━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 25 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *एक बाप की सुमत पर चले ?*

 

➢➢ *सत्य बाप से सत्य नारायण की सच्ची सच्ची कथा सुनी ?*

 

➢➢ *फ़रिश्तेपन की स्थिति द्वारा बाप के स्नेह का रीटर्न दिया ?*

 

➢➢ *व्यर्थ से बेपरवाह बनकर रहे ?*

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  *ज्ञान मनन के साथ शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्प, सकाश देने का अभ्यास, यह मन के मौन का, ट्रैफिक कण्ट्रोल का टाइम मुकरर करो। विशेष एकान्तवासी और खजानों के एकानामी का प्रोग्राम बनाओ।* एकनामी और एकानामी वाले बनो।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

   *"मैं विघ्न-विनाशक आत्मा हूँ"*

 

  अपने को सदा विघ्न-विनाशक आत्मा अनुभव करते हो? या विघ्न आये तो घबराने वाले हो? विघ्न-विनाशक आत्मा सदा ही सर्व शक्तियों से सम्पन्न होती है। विघ्नों के वश होने वाले नहीं, विघ्न-विनाशक। कभी विघ्नों का थोड़ा प्रभाव पड़ता है? *कभी भी किसी भी प्रकार का विघ्न आता है तो स्मृति रखो कि-विघ्न का काम है आना और हमारा काम है विघ्नविनाशक बनना। जब नाम है विघ्न-विनाशक, तो जब विघ्न आयेगा तब तो विनाश करेंगे ना।* तो ऐसे कभी नहीं सोचना कि हमारे पास यह विघ्न क्यों आता है?

 

  विघ्न आना ही है और हमें विजयी बनना है। तो विघ्न-विनाशक आत्मा कभी विघ्न से न घबराती है, न हार खाती है। ऐसी हिम्मत है? क्योंकि जितनी हिम्मत रखते हैं, एक गुणा बच्चों की हिम्मत और हजार गुणा बाप की मदद। तो जब इतनी बाप की मदद है तो विघ्न क्या मुश्किल होगा? *इसलिए कितना भी बड़ा विघ्न हो लेकिन अनुभव क्या होता है? विघ्न नहीं है लेकिन खेल है। तो खेल में कभी घबराया जाता है क्या? खेल करने में खुशी होती है ना! ऐसे खेल समझने से घबरायेंगे नहीं लेकिन खुशी-खुशी से विजयी बनेंगे।*

 

  सदा ड्रामा के ज्ञान की स्मृति से हर विघ्न को 'नथिंग न्यु' समझेगा। नई बात नहीं, बहुत पुरानी है। कितने बार विजयी बने हो? (अनेक बार) याद है या ऐसे ही कहते हो? सुना है कि ड्रामा रिपीट होता है, इसीलिए कहते हो या समझते हो अनेक बार किया है? *अगर ड्रामा की पॉइंट बुद्धि में क्लीयर है कि हू-ब-हू रिपीट होता है, तो उस निश्चय के प्रमाण हू-ब-हू जब रिपीट होता है, तो अनेक बार रिपीट हुआ है और अब रिपीट कर रहे हैं। लेकिन निश्चय की बात है।* अगले कल्प में और कोई विजयी बने और इस कल्प में आप विजयी बनो-यह हो नहीं सकता। क्योंकि जब बना-बनाया ड्रामा कहते हैं, तो बना हुआ है और बना रहे हैं अर्थात् रिपीट कर रहे हैं। ऐसा निश्चयबुद्धि अचल-अडोल रहता है।

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

✧  सभी ब्रह्माकुमार और कुमारियों का विशेष कर्तव्य क्या है? ब्रह्मा बाप का विशेष कर्तव्य क्या है? *ब्रह्मा का कर्तव्य ही है - नई दुनिया की स्थापना।* तो *ब्रह्माकुमार और कुमारियों का विशेष कर्तव्य क्या हुआ?*

 

✧  *स्थापना के कार्य में सहयोगी।* तो जैसे अमेरिका में विनाशकारियों के विनाश की स्पीड बढ़ती जा रही है। ऐसे स्थापना के निमित बच्चों की स्पीड भी तीव्र है? वे तो बहुत फास्ट गति से विनाश के लिए तैयार है।

 

✧  ऐसे आप सभी भी स्थापना के कार्य में इतने एवररेडी तीव्र गति से जा रहे हो? उन्हों की स्पीड तेज है या आपकी तेज है? *वो 15 सेकण्ड में विनाश के लिए तैयार है और आप - एक सेकण्ड में?*  क्या गति है?

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

〰✧ *आप प्रभु प्रेमी बच्चों ने त्याग किया वा भाग्य लिया? क्या त्याग किया? अनेक चतिया लगा हुआ वस्त्र,* जड़जड़ीभूत पुरानी अन्तिम जन्म की देह का त्याग, यह त्याग है? *जिसे स्वयं भी चलाने में मजबूर हो, उसके बदले फ़रिश्ता स्वरूप लाइट का आकार जिसमें कोई व्याधि नहीं, कोई पुराने संस्कार स्वभाव का अंश नहीं, कोई देह का रिश्ता नहीं, कोई मन की चंचलता नहीं, कोई बुद्धि के भटकने की आदत नहीं - ऐसा फ़रिश्ता स्वरूप, प्रकाशमय काया प्राप्त होने के बाद पुराना छोड़ना, यह छोड़ना हुआ? लिया क्या और दिया क्या?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

 

∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚✰✧゚゚

────────────────────────

 

∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- देही-अभिमानी बनना"*

 

_ ➳  *मैं आत्मा मन-बुद्धि से सूक्ष्म वतन में बाबा के सम्मुख बैठ, बाबा को प्यार से निहार रही हूँ... मीठे बाबा अपनी पावन दृष्टि से मुझ आत्मा को निहाल कर रहे हैं... मैं आत्मा इस देह से डिटैच होकर सुन्दर प्रकाशमय काया को धारण करती हूँ...* बाबा अपने पवित्र किरणों को मुझ आत्मा पर बरसाकर मेरी काया को और चमका रहे हैं... मैं आत्मा चमकीला फ़रिश्ता स्वरुप धारण कर मीठे बाबा की मीठी शिक्षाओं को धारण करती हूँ...

 

  *विकारों से मुक्त होकर देही अभिमानी बनने की शिक्षा देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... देह और देहाभिमान ने जीवन दुखो का दलदल बना दिया है... अब अपने सच्चे वजूद के नशे में खो जाओ... *कितनी खुबसूरत असीम शक्तियो से लबालब जादूगर आत्मा हो इस भान में गहरे डूब जाओ... और माँ पिता का नाम रोशन करने वाले सपूत बन जाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा रूहानी नूर बन खुशियों के आसमान में चमकते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा ईश्वर पिता की मीठी सुखदायी छाँव में विकारो के कांटे से खुशनुमा फूल हो गई हूँ*... मेरा खोया खुबसूरत वजूद पाकर मीठे बाबा पर फ़िदा हो गयी हूँ... माँ पिता के आदर्शो पर चलकर नूरानी सी चहक रही हूँ...

 

  *मुझ आत्मा को सर्व वरदानों और खजानों से मालामाल करते हुए मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता जो अथाह खजाने हथेली पर सजाकर बच्चों के लिए लाये है उन खजानो से मालामाल हो जाओ... *विकारो की कालिमा से दूर होकर ईश्वरीय यादो में प्रकाश पुंज बन सबके दिलो को रोशन करो... माँ पिता के नक्शे कदम पर कदम रखते जाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा विषय सागर से निकल ज्ञानसागर में लहराकर मोतियों को बटोरते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा दुखो में लहुलुहान करने वाले विकारी काँटों से निकल कर ईश्वर पिता की गोद में फूल बन मुस्करा रही हूँ...* मीठे बाबा की सारी दौलत अपने दामन में सजा रही हूँ... और अमीरी से भरपूर हो गई हूँ... वफादारी की खशबू से मीठे बाबा को रिझा रही हूँ...

 

  *अपने स्नेह के आँचल में मुझे समेटते हुए मेरे प्यारे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... *देह के पराये से गुणो का त्यागकर ईश्वरीय गुणो से महक जाओ... अथाह सुखो से सजे मीठे से स्वर्ग के मालिक होकर सच्ची मुस्कराहटों के फूल जीवन की बगिया में खिलाओ...* अपनी सच्ची स्मृतियों में डूब जाओ और माता पिता को गौरवान्वित कराओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा देही-अभिमानी बन परमात्म प्यार की अधिकारी बनते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... *मै आत्मा कितनी भाग्यशाली हूँ... ईश्वर पिता को विकारो का दान कर सारे ईश्वरीय खजाने की सहज ही अधिकारी हो गई हूँ...* धरती आसमाँ को बाँहों में भरकर मुस्कराने वाली मै आत्मा ईश्वर पिता की रोम रोम से ऋणी हूँ..."

 

────────────────────────

 

∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- एक बाप की सुमत पर चलकर मनुष्य से देवता बनना है*"

 

_ ➳  मनुष्य से देवता बनाने वाले अपने परम प्रिय परम पिता परमात्मा शिव बाबा को याद करते करते मैं एक रास्ते से गुजरती हूं और उस रास्ते पर चलते चलते एक मंदिर के पास भक्तों की बहुत भारी भीड़ देख कर रुक जाती हूँ। *भक्तों की इतनी भीड़ देख कर मेरे कदम स्वत:ही मंदिर की ओर चल पड़ते हैं* और मैं पहुंच जाती हूँ मन्दिर के अंदर जहां देवी देवताओं की बहुत सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की हुई है, जिनके आगे भक्त हाथ जोड़ कर खड़े हैं।

 

_ ➳  देवी देवताओं की सुंदर-सुंदर प्रतिमाओं को देख कर मैं विचार करती हूं कि चित्रकारों द्वारा बनाए हुए इन जड़ चित्रों में भी जब इतनी आकर्षणता है। *इन जड़ चित्रों में भी देवी देवताओं के चेहरे से जब इतनी दिव्यता और पवित्रता की झलक दिखाई दे रही है तो चैतन्य में तो इन देवी देवताओं के चेहरों की दिव्यता और पवित्रता अवर्णनीय होगी*।

 

_ ➳  अपने ही जड़ चित्रों की सुंदरता को देखते देखते मैं मन बुद्धि से पहुंच जाती हूँ सृष्टि के आदि अर्थात देव लोक में। अब मैं देख रही हूं स्वयं को अपने सम्पूर्ण सतोप्रधान देवताई स्वरूप में देवभूमि पर, जहां चारों ओर प्रकृति का अद्भुत सौंदर्य है। *हरे भरे पेड़ पौधे, टालियों पर चहचहाते रंग-बिरंगे खूबसूरत पक्षी, वातावरण में गूंजती कोयल की मधुर आवाज, फूलों पर इठलाती रंग बिरंगी तितलियां, बागों में नाचते सुंदर मोर, कल-कल करते सुगंधित मीठे जल के झरने, रस भरे फलों से लदे वृक्ष, सतरंगी छटा बिखेरती सूर्य की किरणें*। ऐसा प्रकृति का सौंदर्य मैं अपनी आंखो से देख रही हूं।

 

_ ➳  स्वर्ण धागों से बनी हीरे जड़ित अति शोभनीय ड्रेस पहने नन्हे नन्हे राजकुमार राजकुमारियां खेल रहे हैं। सोलह कलाओं से युक्त, मर्यादा पुरुषोत्तम देवी-देवता इस स्वर्ग लोक में विचरण कर रहे हैं, अपने पुष्पक विमानों में विहार कर रहे हैं। *लक्ष्मी नारायण की इस पुरी में राजा हो या प्रजा सभी असीम सुख, शान्ति और सम्पन्नता से भरपूर हैं*। चारों ओर ख़ुशी की शहनाइयाँ बज रही हैं। रमणीकता से भरपूर देवलोक के इन नजारों को देख मैं मंत्रमुग्घ हो रही हूँ। 16 कला सम्पूर्ण, डबल सिरताज, पालनहार विष्णु के रूप में मैं स्वयं को स्पष्ट देख रही हूँ।

 

_ ➳  अपने देवताई स्वरूप का भरपूर आनन्द ले कर मैं फिर से अपने ब्राह्मण स्वरूप में उसी मन्दिर में लौट आती हूँ और स्वयं को अपने पूज्य स्वरूप में स्थित करती हूं। अब मैं आत्मा कमल आसन पर विराजमान, शक्तियों से संपन्न स्वयं को अष्ट भुजा धारी दुर्गा के रूप में देख रही हूं । असंख्य भक्त मेरे सामने भक्ति कर रहे हैं, मेरा गुणगान कर रहे हैं, तपस्या कर रहे हैं, मुझे पुकार रहे हैं, मेरा आवाहन कर रहे हैं। मैं उनकी सभी शुद्ध मनोकामनाएं पूर्ण कर रही हूं। *मेरे भक्तगण और मंदिर में विद्यमान समस्त आत्मायें सर्वशास्त्रों से श्रृंगारी हुई मां दुर्गा के रूप में मेरे दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार कर रहे हैं*। मेरा अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित स्वरूप संपूर्ण मानवता को आत्म विभोर कर रहा है।

 

_ ➳  अपने इष्ट देवी स्वरूप में भक्तों को अपना साक्षात्कार करवा कर फिर से *अपने ब्राह्मण स्वरुप में स्थित हो कर मैं मन्दिर से बाहर आ जाती हूँ* और मन ही मन स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूं कि अब मुझे अपने इस ब्राह्मण जीवन में ही देवताई संस्कार धारण करने का पुरुषार्थ अवश्य करना है।

 

────────────────────────

 

∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं फ़रिश्तेपन की स्थिति द्वारा बाप के स्नेह का रिटर्न देने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं समाधान स्वरूप आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा व्यर्थ से सदा बेपरवाह हूँ  ।*

   *मैं आत्मा मर्यादाओं का सदा पालन करती हूँ  ।*

   *मैं सदा समर्थ आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

────────────────────────

 

∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  मास्टर सर्वशक्तिवान की स्थिति से व्यर्थ के किचड़े को समाप्त करो:- सदा अपने को मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा समझते हो?  *सर्वशक्तिवान अर्थात् समर्थ। जो समर्थ होगा वह व्यर्थ के किचड़े को समाप्त कर देगा*। मास्टर सर्वशक्तिवान अर्थात् व्यर्थ का नाम निशान नहीं। *सदा यह लक्ष्य रखो कि - मैं व्यर्थ को समाप्त करने वाला समर्थ हूँ*'। जैसे सूर्य का काम है किचड़े को भस्म करना। अंधकार को मिटानारोशनी देना। तो इसी रीति मास्टर ज्ञान सूर्य अर्थात् - व्यर्थ किचड़े को समाप्त करने वाले अर्थात् अंधकार को मिटाने वाले।

 

 _ ➳  *मास्टर सर्वशक्तिवान व्यर्थ के प्रभाव में कभी नहीं आयेगा*। अगर प्रभाव में आ जाते तो कमजोर हुए। बाप सर्वशक्तिवान और बच्चे कमजोर! यह सुनना भी अच्छा नहीं लगता। कुछ भी हो - लेकिन सदा स्मृति रहे -मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ''। ऐसा नहीं समझो कि मैं अकेला क्या कर सकता हूँ.. एक भी अनेकों को बदल सकता है। तो स्वयं भी शक्तिशाली बनो और औरों को भी बनाओ। जब एक *छोटा-सा दीपक अंधकार को मिटा सकता है तो आप क्या नहीं कर सकते*! तो सदा वातावरण को बदलने का लक्ष्य रखो। विश्व परिवर्तक बनने के पहले सेवाकेन्द्र के वातावरण को परिवर्तन कर पावरफुल वायुमण्डल बनाओ।

 

✺   *"ड्रिल :- व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तित करना।"*

 

 _ ➳  अष्ट शक्तियों के घेरे में सुरक्षित मैं आत्मा हीरा, देह सहित बैठ गयी हूँ, बाप दादा के चित्र के सामने... बापदादा की आँखों से बहती स्नेह की अविरल धारा प्रकाश की असंख्य धाराओं के रूप में मुझ तक आ रही है... आकाश में बादलों के पीछे से झाँकता सूरज जैसे बादलों को अपने सुनहरे रंग में रंग देता है उसी प्रकार रूहानी रंग से रंगी मेरी ये देह भी अपनी स्थूलता भूल चुकी है... *बस रूह ही बाकी है यहाँ और रूहानियत के पैमाने है... उतर रहा नूर परमधाम से उसका, निर्बाध से ये मयखाने है...* मैं आत्मा हीरा अपने कवच में सुरक्षित तेज गति से उडती हुई पहुँच गयी हूँ परम धाम... गुणों, शक्तियों का शान्त-सा सागर, शिव बिन्दु अनगिनत आत्मा मणियों का गुलदस्ता सजाये, किरणों रूपी लहरों से मानों मेरा आह्वान कर रहा है... मैं आत्मा मणि समाँ जाती हूँ उन किरणों के आगोश में, और आहिस्ता आहिस्ता एकरूप होती जा रही हूँ उन लहरों के साथ...

 

 _ ➳  मैं आत्मा फरिश्ता रूप में, बादलों के विमान पर सवार होकर बापदादा के साथ विश्व सेवा पर... आहिस्ता आहिस्ता ये विमान उतर गया है सुन्दर शान्त झील के किनारे... झील में मोती चुगते हंसों की पंक्ति... *विवेक बुद्धि से व्यर्थ रूपी कंकड़ अलग कर केवल मोती चुग रहें है...* देखते ही देखते मैं आत्मा हंस रूप धारण कर हंसों की पंक्ति का हिस्सा बन गयी हूँ... बापदादा मुझे देखकर मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैं... और धीरे से मेरे पास आकर मुझे सर्वशक्तिमान की स्मृति दिला रहे है... मैं फरिश्ता उडकर पहुँच गया हूँ आकाश में और एक ही प्रयास में हाथ बढाकर सूर्य का गोला किसी बाॅल की तरह उछालता हुआ बापदादा  के सम्मुख उपस्थित हो गया हूँ... कानों में गूँज रहे है बापदादा के वही महावाक्य *एक छोटा सा दीपक अंधकार को मिटा सकता है तो आप क्या नही कर सकते...*

 

 _ ➳  *और मैं अकेला ही निकल गया हूँ संसार के किचडे को भस्म करने, व्यर्थ को समर्थ में बदलने...* झील के उस तरफ देख रहा हूँ... सूखे झाड झाडियाँ, व्यर्थ के कँटीले घास फूस और अज्ञानता की गहन गुफाएँ... बापदादा का इशारा पाते ही सूर्य रूपी गेंद मैंने उछाल दी है उस तरफ... *एक तेज विस्फोट और तेज ज्वाला के साथ भस्म होता वो सूखा किचडा, प्रकाश में नहा उठी है वो गुफाएँ... वो हृदय रूपी गुफाएँ...* और मैं बापदादा के कन्धे पर बैठकर खुशी से झूमता हुआ... स्वयं की समर्थता का भी जश्न मनाता हुआ, वापस लौट आया हूँ उसी अष्ट शक्तियों के घेरे में सर्वशक्तिमान की गहरी स्मृति के साथ... अष्ट शक्तियों रूपी सेविकाएँ पग-पग पर मेरे इशारों पर मौन नर्तन करती हुई... *हर व्यर्थ को समर्थ करने के पुरूषार्थ में पहले से ज्यादा तल्लीनता के साथ जुटी हुई है...*

 

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

 

_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━