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 31 / 07 / 20  की  मुरली  से  चार्ट  

       TOTAL MARKS:- 100 

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∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

 

➢➢ *पवित्रता की चलन अपनाई ?*

 

➢➢ *आपस में रूहानी कनेक्शन रखा ?*

 

➢➢ *ब्रह्म मुहूर्त के समय वरदान लिया और दिया ?*

 

➢➢ *क्रोधी आत्मा को भी स्नेह दिया ?*

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  ✰ *अव्यक्त पालना का रिटर्न*

         ❂ *तपस्वी जीवन*

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✧  *हर बात में, वृत्ति में, दृष्टि में, कर्म में न्यारापन अनुभव हो, यह बोल रहा है लेकिन न्यारा-न्यारा, प्यारा-प्यारा लगता है। आत्मिक प्यारा।* नम्बरवन ब्रह्मा की आत्मा के साथ आप सभी को भी फरिश्ता बन परमधाम में चलना है, तो मन की एकाग्रता पर अटेंशन दो, ऑर्डर से मन को चलाओ।

 

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

 

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*अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए*

             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान*

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   *"मैं श्रेष्ठ स्वमानधारी आत्मा हूँ"*

 

  स्वयं को श्रेष्ठ स्वमानधारी आत्मा अनुभव करते हो? *जितना स्वमान में स्थित होते हो, तो 'स्वमान' देहभान को भुला देता है। आधा कल्प देहभान में रहे और देह-भान के कारण अल्पकाल के मान प्राप्त करने के भिखारी रहे। अभी बाप ने आकर स्वमानधारी बना दिया।* स्वमान में स्थित रहते हो या कभी हद के मान की इच्छा रखते हो? जो स्वमान में रहता उसे हद के मान प्राप्त करने की कभी इच्छा नहीं होती, इच्छा मात्रम् अविद्या हो जाते। एक स्वमान में सर्व हद की इच्छायें समा जाती हैं, मांगने की आवश्यकता नहीं रहती। क्योंकि यह हद की इच्छायें कभी भी पूर्ण नहीं होती हैं। एक हद की इच्छा अनेक इच्छा को उत्पन्न करती है, सम्पन्न नहीं करती लेकिन पैदा करती है।

 

  *स्वमान सर्व इच्छाओंको सहज ही सम्पन्न कर देता है। तो जब बाप सदा के लिए स्वमान देता है, तो कभी-कभी क्यों लेवें! स्वमानधारी सदा बेफिक्र बादशाह होता है, सर्व प्राप्ति-स्वरूप होता है। उसे अप्राप्ति की अविद्या होती है। तो सदा स्वमानधारी आत्मा हूँ-यह याद रखो।* स्वमानधारी सदा बाप के दिलतख्त-नशीन होता है क्योंकि बेफिक्र बादशाह है! बादशाह का जीवन कितना श्रेष्ठ है! दुनिया वालों के जीवन में कितनी फिक्र रहती हैं-उठना तो भी फिक्र, सोयेंगे तो भी फिक्र। और आप सदा बेफिक्र हो। पाण्डवों को फिक्र रहता है? कल व्यापार ठीक होगा या नहीं, कल देश में शान्ति होगी या अशान्ति........-यह फिक्र रहता है?कल बच्चे अच्छी तरह से सम्भाल सकोगे या नहीं-यह फिक्र माताओंको रहता है?

 

  दुनिया में कुछ भी हो लेकिन अशान्ति के वायुमण्डल में आप तो शान्तस्वरूप आत्मायें ता औरों को भी शान्ति देने वाले। या अशान्ति होगी तो आप भी घबरा जायेंगे? आपके घर के बाहर बहुत हंगामा हो रहा हो, तो आप उस समय क्या करते हो? याद में बैठ जाते हो ना! बाप को याद करके शान्ति लेकर औरों को देना-यह सेवा करो। क्योंकि जो अच्छी चीज अपने पास है और दूसरों को उसकी आवश्यकता है, तो देनी चाहिए ना! *तो अशान्ति के समय पर मास्टर शान्ति-दाता बन औरों को भी शान्ति दो, घबराओ नहीं। क्योंकि जानते हो कि-जो हो रहा है वो भी अच्छा और जो होना है वह और अच्छा!*

 

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

 

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति*

*अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं*

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✧  बापदादा इस साकारी देह और दुनिया में आते हैं, सभी को इस देह और दुनिया से दूर ले जाने के लिए *दूर-देश वासी सभी को दूर-देश निवासी बनाने के लिए आते हैं।* दूर-देश में यह देह नहीं चलेगी। पावन आत्मा अपने देश में बाप के साथ-साथ चलेगी।

 

✧  *तो चलने के लिए तैयार हो गये हो* वा अभी तक कुछ समेटने के लिए रह गया है? जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हो तो विस्तार को समेट परिवर्तन करते हो। तो दूर-देश वा अपने स्वीट होम में जाने के लिए तैयारी करनी पडेगी? *सर्व विस्तार को बिन्दी में समाना पडे।* इतनी समाने की शक्ति, समेटने की शक्ति धारण कर ली है?

 

 

✧  समय प्रमाण बापदादा डायरेक्शन दे कि *सेकण्ड में अब साथ चलो तो सेकण्ड में, विस्तार को समा सकेंगे?* शरीर की प्रवृति, लौकिक प्रवृति, सेवा की प्रवृति, अपने रहे हुए कमजोरी के संकल्प की और संस्कारों की प्रवृत्ति, *सर्व प्रकार की प्रवृत्तियों से न्यारे और बाप के साथ चलने वाले प्यारे बन सकते हो?* वा कोई प्रवृति अपने तरफ आकर्षित करेगी?

 

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

 

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति*

*अव्यक्त बापदादा के इशारे*

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〰✧ सदा इस स्मृति में डबल लाईट रहो कि मैं हूँ ही बिन्दु। बिन्दु में कोई बोझ नही। यह स्मृति-स्वरूप सदा आगे बढ़ाता रहेगा। *आँखों में बीच में देखो तो बिन्दु ही है। बिन्दु ही देखता है। बिन्दु न हो तो आँख होते भी देख नहीं सकते। तो सदा इसी स्वरूप को स्मृति में रख उड़ती कला का अनुभव करो।*

 

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

 

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

 

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- वंडरफुल पाठशाला में पढ़ना"*

 

_ ➳  *ये रूहानी पाठशाला  जहाँ देवत्व जन्म ले रहा है*... रेखाओं के त्रिकोण नही, हस्त रेखाओं में जहाँ सतयुगी भाग्य का वर्सा लिखा जा रहा है... *सतयुगी दुनिया की नींव ये रूहानी पाठ- शाला... ज्ञानसागर लुटा रहा जहाँ, भर भर ज्ञानमधु का प्याला*... *ज्ञान सागर की लहरों मे डूबती उतरती मैं आत्मा पढाने वाले की मुरीद हुई*... *निहार रही हूँ एकटक उसे*... *जैसे चातक पक्षी एकटक निहारता है बादलों की ओर*... परमधाम से आकर सामने बैठा है मेरा सतगुरू और मैं रूहानी शागिर्द उसकी, और उनका एक एक महावाक्य अन्तर की गहराईयों में उतारता हुआ...

 

  *रूहानी नयनों से रूह को स्नेह परम शान्ति और रूहानी स्नेह का अमृत पिलाते मेरे सच्चे सच्चे रूहानी सदगुरू बोलें:-* "मीठी बच्ची... *मनुष्य से देवता बनाने वाले इस ज्ञानामृत की सच्ची सच्ची हकदार, कोटो में कोई, कोई में भी कोई, आप बच्ची संगम पर प्रत्यक्ष हुए इस गुप्त ज्ञान अमृत का महत्व समझती हो ना?* इस वंडर फुल पाठशाला में पढने का अपना परम लक्ष्य याद है आप बच्ची को?... *क्या आपको मालूम है मेरे परमधाम को छोडकर इस पतित दुनिया में आने का लक्ष्य?...*"

 

_ ➳  *सच्चे सच्चे सदगुरू की नजरों से निहाल, नयनों में उनकी सम्पूर्ण छवि को उतारती हुई मैं आत्मा बोली:-* "मीठा मीठा कहकर मुझे मीठे बनाने वाले प्यारे सदगुरू...  *आपने इसी रूहानी पाठशाला में, मुझे खुद की पहचान दिलाई है... मेरे भाग्य की लेखनी आपने मेरे ही हाथों में पकडा दी, आपके इस पतित दुनिया में आने का वो पावन सा मकसद मेरी ही खुशियों के इर्द गिर्द ही तो घूमता है... निज रूप को भूली आत्माए विषय वासनाओं के सागर में गोते लगाती हुई अपने स्वरूप को  पहचानने के लिए तडप रही थी... और फिर... आप आए, साथ में बहिश्त भी हथेली पर ले आए*... आपने नर से नारायण बनने का दिव्य लक्ष्य दिया और उन दिव्य लक्षणों से आप हर रोज मुझ आत्मा को संवार रहे है..."

 

 ❉  *कदम कदम पर मेरे मददगार, मुझे स्वयं ही आगे बढा शाबाशियों से नवाज़ने वाले मेरे रूहानी सतगुरू बोले:-* "स्वांसो स्वांस मुझे और स्वर्ग को याद कर सेवा करने वाली मेरी मददगार बच्ची... आप इस वन्डर फुल पाठशाला की खूबियाँ सबको बताओं, *आप रूहानी मैसेन्जर बच्ची हर आत्मा को खुद के समान भाग्यशाली बनाओं...* इन गुणों का दिव्य आईना बनकर हर एक को ये गुण धारण कराओं... *अपने चेहरे और चलन से विश्व की आत्माओं को अपने सच्चे सच्चे सदगुरू का चेहरा दिखाओं...*"

 

 ➳ _ ➳  *ज्ञान सूर्य शिव सदगुरू के  शीतल ज्ञान झरनों में सराबोर मैं आत्मा ज्ञान रत्नों की खानियाँ उँडेलने वाले सतगुरू से बोली:-* "स्वदर्शन चक्रधारी बनाने वाले मेरे रूहानी सतगुरू... *ये वंडर पाठशाला अब प्रत्यक्ष हो रही है... ज्ञान सागर से ज्ञान गंगाए निकलकर इस धरती के हर कोने में फैल रही है बाबा*... हर आत्मा बच्ची, ज्ञानगंगा और गऊमुख बनकर आपको प्रत्यक्ष कर रही है, *मैं आत्मा भी अंग अंग में ज्ञान रत्नों को सजाकर आपको प्रत्यक्ष करने निकली हूँ..."*      

 

  ❉  *ज्ञानामृत पिला पतितों को पावन बनाने वाले बापदादा बोले:-* "प्यारी बच्ची... मुँझारें में भटकती आत्माओं को अब सोझंरे में लाओं, *तीर्थ, व्रत, उपवास करती आत्माओं को ज्ञान सागर में डुबकियाँ लगवा पावन बनाने इस पाठशाला तक लाओ... परमधाम से आता है निराकार पढाने अब ये संदेश मनसा सेवा से हर रूह तक पहुँचाओ..."*

 

_ ➳  *विश्व का मालिक बनाने वाले सच्चे सच्चे सौदागर बाप से मैं 21 जन्मों के लिए अखुट खजानों की मालिक आत्मा बोली:-* "मीठे बाबा... मेरे इस जीवन को आपने पारसमणि बनाया है... अब वो देखो! वो सैकडों आत्माए जो मुझ पारसमणि आत्मा के सकंल्पों को छूते ही स्वयं अपना जीवन हीरे तुल्य बना रही है... *आपकी ये बच्ची चलती फिरती रूहानी पाठशाला बन रही है बाबा ! और दूसरों को भी आप समान बना रही है...* और बापदादा मेरे सर पर वरदानों की बारिश करते मुझे सारी सूक्ष्म शक्तियाँ विल कर रहे है..."

 

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)

( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

 

✺   *"ड्रिल :- पवित्रता की चलन अपनानी है*"

 

_ ➳  अपने इस अंतिम मरजीवा ब्राह्मण जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्राप्तियों को एकांत में बैठ मैं याद कर रही हूँ और *स्वयं को स्मृति दिला रही हूँ कि मेरा ये अखुट प्राप्तियों से सम्पन्न जीवन मेरे शिव पिता की देन है और अपने शिव पिता की इस देन का रिटर्न यही है कि अपने इस जन्म को मैं अपने शिव पिता पर सम्पूर्ण रीति कुर्बान कर दूँ और अपने शिव पिता के फरमान पर पूरी रीति चल, पास्ट सो पास्ट कर, इस अंतिम जन्म में उन्हें पवित्रता की मदद दे कर उनके विश्व परिवर्तन के कार्य मे उनकी सहयोगी बन जाऊँ*।

 

_ ➳  स्वयं को यह स्मृति दिलाते, अपने जीवन मे सम्पूर्ण पवित्रता को धारण करने की स्वयं से दृढ़ प्रतिज्ञा कर, अपने अंदर पवित्रता का बल जमा करने के लिए मैं अपने अनादि परम पवित्र स्वरुप को स्मृति में लाकर, पवित्रता के सागर अपने शिव पिता की याद में अपने मन और बुद्धि को स्थिर करती हूँ। *अब मैं देख रही हूँ अपने प्रकाशमय दिव्य ज्योति बिंदु स्वरूप को जो इस देह में भृकुटि की कुटिया में विराजमान हो कर चमक रही है और ऊपर परमधाम से पवित्रता के सागर शिव पिता की पवित्रता की किरणें सफेद प्रकाश की एक तेज धारा के रूप में सीधी मुझ आत्मा पर पड़ रही है और पवित्रता की शक्ति से मुझे भरपूर कर रही हूँ*।

 

_ ➳  स्वयं को मैं एकदम हल्का अनुभव कर रही हूँ और महसूस कर रही हूँ जैसे मेरे शिव पिता की पवित्रता की शक्ति मुझे ऊपर अपनी और खींच रही है। *परमधाम से आ रही अपने शिव पिता की पवित्रता की शक्ति की श्वेत धारा से बंधी मैं आत्मा अब देह के बंधन से मुक्त हो कर ऊपर की ओर उड़ रही हूँ*। नीले आकाश को पार करके, श्वेत चांदनी के प्रकाश से प्रकाशित दिव्य अलौकिक लोक सूक्ष्म वतन से होती हुई अब मैं पवित्रता के सागर, पतित पावन अपने शिव परम पिता परमात्मा के पावन लोक परमधाम में प्रवेश करती हूँ और जा कर उनके सम्मुख बैठ जाती हूँ।

 

_ ➳  देख रही हूँ अब मैं स्वयं को पतित पावन अपने प्यारे शिव बाबा की पवित्रता की शक्ति की अनन्त किरणो की छत्रछाया के नीचे। *अपनी पवित्र किरणों की फुहारों से बाबा मुझ आत्मा के ऊपर चढ़ी विकारों की मैल को धो कर मुझे शुद्ध, पवित्र बना रहे हैं*। पवित्रता की शक्तिशाली किरणों से मैं स्वयं को भरपूर अनुभव कर रही हैं। विकारों की कट उतरने से मेरा स्वरूप अति उज्ज्वल, चमकदार बन गया है और पवित्रता का एक शक्तिशाली कार्ब मेरे चारों और निर्मित हो गया है। *पवित्रता के इस शक्तिशाली कार्ब के साथ अब मैं आत्मा परमधाम से वापिस नीचे लौट रही हूँ और अपने साकारी ब्राह्मण तन में प्रवेश कर रही हूँ*।

 

_ ➳  अपने साकारी ब्राह्मण तन में अब मैं विराजमान हूँ। मेरे चारों और निर्मित पवित्रता का कार्ब एक अलौकिक रूहानी शक्ति में परिवर्तित हो कर इस अंतिम जन्म में मुझे मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्र बनने का बल दे रहा है। *"ब्राह्मण जीवन की विशेषता ही पवित्रता है" इस बात को सदा स्मृति में रख ब्रह्मचारी बनने के साथ - साथ ब्रह्माचारी अर्थात ब्रह्मा बाप के आचरण पर चल, सम्पूर्ण पवित्रता को जीवन मे धारण करने के पुरुषार्थ पर अब मैं हर समय अटेंशन दे रही हूँ*।

 

_ ➳  "पवित्रता ही सुख शांति की जननी है" इसी सुख शांति के प्राप्ति स्वरुप के आधार पर मनसा पवित्रता को चेक करते हुए, *अपनी मनसा को सम्पूर्ण पवित्र रखने का अटेंशन देकर, सुख शांति स्वरूप का अनुभव करते हुए मैं औरों को भी सुख, शांति की प्राप्ति का अनुभव करवाकर उन्हें भी पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा दे रही हूँ और इस अंतिम जन्म में बाबा को पवित्रता की मदद दे कर उनके अथाह स्नेह का थोड़ा सा रिटर्न देने का प्रयास कर रही हूँ*।

 

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

 

   *मैं ब्रह्म मुहूर्त के समय वरदान लेने और दान देने वाली आत्मा हूँ।*

   *मैं बाप समान वरदानी आत्मा हूँ।*

   *मैं महादानी आत्मा हूँ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)

( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

 

   *मैं आत्मा क्रोधी को भी शांत कर देती हूँ  ।*

   *मैं आत्मा सर्व को स्नेह देती हूँ  ।*

   *मैं स्नेही और शांत स्वरूप आत्मा हूँ  ।*

 

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?

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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)

( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳  *वर्तमान समय सेवा की रिजल्ट में क्वान्टिटी बहुत अच्छी है लेकिन अब उस क्वान्टिटी में क्वालिटीज भरो। क्वान्टिटी की भी स्थापना के कार्य में आवश्यकता है।* लेकिन वृक्ष के पत्तों का विस्तार हो और फल न हो तो क्या पसन्द करेंगेपत्ते भी हो और फल भी हों या सिर्फ पत्ते होंपत्ते वृक्ष का श्रृंगार हैं और फल सदाकाल के जीवन का सोर्स हैं।

✺   *"ड्रिल :- सेवा में क्वान्टिटी के साथ साथ क्वालिटी पर भी अटेंशन देना।"*

➳ _ ➳  मैं आत्मा परमात्मा को याद करते हुए अपने मन बुद्धि से एक बुलबुले के अंदर अपने आप को इमर्ज करती हूं... और मैं अनुभव करती हूँ कि मैं उस बुलबुले में बैठी हूं... और उड़ती जा रही हूं... *खुले आसमान में उड़ते हुए मैं अपने आपको इस दुनिया में सबसे अद्भुत अनुभव करती हूं... मैं अनुभव करती हूँ... कि उड़ने की शक्ति परमात्मा ने केवल मुझे ही दी है... मैं आत्मा यह सोचते हुए अपने आप को उस बुलबुले की सहायता से और भी ऊंची अवस्था में महसूस करती हूं...* और कुछ समय बाद मैं अपनी मन बुद्धि से पहुंच जाती हूं अपने घर परमधाम... वहाँ पहुंचकर मैं देखती हूं कि वहां का वातावरण इस इस स्थूल वतन से बिल्कुल ही न्यारा है...

➳ _ ➳  जैसे जैसे मैं परमधाम में समय व्यतीत करती हूं... मुझे आभास होता है कि उस लाल सुनहरे प्रकाश के बीच मैं बुलबुले के आकार की चमकती हुई मणि के समान प्रतीत हो रही हूं... और मैं अपने सामने परमात्मा को अनुभव करती हूँ... जिनसे अनेक रंग बिरंगी किरणें निकल रही है... और मुझमें समाती जा रही है... *जैसे जैसे वह शक्तिशाली किरणें मुझमें प्रवेश करने लगती है... वैसे वैसे ही मैं फिर से एक बुलबुले के रूप में परिवर्तित होती जा रही हूं... और मुझे ये आभास होता है कि परमात्मा मुझे अपनी शक्तिशाली किरणों से भर रहे हैं...* और इन किरणों से अपने आप को भरपूर कर मैं अब बन जाती हूँ एक शक्तिशाली बुलबुला...

➳ _ ➳  और मैं आत्मा अपनी मन बुद्धि से बुलबुले की आकृति में धीरे-धीरे नीचे उतरती जाती हूं... जैसे जैसे मैं नीचे उतरते जाती हूं... मैं प्रकृति के पांचो तत्वों को अपनी पॉजिटिव किरणों से पवित्र बनाती जा रही हूं... और मैं यह फील करती हूं... कि *मुझ आत्मा रूपी बुलबुले से यह पवित्र किरणें निकलकर प्रकृति के पांचो तत्वों को पवित्र बना रही है... और मैं उनको पवित्र बनते हुए अनुभव कर रही हूं...* और जैसे ही मैं आत्मा इस धरा पर आती हूं... तो मैं अपने आप को इस कल्पवृक्ष की जड़ों में स्थित कर लेती हूं... मैं अपनी शक्तिशाली किरणों से इस पूरी सृष्टि को शांति की किरणें देती जा रही हूँ... और जैसे-जैसे मैं अपनी शांति की किरणें सारे कल्पवृक्ष में फैलाती जा रही हूं... वैसे ही मैं अनुभव करती हूँ... कि यह कल्पवृक्ष एकदम भरपूर हो रहा है... कल्पवृक्ष की एक-एक शाखाएं शांति को अनुभव करते हुए हरियाली से भरपूर हो रही हैं...

➳ _ ➳  और जैसे-जैसे मुझसे किरणें निकलती जा रही है... मैं बुलबुले के आकार से धीरे-धीरे अपने असली स्वरुप में आ रही हूं... मैं उस बुलबुले से अब चमकती हुई मणि रूपी आत्मा का आभास कर रही हूं... और अपने आपसे एकाग्रचित अवस्था में स्थित होकर यह संकल्प कर रही हूँ... कि मैं आत्मा अपने आपको सातों गुणों से भरपूर अनुभव करते हुए और परमात्मा द्वारा दिए हुए हर खजाने को अपने अंदर समाते हुए... इस सृष्टि की सेवाधारी बन कर रहूँगी... *मैं आत्मा अपने आपको विश्व सेवाधारी की स्टेज पर अनुभव करती हूँ... और अपने अंदर सभी खजानों को भी गहराई से अनुभव करती हूँ... तथा मैं अपनी सभी कमी कमजोरियों को बारीकी से चेक करते हुए... इन्हें समाप्त करती जा रही हूं...* जैसे जैसे मैं अपनी कमी कमजोरियों को समाप्त करती जाती हूं... मैं अपनी शांति भरी स्थिति का आनंद लेती जा रही हूँ... और अपनी शक्तियों को पहचानते हुए, जानते हुए मैं अन्य दुखी आत्माओं को परमात्मा का परिचय देकर उन्हें सही मार्ग पर लाती जा रही हूँ...  

➳ _ ➳  अब मैं आत्मा परमात्मा द्वारा दिए हुए... ज्ञान रत्नों और शक्तियों से श्रृंगारित होती जा रही हूं... इन अविनाशी रत्नों से सज संवर कर अन्य आत्माओं को भी ज्ञान रत्नों से सजाती जा रही हूं... मैं यह देख रही हूं... कि सभी आत्माएं श्रृंगारित होकर बहुत ही आनंदित हो रही है... और बार-बार अपने आपको सजा सँवरा देखकर हर्षित हो रही है... उनके हर्षित मुख के कारण मुझ आत्मा की चमक और भी बढ़ती जा रही है... *जैसे-जैसे मैं अपने आप को शक्तिशाली स्थिति में अनुभव करती हूं... वैसे वैसे ही मैं अपने आपके और भी करीब होती जा रही हूँ... और अपनी छुपी हुई शक्तियों को पहचानती जा रही हूं...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 

ॐ शांति

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