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 24 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *मोह्जीत बनकर रहे ?*

 

➢➢ *गफलत में अपना टाइम वेस्ट तो नहीं किया ?*

 

➢➢ *तड़फती हुई आत्माओं को एक सेकंड में गति सदगति दी ?*

 

➢➢ *हुज़ूर को बुधी में हाज़िर रख सर्व प्राप्तियों का अनुभव किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  जैसे आजकल साइन्स के साधनों द्वारा रफ माल को भी बहुत सुन्दर रूप में बदल देते हैं। तो *आपकी श्रेष्ठ वृत्ति निगेटिव अथवा व्यर्थ को पॉजिटिव में बदल दे। आपका मन और बुद्धि ऐसा बन जाये जो निगेटिव टच नहीं करे, सेकण्ड में परिवर्तन हो जाये।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं खुशनसीब आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को खुशनसीब आत्मायें अनुभव करते हो? *जो खुशनसीब आत्मायें हैं उनके मन में सदा खुशी के गीत बजते हैं। 'वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य!'-यह गीत बजता है ना। यह खुशी का गीत गाना तो सभी को आता है ना।* चाहे बूढ़ा हो, चाहे बच्चा हो, चाहे जवान हो-सभी गाते हैं।

 

  और मन में है ही क्या जो चले। यही खुशी के गीत बजेंगे ना। और सब बातें खत्म हो गई। *बस, बाप और मैं, तीसरा न कोई। जब ऐसी स्थिति बन जाती है तब खुशी के गीत बजते हैं-'वाह बाबा वाह, वाह मेरा भाग्य वाह!' वैसे भी गाया हुआ है-'खुशी' सबसे बड़ी खुराक है, खुशी जैसी और कोई खुराक नहीं। जो खुशी की खुराक खाने वाले हैं वो सदा तन्दरुस्त रहेंगे, हेल्दी रहेंगे, कभी कमजोर नहीं होंगे।*

 

  *जो अच्छी खुराक खाते हैं वो शरीर से कमजोर नहीं होते हैं। खुशी है मन की खुराक। मन कभी कमजोर नहीं होगा, सदा शक्तिशाली। मन और बुद्धि सदा शक्तिशाली हैं तो स्थिति शक्तिशाली होगी। ऐसी शक्तिशाली स्थिति वाले सदा ही अचल-अडोल रहेंगे।* तो खुशी की खुराक खाते हो? या कभी खाते हो, कभी भूल जाते हो? ऐसे होता है ना। शरीर के लिए भी ताकत की चीजें देते हैं तो कभी खाते हैं, कभी भूल जाते हैं। यह खुराक किस समय खाते हो? कभी खाओ, कभी न खाओ-ऐसे तो नहीं है।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आवाज में आने के लिए वा आवाज को सुनने के लिए कितने साधन अपनाते हो? बापदादा को भी आवाज में आने के लिए शरीर के साधन को अपनाना पडता है। लेकिन *आवाज से परे जाने के लिए इस साधनों की दुनिया से पार जाना पडे।*

 

✧  साधन इस साकार दुनिया में है। बापदादा के सूक्ष्म वतन वा मूल वतन में कोई साधनों की आवश्यकता नहीं है। सेवा के अर्थ आवाज में आने के लिए कितने साधन अपनाते हो? लेकिन *आवाज से परे स्थिति में स्थित होने के अभ्यासी सेकण्ड में इन सब से पार हो जाते है। ऐसे अभ्यासी बने हो?*

 

✧  *अभी-अभी आवाज में आये, अभी-अभी आवाज से परे।* ऐसी कन्ट्रोलिंग पॉवर, रूलिंग पॉवर अपने में अनुभव करते हो? संकल्प शक्ति को भी, *जब चाहे तब संकल्प में आओ, विस्तार में आओ, जब चाहो तब विस्तार को फुल स्टॉप में समा दो।* स्टार्ट करने की और स्टॉप करने की - दोनों ही शक्तियाँ समान रूप में हैं?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ ऐसे फ़रिश्ते - जिसका देह और देह की दुनिया के साथ कोई रिश्ता नहीं। *शरीर में रहते ही हैं सेवा के अर्थ, न कि रिश्ते के आधार पर।* देह के रिश्ते के आधार पर नहीं रहते, सेवा के सम्बन्ध के हिसाब से रहते हो। *सम्बन्ध समझकर प्रवृत्ति में नहीं रहना है, सेवा समझकर रहना है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- ज्ञान सागर बाप से ज्ञान रत्न लेना*"

 

_ ➳  भक्ति में सदा कनरस में डूबी हुई मै आत्मा... मन्दिर में एक प्रतिमा के दर्शन में जीवन की सफलता को निहारा करती थी... तब कहीं ख्वाबो और ख्यालो में भी... ईश्वरीय मिलन की कोई और चाहना भी न थी... बून्द ही मेरे लिए सागर थी... किसी और प्यार के सागर को भला मै क्या जानु... पर भगवान को मेरे ये खोखले और क्षणिक सुख नही भाये... और वह *मुझे सच्चे सुखो की अमीरी का अहसास कराने... परमधाम छोड़, धरती पर आ गया... मेरे अथाह सुखो की चाहना में... धरा पर डेरा जमा लिया.*.. अपने प्यारे बाबा के सागर दिल को याद करते करते... और उसके असीम उपकारों को सिमरते हुए मै आत्मा... मीठे बाबा के कमरे में मिलन के लिए पहुंचती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपने खोये गुणो से भरपूर कर पुनः चमकदार बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे,... जनमो से ईश्वर के दर्शनों को तरसते थे... आज उनके सम्मुख बेठ मा नॉलेजफुल बन रहे हो... तो अब हर पल, हर साँस को ईश्वरीय यादो में ही बिताओ... *सिर्फ एक सच्चे बाप से सच्चे ज्ञान को सुनकर, गुणो की धारणा कर, स्वयं को सदा के लिए मीठा बनाओ.*.. इन अविनाशी ज्ञान रत्नों को सुनने वाली... आपकी कर्मेन्द्रियों का भी भाग्य है.. कि आत्मा को ईश्वरीय सुख दिलाने में भागीदार है..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा के अमृत वचन सुनकर स्वयं के भाग्य की सराहना करते हुए कहती हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... मुझ आत्मा ने आपके बिना अथाह दुःख पाया... सच्चे प्यार को तरसती मै आत्मा... दर दर भटकती रही... आज आप प्यार के सागर ने मुझे अपनी प्यार भरी बाँहों में लेकर... मेरे थके मन, बुद्धि को सुख से भर दिया है... *आपकी यादो में मेरा प्यारा मन और दिव्य बुद्धि मुझे असीम खुशियो से सजा रही है.*.."

 

   *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा को ईश्वरीय खजानो से सम्पन्न बनाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... महान भाग्य ने जो अविनाशी ज्ञान रत्नों को दामन में सजाया है... उनको खनक में सदा खोये रहो... *श्रीमत की धारणा से मन प्यारा और बुद्धि दिव्यता से सज कर, सदा सुखो की बहारो में ले जायेगी.*.. और ज्ञान को सुनते सुनते, स्थूल कर्मेन्द्रियाँ भी मिठास से परिपूर्ण हो जायेगी... इसलिए सदा ज्ञान रत्नों की झनकार में आनन्दित रहो और यादो में झूमते रहो...

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा की सारी दौलत को अपनी बाँहों में भरकर कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा आपके बिना कितनी सूनी थी... पराये देश में पिता बिना कितनी अकेली थी... आप आये तो जीवन में बहार आयी है... *ज्ञान और योग से जीवन रौनक से भरा, खुबसूरत हो गया है... यह जीवन सच्ची खुशियो से संवर गया है.*.. सूक्ष्म और स्थूल कर्मेन्द्रियाँ ईश्वरीय प्यार में शीतल सुखदायी हो गयी है और मुझ आत्मा को सदा का सुख दे रही है..."

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को अपनी यादो में डूबने का फरमान देते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... ईश्वर पिता को पाकर अब पुरानी दुनिया के व्यर्थ से मुक्त हो जाओ... *सिर्फ मीठे बाबा के सच्चे ज्ञान रत्नों को ही सुनो... यह अविनाशी ज्ञान रत्न ही सच्ची कमाई है... सदा इस सच्ची कमाई में ही डूबे रहो.*.. सत्य ज्ञान और सच्चे वजूद को जानकर, अब स्वयं को कहीं भी न उलझाओ... मीठे बाबा की प्यारी यादो में डूब, सदा के लिए प्यारे और न्यारे बन जाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा की मीठी मीठी यादो में गहरे डूबकर कहती हूँ :-* "प्यारे दुलारे बाबा... विकारो की कालिमा में कंगाल बन गयी... मुझ आत्मा को अपने सच्चे ज्ञान से पुनः मालामाल बना रहे हो... मै क्या बन गयी थी, और आप मुझे पुनः देवता सजा रहे हो... ऐसा मीठा खुबसूरत भाग्य पाकर, तो मै आत्मा निहाल हो गयी हूँ... *आपकी मीठी यादे और अमूल्य ज्ञान रत्न ही... मेरे जीवन का सच्चा आधार है, और इसी पर मेरे सारे सुखो का मदार है*..."मीठी बाबा को अपने दिल की बात सुनाकर मै आत्मा... साकारी लोक में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- मुख में मुहलरा डाल लेना है*

 

_ ➳  एकान्त में बैठ परमात्म चिंतन करते हुए, बाबा के महावाक्यों को स्मृति में लाकर मैं विचार कर रही हूँ कि बाबा बार - बार मुरलियों में माया से सावधान रहने का इशारा देते हैं। *क्योंकि माया इतनी जबरदस्त है जो रॉयल से रॉयल रूप धारण करके ब्राह्मण बच्चो के जीवन मे प्रवेश कर उन्हें भगवान से भी बेमुख कर देती है*। इसलिए माया के रॉयल से रॉयल रूप को भी परखने की शक्ति मुझे अपने अंदर जमा करनी है और उसके लिए बाबा ने जो अति सहज उपाय बताया है कि माया से बचने के लिए मुख में मुहलरा डाल लो अर्थात अपने शांत स्वधर्म में स्थित हो जाओ। इस अभ्यास को ही अब मुझे बढ़ाना है।

 

_ ➳  माया के हर वार से स्वयं को बचाने के लिए साइलेन्स की शक्ति स्वयं में जमा करने का संकल्प लेकर, स्वयं को मैं अशरीरी स्थिति में स्थित करती हूँ और देह से डिटैच, अपने निराकार बिंदु स्वरूप में स्थित होकर अपनें मन और बुद्धि को अपने निराकार शिव पिता की याद में स्थिर कर लेती हूँ। *सेकेण्ड में मैं अनुभव करती हूँ जैसे परमधाम से सर्वशक्तियों की तेज लाइट सीधी नीचे आ रही है और मेरे मस्तक को छू रही है। शक्तियों का एक तेज करेन्ट मेरे मस्तक से होता हुआ मेरे सारे शरीर मे दौड़ रहा है*।

एक अद्भुत शक्ति जैसे मेरे अंदर भरती जा रही है जो मेरे अंदर असीम ऊर्जा का संचार करने के साथ - साथ मुझे लाइट स्थिति में भी स्थित करती जा रही है।

 

_ ➳  ऐसा लग रहा है जैसे मैं देह के बन्धन से मुक्त होकर एक दम हल्की हो गई हूँ और अब अपने आप ही ऊपर की ओर उड़ने लगी हूँ। देह और देह की दुनिया के हर आकर्षण से मैं जैसे पूरी तरह मुक्त हो गई हूँ और बस सीधी अपनी मंजिल की ओर बढ़ती ही चली जा रही हूँ। *देह और देह की दुनिया पीछे छूटती जा रही है और मैं उस दुनिया से किनारा कर अब आकाश को पार कर, उससे भी ऊपर सूक्ष्म वतन को भी पार करके पहुँच गई हूँ अपने प्यारे पिता के पास उनके स्वीट साइलेन्स होम में*। अपने इस साइलेन्स होम में आकर गहन शान्ति की अनुभूति में जैसे मैं

स्वयं को भी भूल गई हूँ। हर संकल्प, विकल्प से मुक्त एक अति सुंदर निरसंकल्प स्थिति में स्थित होकर मैं केवल अपने प्यारे प्रभु को निहार रही हूँ।

 

_ ➳  बाबा से आ रही सर्वशक्तियों की अनन्त किरणे चारों और फैली हुई बहुत ही लुभायमान लग रही है और मन को असीम आनन्द से भरपूर कर रही हैं। *एक - एक किरण को बड़े प्यार से निहारते हुए, उन्हें छूने की मन में आश लिए मैं धीरे - धीरे बाबा के पास जाती हूँ और एक - एक किरण को बड़े प्यार से टच करती हूँ। बाबा की सर्वशक्तियों की किरणो को छूते ही मैं महसूस करती हूँ जैसे हर किरण में से शान्ति की शीतल फ़ुहारों का झरना फूट रहा है और उन शीतल फ़ुहारों से निकलने वाले शान्ति के शक्तिशाली वायब्रेशन्स मेरे रोम - रोम को शांति की शक्ति से भर रहें हैं*। साइलेन्स की शक्ति का बल स्वयं में भरकर, इस बल से माया को हराने के  लिए अब मैं वापिस अपने कर्मक्षेत्र पर लौट आती हूँ।

 

_ ➳  अपने ब्राह्मण स्वरूप में स्थित होकर, मुख में मुहलरा डालने की अपने सर्वशक्तिवान पिता द्वारा बताई युक्ति द्वारा अब मैं माया के वार से स्वयं को बचाने में सहज ही सफलता प्राप्त कर रही हूँ। माया अनेक प्रकार के रॉयल रूप धारण करके मेरे पास आती है किंतु मुझे मेरे शांत स्वधर्म में स्थित देख, मेरे साइलेन्स के बल को देख वापिस लौट जाती है। *अपने शांत स्वधर्म में सदा स्थित रहकर, शांति के सागर अपने प्यारे पिता के साथ सदा स्वयं को कम्बाइंड रखने से माया का कोई भी वार अब मेरे ऊपर अपना कोई भी प्रभाव नही डालता। मेरे सर्वशक्तिवान शिव पिता की सर्वशक्तियों का बल मुझे हर समय सर्व शक्तियों से भरपूर शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करवाकर, मेरे चारों और हर समय एक शक्तिशाली सेफ्टी का किला बना कर मुझे माया से पूरी तरह सेफ रखता है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं तड़फती हुई आत्माओं को एक सेकण्ड में गति - सदगति देने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं मास्टर दाता आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा हजूर को बुद्धि में सदा हाज़िर रखती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व प्राप्तियों से जी हज़ूर कराती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व प्राप्ति संपन्न हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  अच्छा - बाकी एक बारी मिलने का रहा हुआ है। वैसे तो साकार द्वारा मिलन मेले काइस रूपरेखा से मिलने का आज अन्तिम समय है। प्रोग्राम प्रमाण तो आज साकार मेले का समाप्ति समारोह है फिर तो आगे की बात आगे देखेंगे। एकस्ट्रा एक बाप का चुगा भी मिल जायेगा। लेकिन इस सारे मिलन मेले का स्व प्रति सार क्या लियासिर्फ सुना वा समाकर स्वरूप में लायाइस मिलन मेले की सीजन विशेष किस सीजन को लायेगी? इस सीजन का फल क्या निकलेगा? *सीजन के फल का महत्व होता है ना! तो इस सीजन का फल क्या निकला! बापदादा मिला यह तो हुआ लेकिन मिलना अर्थात् समान बनना।* तो सदा बाप समान बनने के दृढ़ संकल्प का फल बापदादा को दिखायेंगे ना! ऐसा फल तैयार किया है? अपने को तैयार किया हैवा अभी सिर्फ सुना हैबाकी तैयार होना हैसिर्फ मिलन मनाना है वा बनना है

 

 _ ➳  जैसे मिलन मनाने के लिए बहुत उमंग-उत्साह से भाग-भाग कर पहुँचते हो वैसे बनने के लिए भी उड़ान उड़ रहे होआने जाने के साधनों में तकलीफ भी लेते हो। लेकिन उड़ती कला में जाने के लिए कोई मेहनत नहीं है। *जो हद की डालियाँ बनाकर डालियों को पकड़ बैठ गये होअभी हे उड़ते पंछीडालियों को छोड़ो। सोने की डाली को भी छोड़ो। सीता को सोने के हिरण ने शोक वाटिका में भेजा। यह मेरा मेरा हैमेरा नाममेरा मान, मेरा शानमेरा सेन्टर यह सब - सोने की डालियाँ हैं।* बेहद का अधिकार छोड़हद के अधिकार लेने में आ जाते हो। मेरा अधिकार यह हैयह मेरा काम है - इस सबसे उड़ते पंछी बनो। इन हद के आधारों को छोड़ो। तोते तो नहीं हो ना जो चिल्लाते रहो कि छुड़ाओ। छोड़ते खुद नहीं और चिल्लाते हैं कि छुड़ाओ। तो ऐसे तोते नहीं बनना। छोड़ो और उड़ो। छोड़ेंगे तो छूटेगें ना! बापदादा ने पंख दे दिये हैं - पंखो का काम है उड़ना वा बैठनातो उड़ते पंछी बनो अर्थात् उड़ती कला में सदा उड़ते रहो। समझा - इसको कहा जाता है सीजन का फल देना।

 

✺   *"ड्रिल :- सोने की डालियों को छोड़ उड़ता पंछी स्थिति का अनुभव करना।*

 

 _ ➳  सफेद चमकीली ड्रेस पहने हुए मैं आत्मा अपने आप को देख रही हूं... और *बाबा से पवित्रता की किरणें लेकर अपनी ड्रेस को और भी चमकीली अनुभव कर रही हूं... जैसे जैसे मैं अपनी सफेद चमकीली पोशाक को और भी चमकीला अनुभव करती हूं... वैसे वैसे मैं देखती हूं कि बाबा ने मुझे तो उड़ने के लिए पंख भी लगा दिए हैं... जो मुझे इस दुनिया से ऊपर की और उड़ा कर ले जाएंगे... और मैं अपने आपको इस हलचल भरी संकल्पों की इस दुनिया से दूर परमधाम में अनुभव करती हूँ...* जैसे ही मैं वह पंख धारण करती हूं... मैं आकाश में उड़ने लगती हूं... और उड़ते-उड़ते अपने आपको बहुत ही हल्के पक्षी के पंख के रूप में अनुभव करती हूं...

 

 _ ➳  और  इस हल्केपन की स्थिति को फील करते हुए... मैं अपने आप को एक मायावी पेड़ की शाखा पर अनुभव करती हूँ... तभी मैं सोचती हूं कि यह मायावी पेड़ जो मुझे आकर्षित कर रहा है... यह मुझे उड़ने से रोक रहा है... परंतु मैं इस पेड़ की शाखा में अपने आप को नहीं फंसने दूंगी... और अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उड़ने का प्रयास करुंगी... इतना संकल्प कर मैं फरिश्ते समान चमकीली ड्रेस पहनकर फिर से खुले वातावरण में और खुले आसमान में उड़ने लगती हूं... और *उड़ते-उड़ते सफेद पोशाक में मैं मधुबन बाबा मिलन में आकर बैठ जाती हूं... और अपने आप को बापदादा के सामने अनुभव करती हूँ... बापदादा मुझे अपनी दृष्टि से निहाल कर रहे हैं... और मैं बापदादा द्वारा दी हुई दृष्टि को अपने अंदर समाती जा रही हूं...*

 

 _ ➳  और उस दौरान मुझे यह आभास होता है कि... मानो बाबा मुझे कह रहे हो कि... आज तुम यहां से अपने आप को पके हुए फल की भांति समझकर जाओ... क्योंकि सभी पके हुए फल ही पसंद करते हैं... अर्थात यहां से सभी शक्तियों से परिपूर्ण होकर जाओ... ताकि तुम अपनी शक्तियों से सभी आत्माओं को तृप्त कर सको... और इस रूहानी मिलन का असल फल प्राप्त कर सको... मेरे मन में जैसे ही यह संकल्प उत्पन्न होता है... मेरा मन अपने आपको बहुत ही सौभाग्यशाली समझता है... और *मैं अपने आपको शक्तियों से भरे हुए फल के समान अनुभव करती हूं... जो सभी शक्तियों रुपी मिठास प्राप्त किए हुए हैं... और अपने मन में यह भाव लेकर अपने अगले संकल्प की ओर प्रस्थान करती हूं... और अगला भाव जो मेरी मन बुद्धि में आता है... कि मेरेपन की भावना को समाप्त करते हुए मुझे निमित्त भाव से हर कर्म करना है...*

 

 _ ➳  अब मैं अपने आपको इन रुहानी संकल्पों से परिपूर्ण करके फिर से उड़ जाती हूं... नीले आसमान में... और स्वतंत्र अवस्था में मैं अपने इन शुद्ध संकल्पों का इस सृष्टि पर रहने वाली आत्माओं पर उपयोग कर रही हूं... मैं उन्हें इन पवित्र संकल्पों के द्वारा उनके पुराने आसुरी संस्कारों को समाप्त करने का प्रयास कर रही हूं... और उन सभी आत्माओं को हंसते खिलखिलाते हुए देख रही हूं... जो पहले मेरेपन की बीमारी से पीड़ित थे... वह अब निमित्त भाव में रहकर खुशनुमा जीवन जी रहे हैं... अब मैं एक सफेद रंग की इस ड्रेस को गहराई से फील करते हुए... और इस हल्केपन की स्थिति को अनुभव करते हुए... धीरे-धीरे इस धरा पर आने का प्रयत्न करती हूं... और *मेरे रास्ते में आती हुई हर छोटी बड़ी चीज को शांति की वाइब्रेशन देती जा रही हूं... हर चीज पवित्र होती जा रही है... और मेरी मन बुद्धि भी एकदम शांत अवस्था में इस भाव को अनुभव कर रहे हैं...*

 

 _ ➳  और अब मैं जैसे-जैसे नीचे आती हूं... मुझे वह सभी पेड़ पौधे और शाखाएं दिखाई देती है... परंतु अब वह मुझे सोने के पिंजरे रूपी बेड़ियां दिखाई देती है... मैं उनकी सुंदरता को बस दूर से निहार कर आगे बढ़ जाती हूं... और प्रकृति को पवित्र वाइब्रेशन देती हुई नीचे की तरफ आती जा रही हूं... अपने आप को इस अवस्था में पाकर, मैं आत्मिक स्थिति से अपने आप को बहुत ही गहराई से अनुभव करती हूँ... इस स्थिति को पूर्ण रूप से समझ कर अब *जब भी आसमान में उड़ता परिंदा देखती हूं... तो अपने आप को इसी अवस्था में फील करती हूं... और परमात्मा का बार-बार इस स्थिति के लिए धन्यवाद करती हूं... और फिर से अपने आपको स्वतन्त्र परिंदे रूपी फरिश्ते समान स्थिति में अनुभव करती हूं... और उड़ जाती हूँ प्रभु मिलन की चाह में...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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