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27 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *आत्माओं को आप समान बनाने की सेवा की ?*

 

➢➢ *"बाप हमें कारून का खजाना देते हैं" - इसी ख़ुशी में रहे ?*

 

➢➢ *एक सेकंड की बाजी से सारे कल्प की तकदीर बनायी ?*

 

➢➢ *डबल सेवा द्वारा पावरफुल वायुमंडल बनाया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  अभी समय प्रमाण वृत्ति से वायुमण्डल बनाने के तीव्र पुरुषार्थ की आवश्यकता हैं इसलिए वृत्ति में जरा भी किचड़ा न हो, तब प्रकृति तक आपका वायब्रेशन जायेगा और वायुमण्डल बनेगा इसलिए *हर एक की विशेषताओं को देखो और अपनी वृत्ति को सदा शुभ रखो। इसके लिए याद रखो कि 'दुआ देना है और दुआ लेना है' कोई भी निगेटिव बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दो।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं महावीर आत्मा हूँ"*

 

  सभी अपने को महावीर अनुभव करते हो? *महावीर अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान। जो महावीर आत्मा है उसके लिए सर्व शक्तियां सदा सहयोगी हैं। ऐसे नहीं कि कोई शक्ति सहयोगी हो और कोई शक्ति समय पर धोखा देने वाली हो! हर शक्ति आर्डर पर चलने वाली हो।* जिस समय जो शक्ति चाहिए वो सहयोगी बनती है या टाइम निकल जाता है, पीछे शक्ति काम करती है? आर्डर किया और हुआ। ये सोचना वा कहना न पड़े कि-करना नहीं चाहिए था लेकिन कर लिया, बोलना नहीं चाहिए लेकिन बोल लिया। इससे सिद्ध है कि शक्ति समय पर सहयोगी नहीं होती। सुनना नहीं चाहिए लेकिन सुन लिया, तो कान कर्मेन्द्रिय अपने वश में नहीं हुई ना! अगर सुनने नहीं चाहते और सुन लिया-तो कान ने धोखा दे दिया।

 

  अपनी कर्मेन्द्रियां अगर समय पर धोखा दे दें तो उसको राजा कैसे कहेंगे! राजयोगी का अर्थ ही है हर कर्मेन्द्रिय र्डर पर चले। जो चाहे, जब चाहे, जैसा चाहिए-सर्व कर्मेन्द्रियां वैसा ही करें। *महावीर कभी भी यह बहाना नहीं बना सकता कि समय ऐसा था, सरकमस्टांश ऐसे थे, समस्या ऐसी थी। नहीं। समस्या का काम है आना और महावीर का काम है समस्या का समाधान करना, न कि हार खाना।* तो अपने आपको परीक्षा के समय चेक करो। ऐसे नहीं-परीक्षा तो आई नहीं, मैं ठीक हूँ! पास तो पेपर के टाइम होना पड़ता है! या पेपर हुआ ही नहीं और मैं पास हो गया?

 

  तो सदा निर्भय होकर विजयी बनना। कहना नहीं है, करना है! छोटी-मोटी बात में कमजोर नहीं होना है। जो महावीर विजयी आत्मा होते हैं वो सदा हर कदम में तन से, मन से खुश रहते हैं। उदास नहीं रहते, चिंता में नहीं आते। सदा खुश और बेफिक्र होंगे। *महावीर आत्मा के पास दु:ख की लहर स्वप्न में भी नहीं आ सकती। क्योंकि सुख के सागर के बच्चे बन गये। तो कहाँ सुख का सागर और कहाँ दु:ख की लहर! स्वप्न  भी परिवर्तन हो जाते हैं।* नया जन्म हुआ तो स्वप्न भी नये आयेंगे ना! संकल्प भी नये, जीवन भी नई। जब बाप के बन गये तो जैसा बाप वैसे बच्चे।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आवाज से परे रहने वाला बाप, आवाज की दुनिया में आवाज द्वारा सर्व को आवाज से परे ले जाते हैं। बापदादा का आना होता ही है साथ ले जाने के लिए तो सभी साथ जाने के लिए एवररेडी हो वा अभी तक तैयार होने के लिए समय चाहिए? *साथ जाने के लिए बिन्दु बनना पडे। और बिन्दु बनने के लिए सर्व प्रकार के बिखरे हुए विस्तार अर्थात अनेक शाखाओं के वृक्ष को बीज में समाकर बीजरूप स्थिति अर्थात बिन्दु में सबको समाना पडे।*

 

✧  लौकिक रीति में भी जब बडे विस्तार का हिसाब करते हो तो सारे हिसाब को समाप्त कर लास्ट में क्या कहते? कहा जाता है - 'कहो शिव अर्थात बिन्दी।' ऐसे सृष्टि चक्र वा कल्प वृक्ष के अन्दर आदि से अंत तक कितने हिसाब-किताब के विस्तार में आये? *अपने हिसाब-किताब की शाखाओं अथवा विस्तार रूपी वृक्ष को जानते हो ना?*

 

✧  देह के हिसाब की शाखा, देह के सम्बन्धों के शाखायें, देह के भिन्न-भिन्न पदार्थों में बन्धनी आत्मा बनने की शाखा, भक्तिमार्ग और गुरुओं के बंधनों के विस्तार की शाखायें, भिन्न-भिन्न प्रकार के विकर्मों के बंधनों की शाखायें, कर्मभोग की शाखायें, कितना विस्तार हो गया। अब इन *सारे विस्तार को बिन्दु रूप बन बिन्दी लगा रहे हो?*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ *पूजा की विधि में बूंद-बूंद का महत्व है।* इस समय आप बच्चे 'बिन्दू' के रहस्य में स्थित होते हो। विशेष सारे ज्ञान का सार एक बिन्दू शब्द में समाया हुआ है। बाप भी बिन्दू, आप आत्मायें भी बिन्दू और ड्रामा का ज्ञान धारण करने के लिए जो हुआ - फिनिश अर्थात् फुलस्टाप। बिन्दू लगा दिया। *परम आत्मा, आत्मा और यह प्रकृति का खेल अर्थात् ड्रामा तीनों का ज्ञान प्रैक्टिकल लाइफ में 'बिन्दू' ही अनुभव करते हो ना।* इसलिए भक्ति में भी प्रतिभा के बीच बिन्दू का महत्व है। *दूसरा है - बूंद का महत्व- आप सभी याद में बैठते हो या किसी को भी याद में बिठाते हो तो किस विधि से कराते हो? संकल्पों की बूंदों द्वारा - मैं आत्मा हूँ, यह बूंद डाली। बाप का बच्चा हूँ - यह दूसरी बूंद। ऐसे शुद्ध संकल्प की बूंद द्वारा मिलन की सिद्धि को अनुभव करते हो ना।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺ *"ड्रिल :- टाइम वेस्ट ना करना"*

 

_ ➳  *एकांत में बैठी मैं आत्मा घडी की टिक-टिक को सुन रही हूँ... घडी की टिक-टिक जैसे कह रही हो समय बड़ा अनमोल, समझो इसका मोल... कोई भी पल खो न जाए, गया समय फिर हाथ न आए...* हर घडी अंतिम घडी की स्मृति से मैं आत्मा इस स्थूल देह को छोड़ सूक्ष्म शरीर धारण कर, इस स्थूल दुनिया को छोड़ सूक्ष्म वतन में प्यारे बाबा के पास पहुँच जाती हूँ... मीठे मीठे बाबा संगमयुग के एक-एक सेकंड के अनमोल समय के महत्व को समझा रहे हैं...

 

  *प्यारे बाबा टाइम वेस्ट ना करने की समझानी देते हुए कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय यादो में महकने और खिलने के खुबसूरत लम्हों में सदा ज्ञान के सुरीले नाद से आत्माओ को मन्त्रमुग्ध करना है... *सबका जीवन खुशियो से खिल उठे, सदा इस सुंदर चिंतन में ही रहना है... ईश्वर पिता के साथ भरे इस मीठे समय को सदा यादो से ही संजोना है...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा एक बाप की याद में रह टाइम आबाद करते हुए कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... मैं आत्मा आपकी यादो में दीवानी सी... *ज्ञान रत्नों की बौछार सदा साथ लिए, खुशियो के आसमाँ से, आत्माओ के दिल पर बरस रही हूँ... सबको मीठे बाबा का परिचय देकर हर पल पुण्यो की कमाई में जीजान से जुटी हूँ...*

 

  *मीठे बाबा संगम युग की सुहावनी घड़ियों को सफल करने का राज बतलाते हुए कहते है:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *विश्व पिता के प्यार से लबालब, संगम का यह अनोखा अदभुत समय. संसार की व्यर्थ बातो में, भाग्य के हाथो से, यूँ रेत सा न फिसलाओ...* ज्ञानी तू आत्मा बनकर ज्ञान की झनकार पूरे विश्व को सुनाओ... ईश्वर पिता के साथ विश्व सेवा कर 21 जनमो का महाभाग्य पाओ...

 

_ ➳  *मैं आत्मा ज्ञानी तू आत्मा बन बाबा के ज्ञान रत्नों को चारों ओर बांटते हुए कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... मै आत्मा आपसे पाये अमूल्य रत्नों को पूरे विश्व में बिखेर कर सतयुगी बहार ला रही हूँ... *हर पल यादो में खोयी हुई खुशियो में चहक रही हूँ... और ज्ञानी आत्मा बनकर अपनी रूहानी रंगत से बापदादा को प्रत्यक्ष कर रही हूँ...*

 

  *मेरे बाबा मुझ पर वरदानों की रिमझिम बरसात करते हुए कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... सारे कल्प का कीमती और वरदानी समय सम्मुख है... जिसे कन्दराओं में जाकर ढूंढ रहे थे, दर्शन मात्र को व्याकुल थे... *वो पिता दिलजान से न्यौछावर सा दिल के इतना करीब है... जो चाहा भी न था वो भाग्य खिल उठा है... इस मीठे भाग्य के नशे में खो जाओ, सबको ऐसा भाग्यशाली बनाओ...*

 

_ ➳  *मैं आत्मा सच्ची सच्ची रूहानी सेवाधारी बन सारे विश्व में खुशियों को बाँटती हुई कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी मीठी यादो में सच्चा सुख पाकर 21 जनमो की खुशनसीब बन गयी हूँ... और यह ख़ुशी हर घर के आँगन में उंडेल रही हूँ... *सारा विश्व खुशियो से भर जाये... हर दिल ईश्वरीय प्यार भरा मीठा और सच्चा सुख पाये... यह दस्तक हर दिल को दे रही हूँ...*

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- इस पुरानी दुनिया से बेहद का वैरागी बनना है*"

 

_ ➳  बेहद की वैराग्य वृति को धारण कर, विकारों का सन्यास करके ही आत्मा रूपी सीता अपने प्रभु राम से मिल सकती है, *मन ही मन यह विचार करती मैं आत्मा सीता उस समय को याद करती हूँ जब तक मेरे प्रभु राम मुझे नही मिले थे*। पाँच विकारों रूपी रावण की जेल में कैद मैं आत्मा सीता कैसे अपने प्रभु राम के वियोग में तड़प रही थी।

 

_ ➳  मेरा जीवन पिंजड़े में बन्द उस पंछी के समान बन गया था जो इस बात का कभी अनुभव ही नही कर पाता कि आजाद हो कर उड़ने में कितना आनन्द समाया है? अपने प्रभु राम का पता पाने के लिए मैं कितनी व्याकुल थी। कोई भी मुझे उनका पता बताने वाला नही था। *किंतु मेरे प्रभु राम, मेरे दिलाराम शिव पिता परमात्मा ने स्वयं आ कर ना केवल मुझे रावण की कैद से छुड़ाया बल्कि विकारों रूपी रावण ने जो मेरे पंख काट दिए थे वो ज्ञान और योग के पंख लगा कर मुझे उड़ना भी सिखाया*। इस उड़ने में जो परमआनन्द समाया है उसे मैं जब चाहे तब अनुभव कर सकती हूँ।

 

_ ➳  ज्ञान और योग के पंख लगा कर मैं आत्मा सीता जब चाहे अपने प्रभु राम से मिलन मनाने जा सकती हूँ। *यही चिंतन करते - करते मैं आत्मा रूपी सीता विदेही बन देह रूपी पिंजड़े को छोड़ इससे बाहर निकल आती हूँ और चल पड़ती हूँ ऊँची उड़ान भरते हुए अपने प्रभु राम के पास*। सेकण्ड में पाँच तत्वों से बनी साकारी दुनिया को पार कर, उससे परे सूक्ष्म वतन को भी पार कर मैं पहुंच जाती हूँ अपनी निराकारी दुनिया परमधाम में।

 

_ ➳  अब मैं परमधाम में अपनी निराकारी स्थिति में स्थित हो, बिंदु बन, अपने बिंदु शिव बाबा के साथ मिलन मना रही हूँ। मेरे शिव पिता से आ रही अनन्त सर्वशक्तियों की किरणें मुझ बिंदु आत्मा पर पड़ रही हैं। इन किरणों के पड़ने से मैं आत्मा एकदम हल्की होती जा रही हूँ। *मेरा स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली व चमकदार बनता जा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे प्रभु राम ने सर्वशक्तियों को समाने की ताकत मुझे दे दी हो*। अपने प्रभु राम की सर्वशक्तियों को स्वयं में समा कर मैं शक्तियों का पुंज बनती जा रही हूँ। परमात्म लाइट मुझ में समा कर मुझे लाइट माइट स्वरूप में स्थित करती जा रही हैं ।

 

_ ➳  अपने प्रभु राम के साथ मिलन मना कर परमात्म शक्तियों से मैं भरपूर हो चुकी हूँ। बेहद की वैरागी बन, विकारों का सन्यास करने का बल मेरे शिव पिता ने मेरे अंदर भर दिया है। *इस बल को अपने साथ लिए, शक्तिशाली बन अब मैं आत्मा वापिस साकारी दुनिया की ओर प्रस्थान करती हूँ*। साकारी दुनिया मे अपने साकारी तन में वापिस भृकुटि के भव्य भाल पर आ कर मैं विराजमान हो जाती हूँ।

 

_ ➳  मेरे शिव पिता परमात्मा का बल अब मुझे बेहद का वैरागी बनने और विकारों का सन्यास करने की शक्ति दे रहा है। देह, देह की दुनिया और देह के सम्बन्धों से मैं नष्टोमोहा बनती जा रही हूँ। *मेरे शिव पिता से मिल रहा पवित्रता का बल मुझे विकारों के ऊपर विजयी बनने में मदद कर रहा है और विकारों का सन्यास करवा कर मुझे विकर्माजीत बना रहा है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं एक सेकण्ड की बाजी से सारे कल्प की तकदीर बनाने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं श्रेष्ठ तकदीरवान आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा सदैव डबल सेवा द्वारा पावरफुल वायुमंडल बनाती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा प्रकृति को दासी बनाती हूँ  ।*

   *मैं प्रकृतिजीत आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  *सर्वंश त्यागी सदा अपने को हर श्रेष्ठ कार्य के - सेवा की सफलता के कार्य मेंब्राह्मण आत्माओं की उन्नति के कार्य मेंकमज़ोरी वा व्यर्थ वातावरण को बदलने के कार्य में जिम्मेवार आत्मा समझेंगे।* सेवा में विघ्न बनने के कारण वा सम्बन्घ सम्पर्क में कोई भी नम्बरवार आत्माओं के कारण जरा भी हलचल होती है, तो *सर्वंन्श त्यागी बेहद के आधारमूर्त समझचारों ओर की हलचल को अचल बनाने की जिम्मेवारी समझेंगे।* ऐसे बेहद की उन्नति के आधार मूर्त सदा स्वयं को अनुभव करेंगे। ऐसा नहीं कि यह तो इस स्थान की बात है या इस बहन वा भाई की बात है। नहीं। मेरा परिवार है'। मैं कल्याणकारी निमित्त आत्मा हूँ। टाइटल विश्व-कल्याणकारी का मिला हुआ हैं न कि सिर्फ स्व-कल्याणकारी वा अपने सेन्टर के कल्याणकारी। दूसरे की कमज़ोरी अर्थात् अपने परिवार की कमज़ोरी हैऐसे बेहद के निमित्त आत्मा समझेंगे। मैं-पन नहींनिमित्त मात्र हैं अर्थात् विश्व-कल्याण के आधारमूर्त बेहद के कार्य के आधारमूर्त हैं। *सर्वंश त्यागी सदा एकरस, एक मत, एक ही परिवार का एक ही कार्य है - सदा ऐसे एक ही स्मृति में नम्बर एक आत्मा होंगे।*

 

 ✺   *"ड्रिल :- विश्व कल्याणकारी अवस्था का अनुभव करना।"*

 

_ ➳  भक्ति मार्ग की मैं भक्त आत्मा... अपनी ही उलझन में उलझी... अपने ही दुःखों में डूबी... *अपनी ही विपरीत परिस्थितिओं को सुलझाने में खुद ही उलझ पड़ती मैं आत्मा... न अपना उद्धार कर पा रही थी और न ही औरों का...* भगवान को दर दर ढूंढती मैं आत्मा... सोचती थी मैं भगवान की पक्की भक्त फिर भी भगवान आ नहीं रहे हैं तो समस्त विश्व में मेरे जैसे कितने दुःखी... अशांत आत्मायें हैं जो भगवान को पुकार रहे हैं... *क्या भगवान को सुनाई नहीं दे रहा हैं... समस्त लोक के दुःखी... अशांत... आत्माओं की पुकार...* एक ही संकल्प मन में मुझ भक्त आत्मा में चलता रहता था कि मैं इन समस्त आत्माओं के लियें कुछ भी नहीं कर पा रही हूँ... बस देखती... सुनती रहती हूँ... और *मन ही मन भगवान को पुकारती रहती हूँ... अब तो आ जाओ...* और कितना पाप का घड़ा भरना बाक़ी हैं... अब तो अत्याचार की पराकाष्ठा हो गईं भगवान... अब तो आ जाओ...

 

_ ➳  और मैं भक्त आत्मा... भगवान को खोजती पहुँच जाती हूँ ब्रह्माकुमारी के सेंटर पर... *जहाँ सच्चा गीता ज्ञान मिला... मैं कौन... मेरा कौन... भगवान कौन की पहचान मिली...* और मन की आँखे खुल गई जब भगवान के अवतरण को प्रत्यक्ष महसूस किया... भगवान मेरे पिता शिवबाबा हैं... उनकी शक्तियों और प्यार की मैं हक़दार बच्ची हूँ... *यही वह संगमयुग हैं जब भगवान स्वयं अपना धाम छोड़ कर इस पतित दुनिया में आते हैं... अपने भक्तों को भक्ति का फल देने... अपने बच्चों को वर्सा देने आते हैं...* अपने बच्चों को अपनी ही शक्तियों से अवगत कराने आते हैं... अपने ही संस्कारों से परिपूर्ण कराने आते हैं... और मैं आत्मा बापदादा की शक्तियों की अधिकारी बन गई... अपने आप में सर्व शक्तियों से भरपूर हो गई... खुद के ही दुःखों की जंजीरों में बंधी मैं आत्मा... *बापदादा के प्यार भरी मुरली रूपी शिक्षाओं से दुःखों से मुक्त हो गई...*

 

_ ➳  और मैं आत्मा हद के बंधनों से निकल कर पहुँच जाती हूँ बेहद के त्यागी... तपस्वी जीवन में... *मैं आत्मा सदा स्वयं को बेहद की उन्नति की आधार मूर्त अनुभव करती हूँ...* समस्त ब्रह्माण्ड मेरा परिवार है... और सभी आत्माओं की मैं पूर्वज... विश्व-कल्याणकारी आत्मा हूँ... दाता की बच्ची मैं दातापन के संस्कारों को अपने में उजागर करती हूँ... *मेरेपन की त्यागी मैं आत्मा बापदादा की लाडली बच्ची बन समस्त ब्रह्माण्ड में बापदादा के शांति रूपी किरणों को फैलाने में संगमयुग के क्षणों को व्यतीत करती जा रही हूँ...* दैवीय संस्कारों का आह्वान कर... सभी आत्माओं की मनोकामनाएं पूर्ण करती जा रही हूँ...

 

_ ➳  *हर पल बापदादा से बातें करती... बापदादा को साथ साथ महसूस करती... बापदादा के संग संग चलती मैं आत्मा... प्रत्यक्ष बापदादा को अनुभव करती रहती हूँ...*  उनके आशीर्वादों रूपी शक्तियों को अपने में धारण कर समस्त ब्रह्माण्ड में फैलाती जा रही हूँ... बापदादा के साथ साथ सभी अशांत... दुःखी... आत्माओं को शांति... पवित्रता के वाइब्रेशन से भरपूर करती जा रही हूँ... बापदादा के साथ फ़रिश्ता ड्रैस में सज मैं आत्मा... पूरे ब्रह्माण्ड में लाइट माइट हाउस बन शक्तियों रूपी लाइट से प्रकाशित करती जा रही हूँ... *विश्व-कल्याणकारी के स्टेज पर विराजमान मैं आत्मा... चारों ओर की हलचल को अचल बनाने की जिम्मेवारी बापदादा के साथ साथ निभाती जा रही हूँ...*

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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