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 29 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *शुद्ध अहंकार रखा ?*

 

➢➢ *सूक्षमवतन की बातों में ज्यादा इंटरेस्ट तो नहीं रखा?*

 

➢➢ *संगमयुग के महत्व को जान एक का अनगिनत बार रीटर्न प्राप्त किया ?*

 

➢➢ *किसी भी परिस्थिति में ख़ुशी तो नहीं गयी ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *फ़रिश्ता स्थिति डबल लाइट स्थिति है, इस स्थिति में कोई भी कार्य का बोझ नहीं रहता, इसके लिए कर्म करते बीच-बीच में निराकारी और फरिश्ता स्वरूप यह मन की एक्सरसाइज करो।* जैसे ब्रह्मा बाप को साकार रूप में देखा, सदा डबल लाइट रहे, सेवा का भी बोझ नहीं रहा, ऐसे फालो फादर करो तो सहज ही बाप समान बन जायेंगे।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं तख्तनशीन श्रेष्ठ आत्मा हूँ"*

 

  अपने को तख्त-नशीन श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करते हो? आत्मा सदा किस तख्त पर विराजमान है, जानते हो? इसको कौनसा तख्त कहते हैं? अकाल है ना। *आत्मा अकाल है, इसलिए उसके तख्त का नाम भी अकालतख्त है। आत्मा शरीर में सदा भृकुटि के बीच अकालतख्त-नशीन है। तो तख्त नशीन जो होता है उसे राजा कहा जाता है। तख्त पर तो राजा ही बैठेगा ना। तो आप आत्मा भी अकालतख्त-नशीन राजा हो।* अकालतख्त-नशीन आत्माएं बाप के दिल का तख्त और विश्व के राज्य का तख्त भी प्राप्त करती हैं। तो तीनों ही तख्त कायम हैं? तख्त पर बैठना आता है? या घड़ी-घड़ी नीचे आ जाते हो?

 

  *जो पहले अकालतख्त-नशीन हो सकते हैं वही बाप के दिलतख्त-नशीन हो सकते हैं और जो दिलतख्त-नशीन हैं वही विश्व के राज्य के तख्त-नशीन हो सकते हैं। तो पहला आधार है-अकालतख्त। स्वराज्य है तो विश्व-राज्य है। जिसको स्वराज्य करना नहीं आता वह विश्व का राज्य नहीं कर सकता। तो स्वराज्य का तख्त है यह भृकुटि-अकालतख्त। बाप और बच्चे के सम्बन्ध का तख्त है बाप के दिल का तख्त। इन दो तख्त के आधार पर विश्व के राज्य का तख्त।* तो पहले फाउन्डेशन क्या हुआ? अकालतख्त। अकालतख्त-नशीन आत्मा सदा नशे में रहती है। तख्त का नशा तो होगा ना। लेकिन यह रूहानी नशा है। अल्पकाल का नशा नहीं, नुकसान वाला नशा नहीं। यह रूहानी नशा हद के नशों समाप्त कर देता है। हद के नशे तो अनेक प्रकार के हैं और रूहानी नशा एक है। मैं बाप का, बाप मेरा-यह रूहानी नशा है। बाप का बन गया-यह रूहानी नशा है। तो यह रूहानी नशा सदा रहता है? या उतरता-चढ़ता है-कभी ज्यादा चढ़ता, कभी कम चढ़ता?

 

  अगर कोई राजा हो, तख्त भी हो लेकिन तख्त का, राजाई का नशा नहीं हो तो वह राजा बिना नशे के राज्य चला सकेगा? अगर आत्मा रूहानी नशे में नहीं तो स्वराज्य कैसे कर सकेंगे? राज्य में हलचल होगी। *देखो, प्रजा का प्रजा पर राज्य है तो हलचल है ना। अगर आत्मा स्वराज्य के नशे में नहीं, तो प्रजा का प्रजा पर राज्य हो जाता है-यह कर्मेन्द्रियां ही राज्य करती हैं। तो प्रजा का राज्य हुआ ना। उसका नतीजा होगा-हलचल। तो सदा तख्त-नशीन आत्मा का रूहानी नशा रखो।*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  आग में पडा हुआ बीज कभी फल नहीं देता। तो *इस हिसाब-किताब के विस्तार रूपी वृक्ष को लगन की अग्नि में समाप्त करो।* फिर क्या रह जायेगा? देह और देह के सम्बन्ध वा पदार्थ का विस्तार खत्म हो गया तो *बाकी रह जयेगा बिन्दु आत्मा वा बीज आत्मा'* जब ऐसे बिन्दु, बीज स्वरूप बन जाओ तब आवाज से परे बीजरूप बाप के साथ चल सको।

 

✧  इसलिए पूछा कि आवाज से परे जाने के लिए तैयार हो? विस्तार को समाप्त कर दिया है? बीजरूप बाप, बीज स्वरूप आत्माओं को ही ले जायेंगे। बीज स्वरूप बन गये हो? *जो एवररेडी होगा उसको अभी से अलौकिक अनुभूतियाँ होती रहेगी।* क्या होगी?

 

✧  चलते, फिरते, बैठते, बातचीत करते पहली अनुभूति - यह शरीर जो हिसाब-किताब के वृक्ष का मूल तना है जिससे यह शाखायें प्रकट होती हैं, *यह देह और आत्मा रूपी बीज, दोनों ही बिल्कुल अलग हैं।* ऐसे आत्मा न्यारे-पन का चलते-फिरते बारबार अनुभव करेंगे। नॉलेज के हिसाब से नहीं कि आत्मा और शरीर अलग है। लेकिन शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ। यह अलग वस्तु की अनुभूति हो।

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ शुभ चिंतन का आधार हैं शुभ चिंतक बनने का। पहला कदम है स्व-चिंतन। *स्वःचिन्तन अर्थात् जो बापदादा ने 'मैं कौन' की पहेली बताई है उसको सदा स्मृति-स्वरूप में रखना।* जैसे बाप और दादा जो है, जैसा है - वैसा उसको जानना ही यथार्थ जानना है और दोनों को जानना ही जानना है। ऐसे स्व को भी - जो हूँ जैसा हूँ अर्थात् *जो आदि-अनादि श्रेष्ठ स्वरूप हूँ, उस रूप से अपने आपको जानना और उसी स्वचिन्तन में रहना इसको कहा जाता है - 'स्व-चिन्तन'।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- बाप का सही परिचय देकर गीता का भगवान् सिद्ध करना"*

 

_ ➳  *अपने आंगन के सुंदर से... छोटे से... बाग में टहलती हुई मैं आत्मा... काँटो के साथ शान से मुस्कराते खूबसूरत गुलाब के फूलों को देख... मीठे बाबा के संग अपने महकते जीवन के चिंतन में डूबी हुई...* मीठे बाबा के यादों की बाँहों में झूलने लगती हूँ... बाबा के बिना जीवन कितना दुःख भरे काँटो से सना हुआ था... आज देह भान में आये दुःख के सारे काँटे नीचे हो गये हैं... और *रूहानियत से भरी मैं आत्मा... महकता गुलाब बनकर, सब बातों से ऊपर उठकर... शिखर पर सजी हुई... पूरे विश्व को अपने गुणों की सुगंध से... बरबस दीवाना बना रही हूँ...* अपने मन के मीठे जज्बात मीठे बाबा को सुनाने... मैं आत्मा बाबा की यादों में खो जाती हूँ..."

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को ज्ञान धन से विश्व का मालिक सजाते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे सिकीलधे बच्चे... *श्रीकृष्ण और परमात्मा शिव के महान अंतर को समझ... विचार सागर मंथन करो... गीता का भगवान कौन है... शिव हैं या श्रीकृष्ण हैं... मुक्ति... जीवनमुक्ति दाता कौन हैं..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा से पायी ज्ञान धन की दौलत से शहंशाह बनकर कहती हूँ :-* "मीठे दुलारे बाबा मेरे... मैं आत्मा आपकी प्यार भरी छत्रछाया में रह परमात्मा शिव और श्रीकृष्ण के महान अंतर को समझ गयी हूँ... *ज्ञान सागर "शिवबाबा" निराकार हैं... उनकी पधरामणि हुई है, किसी को भी उनकी प्रवेशता का पता नहीं... वे तो कभी बच्चा बने ही नहीं... जबकि श्रीकृष्ण ने माता के गर्भ से जन्म लिया... वह भी रात्रि के समय... और शिवबाबा... बूढ़े तन में प्रवेश कर... कल्प के आदि-मध्य-अंत का ज्ञान देते हैं... वह एक सेकेंड में जीवनमुक्ति में भेज देते हैं... घर बैठे ही दिव्य दृष्टि दे देते हैं... साक्षात्कार करा देते हैं..."*

 

  *प्यारे बाबा ने मुझ आत्मा का रूहानी श्रृंगार करते हुए कहा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... *शिवपिता के जन्म की कोई तिथि नही, श्रीकृष्ण की तो तिथि तारीख है... शिवभगवान पिता बनकर, आप बच्चों के लिये ही तो धरा पर उतर आया है... अपनी सारी जागीर आपको ही तो देने आया है...*  सुखों की अमीरी में, सदा की खुशियों से, झोली भरने आया है... ऐसे प्यारे पिता की यादों में सदा के लिये... साहूकार बनकर मुस्कराओ... मीठे बाबा के प्यार की छाँव में, सहज ही बाप समान बन जाओ..."

 

_ ➳  *मैं आत्मा मीठे बाबा के मीठे प्यार में पुलकित होकर झूमते हुए कहती हूँ :-* "मीठे मीठे बाबा मेरे... *आपने मुझ आत्मा के जीवन मे आकर, मुझे महान भाग्यशाली बना दिया है...* मैं आत्मा देह भान में आकर, गुणहीन, शक्तिहीन हो गयी थी... प्यारे बाबा... आपने मुझे पुनः मेरी खोयी हुई अमीरी से भर दिया है..."

 

  *मीठे बाबा ने मुझ आत्मा को "परमात्मा शिव" और श्रीकृष्ण के भेद को स्पष्ट करते हुए कहा :-* "मेरे प्यारे फूल बच्चे... शिवपिता... ज्ञान सागर का नाम तो कभी बदलता ही नहीं... उनका नाम तो "सदाशिव" है... बाबा गीता के भगवान के बारे में बताते हुए कहते... *कृष्ण गीता कैसे सुना सकता है... वह तो बच्चा है... गर्भ से आया है... रात और दिन तो ब्रह्मा का गाया जाता है, ब्रह्मा का दिन है... "कृष्ण"... और ब्रह्मा की रात है... "ब्रह्मा"... ब्रह्मा ही फिर सो कृष्ण बनता है... कृष्ण की तो 8 पीढ़ी चलती हैं... छोटेपन में उनको कृष्ण कहते हैं... फिर स्वयम्वर बाद श्रीकृष्ण ही "श्री नारायण"... बनते हैं..."*

 

_ ➳  *मैं आत्मा प्यारे बाबा को बड़े ही प्यार से निहारते हुए कहती हूँ :-* "मीठे जादूगर बाबा मेरे... आपने अपनी प्यार भरी गोद में मुझ आत्मा को बिठाकर... देवताई सौन्दर्य से निखार दिया है... *मैं आत्मा आपकी यादों के हाथ को पकड़कर, दुःखो के जंगल से निकल... सुखों की पगडण्डी पर आ गयी हूँ...* मेरा जीवन ईश्वरीय खुशियों से महक उठा है... मीठे बाबा से प्यार की अथाह धन दौलत को लेकर मैं आत्मा... स्थूल देह में आ गयी..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- सदा इसी नशे वा खुशी में रहना है कि हमको भगवान पढ़ाते हैं*

 

_ ➳  स्वयं भगवान ऊंचे ते ऊंचे धाम से मुझे पढ़ाने आते हैं यह स्मृति एक रूहानी नशे से मुझ आत्मा को भरपूर कर देती है और *अपने परमशिक्षक से भविष्य 21 जन्मों के लिए श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने वाले अविनाशी ज्ञान रत्नो को धारण करने के लिए अपने गॉडली स्टूडेंट स्वरूप में स्थित होकर, उनकी याद में मैं तेज - तेज कदमो से चलते हुए पहुँच जाती हूँ अपने ईश्वरीय विश्वविद्यालय में और जा कर क्लास रूम में बैठ जाती हूँ*। मन ही मन अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य के बारे में मैं विचार करती हूँ कि कितनी पदमापदम सौभाग्यशाली हूँ मैं आत्मा जो स्वयं भगवान मुझे पढ़ाने के लिए अपने ऊंचे ते ऊंचे धाम को छोड़ मेरे पास आते हैं। अपने सर्वश्रेष्ठ भाग्य की स्मृति में खोई, अपने भाग्य का गुणगान करते - करते मैं महसूस करती हूँ जैसे मेरे परमशिक्षक शिव बाबा मेरे सामने आकर उपस्थित हो गए हैं।

 

_ ➳  देख रही हूँ मैं अपने सामने संदली पर बैठे सम्पूर्ण अव्यक्त फ़रिश्ता स्वरूप में अपने प्यारे बापदादा को जो शिक्षक के रूप में मेरे सामने बैठे मुझे निहार रहें हैं। *अपने नयनो में असीम स्नेह को समाये अपनी मीठी दृष्टि से मुझे निहारते हुए बापदादा मन्द - मन्द मुस्करा रहें हैं। अपने परमशिक्षक के इस मनभावन, सुन्दर सलौने स्वरूप को अपनी आंखों में बसाकर मैं एकटक उन्हें निहारती जा रही हूँ*। बाबा की मीठी दृष्टि एक रूहानी नशे से मुझ आत्मा को भरपूर कर रही है। बापदादा के मुख कमल से निकल रहे एक - एक महावाक्य को चात्रिक बन मैं आत्मा सुन रही हूँ और अपनी बुद्धि में उसे धारण करती जा रही हूँ। *बाबा का एक - एक महावाक्य गहराई तक मेरे अंदर समाता जा रहा है। अपने शिव भोलानाथ की सच्ची पार्वती बन उनके मुख कमल से उच्चारित अमरकथा को मैं बड़े प्यार से और बड़े ध्यान से सुन रही हूँ*।

 

_ ➳  अपनी बुद्धि रूपी झोली को अपने परमशिक्षक शिव बाबा के अविनाशी ज्ञान रत्नों से भरपूर करके, मन ही मन मैं स्वयं से प्रतिज्ञा करती हूँ कि हर रोज़ भगवान मुझे जो पढ़ाई पढ़ाने के लिए आते हैं उसे अच्छी रीति पढ़ कर, अपने जीवन मे धारण करके, भविष्य जन्म जन्मांतर के लिए अपनी श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने का पुरुषार्थ मैं अवश्य करूँगी । *अपने आप से यह प्रतिज्ञा करके अपने प्यारे बापदादा की और मैं जैसे ही नजर घुमाती हूँ, मैं महसूस करती हूँ जैसे बाबा का वरदानी हाथ मेरे सिर के ऊपर है और बाबा के वरदानी हस्तों से शक्तियों की अनन्त धारायें निकल कर मेरे अंदर समाकर, मेरी हर प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल मेरे अंदर भरती जा रही हैं*। रंग बिरंगी शक्तियों की सहस्त्रो किरणों की बरसात मेरे ऊपर हो रही है जो मुझे बहुत ही शक्तिशाली बना रही हैं। *शक्तियों की ये अनन्त किरणे मुझे शक्तिशाली बनाने के साथ - साथ डबल लाइट स्थिति में स्थित करती जा रही है*।

 

_ ➳  स्थूल देह और सूक्ष्म देह इन दोनों के भान से मुक्त एक अति सुन्दर निराकारी स्थिति में मैं स्थित होकर अब अपने आपको देख रही हूँ एक अति सूक्ष्म बिंदु के रूप में जो एक प्रकाशपुंज के समान चमकता हुआ दिखाई दे रहा हैं। *कुछ क्षणों के लिए मैं अपने इस स्वरूप में खो जाती हूँ और अपने स्व स्वरूप में टिक कर, अपने अंदर समाये गुणों और शक्तियों के अनुभव का आनन्द लेने लगती हूँ*। यह आत्म स्मृति बहुत गहरी फीलिंग का मुझे अनुभव करवाकर तृप्त कर देती हैं। अपने इस निराकार स्वरूप में स्थित अब मैं देख रही हूँ अपने सामने अपने प्यारे शिव बाबा को भी उनके निराकार बिंदु स्वरूप में। *महाज्योति के रूप में अनन्त शक्तियों की किरणों को बिखेरते हुए मेरे प्यारे पिता मेरे सम्मुख है। उनकी किरणों रूपी बाहों में समाकर अब मैं आत्मा उनके साथ उनके वतन की ओर जा रही हूँ*।

 

_ ➳  अपनी किरणों रूपी बाहों में मुझ बिंदु आत्मा को समाये मेरे मीठे बाबा अब मुझे साकारी दुनिया से निकाल, आकारी दुनिया को पार करके अपनी निराकारी दुनिया मे ले आये हैं। अपने इस मूलवतन घर में अब मैं ज्ञान सागर अपने प्यारे पिता के सामने बैठी हूँ। *उनसे आ रही सर्वशक्तियों की सतरंगी किरणे मुझ पर बरस रही हैं। ज्ञान सागर मेरे प्यारे पिता के ज्ञान की रिमझिम फुहारों का शीतल स्पर्श मेरी बुद्धि को स्वच्छ बना रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे ज्ञान की शक्तिशाली किरणो के रूप में ज्ञान की बरसात मेरे ऊपर करके, बाबा मुझे समपूर्ण ज्ञानवान बना रहे हैं*। मास्टर नॉलेजफुल बन कर, ज्ञान की शक्ति से भरपूर होकर अब मैं वापिस साकारी दुनिया में लौट रही हूँ।

 

_ ➳  अपने साकार तन में भृकुटि के अकालतख्त पर अब मैं फिर से विराजमान हूँ और अपने गॉडली स्टूडेंट स्वरुप को सदा स्मृति में रखते हुए अब मैं हर पल इस खुशी में रहती हूँ कि ऊंचे ते ऊंचे धाम से भगवान मुझे पढ़ाने आते हैं। *यह स्मृति मुझे अपने परमशिक्षक शिव पिता की शिक्षाओं को जीवन मे धारण करने का बल प्रदान करने के साथ - साथ मेरे पुरुषार्थी जीवन को भी उमंग उत्साह से सदा भरपूर रखती है*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं संगमयुग के महत्व को जानने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं एक का अनगिनत बार रिटर्न् प्राप्त करने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं सर्व प्राप्ति सम्पन्न आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा किसी भी परिस्थिति में सदैव खुश रहती हूँ  ।*

   *मैं हर परिस्थिति में खुश रहने वाली आत्मा हूँ  ।*

   *मैं आत्मा खुशी स्वरूप हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

 अव्यक्त बापदादा :-

 

 _ ➳  तीनों ही विशेषता सामने रख स्वयं से पूछो कि मैं कौन-सा त्यागीहूँकहाँ तक पहुँचे हैंकितनी पौड़ियाँ चढ़ करके बाप समान की मंजिल पर पहुँचे हैं? फुल स्टैप तक पहुँचे हो या अभी कुछ स्टैप तक पहुँचे होया अभी कुछ स्टैप रह गये हैंत्याग की भी स्टैप सुनाई ना। तो किस स्टैप तक पहुँचे होसात कोर्स में से कितने कोर्स किये हैंसप्ताह पाठ का लास्ट में भोग पड़ता है - तो बापदादा भी अभी भोग डालेआप लोग तो हर गुरूवार को भोग लगाते हो लेकिन बापदादा तो महाभोग करेंगे ना। जैसे सन्देशियाँ ऊपर वतन में भोग ले जाती हैं - तो बापदादा भी कहाँ ले जायेंगे! *पहले स्वयं को भोग में समर्पण करो। भोग भी बाप के आगे समर्पण करते हो ना। अभी स्वयं को सदा प्रत्यक्ष फलस्वरूप बनाकर समर्पण करो। तब महाभोग होगा। अपने आपको सम्पन्न बनाकर आफर करो।* सिर्फ स्थूल भोग की आफर नहीं करो। सम्पन्न आत्मा बन स्वयं को आफर करो। समझा - बाकी क्या करना है वह समझ में आया?

 

✺   *"ड्रिल :- स्वयं को भोग में समर्पण करना।"*

 

 _ ➳  मैं आत्मा अपने सेंटर पर अपनी प्यारी दीदी से मुरली सुन रही हूं... और मुरली सुनते समय मैं पूरी तरह से दीदी के हर एक शब्द को गहराई से अनुभव कर रही हूं... और मुरली के हर शब्द से मैं एक अलौकिक चित्र बनाकर उसमें भ्रमण कर रही हूं... और अपने परमपिता को कंबाइंड स्थिति मैं फील कर रही हूं... जब मुरली समाप्त होती है... तो मुझे याद आता है... कि आज वीरवार है... और *हमारी दीदी हमारे प्यारे बाबा को अनेक तरह के व्यंजनों का भोग लगाना आरंभ कर रहे हैं... हम सभी क्लास में बैठी आत्माएं योग प्रारंभ करती हैं... तभी मैं अपने आपको मन बुद्धि से अपनी प्यारी दीदी के साथ सूक्ष्म वतन में अनुभव करती हूं...*

 

 _ ➳  और मैं अपने आप को कुछ समय बाद बापदादा के सामने सूक्ष्म वतन में अनुभव करती हूं... मैं देखती हूं कि हमारी दीदी फरिश्ता स्वरूप में बाबा के सामने खड़े हैं... और *मैं भोजन की थाली लेकर उनके पास खड़ी हूं... जैसे जैसे बाबा को भोग लगना प्रारंभ होता है... तो मुझे आभास होता है कि बाबा कह रहे हो कि यह पकवान मुझे कुछ समय के लिए खुश कर सकते हैं... और इसका कुछ ही समय के लिए मैं आनंद ले सकता हूं... मैं कुछ ऐसा भोजन चाहता हूं... जिससे मेरी खुशी अपरम्पार हो जाए...* बाबा की बात सुनकर मैं कुछ सोच में पड़ जाती हूँ... और बापदादा से पूछती हूँ... बाबा आप हमें बताएं कि आपको कैसा भोजन ज्यादा प्रिय होगा? बाबा मुस्कुराते हैं... बाबा मुस्कुराते हुए और मुझे अपनी दृष्टि से निहाल करते हुए इशारे ही इशारों में मुझे समझाने लगते हैं...

 

 _ ➳  और मुझे बाबा की दृष्टि से यह एहसास होता है... कि मानो *बाबा मुझे कह रहे हो कि जब मेरे बच्चे अपने तीव्र पुरुषार्थ से और श्रीमत का पालन करते हुए... जो अभी कच्चे फल की भांति है... अपनी उस अवस्था को परिपक्व करते हुए... अपने आपको मेरे पास उपस्थित करेंगे... तो मैं उन्हें पके हुए फल की भांति स्वीकार करके अपनी इस भूख से तृप्त हो जाऊंगा... और बच्चों के इस परिपक्व भाव के कारण वह हमेशा मेरे दिल के पास रहेंगे...* और बाबा इसका मुझे आभास बहुत गहराई से कराने लगते हैं... मैं भी उनकी शक्तिशाली किरणों द्वारा दृष्टि द्वारा अपने अंदर यह अनुभव करती हूं... कि मैं जो अभी पुरुषार्थ कर रही हूं उसको आगे बढ़ाते हुए पके हुए फल की भांति परिपक्व स्थिति में आने का पूर्ण पुरुषार्थ करूंगी... और अपने इसी संकल्प को लेते हुए मैं दीदी के साथ वहां पर फरिश्ता स्वरुप में नीचे आ जाती हूं...

 

 _ ➳  जब मैं अपने आप को फिर से स्थूल वतन में सेंटर पर अपने इस शरीर में अनुभव करती हूं... और मुझे यहां आकर तो बापदादा की कही हर बात याद आती है... और मैं मन ही मन बापदादा से और अपने से वादा कर लेती हूं... और मैं सेंटर से मुरली सुनकर परमात्मा की याद में अपने आपको अनुभव करते हुए... वापस अपने इस लौकिक परिवार में आ जाती हूं... जब मैं रास्ते से गुजर कर अपने इस गृहस्थ आश्रम में आगमन करती हूं... *मैं ये संकल्प करती हूँ की उन सभी पुराने संस्कारों को रोज अपने बाबा को अर्पण करती चलूंगी... और साथ ही साथ स्वयं को पूर्ण रुप से पुरुषार्थ की परिपक्व अवस्था में... पके हुए फल की भांति बापदादा को अर्पण कर दूंगी... अपने इस संकल्प से मैं अपनी स्थिति को महान बनाते हुए... बाबा की याद में हर कर्म करना प्रारंभ कर देती हूँ...* इस दुनिया में रहते हुए... मैं स्वयं को परमात्मा की याद में समाने का अभ्यास करती चली जाती हूँ... 

 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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