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 26 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *प्रभु प्रीत बुधी विजयंती बनकर रहे ?*

 

➢➢ *त्रिकालदर्शी, निश्चयबुधी, ज्ञानी तू योगी तू आत्मा बनकर रहे ?*

 

➢➢ *स्वयं को मधुबन निवासी समझकर रहे ?*

 

➢➢ *एवर रेडी बनकर रहे ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *यदि कोई संस्कार स्वभाव वाली आत्मा आपके पुरुषार्थ में परीक्षा के निमित्त बनी हुई हो तो उस आत्मा के प्रति भी सदा कल्याण का संकल्प वा भावना बनी रहे,* आपके मस्तक अर्थात् बुद्धि की स्मृति वा दृष्टि से सिवाए आत्मिक स्वरूप के और कुछ भी दिखाई न दे, तब श्रेष्ठ शुभ वृत्तियों द्वारा मन्सा सेवा कर सकेंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं हर कदम में पद्मों की कमाई जमा करने वाली आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को हर कदम में पद्मों की कमाई जमा करने वाले समझते हो? कितना जमा किया है? अरब, खरब कितना जमा किया है? हिसाब कर सकते हो? आजकल का कम्यूटर हिसाब कर सकता है? *तो सारे कल्प में और सारे वर्ल्ड में ऐसा साहूकार कोई होगा? आप सभी हो? या कोई कम हो, कोई ज्यादा हो? सभी भरपूर हो? सदैव ये नशा रहे कि हर कदम में पद्मों की कमाई करने वाली आत्मा हूँ।* लौकिक दुनिया में कहते हैं कि इतना कमा कर इकठ्ठा करें जो वंश के वंश खाते रहें। तो आपकी कितनी जनरेशन (पीढ़िया) खाती रहेंगी? एक जन्म में अनेक जन्मों की कमाई जमा कर ली है और अनेक जन्म आराम से खाते रहेंगे।

 

  *सतयुग में अमृतवेले उठकर योग लगायेंगे? योग की सिध्धि प्राप्त करेंगे। जैसे-पढ़ाई तब तक पढ़ी जाती है जब तक पास नहीं हो जाते। तो अनेक जन्मों जितना जमा किया है? कभी भी विनाश हो जाये तो आपका जमा रहेगा ना।* या कहेंगे थोड़ा समय मिले तो और कर लें? अभी और टाइम चाहिए? एवररेडी हो? आप यहाँ आये हो और यहीं विनाश शुरू हो जाए तो सेन्टर या सेन्टर का सामान याद आयेगा? कुछ याद नहीं आयेगा। इतने बेफिक्र बादशाह बने हो ना!

 

  *जब देह भी अपनी नहीं तो और क्या अपना है! तन, मन, धन-सब दे दिया ना! जब संकल्प किया कि सब-कुछ तेरा, तो एवररेडी हो गये ना। सभी ने दृढ़ संकल्प कर लिया है कि मैं बाप की और बाप मेरा। संकल्प किया या दृढ़ संकल्प किया? कोई फिक्र नहीं है।* कोई ऐसी खबर आ जाये तो फिक्र होगा? पलैट याद नहीं आयेगा? अच्छा है, पक्के हैं। जब ब्रह्मण बनना ही है तो पक्का बनना है, कच्चा बनने से क्या फायदा! जीते-जी मर गये कि थोड़ा-थोड़ा श्वांस चलता है? कहाँ श्वांस छिप तो नहीं गया है?

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *सेकण्ड में स्थापना का कार्य अर्थात सेकण्ड में दृष्टि दी और सृष्टि बन गई* - ऐसी स्पीड है? तो सदा स्थापना के निमित आत्माओं को यह स्मृति रखनी चाहिए कि *हमारी गति विनाशकारियों से तेज हो* क्योंकि पुरानी दुनिया के विनाश का कनेक्शन नई दुनिया की स्थापना के साथ-साथ है। 

 

✧  पहले स्थापना होनी है या विनाश? *स्थापना की गति पहले तेज होनी चाहिए ना!*

 

✧  स्थापना की गति तेज करने का विशेष आधार है - सदा अपने को पॉवरफुल स्टेज पर रखो। *नॉलेजफुल के साथ-साथ पॉवरफुल दोनों कम्बा हो। तब स्थापना का कार्य तीव्र गति से होगा।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ यह देह अब आपकी देह नहीं रही। देह भी बाप को दे दी। सब तेरा कहा अर्थात् मेरा कुछ नहीं। *इस देह को सेवा के अर्थ बाप ने लोन में दी है। लोन में मिली हुई वस्तु पर मेरे-पन का अधिकार हो नहीं सकता। जब मेरी देह नहीं तो देह का भान कैसे आ सकता!* आत्मा भी बाप की बन गई। देह भी बाप की हो गई तो मैं और मेरा अल्प का कहाँ से आया! *मैं-पन सिर्फ एक बेहद का रहा। मैं बाप का हूँ। जैसा बाप वैसा मैं मास्टर हूँ। तो यह बेहद का मैं-पन रहा। हद का मैं-पन विघ्नों में लाता है। बेहद का मैं-पन निर्विघ्न, विघ्न विनाशक बनाता है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  रूहानी सेना बन विजय के नशे में रहना"*

 

_ ➳  मीठे मधुबन के शांति स्तम्भ की शांत तरंगो में एकांत में बेठ... मीठे बाबा के प्यार में मगन, मै आत्मा अपने ज्ञान धन को निहार रही हूँ, और सोच रही हूँ... कितने अथाह खजानो से मीठे बाबा ने मुझे भर कर धनवान् बना दया है... *इतनी अमीरी से सजाकर भगवान ने जनमो की तपस्या का फल दे दिया है.*. और सामने बाबा कब से खड़े मेरे मन भावो को पढ़ते पढ़ते मुस्कराते जा रहे है...

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा में महान भाग्य की अनुभूतियों को जगाते हुए बोले :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वर पिता द्वारा पसन्द किये गए, भाग्यवान फूल हो... और रूहानी सेना बनकर मुस्करा रहे हो... *ईश्वरीय याद द्वारा असीम शक्तियो स्वयं में भरकर विश्व रक्षक हो गए हो.*.. सर्व आत्माओ को आप समान सुखी बना रहे हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा प्यारे बाबा के ज्ञान रत्नों को पाकर ख़ुशी से झूम रही हूँ और कह रही हूँ :-* "मीठे प्यारे बाबा... *आपसे पायी जिन खुशियो में मै आत्मा मुस्करा रही हूँ..*. उन्ही खुशियो को हर दिल पर दिल खोल कर लुटा रही हूँ... सबके जीवन को विकारो से मुक्त कराकर... सच्चे सुख शांति को आपसे दिलवा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा अपने सारे खजाने मुझ पर लुटाते हुए बोले :-* "मीठे लाडले बच्चे... ईश्वरीय बाँहों में रूहानी सेना बनकर पूरे विश्व का कल्याण करने वाले हो... *अपने इस भाग्य को बार बार स्म्रति में रखकर शुद्ध नशे से भर जाओ..*. श्रीमत पर चलकर रावण राज्य का सफाया कर... सुखो भरा रामराज्य लाने वाले महान भाग्यवान हो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने प्यारे बाबा और अपने महान भाग्य की स्म्रति में खोयी हुई कह रही हूँ :-* "प्राणप्रिय बाबा मेरे... देह समझ कर सदा असुरक्षित थी.. और *आत्मिक स्वरूप में कितनी निश्चिन्त और निर्भय बन गयी हूँ..*. माया के हर वार से सावधान होकर... सबकी रक्षा करने वाली रूहानी सेना बन मुस्करा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को रूहानी नशे से भरते हुए ज्ञान वर्षा में भिगो रहे है और कह रहे है :-* "प्यारे सिकीलधे बच्चे मेरे... रूहानी सेना बनकर विश्व धरा को सुखो की बगिया बनाओ... सबको विकारो रुपी रावण से मुक्त कराकर देवताई राज्य भाग्य दिलवाओ... *ईश्वरीय खजानो के मालिक बनाकर, सबके दामन में असीम खुशियो को सजाओ..*."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने भाग्य की खूबसूरती पर मोहित होकर मीठे बाबा से कहती हूँ :-* "प्यारे दुलारे बाबा मेरे... मै आत्मा *आपसे अथाह शक्तियाँ पाकर पूरे विश्व में सुख शांति की मीठी बयार ला रही हूँ..*. ज्ञान रत्नों को अपनी झोली से छलका कर.. सबको ज्ञान सागर पिता का दीवाना बना रही हूँ..." मीठे बाबा से प्यार भरी रुहरिहानं कर मै आत्मा स्थूल जग में आ गयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- विश्व कल्याणकारी बन विश्व सेवा बढ़ाने के निमित बनना*"

 

_ ➳  एकान्त में बैठ जैसे ही भगवान के रथ ब्रह्मा बाबा के बारे में मैं विचार करती हूँ मन सहज ही अपने प्यारे ब्रह्मा बाप के प्रति असीम प्रेम और स्नेह से सरोबार हो उठता है। *भगवान से मिलवाने के निमित बने ब्रह्मा बाप के लिए मन से कोटि - कोटि धन्यवाद स्वत: ही निकलने लगता है*। अपना तन - मन - धन सब कुछ ईश्वरीय यज्ञ में स्वाहा कर बाबा ने जिस निस्वार्थ भाव से सारे विश्व की सेवा की, उनके उस त्याग को याद कर, *दिल से उनका शुक्रिया अदा करते - करते मैं महसूस करती हूँ जैसे अव्यक्त ब्रह्मा बाप मेरे सामने खड़े मन्द - मन्द मुस्करा रहें हैं और अव्यक्त इशारे से मुझे कुछ कह रहे हैं*। बाबा के उन अव्यक्त ईशारो को समझने के लिए मैं सेकण्ड में देह भान का त्याग कर अपनी अव्यक्त स्थिति में स्थित होती हूँ।

 

_ ➳  अपनी अव्यक्त स्थिति में स्थित होते ही मैं स्पष्ट अनुभव करती हूँ कि जैसे बापदादा मुझे बेहद की सर्विस के लिए डायरेक्शन दे रहें हैं। *विश्व की जो दुर्दशा बाबा देख रहें हैं अब वो सब दृश्य मुझे दिखाई दे रहें हैं*। विकारों की अग्नि में जल रही दुखी और अशांत आत्माये, भगवान की एक झलक पाने के लिए दर - दर भटक रही, अपने शरीर को कष्ट देने वाले भक्ति के कर्म कांडों में फंसी भक्त आत्मायें। *कहीं प्रकृति के प्रकोप का शिकार हुई रोती बिलखती आत्मायें तो कहीं शरीर की भयंकर बीमारियों के रूप में कर्मभोग की भोगना भोगती दुखी आत्मायें और कही अकाले मृत्यु के कारण शरीर ना मिलने की वजह से भटकती आत्मायें*।

 

_ ➳  इन सभी दृश्यों को देखते - देखते, मन मे विरक्त भाव लिए मैं जैसे ही बाबा की ओर देखती हूँ। बाबा के नयनों में बाबा की इच्छा मुझे स्पष्ट समझ में आने लगती है। *बाबा के मन की आश को जान मैं मन ही मन स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ कि अपने इस ब्राह्मण जीवन को अब मुझे केवल बाबा की सर्विस में ही लगाकर सफल करना है*। अब मुझे केवल सर्विस का ही फुरना रखना है। स्वयं से प्रतिज्ञा करते - करते मैं जैसे ही बाबा के मुख मण्डल को निहारती हूँ, एक गुह्य मुस्कराहट के साथ बाबा के वरदानी हाथ को अपने सिर के ऊपर अनुभव करती हूँ। *बाबा के वरदानी हस्तों से निकल रही अदृश्य शक्ति को मैं स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ जो मुझे बलशाली बना रही है*।

 

_ ➳  विश्व की सर्व आत्माओं के कल्याणार्थ मुझे निमित बनाने के लिए बाबा अपनी लाइट माइट से मुझे भरपूर कर रहें हैं ताकि लाइट हाउस बन मैं सभी को अज्ञान अंधकार से निकाल ज्ञान सोझरे में लाकर सबके दुखी अशांत जीवन को सुखदाई बना सकूँ। भक्त आत्माओं को दर - दर के धक्कों से छुड़ा कर उन्हें उनके पिता परमेश्वर से मिलवा सकूँ। *इस बेहद की सर्विस के लिए बाबा अपने सर्व गुणों, सर्व शक्तियों और सर्व ख़ज़ानों से मुझे सम्पन्न बना रहे हैं*। बापदादा से लाइट माइट, वरदान और शक्तियों का असीम बल ले कर अपने लाइट के फ़रिश्ता स्वरूप में स्वयं को अत्यन्त शक्तिशाली बनाकर अब मैं फ़रिश्ता विश्व ग्लोब पर पहुँचता हूँ।

 

_ ➳  विश्व ग्लोब पर बैठ, बापदादा का आह्वान कर, उनके साथ कम्बाइंड होकर, उनसे सुख, शांति और पवित्रता की शक्तियाँ लेकर अब मैं सारे विश्व मे प्रवाहित कर रहा हूँ। *मैं देख रहा हूँ इन सर्वशक्तियों के शक्तिशाली वायब्रेशन विश्व की सर्व आत्माओं तक पहुँच रहें हैं*। विकारों की अग्नि में जल रही आत्माओं पर ये वायब्रेशन शीतल फ़ुहारों का रूप लेकर बरस रहें हैं और उन्हें शीतलता का अनुभव करवा रहें हैं। *भक्त आत्माओं को ये वायब्रेशन परमात्म प्यार का अनुभव करवाकर उन्हें भटकने से छुड़ा रहें हैं। बीमारियों से पीड़ित आत्माओं पर ये वायब्रेशन मरहम का काम कर रहें हैं और उनकी पीड़ा को खत्म कर रहें हैं*। प्रकृति का प्रकोप सहन करती आत्माओं को ये वायब्रेशन धैर्य का बल दे रहें हैं।

 

_ ➳  विश्व की सर्व आत्माओं की बेहद की सेवा करके अब मैं अपने फ़रिश्ता स्वरूप के साथ वापिस साकार लोक में लौटती हूँ और अपने ब्राह्मण स्वरूप को धारण कर लेती हूँ। *बाप की सेवा का फुरना रख, अपने ब्राह्मण स्वरूप द्वारा मैं अपने संकल्प, बोल और कर्म के माध्यम से अपने सम्बन्ध, सम्पर्क में आने वाली सर्व आत्माओं की स्थूल सेवा और अपने फ़रिश्ता स्वरूप द्वारा विश्व की सर्व आत्माओं की बेहद की सेवा अब सदैव कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं कम्बाइंड स्वरूप की स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति की सीट पर सेट रहने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सदा सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा पावरफुल वृत्ति द्वारा आत्माओं को योग्य और योगी बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सदा पावरफुल हूँ  ।*

   *मैं सच्ची सेवाधारी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *सर्वंश त्यागीसदा विश्व-कल्याणकारी की विशेषता वाले होंगे। सदा दाता का बच्चा दाता बन सर्व को देने की भासना से भरपूर होंगे।* ऐसे नहीं कि यह करे वा ऐसी परिस्थिति हो, वायुमण्डल हो तब मैं यह करूँ। दूसरे का सहयोग लेकर के अपने कल्याण के श्रेष्ठ कर्म करने वाले अर्थात् लेकर फिर देनेे वाले, सहयोग लिया फिर दियातो लेना और देना दोनों साथ-साथ हुआ। लेकिन *सर्वंश त्यागी स्वयं मास्टर दाता बन परिस्थितियों को भी परिवर्तन करने काकमजोर को शक्तिशाली बनाने का, वायुमंडल वा वृत्ति को अपनी शक्तियों द्वारा परिवर्तन करने कासदा स्वयं को कल्याण अर्थ जिम्मेवार आत्मा समझ हर बात में सहयोग वा शक्ति के महादान वा वरदान देने का संकल्प करेंगे।* यह हो तो यह करें, नहीं। मास्टर दाता बन परिवर्तन करने कीशुभ भावना से शक्तियों को कार्य में लगाने अर्थात् देने का कार्य करता रहेगा। मुझे देना हैमुझे करना हैमुझे बदलना हैमुझे निर्मान बनना है। ऐसे ओटे सो अर्जुन'' अर्थात् दातापन की विशेषता होगी।

 

✺   *"ड्रिल :- सदा दाता का बच्चा बन सर्व को देने की भासना से भरपूर रहना।*"

 

_ ➳  खुशनुमा संध्या की वेला में मैं आत्मा... मासूम... खिलखिलाते... महकते... चहकते बच्चों को एक गार्डन में खेलते... कूदते... मौज... मस्ती करते देख रही हूँ... अपनी ही खेल में व्यस्त... *न देह का भान... न दुनियादारी का भान... अपनी अलौकिक मासूमियत से भरे सभी बच्चों को देख मन हर्षित हो उठा...* छोटे छोटे बच्चे जो बोलना चलना भी ठीक से नहीं जानते वह बच्चे एक दूसरे के साथ खेल रहे हैं... *पवित्रता और मासूमियत से छलकते गागर के जैसे यह बच्चे...* न जान न पहचान... एक दूसरे से ऐसे घुलमिल गये हैं कि खुद का नास्ता... भी एक दूसरें को अपने हाथों से ख़िला रहे हैं...

 

_ ➳  एक दूसरे से गले मिलते... खेलते... कूदते बच्चों को देख मेरा मन भर आया... एक ही संकल्प चला... क्या मैं ऐसी नहीं बन सकती... *क्या मैं इन बच्चों के जैसे निःस्वार्थ प्यार नहीं कर सकती.... क्या मेरा तेरा किये बिगर एक दिन भी नहीं गुजर सकता...* कोई मेरा अच्छा करे तो ही क्या मैं उनका अच्छा करुं... मैं भी तो बचपन में ऐसी ही मासूम थी... पवित्रता और मासूमियत से भरे नयन... कहाँ गया सब... *क्या बड़े होने का यह मतलब है कि पवित्रता... मासूमियत को अलविदा कह दो...* अपने ही उलझन में उलझी मैं आत्मा... अपने इस सवाल के जवाब के लिए एक की ही ओर दृष्टि करती हूँ... और वह हैं मेरे बाबा... शिव पिता... जिन्हें मिलकर मेरी सारी उलझन सुलझ जाती हैं...

 

_ ➳  और मैं आत्मा... मन बुद्धि के पंख लगाकर पहुँच जाती हूँ मेरे पिता से मिलने... अपने सूक्ष्म शरीर में... पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन में... अपने ब्रह्मा बाबा के सामने... मंद मंद मुस्कुराते ब्रह्मा बाबा मेरा ही इंतजार कर रहे थे और बाबा का आह्वान करते हैं... *ब्रह्मा बाबा का आह्वान और शिवबाबा का सूक्ष्म वतन में आना...* मैं आत्मा निहार रही हूँ यह अलौकिक संगमयुग का अकल्पनीय नजारा... *शिवबाबा का अपने रथ... ब्रह्मा बाबा के तख़्त सिंहासन पर विराजमान होना... एक चमकती हुई दिव्य ज्योति का आगमन महसूस* करने के लिये लाखों आत्मायें इंतजार कर रही हैं... और मैं सौभाग्यशाली आत्मा... यह प्रत्यक्ष देख रही हूँ...

 

_ ➳  बापदादा का कंबाइंड भव्य रूप देखकर मैं आत्मा... भावविभोर हो जाती हूँ... बापदादा से आती हुई शीतल मधुर किरणों को अपने सूक्ष्म शरीर में महसूस कर रही हूँ... और मेरा सूक्ष्म शरीर... पवित्र फ़रिश्ता ड्रैस धारण कर लेता है... *बापदादा से आती हुई अनंत शक्तियों रूपी किरणों से मेरा फ़रिश्ता स्वरुप जगमगा रहा है...* और बापदादा मुझे मेरा सतयुगी स्वरुप दिखा रहा है... *सोलह कला संपूर्ण... संपूर्ण निर्विकारी... परम पवित्र... अलौकिक मासूमियत... स्वार्थ से परे मैं आत्मा* अपना ही स्वरुप देखती रहती हूँ... बोलना... चलना... उठना... बैठना... सभी कार्य में अलौकिकता दिखाई दे रही हैं... स्वार्थ की भावना से परे यह मेरा ही रूप मैं देख रही हूँ...

 

_ ➳  मेरे दैवीय रूप से निकलती शक्तियों रूपी किरणें सारे ब्रह्माण्ड में फ़ैल रही हैं... और सभी अशांत... दुःखी... हताश आत्माओं तक पहुँच रही हैं... *अपने आप निकलती यह किरणों की फव्वारे... बिना मांगे सभी की मनोकामनाएं पूर्ण कर रही हैं...* भक्ति मार्ग के मंदिर में पत्थर की मूर्त के रूप में सजा मेरा दैवीय रूप सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण कर रहा है... मैं आत्मा... मेरे फ़रिश्ते ड्रेस में अपने ही सतयुगी जन्म को देख रही थी... *सतयुगी जन्म में अपने दातापन के संस्कारों को उजागर होता देख मैं आत्मा...* दृढ संकल्प करती हूँ... दाता की बच्ची मैं आत्मा... संगमयुग में भी अपने दातापन के अधिकार को उजागर करुँगी...

 

_ ➳  *सदा स्वयं को कल्याण अर्थ जिम्मेवार आत्मा समझ हर बात में सहयोग वा शक्ति के महादान वा वरदान* देने का संकल्प करके मैं आत्मा बापदादा से विदाई लेकर पहुँच जाती हूँ अपने साकार लोक में... और *मास्टर दाता बन निःस्वार्थ भावना से कोई भी परिस्थिति को परिवर्तित कर रही हूँ...* मास्टर दाता बन परिवर्तन करने कीशुभ भावना से शक्तियों को कार्य में लगाने अर्थात् देने के कार्य में जुड़ जाती हूँ... पवित्र और मासूमियत से भरे बच्चों के रूप में मैं आत्मा मेरा ही सतयुगी स्वरुप को महसूस कर रही हूँ... *मैं आत्मा अपने दातापन के अधिकार से सज समस्त ब्रह्माण्ड में पवित्र... सुख... शांति के किरणों को फ़ैला रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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