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 28 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *बुधी को ज्ञान चिंतन में बिजी रखने की आदत डाली ?*

 

➢➢ *सभी पार्टधारियों के पार्ट को साक्षी होकर देखा ?*

 

➢➢ *मास्टर ज्ञान सागर बन गुड़ियों के खेल को समाप्त किया ?*

 

➢➢ *समय पर सहयोगी बन एक का पदमगुणा फल प्राप्त किया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *आप क्षमा के सागर के बच्चे हो तो परवश आत्माओं को क्षमा दे दो।* अपनी शुभ वृत्ति से ऐसा वायुमण्डल बनाओ जो *कोई भी आपके सामने आये वह कुछ न कुछ स्नेह ले, सहयोग ले, क्षमा का अनुभव करे, हिम्मत का उमंग-उत्साह का अनुभव करे।*

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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✺   *"मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ"*

 

  सभी अपने को डबल लाइट अर्थात् फरिश्ता समझते हो? *फरिश्ते की विशेष निशानी है-फरिश्ता अर्थात् न्यारा और बाप का प्यारा, पुरानी दुनिया और पुरानी देह से लगाव का रिश्ता नहीं। देह से आत्मा का रिश्ता तो है, लेकिन लगाव का संबंध नहीं। एक है 'संबंध' और दूसरा है 'बंधन'। एक है कर्म-बन्धन और दूसरा है कर्म-सम्बन्ध।* तो संबंध तो रहना ही है। जब तक कर्मेन्द्रियां हैं तो कर्म का संबंध तो रहेगा लेकिन बंधन नहीं हो। बंधन की निशानी है-जिसके बंधन में जो रहता है उसके वश रहता है। जो संबंध में रहता है वह स्वतन्त्र रहता है, वश नहीं होता। कर्मेन्द्रियों से कर्म के संबंध में आना अलग बात है लेकिन कर्मबन्धन में नहीं आना।

 

  फरिश्ता अर्थात् कर्म करते भी कर्म के बंधन से मुक्त। ऐसे नहीं कि आज आंख कहे कि यह करना ही है, देखना ही है-तो वश होकर के देख लें। जैसे कोई जेल में बंधन में होता है, तो जेलर जैसे चाहे उसको बिठायेगा, चलायेगा, खिलायेगा। तो बंधन में होगा ना! वो चाहे मैं जेल से चला जाऊं, तो जा सकता है? बंधन है ना। ऐसे पुराने शरीर का बंधन न हो, सिर्फ सेवा प्रति संबंध हो। ऐसी अवस्था है? या कभी बंधन, कभी संबंध? बंधन बार-बार नीचे ले आयेगा। *तो फरिश्ता अर्थात् बंधनमुक्त। ऐसे नहीं-कोशिश करेंगे। 'कोशिश' शब्द ही सिद्ध करता है कि पुरानी दुनिया की कशिश है। 'कोशिश' शब्द नहीं। करना ही है, होना ही है। 'है'-'है' उड़ा देगा, 'गे'-'गे' नीचे ले आयेगा। तो 'कोशिश' शब्द समाप्त करो।*

 

  *फरिश्ता अर्थात् जीवन्मुक्त, जीवन-बंधन नहीं। न देह का बंधन, न देह के संबंध का बंधन, न देह के पदार्थ का बंधन। ऐसे जीवन्मुक्त हो? अव्यक्त वर्ष का अर्थ ही है फरिश्ता स्थिति में स्थित रहना।* चेक करो कि कौनसा लगाव नीचे ले आता है? अपनी देह का लगाव खत्म किया तो संबंध और पदार्थ के लगाव आपे ही खत्म हो जायेंगे। अपनी देह का लगाव अगर है तो संबंध और पदार्थ का लगाव भी अवश्य ही खींचेगा। इसलिए पहला पाठ पढ़ाते हो कि-देह-भान को छोड़ो, तुम देह नही, आत्मा हो।

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  *सारे विस्तार को बीज में समा दिया है वा अभी भी विस्तार है?* इस जडजड़ीभूत वृक्ष की किसी भी प्रकार की शाखा रह तो नहीं गई है? *संगमयुग है ही पुराने वृक्ष की समाप्ति का युग।* तो हे संगमयुगी ब्राह्मणों! पुराने वृक्ष को समाप्त किया है? जैसे पते-पते को पानी नहीं दे सकते। बीज को देना अर्थात सभी पत्तों को पानी मिलना। ऐसे इतने *84 जन्मों के भिन्न-भिन्न प्रकार के हिसाब-किताब का वृक्ष समाप्त करना है।*

एक-एक शाखा को समाप्त करने का नहीं।

 

✧   आज देह के स्मृति की शाखा को समाप्त करो और कल देह के सम्बन्धों की शाखा को समाप्त करो, ऐसे एक-एक शाखा को समाप्त करने से समाप्ति नहीं होगी। लेकिन *बीज बाप से लगन लगाकर, लगन की अग्नि द्वारा सहज समाप्ति हो जायेगी।* काटना भी नहीं है लेकिन भस्म करना है। आज काटेंगे, कुछ समय के बाद फिर प्रकट हो जायेगा क्योंकि वायुमण्डल के द्वारा वृक्ष को नेचुरल पानी मिलता रहता है। जब वृक्ष बडा हो जाता है तो विशेष पानी देने की आवश्यकता नहीं होती।

 

✧  नैचरल वायुमण्डल से वृक्ष बढ़ता ही रहता है वा खडा हुआ रहता है तो इस विस्तार को पाये हुए जडजडीभूत वृक्ष को अभी पानी देने की आवश्यकता नहीं है। यह आटोमैटिक बढ़ता जाता है। *आप समझते हो कि पुरुषार्थ द्वारा आज से देह सम्बन्ध की स्मृति रूपी शाखा को खत्म कर दिया, लेकिन बिना भस्म किये हुए फिर से शाखा निकल आती है।* फिर स्वयं ही स्वयं से कहते हो वा बाप के आगे कहते हो कि यह तो हमने समाप्त कर दिया था फिर कैसे आ गया! पहले तो था नहीं फिर कैसे हुआ। कारण? *काटा, लेकिन भस्म नहीं किया।*

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ भाग्य विधाता बाप सभी बच्चों को भाग्य बनाने की अति सहज विधि बता रहे हैं। *सिर्फ बिन्दु के हिसाब को जानो। बिन्दु का हिसाब सबसे सहज है। बिन्दु के महत्व को जाना और महान बने।* सबसे सहज और महत्वशाली बिन्दु का हिसाब सभी अच्छी तरह से जान गये हो ना! बिन्दु कहना और बिन्दु बनना। बिन्दु बन बिन्दु बाप को याद करना है। *बिन्दु थे और अब बिन्दु स्थिति में स्थित हो बिन्दु बाप समान बन मिलन मनाना है।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :-  बेहद नाटक में पार्ट बजाना"*

 

_ ➳  चाँदनी रात में नौका विहार करते करते... मै आत्मा चाँद की ओर निहारती हूँ... तो मुझे मेरा प्रियतम चाँद... मीठा बाबा याद आता है... मीठे बाबा की याद आते ही मै आत्मा...फ़रिश्ता बनकर मीठे बाबा के पास उड़ चलती हूँ... वतन में मीठे बाबा को देख मीठी ख़ुशी से भर जाती हूँ... *ईश्वर पिता को पाकर खुबसूरत हो गए अपने जीवन को*... और कभी, अपने सामने साधारण बन कर बेठे, असाधारण भगवान को देख देख... मीठे महान भाग्य के नशे में डूब जाती हूँ...

 

   *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान रत्नों से सजाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे फूल बच्चे... ईश्वरीय ज्ञान रत्नों को पाकर बेहद के खेल को जान गए हो... यह सुख और दुःख का बहुरूपी नाटक है... *इस नाटक में हीरो पार्ट बजाकर विश्व स्टेज पर मुस्कराना है..*. अज्ञान के अंधेरो से निकल, ज्ञान के प्रकाश में... सुखो भरी दुनिया अपनी तकदीर में सजानी है..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे बाबा को ख़ुशी में भरकर कहती हूँ :-* "प्यारे मीठे बाबा मेरे... मै आत्मा *आपकी यादो के साये में, अज्ञान के आवरण से निकल कर... सुखो की दुनिया की मालिक बन रही हूँ..*. आपने मुझे जाग्रत कर विकारो की कालिमा से छुड़ा दिया है,.. मै आत्मा दिव्य गुण और पवित्रता से सज संवर कर मुस्करा रही हूँ..."

 

   *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को विश्व नाटक के राज समझाते हुए कहते है :-* "मीठे लाडले बच्चे... *बेहद के नाटक में हीरो का पार्ट अदा कर शान से विश्व धरा पर मुस्कराओ*... ईश्वरीय यादो में इस कदर निखर जाओ कि... हीरो बन कर, नाटक की मुख्य भूमिका अदा करो...  देह की दुनिया और अज्ञान के अंधकार से निकल, सतयुगी सवेरे में खिलखिलाओ..."

 

_ ➳  *मै आत्मा अपने मीठे बाबा से असीम खजाने लेते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा... मै आत्मा अज्ञान मार्ग पर चलकर, कितनी विकारी और दुखो से भर गयी थी... कभी सोच भी नही सकती थी कि मै हीरो बन मुस्कराऊंगी... *आपने जीवन में आकर मुझे नई उमंगो से भर दिया है.*.. मुझे देवताई लक्ष्य देकर कितना ऊँचा बना दिया है..."

 

   *मीठे बाबा मुझ आत्मा को अपनी सम्पत्ति का वारिस बनाते हुए कहते है :-* "मीठे सिकीलधे बच्चे... *ईश्वर पिता को पाकर, उनकी यादो में गहरे डूबकर, विश्व राज्य अधिकारी बन कर, अथाह सुखो को बाँहों में भरो..*. ज्ञान के प्रकाश में नूरानी बन जाओ... शिव बाबा को पाकर जो ज्ञान खजाने से पाये है.. उस अमीरी से जन्नत के मीठे सुखो का आनन्द लो..."

 

_ ➳  *मै आत्मा मीठे जादूगर बाबा से सुखो की अधिकारी बनकर कहती हूँ :-* "सच्चे साथी मेरे बाबा... आपको पाकर मेने अपनी सत्यता को जाना है... और इस सत्यता ने मेरे जीवन को सच्ची खुशियो से सजाया है... अब मै आत्मा *आपकी यादो में पावन बनकर इस बेहद लीला रुपी नाटक में हीरो पार्ट की तैयारी में जुटी हूँ..*.मीठे बाबा से अथाह ज्ञान खजाने लेकर मै आत्मा... अपने कर्म क्षेत्र पर लौट आयी...

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप को याद कर सच्ची कमाई जमा करनी है*"

 

_ ➳  सचखंड की स्थापना कर, उस सचखंड का मुझे मालिक बनाने वाले अपने सत्य परमपिता परमात्मा बाप के साथ अंदर बाहर सदा सच्चे रहने का प्रोमिस करती हुई मैं मन ही मन विचार करती हूं कि कितने घोर अंधकार में भटक रही है दुनिया! जो रावण की झूठी नगरी झूठखण्ड को सच माने बैठी है। *रावण की झूठी माया ने सबकी बुद्धि को ताला लगा दिया है जो झूठ और सच का निर्णय भी नहीं कर पा रहे*। इस झूठ खंड के विनाशी भौतिक सुख संसाधनों से मिलने वाले अल्पकाल के विनाशी सुखों को ही पाने में लगे हुए हैं। जो अविनाशी सुख इस समय परमात्मा आ कर दे रहे हैं और भविष्य 21 जन्मों के लिए देने वाले हैं उन सुखों को तो यह बेचारे कभी अनुभव ही नहीं कर पाएंगे।

 

_ ➳  यही विचार करते करते मैं अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की सुनहरी यादों में खो जाती हूँ और परमात्म प्यार की मधुर स्मृतियों में खोकर जैसे ही अपने प्यारे मीठे शिव बाबा को याद करती हूं। मैं अनुभव करती हूं स्वयं को बाप दादा के सामने। *मेरे सामने कुर्सी पर लाइट लाइट स्वरुप में बापदादा विराजमान है। मैं एकटक उनकी ओर निहार रही हूं*। उनकी मीठी दृष्टि में अपने लिए समाये असीम प्यार को देख मन ही मन हर्षित हो रही हूं। बाबा के पास बैठकर बाबा के घुटनों में अपना सिर रखकर परमात्म प्यार का असीम सुख ले रही हूं।

 

_ ➳  सिर पर बाबा के हाथों का हल्का - हल्का स्पर्श मुझे परमात्म शक्तियों से भर रहा है। परमात्म बल से भरपूर हो कर मैं स्वयं को एकदम हलका अनुभव कर रही हूं। *आंखों को बंद करके बाबा की गोद मे सिर रख कर परमात्म पालना के दिव्य अलौकिक आनंद में मैं डूबी हुई हूं*। तभी एक बहुत ही खूबसूरत दृश्य मुझे दिखाई देता है। मैं देख रही हूं कि लाइट का सूक्ष्म शरीर धारण कर मैं एक नन्हा फरिश्ता बन बापदादा के साथ कहीं दूर जा रहा हूं। देह और देह की दुनिया पीछे छूटती जा रही है।

 

_ ➳  एक बहुत खुले स्थान पर बाबा मुझे ले आते हैं और मेरी आँखों पर पट्टी बांध कर मेरे साथ आंख मिचौली का खेल खेलने लगते हैं। *आंखों पर पट्टी बांधे अपने नन्हे नन्हे हाथों से मैं बाबा को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ*। थोड़े प्रयास के बाद मैं बाबा को ढूंढ कर बाबा का हाथ पकड़ कर जैसे ही अपनी आंखों से पट्टी हटाता हूं तो उसी स्थान पर मैं अपना देवताई स्वरूप धारण किये एक नन्हे राजकुमार के रूप में स्वयं को सोने की एक बहुत सुंदर नगरी में देखता हूं।

 

_ ➳  हरे भरे पेड़ पौधे, डालियों पर चहचहाते रंग-बिरंगे खूबसूरत पक्षी, वातावरण में गूंजती कोयल की मधुर आवाज, बागों में नाचते सुंदर मोर, रसभरे फलों से लदे वृक्षों की सुंदर कतारें, सतरंगी छटा बिखेरती सूरज की किरणें, ऐसा मनोरम दृश्य मैं अपनी आंखो से देख रहा हूं। स्वयं को मैं अति सुंदर हीरे जड़ित पोशाक धारण किए एक सुंदर राजकुमार के रूप में बगीचे में अन्य राजकुमारों के साथ खेलता हुआ देख रहा हूं। *बगीचे के बीचो-बीच से गुजरता एक सुंदर पथ जिस पर लाल मखमली कालीन बिछा है जो राजमहल के भीतर तक जा रहा है। यह मेरा राजमहल है जो पूरा सोने का बना है*। स्वर्ण महल के अंदर दास दासियाँ 56 प्रकार के भोजन बना रहे हैं। माँ श्री लक्ष्मी और पिता श्री नारायण मुझे अपनी गोद में उठा कर दुलार कर रहे हैं। शयनकक्ष में माँ मुझे मीठी लोरी सुनाकर सुला रही है।

 

_ ➳  अपने देवताई जीवन का दिन हंसते गाते खेल पाल करते आनंद में मैं व्यतीत कर रहा हूं। *तभी कानों में बाबा की मधुर आवाज सुनाई देती है:- "मेरे राजा बच्चे अपने देवताई राजकुमार स्वरुप को और अपने राजमहल को देखा ना"!इसी सचखण्ड का आपको मालिक बनना है*। बाबा के ये महावाक्य निरन्तर कानो में गूंज रहे हैं और सचखण्ड के सुंदर नज़ारे बार बार आंखों के सामने स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

 

_ ➳  सचखण्ड के इन सुंदर नजारों को अपनी आंखों में बसाये, सचखण्ड का मालिक बनने का तीव्र पुरुषार्थ करने के लिए *अब मैं फ़रिशता अपनी साकारी देह में अवतरित हो रहा हूँ और साकारी तन में प्रवेश कर अपने संगमयुगी ब्राह्मण स्वरूप को धारण कर रहा हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं मास्टर ज्ञान सागर बन गुड़ियों का खेल समाप्त करने वाली स्मृति स्वरूप आत्मा हूँ।*

   *मैं समर्थ स्वरूप आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा समय पर सदा सहयोगी बनती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा एक का पदमगुणा फल प्राप्त करती हूँ  ।*

   *मैं सदा सहयोगी आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  सभी प्रवृत्ति में रहतेप्रवृत्ति के बन्धन से न्यारे और सदा बाप के प्यारे होकिसी भी प्रवृत्ति के बन्धन में बंधे हुए तो नहीं हो? लोकलाज के बन्धन में, सम्बन्ध में बंधे हुए को बन्धनयुक्त आत्मा कहेंगे। तो कोई भी बन्धन न हो। मन का भी बन्धन नहीं। मन में भी यह संकल्प न आये कि हमारा कोई लौकिक सम्बन्ध है। *लौकिक सम्बन्ध में रहते अलौकिक सम्बन्ध की स्मृति रहे। निमित्त लौकिक सम्बन्ध लेकिन स्मृति में अलौकिक और पारलौकिक सम्बन्ध रहे। सदा कमल आसन पर विराजमान रहो। कभी भी पानी वा कीचड़ की बूँद स्पर्श न करे। कितनी भी आत्माओं के सम्पर्क में आते - सदा न्यारे और प्यारे रहो। सेवा के अर्थ सम्पर्क है। देह का सम्बन्ध नहीं हैसेवा का सम्बन्ध है। प्रवृत्ति में सम्बन्ध के कारण नहीं रहे होसेवा के कारण रहे हो। घर नहीं, सेवास्थान है।* सेवास्थान समझने से सदा सेवा की स्मृति रहेगी। अच्छा।

 

✺   *"ड्रिल :- प्रवृति के बन्धनों से मुक्त रहना।*"

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने कमल आसन पर विराजमान होकर अपने मस्तक पर सफेद मणि के समान चमकते हुए प्रकाश को अनुभव करती हूं... *जैसे जैसे मेरे मस्तक पर यह आत्मिक मणी जगमगाती है... वैसे वैसे मैं कमल आसन पर विराजमान आत्मा अपने चारों ओर एक सफेद प्रकाश रूपी औरे को महसूस करती हूं... मैं इस औरे में अपने आप को सुरक्षित अवस्था में अनुभव करती हूं... जैसे जैसे मैं इस अवस्था की गहराई में जाती हूं... वैसे वैसे ही मैं अपने आप को परमात्मा के और करीब महसूस करती हूं...* मैं उन्हें हर समय अपने साथ लेकर चलने का संकल्प करती हूं... और मैं अपने कर्म में आगे बढ़ने लगती हूं...

 

 _ ➳  अब मैं अपनी दिनचर्या प्रारंभ करती हूं... और हर कर्म में अपने आप को अलौकिक स्थिति में अनुभव करते हुए... और प्रवृत्ति मार्ग में रहते हुए भी मैं अपने आप को बेहद की वृत्ति में अनुभव करने का प्रयास करती हूं... और मैं अब अपने लौकिक परिवार के सभी सदस्यों को देखती हूं... और अनुभव करती हूं... कि यह सभी आत्माएं मेरे परम पिता की संतान हैं... और हम यहां पर परमात्मा द्वारा दिए गए महान कार्य को पूर्ण करने के लिए आए हैं... यह सभी आत्माएं बहुत महान और अलौकिक आत्माएं हैं... यह मेरी पूर्ण सहयोगी आत्माएं हैं... *सभी सदस्यों को मैं बेहद कि वृत्ति में अनुभव करती हूं... और ये अनुभव करती हूं... कि यह सभी आत्माएं शांतिधाम में रहने वाली मेरी प्रिय आत्माएं हैं... इस स्थिति का अनुभव करके मैं अपने आप को हर संबंध रूपी बेडी से आजाद अनुभव करती हूं...*

 

 _ ➳  अब मैं आत्मा अपने आपको बेहद की स्मृति में रखते हुए... इस लौकिक  परिवार का हर कार्य निमित्त भाव से करती जा रही हूं... *मैं इस हलचल भरी दुनिया में भी अपने आप को शांति स्वरूप अवस्था में अनुभव कर रही हूं... और हर कार्य करते हुए मैं अपने आप को ऐसे व्यक्ति के रूप में अनुभव करती हूं... जैसे एक व्यक्ति फांसी पर लटका हुआ हो... अर्थात मैं अपने मन बुद्धि को परमधाम में प्रभु की याद में स्थित रखती हूं... और अपनी इस देह से सभी कर्म करती जा रही हूं...* मेरे इस स्थिति के कारण मेरे आसपास का वातावरण एकदम शांति से भरा हुआ प्रतीत हो रहा है... और मेरे आस पास रहने वाली सभी आत्माएं शांति की शक्ति का अनुभव कर रही है...

 

 _ ➳  अब मैं इस बेहद की वृत्ति को गहराई से अनुभव करते हुए... अपने आपसे यह वादा करती हूं... *कि अब मैं इस लौकिक जीवन में रहते हुए... अपने आपको सदा सभी लौकिक बंधनों से मुक्त करते हुए... उनके प्रति निमित्त भाव का अनुभव करूंगी... चाहे कैसी भी परिस्थिति हो मैं अपनी इस शांति और बेहद की वृत्ति में रहने वाली स्थिति को हलचल में नहीं आने दूंगी... और इन रिश्ते नातों रूपी बंधनों को अपने पुरुषार्थ की बेड़ी नहीं बनने दूंगी...* और अब मैं अपने आप को उसी कमल आसन पर बैठा हुआ और प्रवृत्ति मार्ग के बंधनों से मुक्त अवस्था का अनुभव करती जा रही हूं... और पुरुषार्थ की गति को और भी तीव्रता से आगे ले जा रही हूं...

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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