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 22 / 11 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *दिल से "बाबा" कहा ?*

 

➢➢ *एकरस स्थिति का अनुभव किया ?*

 

➢➢ *मन बुधी संस्कार को चेक किया ?*

 

➢➢ *निरंतर योगी बन स्वराज्य अधिकारी बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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〰✧  आप रूहानी रॉयल आत्मायें हो इसलिए मुख से कभी व्यर्थ वा साधारण बोल न निकलें। *हर बोल युक्तियुक्त हो, व्यर्थ भाव से परे अव्यक्त भाव वाला हो तब रॉयल फैमली में आयेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं निश्चिंत सेवाधारी हूँ"*

 

  *'सदा निश्चिन्त बन सेवा करने का बल आगे बढ़ाता रहता है'। इसने किया या हमने किया - इस संकल्प से निश्चिन्त रहने से निश्चिंत सेवा होती है और उसका बल सदा आगे बढ़ाता है।*

 

  *तो निश्चिंत सेवाधारी हो ना? गिनती करने वाली सेवा नहीं। इसको कहते हैं -निश्चिंत सेवा।*

 

  *तो जो निश्चिंत हो सेवा करते हैं, उनको निश्चित ही आगे बढ़ने में सहज अनुभूति होती है। यही विशेषता वरदान रूप में आगे बढ़ाती रहेगी।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *एवररेडी का अर्थ ही है ऑर्डर हुआ और चल पडा।* इतना मेरे-पन से मुक्त हो? सबसे बडा मेरा-पन सुनाया ना कि देहभान के साथ देह-अभिमान के सोने-चांदी के धागे बहुत है।

 

✧  इसलिए सूक्ष्म बुद्धि से, महीन बुद्धि से चेक करो कि कोई भी अल्पकाल का नशा ये धागा बन करके रोकने के निमित तो नहीं बनेगा? मोटी बुद्धि से नहीं सोचना कि मेरा कुछ नहीं है, कुछ नहीं है। *फालो करने में सदा ब्रह्मा बाप को फालो करो।*

 

✧  सर्वप्रति गुणग्राहक बनना अलग चीज है लेकिन फालो फादर कई है जो भाई-बहनों को फालो करने लगते हैं लेकिन वो किसको फालो करते हैं? *वो फालो ब्रह्माबाप को करते हैं और आप फिर उनको करते!* डायरेक्ट क्यों नहीं करते?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧  *जो वाचा के महादानी हैं उनको क्या मिलता है? वह हैं मास्टर नालेज़फुल। उनके एक-एक शब्द की बहुत वैल्यु होती है।* एक रत्न की वैल्यु अनेक रत्नों से अधिक होती है। तो जो ज्ञान-रत्नों का दान करते हैं *उनका एक-एक रत्न इतना वैल्युएबुल हो जाता है जो उनके एक-एक वचन सुनने के लिए अनेक आत्मायें प्यासी होती हैं।* अनेक प्यासी आत्माओं की प्यास बुझाने वाला एक वचन बन जाता है। *मास्टर नालेज़फुल, वैल्युएबुल और तीसरा फिर सेन्सीबुल बन जाता है। उनके एक-एक शब्द में सेन्स भरा हुआ होता है। सेन्स अर्थात् सार के बिना कोई शब्द नहीं होता।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  स्वराज्य अधिकारी बनना"*

 

_ ➳  मै ओजस्वी आत्मा चमकती हुई मणि... मीठे बाबा की गहरी यादो में खोयी हुई... शांतिवन में मीठे बाबा के कमरे में बेठी हुई हूँ... और *बाबा भी पल भर में जेसे मेरी यादो में खिचते हुए वहाँ उपस्थित हो गए.*.. और गहरी प्रेम दृष्टि से मुझ आत्मा को गुणो और शक्तियो से भरने लगे... मै आत्मा बाबा की सारी शक्तियो की स्वयं में समाती हुई देख रही हूँ... और अपना तेजस्वी रूप देख देख पुलकित हो रही हूँ...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को श्रेष्ठ राज्याधिकारी के रूप में देखते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... *संगमयुगी स्वराज्य दरबार सबसे खुबसूरत दरबार है.*.. यह दरबार जन्म जन्मातर की दरबार की फाउंडेशन है.. इसलिए दिव्य बुद्धि के यन्त्र द्वारा अपना स्थान छैक करो... मा त्रिकालदर्शी बनकर तीनो कालो की नालेज के आधार पर इस दिव्य बुद्धि के यन्त्र को यूज करो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की ज्ञान मणियो को दिल में समाती हुई बोली :-* "मीठे प्यारे बाबा मेरे... *आपने जीवन में आकर खुबसूरत नये आयाम दिए है.*.. दुखभरी उदासी से छुड़ाकर मुझे सदा की मुस्कान से सजाया है... शरीर की पराधीन सी मुझ आत्मा को मुक्त कराकर.. स्वराज्य अधिकारी सा सजा मेरे भाग्य में चार चाँद लगा दिए है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा के शानदार भाग्य पर मुस्करा रहे है और कह रहे है :-* "यह स्नेह सागर और नदियो का प्यार भरा मिलन है.. कितना प्यारा भाग्य आप बच्चों का है कि पूरे विश्व में अथाह संख्या होते हुए भी आपने मिलन का भाग्य पाया है... *भोले भक्त कण कण में ढूंढते ही रह गए और भोले के बच्चों ने भोले को ही पा लिया.*.. सच्ची दिल वालो ने दिलाराम को पा लिया और दिल में समा लिया..."

 

_ ➳  *ईश्वर पिता के हाथो में सजते संवरते अपने भाग्य को देखकर मै आत्मा बाबा की दीवानी होकर कहने लगी :-* " प्यारे लाडले बाबा मेरे... आपके मिलन को आपके दरस को मै आत्मा जनमो कितना भटकी हूँ... अब जीवन में आकर आपने मुझ बेचैन दिल आत्मा को... सदा का आराम दिया है... पता है ना मीठे बाबा आपके बिना वो दिन कितने उजड़े और सूने थे... *आपने आकर खुशियो के घुँघरूँ मेरे पेरो में बांध दिए है.*.."

 

  *प्यारे बाबा बहुमूल्य रत्नों को मेरी झोली में बरसाते हुए बोले मीठे लाडले बच्चे :-* "याद और सेवा में बेलेन्स को रखकर सदा वर्द्धि को पाते रहो... होलिहंस बनकर सदा विशेषताओ के मोती ही चुगते रहो... सदा फॉलो फादर कर बापदादा के दिल तख्त पर छाये रहो... *शिव शक्ति कम्बाइंड इस विशेषता से सदा सजे रहकर सफलताओ के आसमाँ को छु लो..*."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को अपनी बाँहों में भरकर प्यार करते हुए कह उठी :-* "मेरे दिल के चैन बाबा... आपकी प्यारी श्रीमत ने मुझे हर बुराई से परे कर होलिहंस रूप में निखारा है... मै आत्मा व्यर्थ से निकल समर्थता को पा चली हूँ... *आपकी यादो में शिव शक्ति बनकर शक्तियो से भरपूर हो गयी हूँ.*.. और जहाँ भी कदम रखती हूँ सफलता कदमो को चूमती है... ऐसी मीठी रुहरिहानं कर मै आत्मा अपने कार्य क्षेत्र पर आ गयी..."

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एकरस स्थिति का अनुभव*"

 

_ ➳  परमधाम में मैं आत्मा, मैं चैतन्य ज्योति, अपने महाज्योति शिव पिता के सानिध्य में बैठ उनकी सर्वशक्तियों से स्वयं को भरपूर कर रही हूँ। *अपने शिव पिता के साथ मिलन मनाने का असीम सुख लेते हुए मैं एकटक उन्हें निहार रही हूँ*। पूरे पाँच हजार वर्ष उनसे अलग रहने के कारण उनसे मिलने की जो प्यास थी उस जन्म जन्मांतर की प्यास को मैं आज पूरी तरह बुझा लेना चाहती हूँ। *इसलिए मन बुद्धि रूपी नेत्रों को पूरी तरह अपने शिव पिता पर केंद्रित कर, उनके अति सुंदर मनमोहक स्वरूप को, उनकी एक - एक किरण को निहारते हुए मैं मन ही मन मगन हो रही हूँ*। उनका यह सुन्दर सलौना स्वरूप मुझे उन्हें और समीप से देखने के लिए अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

 

_ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे मेरे शिव पिता अपनी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों को फैला कर मुझे अपने आगोश में लेकर, अपना सम्पूर्ण स्नेह मुझ पर बरसा कर आज मुझे तृप्त करना चाहते हैं। *अपने शिव पिता की सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में समाकर अब मैं चैतन्य ज्योति स्वयं को अपने महाज्योति शिव पिता के अति समीप देख रही हूँ*। इतना समीप कि ऐसा लग रहा है जैसे मैं ज्योति, महाज्योति में समा कर उनका ही स्वरूप बन गई हूँ। बाबा से आ रही सर्वशक्तियाँ ऐसे लग रही हैं जैसे बहुत तेज अग्नि की अनन्त धाराएं निकल रही हों।

 

_ ➳  पूरे वेग से ये धाराएं मुझ आत्मा के ऊपर निरन्तर प्रवाहित हो रही हैं। और इन धाराओं के प्रभाव से मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की खाद जल कर भस्म हो रही हैं। *63 जन्मो के विकारों की कट जो असंख्य परतों के रुप में मुझ आत्मा पर चढ़ी हुई थी वो एक - एक परत योग की अग्नि में जल कर  समाप्त हो रही है और मैं आत्मा हल्केपन का अनुभव कर रही हूँ*। अपनी सर्वशक्तियों की ज्वालास्वरूप किरणों की अग्नि से बाबा मुझ आत्मा द्वारा किये हुए एक - एक विकर्म को दग्ध कर मुझे सम्पूर्ण पावन बना रहें हैं। *मेरे सभी पुराने स्वभाव, संस्कार इस योग की अग्नि में जल कर भस्म हो रहें हैं*।

 

_ ➳  जैसे - जैसे इस योग अग्नि में मेरे पुराने स्वभाव संस्कारों का दाह संस्कार हो रहा है वैसे - वैसे मैं आत्मा फिर से अपने अनादि सतोप्रधान स्वरूप को पुनः प्राप्त कर रही हूँ। *रीयल गोल्ड के समान चमकते हुए अपने वास्तविक स्वरूप का मैं अनुभव कर रही हूँ*। मेरा अनादि स्वरूप बहुत ही प्यारा और बहुत ही आकर्षक है। कभी मैं अपने इस मनमोहक अनादि स्वरूप को और कभी अपने सामने विराजमान अपने महाज्योति शिव पिता परमात्मा के मन को लुभाने वाले अति सुंदर स्वरूप को निहारते हुए आनन्दविभोर हो रही हूँ।

 

_ ➳  रीयल गोल्ड बन कर, शक्तियों से भरपूर हो कर अब मैं आत्मा वापिस साकारी लोक में आ रही हूँ। *अपने जिस अनादि सतोप्रधान स्वरूप में मैं आत्मा पहली बार सृष्टि रूपी रंगमंच पर शरीर धारण कर पार्ट बजाने के लिए आई थी, उस सम्पूर्ण सतोप्रधान अवस्था को पाना ही मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है*। इस लक्ष्य को सदैव स्मृति में रख, आत्मा को सतोप्रधान बना कर एकरस कर्मातीत अवस्था तक पहुंचने के लिये, निरन्तर बाबा की याद में रह, अब मैं योग का बल स्वयं में जमा कर रही हूँ।

 

_ ➳  *जैसे ब्रह्मा बाबा ने योगबल द्वारा एकरस कर्मातीत अवस्था बनाकर सम्पूर्ण अवस्था को प्राप्त किया। कर्म करते हुए भी कर्म के हर प्रकार के प्रभाव से निर्लिप्त न्यारी और प्यारी अवस्था मे ब्रह्मा बाबा सदैव स्थित रहे ऐसे ही फॉलो फादर कर, योगबल से आत्मा को सतोप्रधान बना कर, एकरस कर्मातीत अवस्था तक पहुँचने और सम्पूर्णता को पाने का पुरुषार्थ अब मैं निरन्तर कर रही हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

✺   *मैं भटकती हुई आत्माओं को यथार्थ मंजिल दिखाने वाली आत्मा हूँ।*

✺   *मैं चैतन्य लाइट माइट आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

✺   *मैं आत्मा दूसरों की करेक्शन करने से सदा मुक्त हूँ  ।*

✺   *मैं आत्मा एक बाप से ठीक कनेक्शन रखती हूँ  ।*

✺   *मैं सहज योगी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *बापदादा ने पहले भी कहा है - रोज अमृतवेले अपने आपको तीन बिन्दियों की स्मृति का तिलक लगाओ तो एक खजाना भी व्यर्थ नहीं जायेगा। हर समयहर खजाना जमा होता जायेगा।* बापदादा ने सभी बच्चों के हर खजाने के जमा का चार्ट देखा। उसमें क्या देखाअभी तक भी जमा का खाता जितना होना चाहिए उतना नहीं है। समय, संकल्प, बोल व्यर्थ भी जाता है। चलते-चलते कभी समय का महत्व इमर्ज रूप में कम होता है। *अगर समय का महत्व सदा याद रहे, इमर्ज रहे तो समय को और ज्यादा सफल बना सकते हो।* सारे दिन में साधारण रूप से समय चला जाता है। गलत नहीं लेकिन साधारण। ऐसे ही संकल्प भी बुरे नहीं चलते लेकिन व्यर्थ चले जाते हैं। *एक घण्टे की चेकिंग करोहर घण्टे में समय या संकल्प कितने साधारण जाते हैं?* जमा नहीं होते हैं। फिर बापदादा इशारा भी देता हैतो बापदादा को भी दिलासे बहुत देते हैं। बाबाऐसे थोड़ा सा संकल्प है बस। बाकी नहींसंकल्प में थोड़ा चलता है।सम्पूर्ण हो जायेंगे। ठीक हो जायेंगे। अभी अन्त थोड़ेही आया हैथोड़ा समय तो पड़ा है। समय पर सम्पन्न हो जायेंगे।

 

 _ ➳  *लेकिन बापदादा ने बार-बार कह दिया है कि जमा बहुत समय का चाहिए।* ऐसे नहीं जमा का खाता अन्त में सम्पन्न करेंगे, समय आने पर बन जायेंगे! बहुत समय का जमा हुआ बहुत समय चलता है। वर्सा लेने में तो सभी कहते हैं हम तो लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। अगर हाथ उठवायेंगे कि त्रेतायुगी बनेंगेतो कोई नहीं हाथ उठाता। और लक्ष्मी-नारायण बनेंगेतो सभी हाथ उठाते। *अगर बहुत समय का जमा का खाता होगा तो पूरा वर्सा मिलेगा।* अगर थोड़ा-सा जमा होगा तो फुल वर्सा कैसे मिलेगा? *इसलिए सर्व खजाने को जितना जमा कर सको उतना अभी से जमा करो।* हो जायेगा, आ जायेंगे....गे गे नहीं करो। *'करना ही है' - यह है दृढ़ता।* अमृतवेले जब बैठते हैं, अच्छी स्थिति में बैठते हैं तो दिल ही दिल में बहुत वायदे करते हैं - यह करेंगेयह करेंगे। कमाल करके दिखायेंगे... यह तो अच्छी बात है। *श्रेष्ठ संकल्प करते हैं लेकिन बापदादा कहते हैं इन सब वायदों को कर्म में लाओ।* 

 

✺   *ड्रिल :-  "अमृतवेले तीन बिन्दियों की स्मृति का तिलक लगाकर व्यर्थ वा साधारणता से मुक्त बनने का अनुभव"*

 

 _ ➳  अमृतवेला की शांतमय सुहावनी वेला में, मैं आत्मा बिन्दु आंख खुलते ही अपने ज्योति बिन्दु शिव पिता को मुस्कुराते हुए गुडमार्निंग विश करती हूँ... गुडमार्निंग प्यारे बाबा और मैं आत्मा बिन्दु बाबा रूम में जाती हूँ... और जाते ही एक निराला सीन मुख आत्मा के सामने उभरता है... *दीवार पर लगे बापदादा के चित्र से लाइट निकल कर सामने राइट साइड पर लगे सृष्टि चक्र पर पड़ रही हैं...* मैं आत्मा बिन्दु बड़े ध्यान से इस दृश्य को देख रही हूँ... अचानक से सृष्टि चक्र का चित्र बड़ा हो जाता है... और हाइलाइट होकर और ऊभर कर सामने आ गया है... *3 डी व्यू की तरह यह सामने आ गया है...* ये चित्र बेहद स्पष्ट नजर आ रहा हैं... *और देखते ही देखते ये काल चक्र ( समय चक्र ) जिसे चार भागों में विभाजित किया है, घूमने लगता हैं...* इस समय चक्र के बीच लगी घड़ी के समान सुईयां धीरे-धीरे चलने लगती है...

 

 _ ➳  ये सुईयां सृष्टि चक्र के शुरू सतयुग से चलना शुरु होती है... और त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग के अन्तिम चरण संगमयुग में पहुँच जाती हैं... जैसे ही इस काल चक्र की सुईयां संगमयुग में पहुँचती हैं... उसी पल मुझ आत्मा के सामने कुछ स्मृतियां इमर्ज होती है... *मैं कौन की स्मृति इसी संगमयुग में मिली, ये स्मृति सामने आते ही मैं आत्मा अपने असली स्वरूप में स्थित हो जाती हूँ और बेहद शक्तिशाली अनुभव कर रही हूँ...* भृकुटि के भव्य भाल पर सितारे के समान चमक रही हूँ... इस प्रकार आत्म-स्मृति का तिलक लगाती, *मैं आत्मा स्वयं में नव उर्जा का अनुभव कर रही हूँ...* और एक दूसरी स्मृतियाँ मेरे सामने इस सृष्टि चक्र को देख इमर्ज होती है... *मुझ आत्मा के सामने, मुझ आत्मा को सत्य प्रकाश देने वाले शिव पिता की वो सभी स्मृतियाँ इमर्ज हो जाती है...* जब वो ज्ञान सूर्य मेरे जीवन में आया और उसने अज्ञान रूपी अन्धकार को मेरे जीवन से हटाया अपना बनाया... *सामने शिव ज्योति बिन्दु पिता को देख रही हूँ... उनसे आता प्रकाश मुझ आत्मा में समा रहा है... ये प्रकाश मुझे अलौकिक ईश्वरीय शक्तियों से भर रहा हैं... इस प्रकार बिन्दी बाबा की याद रुपी द्वितीय तिलक मैं आत्मा  लगाती हूँ...*

 

 _ ➳  *मुझ आत्मा के सामने अब ज्योति बिन्दु पिता के द्वारा दिये इस सृष्टि चक्र के ज्ञान की सभी तस्वीरें एक-एक कर सामने आने लगती है, इमर्ज होती है...* आदि मध्य अन्त, देख रही हूँ मैं आत्मा किस प्रकार हर आत्मा इस सृष्टि चक्र ( वर्ल्ड ड्रामा ) में अपना फिक्स और एक्यूरेट पार्ट प्ले कर रही है... *देख रही हूँ मैं आत्मा इस कल्याणकारी समय चक्र को जिसकी हर सीन में कल्याण है...* इस प्रकार मैं आत्मा ड्रामा बिन्दी लगा एक निश्चित और निरप्रश्न स्थिति का अनुभव कर रही हूँ... इस समय की स्मृति के साथ और तीन बिन्दियों का तिलक लगाकर मैं आत्मा अपनी दिनचर्चा की शुरुआत करती हूँ... *मैं आत्मा हर कदम में पदमों की कमाई जमा कर रही हूँ... तीन बिन्दुओं का तिलक   लगाकर हर कर्म कर रही हूँ...* और हर खजाने को सफल कर जमा का खाता बढ़ा रही हूँ... और समय का महत्व हर पल इमर्ज रूप में है... *समय के महत्व को सदा सामने रख मैं आत्मा समय, संकल्प, बोल हर खजाने को सफल कर जमा का खाता बढाते नम्बर वन में आने का पुरूषार्थ कर रही हूँ... और मैंने बाबा से जो वायदे किये सब दृढ़ता से कर्म में ला रही हूं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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