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 24 / 06 / 22  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *दुःख हर्ता सुख कर्ता की याद में रहे ?*

 

➢➢ *निमित और निर्माणचित बनकर रहे ?*

 

➢➢ *अपने पूज्य स्वरुप की स्मृति से रूहानी नशे में रहे ?*

 

➢➢ *अपने कर्मों पर विशेष अटेंशन दिया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *अभी अच्छा-अच्छा कहते हैं, लेकिन अच्छा बनना है यह प्रेरणा नहीं मिल रही है।* उसका एक ही साधन है-संगठित रुप में ज्वाला स्वरुप बनो। एक एक चैतन्य लाइट हाउस बनो। सेवाधारी हो, स्नेही हो, एक बल एक भरोसे वाले हो, यह तो सब ठीक है, *लेकिन मास्टर सर्वशक्तिवान की स्टेज, स्टेज पर आ जाए तो सब आपके आगे परवाने के समान चक्र लगाने लगेंगे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं मास्टर दाता हूँ"*

 

  आप कौन हो? मास्टर दाता हो ना। वास्तव में देना अर्थात् बढ़ना। *जितना देते हो उतना बढ़ता है। विनाशी खजाना देने से कम होता है और अविनाशी खजाना देने से बढ़ता है-एक दो, हजार पाओ।* तो देना आता है कि सिर्फ लेना आता है? दे कौन सकता है? जो स्वयं भरपूर है। अगर स्वयं में ही कमी है तो दे नहीं सकता।

 

  *तो मास्टर दाता अर्थात् सदा भरपूर रहने वाले, सम्पन्न रहने वाले। तो सहज याद क्या हुई? 'प्यारा बाबा'। मतलब से याद नहीं करो। मतलब से याद करने में मुश्किल होता है, प्यार से याद करना सहज होता है। मतलब से याद करना याद नहीं, फरियाद होती है।* तो फरियाद करते हो? ऐसा कर देना, ऐसा करो ना, ऐसा होना चाहिए ना....-ऐसे कहते हो?

 

  याद से सर्व कार्य स्वत: ही सफल हो जाते हैं, कहने की आवश्यकता नहीं। सफलता जन्मसिद्ध अधिकार है। अधिकार मांगने से नहीं मिलता, स्वत: मिलता है। तो अधिकारी हो या मांगने वाले हो? अधिकारी सदा नशे में रहते हैं-मेरा अधिकार है। मांगना तो बन्द हो गया ना। बाप से भी मांगना नहीं है। यह दे दो, थोड़ी खुशी दे दो, थोड़ी शान्ति दे दो....-ऐसे मांगते हो? बाप का खजाना मेरा खजाना है। जब मेरा खजाना है तो मांगने की क्या दरकार है। तो अधिकारी जीवन का अनुभव करने वाले हो ना। अनेक जन्म भिखारी बने, अभी अधिकारी बने हो। *सदा इसी अधिकार के नशे में रहो। परमात्म-प्यार के अनुभवी आत्माएं हो। तो सदा इसी अनुभव से सहजयोगी बन उड़ते चलो। अधिकारी आत्मायें स्वप्न में भी मांग नहीं सकतीं। बालक सो मालिक हो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *विस्तार को देखते भी न देखें, सुनते हुए भी न सुनें - यह प्रैक्टिकल अभी से चाहिए।* तब अंत के समय चारों ओर की हलचल की आवाज जो बडी दु:खदायी होगी, दृश्य भी अति भयानक होगे - अभी की बातें उसकी भेंट में तो कुछ भी नहीं है - *अगर अभी से ही देखते हुए न देखना, सुनते हुए न सुनना यह अभ्यास नहीं होगा तो अंत में इस विकराल दृश्य को देखते एक घडी के पेपर में सदा के लिए फेल माक्र्स मिल जावेगी।*

 

✧  इसलिए यह भी विशेष अभ्यास चाहिए। *ऐसी स्टेज हो जिसमें साकार शरीर भी आकारी रूप में अनुभव हो।* जैसे साकार रूप में देखा साकार शरीर भी आकरी फरिश्ता रूप अनुभव किया ना। चलते-फिरते कार्य करते आकारी फरिश्ता अनुभव करते थे।

 

✧  शरीर तो वही था ना - लेकिन स्थूल शरीर का भान निकल जाने कारण स्थूल शरीर होते भी आकारी रूप अनुभव करते थे। तो सर्व के सहयोग के वायब्रेशन का फैला हुआ हो - *जिस भी स्थान पर जाए तो यह फरिश्ता रूप दिखाई दे।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सिर्फ संकल्प शक्ति अर्थात मन और बुद्धि सदा मनमत से खाली रखो। *मन को चलाने की आदत बहुत है ना।* एकाग्र करते हो फिर भी चल पड़ता है। फिर मेहनत करते हो । *चलाने से बचने का साधन है* जैसे आजकल अगर कोई कन्ट्रोल में नहीं आता, बहुत तंग करता है, बहुत उछलता है, या पागल हो जाता है तो उनको ऐसा इन्जेक्शन लगा देते हैं जो वह शान्त हो जाता है। तो ऐसे अगर संकल्प शक्ति आपके कण्ट्रोल में नहीं आती तो *अशरीरी भव का इन्जेक्शन लगा दो। बाप के पास बैठ जाओ। तो संकल्प शक्ति व्यर्थ नहीं उछलेगी।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- कर्म ही सुख और दुःख का कारण है"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सेण्टर में बाबा के कमरे में बैठ बाबा का आह्वान करती हूँ... बाहरी सभी बातों से अपने मन को हटाकर एक बाबा में लगाने की कोशिश करती हूँ... धीरे-धीरे सभी कर्मेन्द्रियाँ शांत होती जा रही हैं... भटकता हुआ मन स्थिर होने लगा है... मैं आत्मा अपना बुद्धि योग एक बाबा से कनेक्ट करती हूँ...* इस शरीर को भी भूल एक बाबा की लगन में मगन होने लगती हूँ... बाबा मेरे सम्मुख आकर बैठ जाते हैं... मैं आत्मा गहन शांति की अनुभूति कर रही हूँ... मैं और मेरा बाबा बस और कोई भी नहीं...

 

  *कदम-कदम पर बाप की श्रीमत लेकर कर्म में आने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... मीठे से भाग्य ने जो ईश्वर पिता का साथ दिलवाया है... उस महान भाग्य को सदा का सुखो भरा सौभाग्य बना लो... *हर पल मीठे बाबा की श्रीमत का हाथ पकड़कर सुखी और निश्चिन्त हो जाओ... जिन विकारो ने हर कर्म को विकर्म बनाकर जीवन को गर्त बना डाला... श्रीमत के साये में उनसे हर पल सुरक्षित रहो...*

 

_ ➳  *प्यारे बाबा को विकारों का दान देकर माया के ग्रहण से मुक्त होकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मै आत्मा सच्चे ज्ञान को पाकर कर्मो की गुह्य गति जान गई हूँ... *आपकी श्रीमत पर चलकर जीवन पुण्य कर्मो से सजा रही हूँ... आपके मीठे साथ ने जीवन को फूलो सा महका दिया है... सुकर्मो से दामन सजता जा रहा है...*

 

  *हर कदम में मेरा साथ देकर मेरे भाग्य को श्रेष्ठ बनाते हुए खुदा दोस्त बन मीठे बाबा कहते हैं:-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... श्रीमत ही वह सच्चा आधार है जो जीवन को खुशियो का पर्याय बनाता है... *स्वयं भगवान साथी बन हर कर्म में सलाह और साथ दे रहा है... तो इस महाभाग्य से रोम रोम सजा लो... सच्चे साथी की श्रीमत पर चलकर सुखदायी जीवन का भाग्य अपने नाम करालो...*

 

_ ➳  *सदा श्रेष्ठ संकल्प और कर्मों से अपने जीवन को सदा के लिए खुशहाल बनाते हुए मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा मनुष्य मत के पीछे लटककर कितनी दुखी हो गई थी... अब आपकी छत्रछाया में कितनी सुखी कितनी बेफिक्र जिंदगी को पा रही हूँ... आपका साथ पाकर मै आत्मा सतयुगी सुखो की मालकिन बनती जा रही हूँ...* मेरे जीवन की बागडोर को थाम आपने मुझे सच्चा सहारा दिया है...

 

  *अपने मीठे वरदानों की बारिश कर मुझे अपने दिल तख़्त पर बिठाते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* "प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... यह वरदानी संगम सुकर्मो से दामन सजाने वाला खुबसूरत समय है कि मीठा बाबा बच्चों के सम्मुख है... *इसलिए हर कर्म को श्रीमत प्रमाण कर बाबा का दिल सदा का जीत लो... जब बाबा साथ है तो जीवन के पथ पर अकेले न चलो... सच्चे साथ का हाथ पकड़कर अनन्त खुशियो में उड़ जाओ...*

 

_ ➳  *ईश्वरीय प्रेम के साये में श्रेष्ठ कर्मों से व्यर्थ से मुक्त होकर समर्थ बनकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में कितनी खुशनुमा हो गई हूँ... *हर कदम पर श्रीमत के साथ अपने जीवन में खुशियो के फूल खिला रही हूँ... ईश्वर पिता के सच्चे साथ को पाकर, मै आत्मा हर कर्म को सुकर्म बनाती जा रही हूँ... और बेफिक्र बादशाह बनकर मुस्करा रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- दुःख हर्ता, सुख कर्ता की याद में रहना*"

 

_ ➳  अपने प्यारे पिता की याद में अपने मन और बुद्धि को एकाग्र करते ही मैं महसूस करती हूँ जैसे बाबा की सर्वशक्तियों की किरणें मुझ आत्मा के ऊपर बरसने लगी है और उनसे एक सतरंगी खूबसूरत आभामण्डल निर्मित होने लगा है। *सात रंगों से निर्मित उस खूबसूरत आभामण्डल को, मैं देह की कुटिया में भृकुटि के अकालतख्त पर बैठ कर निहार रही हूँ और उस रंगबिरंगे आभामण्डल से निकल रहे प्रकाश को, रंगबिरंगी किरणों के रूप में चारों और फैलता हुआ देख रही हूँ*। अपने मस्तक से निकल रही इन किरणों को निहारते हुए इनमे समाये गुणों और शक्तियों को महसूस करके मैं गहन तृप्ति का अनुभव कर रही हूँ। इनसे निकल रहें वायब्रेशन्स मुझे एक खूबसूरत एहसास करवा कर मेरे मन को बहुत सूकून दे रहें हैं। *ऐसा लग रहा है जैसे मैं सुख, शांति, आनन्द के एक वन्डरफुल आंतरिक जगत में विचरण कर रही हूँ*।

 

_ ➳  यह आंतरिक जगत एक ऐसे स्वप्नलोक की भांति मुझे दिखाई दे रहा है, जहाँ कुछ ना होते हुए भी जैसे सब कुछ है। *देह और देह की दुनिया से जुड़ी हर वस्तु का यहाँ अभाव है। लेकिन एक गहन सुख, शांति और आनन्द की अनुभूति आत्मा को हो रही है। मन को तृप्त करने वाली इस गहन अनुभूति के साथ अब मैं आत्मा इस आंतरिक जगत की सैर करने के लिए, मन बुद्धि की इस आंतरिक यात्रा पर आगे बढ़ने के लिए भृकुटि के अकालतख्त से उतर कर देह की कुटिया से बाहर आ जाती हूँ*। उसी खूबसूरत सतरंगी आभामण्डल के साथ अब मैं स्वयं को देह से बाहर, देह से पूरी तरह अलग देख रही हूँ और महसूस कर रही हूँ कि बाबा की याद से निर्मित, सर्वशक्तियों का आभामण्डल एक सुरक्षा कवच का काम कर रहा है जो मेरे आसपास फैली नेगेटिविटी को समाप्त कर उसे पॉजिटिव बनाता जा रहा हैं। 

 

_ ➳  जैसे - जैसे मैं आत्मा ऊपर आकाश की और जा रही हूँ मैं स्पष्ट महसूस कर रही हूँ कि बाबा की सर्वशक्तियों से, मुझ आत्मा के चारों और बने हुए औरे को एक कवच की भांति अपने चारों और लपेटे, मैं आत्मा हर तूफान को चीरते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ती ही जा रही हूँ। *याद के इस शक्तिशाली कवच के साथ मैं आत्मा अब सारे विश्व का चक्कर लगाकर आकाश को पार करती हूँ और उससे ऊपर सूक्ष्म वतन को क्रॉस कर पहुँच जाती हूँ अपनी निराकारी दुनिया, अपने स्वीट साइलेन्स होम में जहाँ चारों और गहन शन्ति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स फैले हुए हैं*। अपने इस घर मे आकर मैं आत्मा शन्ति के गहरे अनुभव में खो जाती हूँ और शान्ति की गहन अनुभूति करने के बाद, सर्व गुणों और सर्वशक्तियों के सागर अपने प्यारे पिता के पास पहुँच कर उनके सम्मुख जाकर बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  देख रही हूँ अब मैं अपने अति उज्ज्वल स्वरूप को और अपने प्यारे पिता के अनन्त प्रकाशमय स्वरूप को उस महाज्योति के रूप में जिनसे शक्तियों की अनन्त किरणे निकल रही हैं और मुझ निराकार बिंदु आत्मा पर पड़ रही है। *शक्तियों से मैं आत्मा भरपूर होती जा रही हूँ। मेरे शिव पिता परमात्मा से आ रही सतरंगी किरणे मुझ आत्मा में निहित सातों गुणों को विकसित कर रही हैं। देह अभिमान में आ कर, अपने सातो गुणों को भूल चुकी मैं आत्मा अपने एक - एक गुण को पुनः प्राप्त कर फिर से अपने सतोगुणी स्वरूप में स्थित होती जा रही हूँ*। अपने हर गुण, हर शक्ति को पुनः प्राप्त कर स्वयं को मैं  अब सर्वगुण, सर्वशक्ति सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ।

 

_ ➳  बाबा से आ रही शक्तिशाली किरणों का प्रवाह मुझे बढ़ता हुआ महसूस हो रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बाबा इन शक्तियों की अनन्त किरणों को मुझ आत्मा में प्रवाहित कर मुझे आप समान बना रहे हैं। *इन शक्तिशाली किरणों की तपिश मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की कट को जला कर भस्म कर रही है। मेरा स्वरूप बहुत ही उज्ज्वल बनता जा रहा हैं। सातों गुणों और सर्वशक्तियों से भरपूर, अपने उज्ज्वल स्वरूप के साथ अब मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया मे लौट रही हूँ*। 

 

_ ➳  साकारी दुनिया में फिर से अपने साकारी तन में भृकुटि सिहांसन पर अब मैं विराजमान हो कर सृष्टि रंगमंच पर अपना पार्ट बजा रही हूँ। सर्व सम्बन्ध बाबा के साथ जोड़ कर, हर सम्बन्ध का सुख उनसे लेते हुए, अब मैं देह और देह की दुनिया से उपराम होती जा रही हूँ। *चलते - फिरते, उठते - बैठते हर कर्म करते स्वयं को मैं बाबा की छत्रछाया के नीचे अनुभव करती हूँ। बाबा की याद का कवच सदा पहन कर रखने से अब माया का हर वार भी बेकार चला जाता है और मैं आत्मा बाबा की याद रूपी सेफ्टी के किले के अंदर बाबा के साथ अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलती रहती हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं अपने पूज्य स्वरूप की स्मृति सदा सदा रूहानी नशे में रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं जीवन मुक्तआत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं निमित्त और निर्माण आत्मा हूँ  ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

   *मैं मास्टर सर्वशक्तिवान् हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :

➳ _ ➳ मायाजीत बनने के लिए स्वमान की सीट पर रहो: सदा स्वयं को स्वमान की सीट पर बैठा हुआ अनुभव करते हो? पुण्य आत्मा हैं, ऊंचे ते ऊंची ब्राह्मण आत्मा हैं, श्रेष्ठ आत्मा हैं, महान आत्मा हैं, ऐसे अपने को श्रेष्ठ स्वमान की सीट पर अनुभव करते हो? कहाँ भी बैठना होता है तो सीट चाहिए ना! तो *संगम पर बाप ने श्रेष्ठ स्वमान की सीट दी है, उसी पर स्थित रहो। स्मृति में रहना ही सीट वा आसन है। तो सदा स्मृति रहे कि मैं हर कदम में पुण्य करने वाली पुण्य आत्मा हूँ। महान संकल्प, महान बोल, महान कर्म करने वाली महान आत्मा हूँ। कभी भी अपने को साधारण नहीं समझो। किसके बन गये और क्या बन गये? इसी स्मृति के आसन पर सदा स्थित रहो।* इस आसन पर विराजमान होंगे तो कभी भी माया नहीं आ सकती। हिम्मत नहीं रख सकती। आत्मा का आसन स्वमान का आसन है, उस पर बैठने वाले सहज ही मायाजीत हो जाते हैं।

✺ *"ड्रिल :- सदा स्वमान की सीट पर सेट रहना"*

➳ _ ➳ मै आत्मा तालाब के किनारे बैठकर तालाब के पानी को अपने हाथों से उछाल रही हूं... तभी अचानक मैं देखती हूं कि *एक मछली मेरे पास आ जाती है और मछली के मुंह से एक पानी का बुलबुला निकलता है... मैं उस बुलबुले में जाकर बैठ जाती हूं और हवा में ऊपर उड़ने लगती हूं... और उड़ते-उड़ते मैं बगीचे की घास पर जाकर बैठ जाती हूं... सूरज की किरणें मुझ पर गिर रही है और मुझसे रंग-बिरंगी किरणे निकल रही है...* तभी मुझे आभास होता है कि सूरज की किरणे जो मुझ पर गिर रही है वह मेरे बाबा की शक्तिशाली किरणे हैं... जैसे जैसे वह किरणे मुझ पर गिरती हैं वैसे-वैसे मुझे अनुभव होता है कि मेरे बाबा मुझे कुछ समझाने की कोशिश कर रहे हैं... मैं बुलबुला ऊपर उड़ रही हूं और मेरे बाबा की किरणों पर जाकर बैठ जाती हूं...

➳ _ ➳ और जब मैं बाबा की किरणों पर बैठकर झूलने लगती हूं तो मुझे आभास होता है कि बाबा मुझे अपनी बाहों में झूला रहे हैं और झुलाते झुलाते शिक्षा दे रहे हैं... मेरे बाबा मुझे कहते हैं कि *तुम्हें हमेशा अपने स्वमान की सीट पर विराजमान रहना चाहिए... जब तुम स्वमान में स्थित होकर कोई भी कार्य करोगे तो तुम हमेशा अपनी स्थिति स्थिर रख सकते हो... तुम्हारी स्थिति में कोई भी हलचल पैदा नहीं होगी...* अगर तुम्हारे मन में हलचल पैदा हुई तो तुम इधर-उधर हवा में उड़ने लगोगे और उड़ते उड़ते कई बार ऐसी जगह पर बैठ जाओगे जिसको छूते ही तुम नष्ट हो जाओगे...

➳ _ ➳ बाबा ने मुझे कहा की अगर तुम ऐसे ही खुशियों की मौज में उड़ना चाहते हो और हमेशा अपने अस्तित्व को बचाए रखना चाहते हो तो तुम्हें स्वमान में ही रहना होगा अपने आप को ऐसा स्वमान दो... जैसे, मैं मास्टर सर्वशक्तिमान हूं और उस सर्वशक्तिमान सीट पर आप विराजमान हो... *बाबा कहते हैं अपने आप को उस सीट पर हमेशा बैठा कर रखोगे तो तुम बड़ी ही सरलता से किसी भी कठिनाई को पार कर लोगे और वह कठिनाई या परिस्थिति तुम्हारी कुर्सी के नीचे से होकर गुजर जाएगी तुम्हें एहसास भी नहीं होगा कि अभी तुम्हारे सामने कितनी बड़ी परिस्थिति आई थी*... जब जब तुम इस स्वमान की कुर्सी पर विराजमान रहोगे तब तब तुम अपने आप को श्रेष्ठ और ऊंची अवस्था में अनुभव करोगे...

➳ _ ➳ बाबा की यह बातें सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगता है और मैं बाबा को कहती हूं कि... बाबा मैं इस स्वमान की सीट को कभी नहीं छोडूंगी साथ ही कहती हूं... बाबा अगर मैं कभी इस *स्वमान की सीट को छोड़कर अपनी स्थिति हलचल में लाई तो यह सांसारिक मोह-माया मुझे अपने अंदर समा लेगी...* यह मोह माया रूपी मछली मुझे अपने अंदर समा लेगी... इसलिए मैं हमेशा अपने आप को परिस्थिति के अनुसार स्वमान की सीट पर विराजमान रखूंगी... अपनी इस सीट को कभी नहीं छोडूंगी...

➳ _ ➳ बाबा से यह बातें करके मैं वापिस अपनी दुनिया में आ पहुंचती हूं... नीचे आते समय मुझे कई ऐसी चीजें छूने की कोशिश करती हैं जिससे मेरा अस्तित्व समाप्त हो सकता है... परंतु मैं अपने स्वमान की सीट पर विराजमान थी... इसलिए वह परिस्थिति रूपी वस्तुएं मुझे छू भी नहीं पाई और मेरे कुर्सी के नीचे से निकल गई... और मैं जब नीचे आकर पहुंचती हूं तो उसी मछली को देखती हूं और उससे कहती हूं.. *अब तुम मुझे कभी भी अपने अंदर नहीं समा सकती हो... क्योंकि अब मैं तुमसे कहीं शक्तिशाली स्थिति में विराजमान हूं... मछली दूर से ही मुझे निहारती है... लाख प्रयास के कारण भी वह मुझे छू नहीं पाती है... और मैं इस स्थिति का दूर बैठे ही आनंद लेती हूं...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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