीरे - धीरे उनकी ओर बढ़ रही हूँ। मैं चैतन्य दीपक महाज्योति शिव बाबा के अति समीप पहुंच कर उन्हें टच करती हूँ और उन्हें टच करते ही उनके समस्त गुणों और सर्वशक्तियों को स्वयं में भरता हुआ स्पष्ट अनुभव करती हूँ।

➳ _ ➳ बाबा के सर्वगुणों और सर्वशक्तियों को स्वयं में भरकर मैं स्वयं को सर्वशक्तियों से सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ और सर्वशक्ति स्वरूप बन कर वापिस साकारी दुनिया में लौट रही हूँ। अपने साकारी तन में अब मैं भृकुटि सिहांसन पर विराजमान हूँ और देह धारण कर फिर से इस कर्मभूमि पर अपना पार्ट बजा रही हूँ। किन्तु अब मैं स्वयं को आत्मा निश्चय कर हर कर्म कर रही हूँ। देह के सभी सम्बन्धो को भूल स्वयं को अकेली आत्मा समझने से मेरी दृष्टि, वृति भी आत्मिक होने लगी है इसलिए इस देह से जुड़े सम्बन्धियों को भी अब मैं देह नही बल्कि उनके आत्मिक स्वरूप में देख रही हूँ। अपने को अकेली आत्मा समझने और सबके प्रति आत्मा भाई - भाई की दृष्टि हो जाने से देह के सम्बन्धों के प्रति अब मेरा लगाव, झुकाव और टकराव समाप्त हो गया है और जीवन बहुत ही आनन्दमयी लगने लगा है।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   मैं आत्मा बाप की छत्रछाया में हूँ।
✺   मैं आत्मा सदा मौज का अनुभव करती हूँ।
✺   मैं विशेष आत्मा हूँ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺ मैं आत्मा ड्रामा के राज़ को जानती हूँ ।
✺ मैं आत्मा नाराज होने से मुक्त हूँ ।
✺ मैं सदा राज़ी आत्मा हूँ ।

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  बापदादा ने पहले भी कहा है - रोज अमृतवेले अपने आपको तीन बिन्दियों की स्मृति का तिलक लगाओ तो एक खजाना भी व्यर्थ नहीं जायेगा। हर समयहर खजाना जमा होता जायेगा। बापदादा ने सभी बच्चों के हर खजाने के जमा का चार्ट देखा। उसमें क्या देखाअभी तक भी जमा का खाता जितना होना चाहिए उतना नहीं है। समय, संकल्प, बोल व्यर्थ भी जाता है। चलते-चलते कभी समय का महत्व इमर्ज रूप में कम होता है। अगर समय का महत्व सदा याद रहे, इमर्ज रहे तो समय को और ज्यादा सफल बना सकते हो। सारे दिन में साधारण रूप से समय चला जाता है। गलत नहीं लेकिन साधारण। ऐसे ही संकल्प भी बुरे नहीं चलते लेकिन व्यर्थ चले जाते हैं। एक घण्टे की चेकिंग करोहर घण्टे में समय या संकल्प कितने साधारण जाते हैंजमा नहीं होते हैं। फिर बापदादा इशारा भी देता हैतो बापदादा को भी दिलासे बहुत देते हैं। बाबाऐसे थोड़ा सा संकल्प है बस। बाकी नहींसंकल्प में थोड़ा चलता है।सम्पूर्ण हो जायेंगे। ठीक हो जायेंगे। अभी अन्त थोड़ेही आया हैथोड़ा समय तो पड़ा है। समय पर सम्पन्न हो जायेंगे।

 

 _ ➳  लेकिन बापदादा ने बार-बार कह दिया है कि जमा बहुत समय का चाहिए। ऐसे नहीं जमा का खाता अन्त में सम्पन्न करेंगे, समय आने पर बन जायेंगे! बहुत समय का जमा हुआ बहुत समय चलता है। वर्सा लेने में तो सभी कहते हैं हम तो लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। अगर हाथ उठवायेंगे कि त्रेतायुगी बनेंगेतो कोई नहीं हाथ उठाता। और लक्ष्मी-नारायण बनेंगेतो सभी हाथ उठाते। अगर बहुत समय का जमा का खाता होगा तो पूरा वर्सा मिलेगा। अगर थोड़ा-सा जमा होगा तो फुल वर्सा कैसे मिलेगा? इसलिए सर्व खजाने को जितना जमा कर सको उतना अभी से जमा करो। हो जायेगा, आ जायेंगे....गे गे नहीं करो। 'करना ही है' - यह है दृढ़ता। अमृतवेले जब बैठते हैं, अच्छी स्थिति में बैठते हैं तो दिल ही दिल में बहुत वायदे करते हैं - यह करेंगेयह करेंगे। कमाल करके दिखायेंगे... यह तो अच्छी बात है। श्रेष्ठ संकल्प करते हैं लेकिन बापदादा कहते हैं इन सब वायदों को कर्म में लाओ। 

 

✺   ड्रिल :-  "अमृतवेले तीन बिन्दियों की स्मृति का तिलक लगाकर व्यर्थ वा साधारणता से मुक्त बनने का अनुभव"

 

 _ ➳  अमृतवेला की शांतमय सुहावनी वेला में, मैं आत्मा बिन्दु आंख खुलते ही अपने ज्योति बिन्दु शिव पिता को मुस्कुराते हुए गुडमार्निंग विश करती हूँ... गुडमार्निंग प्यारे बाबा और मैं आत्मा बिन्दु बाबा रूम में जाती हूँ... और जाते ही एक निराला सीन मुख आत्मा के सामने उभरता है... दीवार पर लगे बापदादा के चित्र से लाइट निकल कर सामने राइट साइड पर लगे सृष्टि चक्र पर पड़ रही हैं... मैं आत्मा बिन्दु बड़े ध्यान से इस दृश्य को देख रही हूँ... अचानक से सृष्टि चक्र का चित्र बड़ा हो जाता है... और हाइलाइट होकर और ऊभर कर सामने आ गया है... 3 डी व्यू की तरह यह सामने आ गया है... ये चित्र बेहद स्पष्ट नजर आ रहा हैं... और देखते ही देखते ये काल चक्र ( समय चक्र ) जिसे चार भागों में विभाजित किया है, घूमने लगता हैं... इस समय चक्र के बीच लगी घड़ी के समान सुईयां धीरे-धीरे चलने लगती है...

 

 _ ➳  ये सुईयां सृष्टि चक्र के शुरू सतयुग से चलना शुरु होती है... और त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग के अन्तिम चरण संगमयुग में पहुँच जाती हैं... जैसे ही इस काल चक्र की सुईयां संगमयुग में पहुँचती हैं... उसी पल मुझ आत्मा के सामने कुछ स्मृतियां इमर्ज होती है... मैं कौन की स्मृति इसी संगमयुग में मिली, ये स्मृति सामने आते ही मैं आत्मा अपने असली स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और बेहद शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ... भृकुटि के भव्य भाल पर सितारे के समान चमक रही हूँ... इस प्रकार आत्म-स्मृति का तिलक लगाती, मैं आत्मा स्वयं में नव उर्जा का अनुभव कर रही हूँ... और एक दूसरी स्मृतियाँ मेरे सामने इस सृष्टि चक्र को देख इमर्ज होती है... मुझ आत्मा के सामने, मुझ आत्मा को सत्य प्रकाश देने वाले शिव पिता की वो सभी स्मृतियाँ इमर्ज हो जाती है... जब वो ज्ञान सूर्य मेरे जीवन में आया और उसने अज्ञान रूपी अन्धकार को मेरे जीवन से हटाया अपना बनाया... सामने शिव ज्योति बिन्दु पिता को देख रही हूँ... उनसे आता प्रकाश मुझ आत्मा में समा रहा है... ये प्रकाश मुझे अलौकिक ईश्वरीय शक्तियों से भर रहा हैं... इस प्रकार बिन्दी बाबा की याद रुपी द्वितीय तिलक मैं आत्मा  लगाती हूँ...

 

 _ ➳  मुझ आत्मा के सामने अब ज्योति बिन्दु पिता के द्वारा दिये इस सृष्टि चक्र के ज्ञान की सभी तस्वीरें एक-एक कर सामने आने लगती है, इमर्ज होती है... आदि मध्य अन्त, देख रही हूँ मैं आत्मा किस प्रकार हर आत्मा इस सृष्टि चक्र ( वर्ल्ड ड्रामा ) में अपना फिक्स और एक्यूरेट पार्ट प्ले कर रही है... देख रही हूँ मैं आत्मा इस कल्याणकारी समय चक्र को जिसकी हर सीन में कल्याण है... इस प्रकार मैं आत्मा ड्रामा बिन्दी लगा एक निश्चित और निरप्रश्न स्थिति का अनुभव कर रही हूँ... इस समय की स्मृति के साथ और तीन बिन्दियों का तिलक लगाकर मैं आत्मा अपनी दिनचर्चा की शुरुआत करती हूँ... मैं आत्मा हर कदम में पदमों की कमाई जमा कर रही हूँ... तीन बिन्दुओं का तिलक   लगाकर हर कर्म कर रही हूँ... और हर खजाने को सफल कर जमा का खाता बढ़ा रही हूँ... और समय का महत्व हर पल इमर्ज रूप में है... समय के महत्व को सदा सामने रख मैं आत्मा समय, संकल्प, बोल हर खजाने को सफल कर जमा का खाता बढाते नम्बर वन में आने का पुरूषार्थ कर रही हूँ... और मैंने बाबा से जो वायदे किये सब दृढ़ता से कर्म में ला रही हूं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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