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 23 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *चलन और खान पान में रॉयल्टी रखी ?*

 

➢➢ *अपना पोतामेल देखा की हम बाबा को कितना याद करते हैं ?*

 

➢➢ *माया के खेल को साक्षी होकर देखा ?*

 

➢➢ *स्नेह का सागर बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *हर व्यक्ति को, बात को पॉजिटिव वृत्ति से देखो, सुनो या सोचो तो कभी जोश या क्रोध नहीं आयेगा।* आप मास्टर स्नेह के सागर हो तो आपके नयन, चैन, वृत्ति, दृष्टि में जरा भी और कोई भाव नहीं आ सकता, इसलिए चाहे कुछ भी हो जाये, *सारी दुनिया क्यों नहीं आप पर क्रोध करे लेकिन मास्टर स्नेह के सागर दुनिया की परवाह नहीं करो। बेपरवाह बादशाह बनो, तब आपकी श्रेष्ठ वृत्तियों से शक्तिशाली वायुमंडल बनेगा।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं विजयी रत्न हूँ"*

 

  सदा अपने को विजयी रत्न अनुभव करते हो? सदा विजयी बनने का सहज साधन क्या है? *सदा विजयी बनने का सहज साधन है-एक बल एक भरोसा। एक में भरोसा और उसी एक भरोसे से एक बल मिलता है। निश्चय सदा ही निश्चिंत बनाता है।*

 

  अगर कोई समझते हैं कि मुझे निश्चय है, तो उसकी निशानी है कि वो सदा निश्चिंत होगा और निश्चिंत स्थिति से जो भी कार्य करेगा उसमें जरूर सफल होगा। *जब निश्चिंत होते हैं तो बुद्धि जजमेन्ट यथार्थ करती है। अगर कोई चिंता होगी, फिक्र होगा, हलचल होगी तो कभी जजमेन्ट ठीक नहीं होगी।*

 

  तराजू देखा है ना। तराजू की यथार्थ तौल तब होती है जब तराजू में हलचल नहीं हो। *अगर हलचल होगी तो यथार्थ नहीं कहा जायेगा। ऐसे ही, बुद्धि में अगर हलचल है, फिक्र है, चिन्ता है तो हलचल जरूर होगी। इसीलिए यथार्थ निर्णय का आधार है-निश्चयबुद्धि, निश्चिंत।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  जो चैलेन्ज करते हो - सेकण्ड में मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा प्राप्त करो, उसको प्रैक्टिकल में लाने लिए तैयार हो? *स्व-परिवर्तन की गति सेकण्ड तक पहुँची है?* क्या समझते हो? पुराना वर्ष समाप्त हो रहा है, नया वर्ष आ रहा है, अभी संगम पर बैठे हो।

 

✧  तो *पुराने वर्ष में स्व-परिवर्तन व विश्व परिवर्तन की गति कहाँ तक पहुँची है?* तीव्र गति रही? रिजल्ट तो निकालेंगे ना? तो इस वर्ष की रिजल्ट क्या रही? स्व-प्रति, सम्बन्ध और सम्पर्क प्रति वा विश्व की सेवा के प्रति।

 

✧  इस वर्ष का लक्ष्य मिला? जानते है ना। उडता पंछी वा उडती कला तो इसी लक्ष्य प्रमाण गति क्या रही? *जब सबकी गति सेकण्ड तक पहुँचेगी तो क्या होगा? अपना घर और अपना राज्य, अपने घर लौटकर राज्य में जायेंगे।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *स्व अभ्यास में अलबेले मत बनो। क्योंकि अन्त में विशेष शक्तियों के अभ्यास की आवश्यकता है।* उसी प्रैक्टिकल पेपर्स द्वारा ही नम्बर मिलने हैं। *इसलिए फ़र्स्ट डिवीजन लेने के लिए स्व अभ्यास को फ़ास्ट करो। उसमें भी एकाग्रता के शक्ति की विशेष प्रैक्टिस करते रहो।* हंगामा हो और आप एकाग्र हो। साइलेन्स के स्थान और परिस्थिति में एकाग्र होना यह तो साधारण बात है, लेकिन चारों प्रकार की हलचल के बीच एक के अन्त में खो जाओ अर्थात् एकान्तवासी हो जाओ। *एकान्तवासी हो एकाग्र स्थिति में स्थित हो जाओ - यह है महारथियों का महान पुरुषार्थ।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- श्रीमत पर विश्व की सेवा करना"*

 

_ ➳  *परमपिता परमात्मा परमधाम से आकर विकारों की अग्नि से धधकते इस दुनिया को स्वाहा कर... नई निर्विकारी सतयुगी दुनिया की स्थापना के लिए रूद्र ज्ञान यज्ञ की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं...* कोटो में से चुनकर प्यारे बाबा ने मुझे अपनी गोदी में पालना दी... मुझे ब्राहमण बनाकर इस यज्ञ में अपना राईट हैण्ड बनाया... विचार करते हुए मैं आत्मा उड़ चलती हूँ, अव्यक्त वतन में... मीठे बाबा मेरे सिर पर विश्व परिवर्तन का ताज पहनाते हुए समझानी देते हैं...  

 

  *सबकी जिन्दगी की राहों से अँधेरा मिटाकर विश्व को रोशन करने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... बापदादा आज चैतन्य दीपको से मिलन मना रहे है... *हर एक दीपक अपनी रौशनी से विश्व के अंधकार को दूर करने वाला चैतन्य दीपक है... अपनी इस खुबसूरत जिम्मेदारी के ताज को सदा पहने रहो...* विश्व की आत्माये अंधकार के सागर में समायी सी... बेसब्री से आपकी बाट निहार रही है... उनके जीवन का अँधेरा दूर करो...

 

_ ➳  *इस जहान की नूर मैं आत्मा सबके दिलों की आश बन दुःख दर्द मिटाकर खुशियों से महकाते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में प्रकाश पुंज बन गई हूँ... *सबके दुखो को दूर करने वाली दीपक बन जगमगा रही हूँ... सबके दामन में सुखो के फूल खिला रही हूँ...* और विश्व परिवर्तन की जिम्मेदारी का ताज पहन मुस्करा रही हूँ...

 

  *प्यारे बाबा अमृत भरा कलश मेरे सिर पर रख विश्व परिवर्तन की जिम्मेवारी के निमित्त बनाते हुए कहते हैं:-* मीठे प्यारे फूल बच्चे... कितने महान भाग्यशाली ब्रह्मा कुमार हो... आपके स्नेह के आकर्षण में बाबा अव्यक्त होते हुए भी....मधुबन में साकार रूप चरित्र की अनुभूति सदा कराते है... *कितने बड़े स्नेह के जादूगर हो... ऐसी विशेषता भरी खुबसूरत मणि हो कि स्नेह के बन्धन में बापदादा को बांध लिया है...*

 

_ ➳  *परमात्मा की गले का हार बन अविनाशी सुखों से इस सृष्टि का श्रृंगार करते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा खुबसूरत भाग्य की धनी हूँ... भगवान मेरी बाँहों में आ गया है... *मेरे स्नेह की डोरी में खिंच कर सदा साथ रह मुस्करा रहा है... वाह बच्चे वाह के गीत गा रहा है... आपके प्यार में मै आत्मा खुबसूरत चैतन्य दीपक बन गई हूँ...*

 

  *अपने वरदानी हाथों से अविनाशी भाग्य की लकीर मेरे मस्तक पर खींचते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... *बापदादा होलिहंसो का ख़ुशी भरा डांस देख देख मन्त्रमुग्ध है... मनमनाभव के महामन्त्र के वरदानी बन मुस्करा रहे हो...* ईश्वर पिता की सारी दौलत को बाँहों में भरने वाले खबसूरत सौदागर भी हो और जादूगर भी हो... सदा इस अलौकिक नशे में रहो और ज्ञान सूर्य बन चमको...

 

_ ➳  *इस धरा पर स्वर्ग लाने के कार्य में मैं आत्मा अपना तन, मन, धन सफल करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपको पाकर किस कदर गुणो और शक्तियो की जादूगर सी बन गयी हूँ... *जीवन कितना मीठा प्यारा और खुशनुमा इस प्यार की जादूगरी से हो गया है... मै आत्मा ज्ञान सूर्य बन अपनी रूहानियत से सबके दिल रोशन कर रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- अमरलोक में उंच पद पाने के लिए पवित्र बनने के साथ - साथ दैवीगुण भी धारण करने हैं*"

 

_ ➳  एकांत में अंतर्मुखी बन कर बैठी मैं ब्राह्मण आत्मा विचार करती हूँ कि मेरा यह जीवन जो कभी हीरे तुल्य था आज रावण की मत पर चलने से कैसा कौड़ी तुल्य बन गया है! *दैवी गुणों से सम्पन्न थी मैं आत्मा और आज आसुरी अवगुणों से भर गई हूँ। रावण रूपी 5 विकारों की प्रवेशता ने मेरे दैवी गुण छीन कर मेरे अंदर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहँकार पैदा कर मेरे जीवन को ही श्रापित कर दिया है और अब जबकि स्वयं भगवान आकर मेरे इस श्रापित जीवन से मुझे छुड़ा कर फिर से पूज्य देवता बना रहे हैं तो मेरा भी यह परम कर्तव्य बनता है कि उनकी श्रेष्ठ मत पर चल कर, अपने जीवन मे दैवी गुणों को धारण कर अपने जीवन को पलटा कर भविष्य जन्म जन्मान्तर के लिए सुख, शांति और पवित्रता का वर्सा उनसे ले लूँ*। मन ही मन इन्ही विचारो के साथ अपने दैवी गुणों से सम्पन्न स्वरूप को मैं स्मृति में लाती हूँ और अपने उस अति सुन्दर दिव्य स्वरूप को मन बुद्धि के दिव्य चक्षु से निहारने मे मगन हो जाती हूँ।

 

_ ➳  दैवी गुणों से सजा मेरा पूज्य स्वरूप मेरे सामने है। लक्ष्मी नारायण जैसे अपने स्वरूप को देख मैं मन ही मन आनन्दित हो रही हूँ। अपने सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप में मैं बहुत ही शोभायमान लग रही हूँ। *मेरे चेहरे की हर्षितमुखता, नयनो की दिव्यता, मुख मण्डल पर पवित्रता की दिव्य आभा मेरे स्वरूप में चार चांद लगा रही है। अपने इस अति सुन्दर स्वरूप का भरपूर आनन्द मैं ले रही हूँ । मन ही मन अपनी इस ऐम ऑब्जेक्ट को बुद्धि में रख, ऐसा बनने की मन मे दृढ़ प्रतिज्ञा कर, अपने जीवन को पलटाने के लिए दैवी गुणों को धारण करने का संकल्प लेकर, पुजारी से पूज्य बनाने वाले अपने परमपिता परमात्मा का दिल की गहराइयों से मैं शुक्रिया अदा करती हूँ* और 63 जन्मो के आसुरी अवगुणों को योग अग्नि में दग्ध करने के लिए अपने प्यारे पिता की याद में अब सम्पूर्ण एकाग्रचित होकर बैठ जाती हूँ।

 

 

_ ➳  एकाग्रता की शक्ति जैसे - जैसे बढ़ने लगती है मेरा वास्तविक स्वरूप मेरे सामने पारदर्शी शीशे के समान चमकने लगता है और अपने स्वरूप का मैं आनन्द लेने में व्यस्त हो जाती हूँ। एक चमकते हुए बहुत ही सुन्दर स्टार के रूप में मैं स्वयं को देख रही हूँ। *उसमे से निकल रही रंगबिरंगी किरणें चारों और फैलते हुए बहुत ही आकर्षक लग रही हैं। उन किरणों से मेरे अंदर समाये गुण और शक्तियों के वायब्रेशन्स जैसे - जैसे मेरे चारों और फैल रहें है, एक सतरंगी प्रकाश का खूबसूरत औरा मेरे चारो और बनता जा रहा है*। प्रकाश के इस खूबसूरत औरे के अंदर मैं स्वयं को ऐसे अनुभव कर रही हूँ जैसे किसी कीमती खूबसूरत जगमगाती डिब्बी के अंदर कोई बहुमूल्य हीरा चमक रहा हो और अपनी तेज चमक से उस डिब्बी की सुंदरता को भी बढ़ा रहा हो।

 

_ ➳  सर्वगुणों औऱ सर्वशक्तियों की किरणें बिखेरते अपने इस सुन्दर स्वरूप का अनुभव करके और इसका भरपूर आनन्द लेकर अब मैं चमकती हुई चैतन्य शक्ति देह की कुटिया से निकल कर, स्वयं को कौड़ी से हीरे तुल्य बनाने वाले अपने प्यारे शिव बाबा के पास उनके धाम की ओर चल पड़ती हूँ। *प्रकाश के उसी खूबसूरत औरे के साथ मैं ज्योति बिंदु आत्मा अपनी किरणे बिखेरती हुई अब धीरे - धीरे ऊपर उड़ते हुए आकाश में पहुँच कर, उसे पार करके, सूक्ष्म वतन से होती हुई अपने परमधाम घर मे पहुँच जाती हूँ*। आत्माओं की इस निराकारी दुनिया में चारों और चमकती जगमग करती मणियों के बीच मैं स्वयं को देख रही हूँ। चारों और फैला मणियो का आगार और उनके बीच मे चमक रही एक महाज्योति। ज्ञानसूर्य शिव बाबा अपनी सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे फैलाते हुए इन  चमकते हुए सितारों के बीच बहुत ही लुभावने लग रहे हैं। *उनकी सर्वशक्तियों की किरणों का तेज प्रकाश पूरे परमधाम घर मे फैल रहा है जो हम चैतन्य मणियों की चमक को कई गुणा बढ़ा रहा है*।

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता के इस सुंदर मनमनोहक स्वरूप को देखते हुए मैं चैतन्य शक्ति धीरे - धीरे उनके नजदीक जाती हूँ और उनकी सर्वशक्तियों की किरणों रूपी बाहों में ऐसे समा जाती हूँ जैसे एक बच्चा अपनी माँ के आंचल में समा जाता है। मेरे पिता का प्यार उनकी अथाह शक्तियों के रूप में मेरे ऊपर निरन्तर बरस रहा है। *मेरे पिता के निस्वार्थ, निष्काम प्यार का अनुभव, उनका प्यार पाने की मेरी जन्म - जन्म की प्यास को बुझाकर मुझे तृप्त कर रहा है। परमात्म प्यार से भरपूर होकर योग अग्नि में अपने विकर्मों को दग्ध करने के लिए अब मैं बाबा के बिल्कुल समीप जा रही हूँ और उनसे आ रही जवालास्वरूप शक्तियों की किरणों के नीचे बैठ, योग अग्नि में अपने पुराने आसुरी स्वभाव संस्कारों को जलाकर भस्म कर रही हूँ*। बाबा की शक्तिशाली किरणे आग की भयंकर लपटों का रूप धारण कर मेरे चारों और जल रही है, जिसमे मेरे 63 जन्मो के विकर्म विनाश हो रहें हैं और मैं आत्मा शुद्ध पवित्र बन रही हूँ।

 

_ ➳  सच्चे सोने के समान शुद्ध और स्वच्छ बनकर अपने प्यारे पिता की श्रेष्ठ मत पर चल कर, अब मैं अपने जीवन को पलटाने और श्रेष्ठ बनाने के लिए स्वयं में दैवी गुणों की धारणा करने के लिए फिर से साकार सृष्टि पर लौट आती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर पूज्य बनने के पुरुषार्थ में लग जाती हूँ। *अपने आदि पूज्य स्वरूप को सदा स्मृति में रखते हुए, बाबा की याद से पुराने आसुरी स्वभाव संस्कारों को दग्ध कर, नए दैवी संस्कार बनाने का पुरुषार्थ करते हुए अब मैं स्वयं का परिवर्तन बड़ी सहजता से करती जा रही हूँ*

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं माया के खेल को साक्षी हो कर देखने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा निर्भय आत्मा हूँ।*

   *मैं मायाजीत आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं मास्टर स्नेह का सागर हूँ  ।*

   *मैं आत्मा क्रोध के समीप आने से सदा मुक्त हूँ  ।*

   *मैं आत्मा शांति स्वरूप हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सर्वंश त्यागी आत्मा किसी भी विकार के अंश के भी वशीभूत हो कोई कर्म नहीं करेगी। विकारों का रायल अंश स्वरूप पहले भी सुनाया है कि मोटे रूप में विकार समाप्त हो रायल रूप में अंश मात्र के रूप में रह जाते हैं। वह याद है ना! ब्राह्मणों की भाषा भी रायल बन गई है। अभी वह विस्तार तो बहुत लम्बा है। *मैं ही यथार्थ हूँ वा राइट हूँ - ऐसा अपने को सिद्ध करने के रायल भाषा के शब्द भी बहुत हैं। अपनी कमज़ोरी छिपाकर दूसरे की कमज़ोरी सिद्ध करने वा स्पष्ट करने का विस्तार करना, उसके भी बहुत रायल शब्द हैं। यह भी बड़ी डिक्शनरी हैं। जो वास्तविकता नहीं है लेकिन स्वयं को सिद्ध करने वा स्वयं की कमज़ोरियों के बचाव के लिए मनमत के बोल हैं। वह विस्तार अच्छी तरह से सब जानते हो। सर्वन्श त्यागी की ऐसी भाषा नहीं होती - जिसमें किसी भी विकार का अंश मात्र भी समाया हुआ हो। तो मंसा-वाचा-कर्मणा, सम्बन्ध-सम्पर्क में सदा विकारों के अंश मात्र से भी परेइसको कहा जाता है सर्वंश त्यागी'। सर्व अंश का त्याग।*

 

✺   *"ड्रिल :- स्वयं को सिद्ध करने वा स्वयं की कमज़ोरियों के बचाव के लिए मनमत के बोल नहीं बोलना।*

 

 _ ➳  बाबा को याद करते हुए मैं आत्मा मन बुद्धि से पहुंच जाती हूं परमधाम... और बाबा से मिलकर बाबा को अपने साथ लेकर आ जाती हूं... *रिमझिम की एक फुहार बनकर नीचे आसमान में... मुझे वहां कुछ बादल दिखाई देते हैं... और मैं आ जाती हूं बादलों के अंदर... जैसे ही मैं बादल में प्रवेश करती हूं... बादल गहरे रंग के हो जाते हैं... और बादलों की गति बढ़ने लगती हैं... मैं बादलों में बैठकर उनकी गति को मन ही मन फील करती हूं... मुझे एहसास होता है... कि जैसे बाबा ने मुझमें इतनी शक्तियां भर दी हैं कि मैं अब इस धरा को अपने रिमझिम फुहार से हरी-भरी कर सकूं और बंजर जमीन से फसल का जीवन दान दे सकूं...और साथ ही उदास चेहरों पर हंसी ला सकूं...*

 

 _ ➳  *जैसे-जैसे बादलों की गति बढ़ती जाती है... वह आपस में एक दूसरे से टकराते हैं... और शिवबाबा बिजली बनकर चमकते हैं... और बाबा से शक्तियां लेकर मैं बारिश की फुहार बनकर इस धरा पर बरसने लगती हूं... और ऐसा प्रतीत हो रहा है... मानों सभी आत्माएं जन्म जन्म की प्यासी हो... और मुझसे वरदानों की बारिश करने के लिए कह रही हो...* मैं अपनी शक्तियों की वर्षा उन पर करने लगती हूं... तभी मैं अचानक देखती हूं कि... एक स्थान पर कुछ आत्माएं बैठी हुई है... और एक आत्मा आगे बैठकर उन्हें कुछ पढ़ा रही है... और मैं देखती हूं कि... वह सभी आत्माएं उस एक आत्मा की बातें बहुत गहराई से और प्यार से सुन रही है...

 

 _ ➳  परंतु कुछ समय बाद मैं देखती हूं कि... वह आत्मा अपने आप को देहभान में लाते हुए... बाबा की श्रीमत को पूरा फॉलो नहीं करते हुए... उन सभी आत्माओं को अपने ज्ञान अभिमान करते हुए... कुछ बातें बता रही है... वह अपनी मन बुद्धि में परमात्मा को शामिल नहीं करते हुए सिर्फ अपनी मनमत से आत्माओं को कुछ बातें बताने की चेष्टा कर रही है... परंतु उसके सामने बैठी सभी आत्माएं कुछ असंतुष्ट सी नजर आ रही है... मेरा जैसे ही ध्यान उन आत्माओं पर जाता है... मैं उनकी भावनाओं को समझ जाती हूँ... और *बाबा से लगातार शक्तियां लेते हुए बारिश की फुहार बनकर सामने बैठी उस आत्मा के मन बुद्धि में प्रवेश कर जाती हूँ... और मैं उस आत्मा के मुख मंडल द्वारा उन सभी आत्माओं को कहती हूं कि... मैं आज जो कुछ भी हूं जो कुछ भी मुझे ज्ञान मिला है वह सिर्फ परमात्मा के द्वारा ही मिला है...*

 

 _ ➳  और मैं कहती हूं कि मुझे परमात्मा रोज नया नया ज्ञान मुरली द्वारा देते हैं... जिससे मैं श्रीमत का पूर्ण रुप से पालन कर पाती हूं... मैं जो भी कुछ ज्ञान सुना रही हूं वह सिर्फ और सिर्फ परमात्मा द्वारा दिए हुए श्रीमत के कारण ही सुना पा रही हूं... इतना कहकर मैं उस आत्मा की मन बुद्धि से वापस बाहर निकल आती हूं... और मैं देखती हूं कि... वह आत्मा एकदम परिवर्तित हो चुकी है... और उस पर मेरे कहे हुए शब्दों का प्रभाव पड़ रहा है... और *वह परमात्मा का बार-बार धन्यवाद करते हुए उन आत्माओं को बाबा के ज्ञान द्वारा संतुष्ट करने का पुरुषार्थ कर रही है... वह अपने आप को सिद्ध करने के लिए किसी भी प्रकार के मनमत का साथ नहीं ले रही है... तथा मैं देखती हूं कि... वहां बैठी सभी आत्माएं एकदम शीतल भाव से, शांत भाव से संतुष्ट होकर उस आत्मा की बातें सुन रही है...*

 

 _ ➳  वहां का यह चित्र देखकर मेरा मन अति हर्षित हो रहा है... और मैं परमात्मा को लगातार अपने साथ अनुभव कर रही हूं... और रिमझिम फुहार से और परमात्मा द्वारा दी हुई शक्तियों को रिमझिम फुहार में परिवर्तन कर... इस पूरे संसार में फैला रही हूं... क्रोध में जलती हुई आत्माएं और सभी असंतुष्ट आत्माएं श्रीमत से बाहर जाती आत्माएं सभी अपने साथ परमात्मा को अनुभव करने लगती है... और मैं यह चित्र देखकर बाबा को धन्यवाद करती हूं... फिर से अपने आप को उस बादल से निकालकर इस देह में विराजमान कर लेती हूं... और इस देह में विराजमान होते-होते *मैं अपने आप से यह वादा करती हूं... कि मैं पुरुषार्थ की राह में कभी भी अपने आप को सिद्ध करने के लिए मनमत का सहारा नहीं लूंगी... और सदा पुरुषार्थ में श्रीमत की राह पर चलूंगी... इसी भाव से मैं इस सृष्टि पर अपनी वाइब्रेशन फैलाने लगती हूं...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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