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 23 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *सदा शांतचित और हर्शितमुख रहे ?*

 

➢➢ *बाप की अन्दर से महिमा की ?*

 

➢➢ *श्रेष्ठ मत प्रमाण हर कर्म कर्मयोगी बनकर किया ?*

 

➢➢ *अनुभवों की ऑथरिटी बनकर आरहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *जैसे अग्नि में कोई भी चीज डालो तो नाम, रूप, गुण सब बदल जाता है, ऐसे जब बाप के याद के लगन की अग्नि में पड़ते हो तो परिवर्तन हो जाते हो।* मनुष्य से ब्राह्मण बन जाते, फिर ब्राह्मण से फरिश्ता सो देवता बन जाते। *लग्न की अग्नि से ऐसा परिवर्तन होता है जो अपनापन कुछ भी नहीं रहता, इसलिए याद को ही ज्वाला रूप कहा है।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं 'मेरा बाबा' की स्मृति द्वारा सर्व प्राप्ति से भरपूर आत्मा हूँ"*

 

✧  सबसे सहज सदा शक्तिशाली रहने की विधि क्या है जिस विधि से सहज और सदा निर्विग्न भी रह सकते हैं और उड़ती कला का भी अनुभव कर सकते हैं? सबसे सहज विधि है-और कुछ भी भूल जाये लेकिन एक बात कभी नहीं भूले- 'मेरा बाबा'। *'मेरा बाबा' दिल से मानना-यही सबसे सहज विधि है आगे बढ़ने की। मेरा-मेरा मानने का संस्कार तो बहुत समय का है ही। उसी संस्कार को सिर्फ परिवर्तन करना है। 'अनेक' मेरे को 'एक' मेरा बाबा उसमें समाना है।* एक को याद करना सहज है ना और एक मेरे में सब-कुछ आ जाता है। तो सबसे सहज विधि है-मेरा बाबा। 'मेरा' शब्द ऐसा है जो न चाहते भी याद आती है। 'मेरे' को याद नहीं करना पड़ता लेकिन स्वत: याद आती है।

 

  भूलने की कोशिश करते भी 'मेरा' नहीं भूलता। *योग अगर कमजोर होता है तो भी कारण 'मेरा' है और योग शक्तिशाली होता है तो उसका भी कारण 'मेरा' ही है। 'मेरा बाबा'-तो योग शक्तिशाली हो जाता है और मेरा सम्बन्ध, मेरा पदार्थ-यह 'अनेक मेरा' याद आना अर्थात् योग कमजोर  होना।* तो क्यों नहीं सहज विधि से पुरुषार्थ में वृद्धि करो। विधि से ही सिद्धि प्राप्त होती है। रिद्धि-सिद्धि अल्पकाल की होती है लेकिन विधि से सिद्धि जो प्राhत होती है वह अविनाशी होती है। तो यहाँ रिद्धि-सिद्धि की बात नहीं है लेकिन विधि से सिद्धि प्राप्त करनी है। विधि को अपनाना आता है या मुश्किल लगता है?

 

  कमजोर बनना अर्थात् मुश्किल अनुभव होना। बिना कमजोरी के मुश्किल नहीं होता है। तो कमजोर हो क्या? या माया कभी-कभी कमजोर बना देती है? *अगर 'मेरा बाबा' याद आता है, तो बाप सर्वशक्तिवान है ना, तो जैसा बाप वैसे बच्चे। 'मेरा बाबा' याद आने से अपना मास्टर सर्वशक्तिवान का स्वरूप याद आता है। 'मेरा बाबा' कहने से ही 'बाप कौन है', वह स्मृति में आता है।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *सदा एक लक्ष्य हो की हमें दादा का बच्चा बन सर्व आत्माओं को देना है न कि लेना है*-  यह करें तो मैं करूँ, नहीं। हर एक दाता -  पन की भावना रखे तो सब देने वाले अर्थात सम्पन्न आत्मा हो जायेंगे। सम्पन्न नहीं होंगे तो दे भी नहीं  सकेंगे। तो *जो सम्पन्न आत्मा होगी वह सदा तृप्त आत्मा ज़रूर होगी।* मैं देने वाले दादा का बच्चा हूँ - देना ही लेना है। जितना देना उतना लेना ही है। प्रैक्टिकल में लेने वाला नहीं लेकिन देने वाला बनना है।

 

✧  *दाता-पन की भावना सदा निर्विघ्न, इच्छा मात्रम्  अविद्या की स्थिति का अनुभव कराती है* - सदा एक लक्ष्य की तरफ ही नजर रहे। वह लक्ष्य है बिन्दु। एक लक्ष्य अर्थात बिन्दी की तरफ सदा देखने वाले। अन्य कोई भी बातों को देखते हुए भी नहीं देखें। नजर एक बिन्दु की तरफ ही हो - जैसे यादगार रूप में भी दिखाया है कि मछली के तरफ नजर नहीं थी लेकिन आँख की भी बिन्दु में थी।

 

✧  तो मछली है विस्तार और सार है बिन्दु। तो *विस्तार को नहीं देखा लेकिन सार अर्थात एक बिन्दु को देखा।* इसी प्रकार अगर कोई भी बातों के विस्तार को देखते तो विघ्नों में आते - और सार अर्थात एक बिन्दु रूप स्थिति बन जाती और फुलस्टॉप अर्थात बिन्दु लग जाती। *कर्म में भी फुलस्टॉप अर्थात बिन्दु। स्मृति में भी बिन्दु अर्थात बीजरूप स्टेज हो जाती। यह विशेष अभ्यास करना है।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सभी सदा प्रवृत्ति में रहते भी न्यारे और बाप के प्यारे, ऐसी स्थिति में स्थित हो चलते हो ? जितने न्यारे होंगे उतने ही बाप के प्यारे होंगे। तो हमेशा न्यारे रहने का विशेष अटेन्शन है? सदा देह से न्यारे आत्मिक स्वरूप में स्थित रहना। *जो देह से न्यारा रहता है वह प्रवृत्ति के बन्धन से भी न्यारा रहता है। निमित्त मात्र डायरेक्शन प्रमाण प्रवृत्ति में रह रहे हो, सम्भाल रहे हो लेकिन अभी-अभी आर्डर हो कि चले आओ तो चले आयेंगे या बन्धन आयेगा। सभी स्वतन्त्र हो?*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अब सचखण्ड के लिए सच्ची कमाई करना"*

 

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय गोद में बैठकर सचखण्ड की सच्ची कमाई से स्वयं को लबालब करो... इस झूठ की दुनिया के करोड़ सब मिटटी में मिल जायेंगे... इसलिए इनके पीछे बहुमूल्य समय सांसो को न खपाओ... *दिव्य गुण और शक्तियो से सज संवर कर* नयी दुनिया पर अपना अधिकार जमाओ..."

     

_ ➳  *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपको पाकर बेहद की समझदार हो गयी हूँ... मिटटी के ढेलों को छोड़ अब रत्नों से खेल रही हूँ... *प्यारे बाबा आपने अपनी बाँहों में भरकर मुझे मालामाल कर दिया है*.. सतयुगी दुनिया को मेरे नाम कर दिया है... मुझे सचखण्ड का मालिक बना दिया है..."

 

   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता के साथ के खुबसूरत और वरदानी समय को *सच्ची कमाई से भरपूर कर, विश्व के मालिक बन सदा की मुस्कराहटों से सज जाओ.*.. इस बहुमूल्य समय को कौड़ियो के पीछे अब व्यर्थ न गंवाओ... यादो में सच्ची कमाई कर सदा के धनवान् बन सतयुगी सुखो की धरोहर को पाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा स्वयं को देह समझ निर्रथक जीवन को जी रही थी... आपने मीठे बाबा *मुझे अपनी प्यार भरी छत्रछाया में कितना अमूल्य बना दिया है*... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में डूबकर कितनी मालदार हो गयी हूँ...

 

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... ईश्वरीय यादो में सदा की अमीरी से भर जाओ... *सच्ची कमाई से 21 जनमो की सुख भरी दौलत को अपने नाम लिखवाओ.*.. ईश्वर पिता की मीठी यादो में, देह की मिटटी और विनाशीधन के आकर्षण से मुक्त होकर, सच्चे सौंदर्य और अखूट कमाई से भरपूर हो जाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्यार के साये तले कितनी मालामाल हो गयी हूँ... *विनाशी धन को छोड़ सच्ची कमाई में दिलोजान से जुट गयी हूँ.*.. दैहिक आकर्षण और विनाशी कमाई से मुक्त होकर आत्मिक नशे में झूम रही हूँ..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मनसा वाचा कर्मणा किसी को भी दुख नहीं देना है*"

 

_ ➳  अपने प्यारे ब्रह्मा बाबा की अनमोल शिक्षाओं को अपने ब्राह्मण जीवन में धारण कर, उनके समान बनने का लक्ष्य अपने सामने लाते ही मैं अनुभव करती हूँ जैसे मैं ब्राह्मण आत्मा ब्रह्मा बाबा की कर्मभूमि, और अपने प्राण प्रिय परम पिता परमात्मा शिव बाबा की अवतरण भूमि मधुबन में हूँ। स्वयं को मैं साकार ब्रह्मा बाबा के सामने देख रही हूँ। *अपने हर संकल्प, बोल और कर्म से बाबा सबको सुख दे कर, सबको परमात्म पालना का अनुभव करवा रहे हैं। सभी ब्राह्मण बच्चे बाबा की पालना में पलते हुए अपने ईश्वरीय जीवन का भरपूर आनन्द ले रहे हैं और फॉलो  फादर कर बाप समान बनने का पुरुषार्थ भी कर रहें हैं*।

 

_ ➳  साकार बाबा की साकार पालना का यह खूबसूरत एहसास मुझे अव्यक्त बापदादा की याद दिला रहा है। उनसे मिलने के लिए मैं जैसे ही उनका आह्वान करती हूँ मैं स्पष्ट अनुभव करती हूँ कि बाबा अपना धाम छोड़कर मुझ से मिलने के लिए नीचे आ रहें हैं। *अपनी सर्वशक्तियाँ बिखेरते हुए परमधाम से नीचे उतरते, ज्ञान सूर्य अपने प्यारे बाबा को मैं मन बुद्धि रूपी नेत्रों से देख रही हूँ। सूक्ष्म वतन में पहुँच कर शिव बाबा अव्यक्त ब्रह्मा बाबा के सम्पूर्ण आकारी शरीर मे प्रवेश करते हैं और उनकी भृकुटि पर विराजमान हो कर अब नीचे साकार लोक में पहुँच कर मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं*। बाबा के मस्तक से आती तेज लाइट को मैं अपने चारों और देख रही हूँ। यह लाइट मुझे सहज ही लाइट माइट स्वरूप में स्थित कर रही है।

 

 ➳ _ ➳  चारों ओर चांदनी सा सफेद प्रकाश फैलता जा रहा है। बापदादा अपना निस्वार्थ प्रेम और स्नेह अपनी अनन्त किरणो के रूप में मुझ पर बरसा रहें हैं। बाबा के निस्वार्थ प्यार की अनन्त किरणे और सर्वशक्तियां मेरे अंदर गहराई तक समाती जा रही हैं। *उनकी पावन दृष्टि से पवित्रता का झरना बह रहा है जिससे निकल रही पवित्र फुहारें मुझ पर बरस रही हैं और मेरे अंदर पवित्रता का बल भर रही हैं*। यह पवित्रता का बल मुझे डबल लाइट बना रहा है। अपना वरदानी हाथ मेरे सिर पर रखकर बाबा मुझे आप समान "मास्टर सुख दाता" भव का वरदान दे कर वापिस अपने अव्यक्त वतन की ओर लौट रहें हैं।

 

_ ➳ बापदादा से मिले वरदान को फलीभूत करने के लिए मैं सुख का फ़रिश्ता बन सारे विश्व मे चक्कर लगाकर, विश्व की तड़पती हुई दुखी अशांत आत्माओं को सुख की अनुभूति करवाने चल पड़ती हूँ। *एक बहुत ऊंचे और खुले स्थान पर जाकर मैं फरिश्ता बैठ जाता हूँ और अपने सुख सागर परमपिता परमात्मा शिव बाबा के साथ कनेक्शन जोड़ कर उनसे सुख की शक्तिशाली किरणे लेकर सारे विश्व में सुख के वायब्रेशन फैलाने लगता हूँ*। अपनी श्रेष्ठ सुख दाई मनसा शक्ति से विश्व की सर्व आत्माओ को सुख प्रदान कर, अब मैं मनसा - वाचा - कर्मणा तीनो स्वरूपों से सबको सुख देने के लिए अपने सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण स्वरूप में आकर स्थित हो जाती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में रहते अब मैं मनसा - वाचा - कर्मणा अपनी सम्पूर्ण सुख स्वरूप अवस्था बनाने के लिए हर कर्म अपने प्राण प्रिय सुख सागर शिव बाबा की याद मे रहकर करती हूँ। चलते फिरते बुद्धि का योग केवल अपने शिवपिता के साथ जोड़ कर अपने हर संकल्प, बोल और कर्म पर मैं सम्पूर्ण अटेंशन देती हूँ। *अपने सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली हर आत्मा को मैं मनसा - वाचा - कर्मणा सुख दे कर अपने प्यारे बाबा और समस्त ब्राह्मण परिवार की दुआयों की पात्र बन, दुआयों की लिफ्ट पर बैठ, बाप समान बनने के अपने संपूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त करने का तीव्र पुरुषार्थ अब निरन्तर और अति सहज रीति कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं श्रेष्ठ मत प्रमाण हर कर्म कर्मयोगी बन करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं कर्मबन्धन मुकत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा अनुभवों की अथॉरिटी हूँ  ।*

   *मैं आत्मा कभी भी धोखा खाने से मुक्त हूँ  ।*

   *मैं अनुभवी स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳ सेवा की भाग-दौड़ भी मनोरंजन का साधन है: सभी अपने को हर कदम में याद और सेवा द्वारा पदमों की कमाई जमा करने वाले पदमापदम भाग्यवान समझते हो? कमाई का कितना सहज तरीका मिला है। *आराम से बैठे-बैठे बाप को याद करो और कमाई जमा करते जाओ। मन्सा द्वारा बहुत कमाई कर सकते हो, लेकिन बीच-बीच में जो सेवा के साधनों में भाग-दौड़ करनी पड़ती है, यह तो एक मनोरंजन है। वैसे भी जीवन में चेन्ज चाहते हैं तो चेन्ज हो जाती है। वैसे कमाई का साधन बहुत है, सेकेण्ड में पदम जमा हो जाते हैं, याद किया और बिन्दी बढ़ गई। तो सहज अविनाशी कमाई में बिजी रहो।*

✺ *"ड्रिल :- सेवा के भाग-दौड़ में भी मनोरंजन का अनुभव करना"*

➳ _ ➳ मैं आत्मा रंग बिरंगे रंगों से एक चित्र बना रही हूं... इस चित्र में मैं एक ऐसी आत्मा का चित्र बनाती हूं, जो हाथ में माला लेकर राम राम जप रहा है... उस चित्र में मैं यह भी दर्शाती हूं कि वह व्यक्ति हर कर्म करते हुए राम राम जप रहा है... भिन्न भिन्न रंगों के द्वारा मैं यह भी दर्शाती हूं कि वह व्यक्ति हाथ में माला लेकर अनेक स्थानों पर जाकर अपना कर्म कर रहा है... वह चित्र बनाते समय मैं पूरी तरह से उस चित्र में डूब जाती हूं... और *मैं एक छोटा सा मोती बन कर उस व्यक्ति की माला में बैठ जाती हूं... और उस माला में बैठकर अब मैं उस व्यक्ति के और करीब हो जाती हूं और उसकी पूरी दिनचर्या करीब से देखती हूं... तभी मुझे आभास होता है कि इसी माला में ऊपर की ओर शिव बाबा बैठे हैं और मुझे देख कर मुस्कुरा रहे हैं...*

➳ _ ➳ जैसे ही मुझे आभास होता है कि शिव बाबा मुस्कुरा रहे हैं... तो मैं शिव बाबा से पूछती हूं... कि बाबा आपकी मुस्कुराहट का क्या कारण है? बाबा मुझे कहते हैं... *क्या तुमने इस व्यक्ति को ध्यान से देखा और समझा कि यह सारा दिन कितना व्यस्त रहता है फिर भी माला सिमरण करना नहीं भूलता, और ना ही यह अपना कोई भी कर्तव्य भूलता है, और साथ ही बाबा मुझे पूछते हैं... क्या तुम अपना कर्तव्य करते समय अपने परमात्मा को याद करते हो? कितना समय याद करते हो और कितना समय भूलते हो? क्या तुम्हें कुछ याद है? बाबा की यह बातें सुनकर मैं कुछ देर के लिए स्थिर हो जाती हूं...*

➳ _ ➳ कुछ समय उस चित्र में व्यतीत करने के बाद मैं बाहर निकलकर इस देह में विराजमान हो जाती हूं और फिर भी शिव बाबा की कही हुई बातों को नहीं भूलती हूं, और बार-बार अपने सामने शिवबाबा को अनुभव करती हूं... और मुझे यह आभास होता है कि मानो शिव बाबा बार-बार मुझे वही प्रश्न पूछ रहे हैं कि... क्या तुम्हें याद है तुम परमात्मा को कितना समय याद करती हो? और कितना समय भूलती हो? फिर *मैं एकांत मैं जाकर विचार सागर मंथन करती हूं और अपनी दिनचर्या बनाती हूं, जिसमें मैं सारा दिन परमात्मा को याद रख सकूं और मेरा मनोरंजन भी हो जाए व पुरुषार्थ में नवीनता भी आ जाए...*

➳ _ ➳ सबसे पहले मैं अमृतवेला में प्रभु मिलन कर अपनी दिनचर्या प्रारंभ करती हूं... और जब मैं स्नान करने जाती हूं तो मैं यह अनुभव करती हूं कि मैं आत्मा शिव बाबा की किरणों रुपी झरने में नहा रही हूं... जिससे नहा कर मेरा फरिश्ता स्वरूप निखरता जा रहा है, और मैं बाबा को अपने साथ लेकर श्रृंगार करने बैठती हूं... और मुझे यह भी ध्यान रहता है कि मुझे परमात्मा को भी याद करना है और श्रृंगार भी करना है... मैं बैठ जाती हूं *शीशे के सामने और मैं श्रृंगार प्रारंभ करती हूं... जैसे ही मैं माथे पर बिंदिया लगाती हूं तो मुझे आभास होता है कि शिव बाबा मुझे कह रहे हैं... कि बच्चे तुम शरीर नहीं आत्मा हो, तुम आत्मिक स्थिति में हो... और मैं तुरंत अपने आपको आत्मिक स्थिति में ले आती हूं... फिर मैं अनुभव करती हूं कि मैं आत्मा शिव बाबा की सजनी हूं, शिव बाबा मुझे ज्ञान रत्नों से सजाने के लिए आए हैं...*

➳ _ ➳ और कुछ समय बाद जब मैं सुंदर वस्त्र पहनती हूं, तो मैं अनुभव करती हूं कि मैं सतयुगी देवी हूं और बाबा ने मुझे यह रुप दिया है... और जब मैं भोजन बनाती हूं तो मैं अनुभव करती हूं कि शिव बाबा मेरे सर के ऊपर हैं और अपनी शक्तिशाली और पवित्र किरणों से भोजन को शुद्ध बना रहे हैं... और जब मैं भोजन करके और अपना काम खत्म करके बाहर निकलती हूं तो मैं शिवबाबा को कहती हूं... बाबा इस कड़ी धूप में आप मेरी छत्रछाया बनकर मेरे साथ रहना और पूरे रास्ते भर मैं उनको अपनी छत्रछाया अनुभव करती हूं और उनसे बातें करते हुए चलती हूं... ऐसे ही जब मैं वापस घर लौटती हूं तो अपने सभी काम शिव बाबा की याद में खत्म करके रात को शिव बाबा की गोद में आकर सो जाती हूं... और मैं बाबा को कहती हूं... बाबा धन्यवाद आपने समय पर मुझे समझा दिया कि हम कितने भी व्यस्त हो, *अपने परमात्मा को व्यस्त रहते हुए भी याद कर सकते हैं और मनोरंजन भी हो जाता है... जिससे हमारे पुरुषार्थ में नवीनता आ जाती है और अलबेलापन भी नहीं आता, हमारी याद की यात्रा बढ़ती जाती है...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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