01-01-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम्हें पाकीज़ा दुनिया में चलना है इसलिए हवस अज़ीम दुश्मन पर फ़तह पानी है, हवस फ़तहयाब, जहान फ़तहयाब बनना है

सवाल:-
हर एक अपनी एक्टिविटी से कौन-सा दीदार ए जलवा सबको करा सकते हैं?

जवाब:-
मैं हंस हूँ या बगुला हूँ? यह हर एक अपनी एक्टिविटी से सबको दीदार ए जलवा करा सकते हैं क्योंकि हंस कभी किसी को ग़म नहीं देंगे। बगुले ग़म देते हैं, वह ख़बासती होते हैं। तुम बच्चे अभी बगुले से हंस बने हो। तुम पारस अक्ल बनने वाले बच्चों का फ़र्ज़ है सबको पारस अक्ल बनाना।

आमीन।
जब आमीन कहा जाता है तो अपना दीन ए नफ़्स याद पड़ता है। घर की भी याद आती है। मगर घर में बैठ तो नहीं जाना है। रब के बच्चे हैं तो ज़रूर अपनी जन्नत भी याद करनी पड़े। तो आमीन कहने से यह तमाम इल्म अक्ल में आ जाता है। मैं रूह सुकून परस्त हूँ, दरिया ए सुकून रब का बच्चा हूँ। जो रब जन्नत क़ायम करते हैं वह रब ही हमको पाकीज़ा सुकून परस्त बनाते हैं। अहम बात है पाकीज़गी की। दुनिया ही पाकीज़ा और नापाक बनती है। पाकीज़ा दुनिया में एक भी ख़बासती नहीं है। नापाक दुनिया में 5 ख़बासत हैं, इसलिए कहा जाता है ख़बासती दुनिया। वह है ग़ैर मुजस्सम दुनिया। ग़ैर मुजस्सम दुनिया से सीढ़ी उतरते-उतरते फिर नीचे ख़बासती दुनिया में आते हैं। वह है पाकीज़ा दुनिया, यह है नापाक दुनिया। वह है दिन, मसर्रत। यह है भटकने की रात। यूँ तो रात में कोई भटकता नहीं है। मगर अकीदत मन्दी को भटकना कहा जाता है।

तुम बच्चे अब यहाँ आये हो ख़ैर निजात पाने। तुम्हारी रूह में तमाम गुनाह थे, 5 ख़बासत थी। उनमें भी अहम है हवस ख़बासत, जिससे ही इन्सान गुनाहगार रूह बनते हैं। यह तो हर एक जानते हैं हम नापाक हैं और गुनाहगार रूह भी हैं। एक हवस ख़बासत के सबब क्वालिफिकेशन बिगड़ पड़ती हैं इसलिए रब फ़रमाते हैं हवस को जीतो तो तुम जहान फ़तहयाब यानि कि नयी दुनिया के मालिक बनेंगे। तो अन्दर में इतनी ख़ुशी रहनी चाहिए। इन्सान नापाक बनते हैं तो कुछ भी समझते नहीं। रब समझाते हैं - कोई भी ख़बासत नहीं होनी चाहिए। अहम है हवस ख़बासत, इस पर कितने हंगामें होते हैं। घर-घर में कितनी बे सुकूनियत, हाहाकार हो जाता है। इस वक़्त दुनिया में हाहाकार क्यों है? क्योंकि गुनाहगार रूहें हैं। ख़बासत के सबब ही शैतान कहा जाता है। अभी तुम समझते हो इस वक़्त दुनिया में कोई भी काम की चीज़ नहीं, भंभोर को आग लगनी है। जो कुछ इन आंखों से देखा जाता है, सबको आग लग जायेगी। रूह को तो आग लगती नहीं। रूह तो हमेशा जैसे इन्श्योर है, हमेशा जीती रहती। रूह को कभी इन्श्योर कराते हैं क्या? जिस्म को इन्श्योर कराया जाता है। रूह ला फ़ानी है। बच्चों को समझाया गया है - यह खेल है। रूह तो ऊपर रहने वाली 5 अनासर से बिल्कुल अलग है। 5 अनासर से तमाम दुनिया की चीज़े बनती है।रूह तो नहीं बनती है। रूह हमेशा है ही। सिर्फ़ नफ़ीस रूह, ख़बीस रूह बनती है।रूह पर ही नाम पड़ता है नफ़ीस रूह, ख़बीस रूह। 5 ख़बासतों से कितने गन्दे बन जाते हैं। अब रब आये हैं गुनाहों से छुड़ाने। ख़बासत ही तमाम कैरेक्टर बिगाड़ती हैं। कैरेक्टर किसको कहा जाता है, यह भी समझते नहीं। यह है आला ते आला रूहानी गवर्नमेन्ट। पन्जतनी गवर्नमेन्ट न कह तुमको इलाही गवर्नमेन्ट कह सकते हैं। तुम समझते हो हम इलाही गवर्नमेन्ट हैं। इलाही गवर्नमेन्ट क्या करती है? रूहों को पाकीज़ा बनाकर हूरैन बनाती है। नहीं तो हूरैन कहाँ से आये? यह कोई भी नहीं जानते, हैं तो यह भी इन्सान मगर हूरैन कैसे थे, किसने बनाया? हूरैन तो होते ही हैं जन्नत में। तो उन्हों को जन्नत रिहाईश नशीन किसने बनाया? जन्नत रिहाईश नशीन फिर ज़रूर जहन्नुम रिहाईश नशीन बनते हैं फिर जन्नत रिहाईश नशीन। यह भी तुम नहीं जानते थे तो और फिर कैसे जानेंगे! अब तुम समझते हो कि ड्रामा बना हुआ है, इतने सब एक्टर्स हैं। यह सब बातें अक्ल में होनी चाहिए। तालीम तो अक्ल में होनी चाहिए ना और पाकीज़ा भी ज़रूर बनना है। नापाक बनना निहायत ख़राब बात है।रूह ही नापाक बनती है। एक-दो में नापाक बनते हैं। नापाकों को पाकीज़ा बनाना यह तुम्हारा धन्धा है। पाकीज़ा बनो तो पाकीज़ा दुनिया में चलेंगे। यह रूह समझती है। रूह न हो तो जिस्म भी ठहर न सके, रेसपान्ड मिल न सके। रूह जानती है हम असुल पाकीज़ा दुनिया के रहवासी हैं। अभी रब ने समझाया है तुम बिल्कुल ही बेसमझ थे, इसलिए नापाक दुनिया के नालायक़ बन पड़े हो। अब जब तक पाकीज़ा नहीं बनेंगे तब तक जन्नत के लायक़ नहीं बन सकेंगे। जन्नत के मुकाबले भी मिलन पर की जाती है। वहाँ थोड़े ही मुकाबला कर सकेंगे। इस मिलन के दौर पर ही तुमको तमाम इल्म मिलता है। पाकीज़ा बनने का हथियार मिलता है। एक को ही कहा जाता है नापाक से पाक बनाने वाला रब्बा, हमको ऐसा पाकीज़ा बनाओ। यह जन्नत के मालिक हैं ना। तुम जानते हो हम ही जन्नत के मालिक थे फिर 84 विलादत लेकर नापाक बने हैं। स्याह और खुबसूरत, इनका नाम भी ऐसा रखा है। कृष्ण की तस्वीर स्याह बना देते हैं मगर मतलब थोड़े ही समझते हैं। आदम अलैहिस्सलाम की भी तुमको कितनी क्लीयर समझानी मिलती है। इनमें दो दुनियायें कर दी हैं।असल में दो दुनियायें तो हैं नहीं। दुनिया एक ही है। वह नई और पुरानी होती है। पहले छोटे बच्चे नये होते हैं फिर बड़े बन बुज़ुर्ग होते हैं। तो तुम कितना माथा मारते हो समझाने के लिए, अपनी दारूल हुकूमत क़ायम कर रहे हो ना। आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम ने समझा है ना। समझ से कितने मीठे बने हैं। किसने समझाया? अल्ल्लाह् ताला ने। लड़ाई वगैरह की तो बात ही नहीं। अल्ल्लाह् ताला कितना समझदार, नॉलेजफुल है। कितना पाकीज़ा है। रहमतुल्आल्मीन की तस्वीर आगे तमाम इन्सान जाकर सज़दा करते हैं मगर वह कौन है, क्या करते हैं, यह कोई नहीं जानते। शिव काशी विश्वनाथ गंगा.... बस सिर्फ़ कहते रहते हैं। मतलब ज़रा भी नहीं समझते। समझाओ तो कहेंगे तुम क्या हमको समझायेंगे। हम तो वेद-सहीफें वगैरह तमाम पढ़े हैं। मगर इलाही सल्तनत किसको कहा जाता है, यह भी कोई जानते नहीं। इलाही सल्तनत सुनहरे दौर नई दुनिया को कहा जाता है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं, जिनको इख्तियार होता है। कई तो भूल भी जाते हैं क्योंकि बिल्कुल ही पत्थर अक्ल बन गये हैं। तो अब पारस अक्ल जो बने हैं उनका काम है औरों को पारस अक्ल बनाना। पत्थर अक्ल की एक्टिविटी वही चलती रहेगी क्योंकि हंस और बगुले हो गये ना। हंस कभी किसको दु:ख नहीं देते। बगुले दु:ख देते हैं। कई हैं जिनकी चाल ही बगुले मिसल होती है, उनमें तमाम ख़बासती होते हैं। यहाँ भी ऐसे निहायत ख़बासती आ जाते हैं, जिनको शैतान कहा जाता है। पहचान नहीं रहती। निहयत सेन्टर्स पर भी ख़बासती आते हैं, बहाना बनाते हैं, हम मोमिन हैं, मगर है झूठ। इसको कहा ही जाता है झूठी दुनिया। वह नई दुनिया सच्ची दुनिया है। अभी है मिलन। कितना फ़र्क रहता है। जो झूठ बोलने वाले, झूठा काम करने वाले हैं, वह थर्ड ग्रेड बनते हैं। फर्स्ट ग्रेड, सेकेण्ड ग्रेड तो होते हैं ना।

रब फ़रमाते हैं पाकीज़गी का भी पूरा सबूत देना है। कई कहते हैं यह दोनों इकट्ठे रहकर पाकीज़ा रहते, यह तो इम्पासिबुल है। तो बच्चों को समझाना चाहिए। कुव्वत ए इबादत न होने सबब इतनी आसान बात भी पूरी तरह समझा नहीं सकते हैं। उनको यह बात कोई नहीं समझाते कि यहाँ हमको अल्ल्लाह् ताला पढ़ाते हैं। वह कहते पाकीज़ा बनने से तुम 21 विलादत जन्नत के मालिक बनेंगे। वह है पाकीज़ा दुनिया। पाकीज़ा दुनिया में नापाक कोई हो न सके। 5 ख़बासत ही नहीं हैं। वह है वाइसलेस वर्ल्ड। यह है विशश वर्ल्ड। हमको सुनहरे दौर की बादशाही मिलती है तो हम एक विलादत के लिए क्यों नहीं पाकीज़ा बनेंगे! जबरदस्त लॉटरी मिलती है हमको। तो ख़ुशी होती है। हूर-हूरैन पाकीज़ा हैं ना। नापाक से पाकीज़ा भी रब ही बनायेंगे। तो बताना चाहिए हमको यह टैम्पटेशन है। रब ही ऐसा बनाते हैं। रब बिगर तो नई दुनिया कोई बना न सके। इन्सान से हूरैन बनाने अल्ल्लाह् ताला ही आते हैं, जिसकी रात गाई जाती है। यह भी समझाया है इल्म, अकीदत मन्दी, बेनियाज़ी। इल्म और अकीदत मन्दी आधा-आधा है। अकीदत मन्दी के बाद है बेनियाज़ी। अब घर जाना है, यह जिस्म रूपी कपड़े उतार देने हैं। इस छी-छी दुनिया में नहीं रहना है। 84 का चक्कर अब पूरा हुआ। अब वाया दारूल सुकून जाना है। पहले-पहले अल्फ की बात नहीं भूलनी है। यह भी बच्चे समझते हैं यह पुरानी दुनिया ख़त्म होनी है। रब नई दुनिया क़ायम करते हैं। रब कई बार आये हैं जन्नत का क़याम करने। जहन्नुम की तबाही हो जानी है। जहन्नुम कितना बड़ा है, जन्नत कितना छोटा है। नई दुनिया में एक ही मज़हब होता है। यहाँ हैं कई मज़हब। एक मज़हब किसने क़ायम किया? जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने तो नहीं किया। जिब्राइल अलैहिस्सलाम ही नापाक सो फिर पाकीज़ा बनता है। मेरे लिए तो नहीं कहेंगे नापाक सो पाकीज़ा हैं तो आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम नाम है। जिब्राइल अलैहिस्सलाम का दिन, जिब्राइल अलैहिस्सलाम की रात। यह बाप ए अवाम है ना। रहमतुल्आल्मीन को अबदी क्रियेटर कहा जाता है। अबदी अल्फ़ाज़ रब के लिए है। रब अबदी तो रूह भी अबदी हैं। खेल भी अबदी है। बना बनाया ड्रामा है। अपनी रूह को खिल्क़त के चक्कर के आग़ाज़ -दरम्यान-आख़िर, ड्यूरेशन का इल्म मिलता है। यह किसने दिया? रब ने। तुम 21 विलादतों के लिए धनके बन जाते हो फिर शैतान की सल्तनत में निधनके बन जाते हो। यहाँ से ही कैरेक्टर बिगड़ते हैं, ख़बासत हैं ना। बाक़ी दो दुनियायें नहीं हैं। इन्सान तो फिर समझते हैं जहन्नुम-जन्नत तमाम इकट्ठे ही चलते हैं। अभी तुम बच्चों को कितना क्लीयर समझाया जाता है। अभी तुम बातिन हो। सहीफ़ों में तो क्या-क्या लिख दिया है। सूत कितना मूँझा हुआ है। सिवाए रब के कोई सुलझा न सके। उन्हें ही पुकारते हैं - हम कोई काम के नहीं रहे हैं, आकर पाकीज़ा बनाए हमारे कैरेक्टर सुधारो। तुम्हारे कितने कैरेक्टर सुधरते हैं। कोई-कोई के तो सुधरने बदले और ही बिगड़ते हैं। चलन से भी मालूम पड़ जाता है। आज अज़ीम सवार हंस कहलाते हैं, कल बगुला बन पड़ते। देरी नहीं लगती है। इबलीस भी बातिन है ना। गुस्सा कोई देखने में थोड़े ही आता है। भौं-भौं करते हैं तो फिर वह बाहर निकलने से दिखाई पड़ता है। फिर आश्चर्यवत् सुनन्ती.... कथन्ती भागन्ती हो जाते हैं। कितना गिरते हैं। एकदम पत्थर बन जाते हैं। इन्द्रप्रस्थ की भी बात है ना। मालूम तो पड़ ही जाता है। ऐसा फिर मजलिस में नहीं आना चाहिए। थोड़ा-बहुत इल्म सुना है तो जन्नत में आ ही जाते हैं। इल्म की तबाही नहीं हो सकती।

अब रब फ़रमाते हैं - तुमको तजवीज़ कर आला मर्तबा पाना है। अगर खबासत में गये तो मर्तबा बद उन्वान कर देंगे। खानदान ए आफ़ताबी, खानदान ए महताबी बनेंगे फिर खानदान ए कारोबारी, खानदान ए यज़ीदी। अभी तुम समझते हो यह चक्कर कैसे फिरता है। वह तो इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर की उम्र ही 40 हज़ार साल कह देते हैं। सीढ़ी तो नीचे उतरनी होती है ना। 40 हज़ार साल हों तो इन्सान बेइंतहा हो जाएं। 5 हज़ार साल में ही इतने इन्सान हैं, जो खाने को नहीं मिलता। तो इतने हज़ार सालों में कितना इज़ाफ़ा हो जाए। तो रब आकर सब्र देते हैं। नापाक इन्सानों को तो लड़ना ही है। उन्हों की अक्ल इस तरफ़ आ न सके। अब तुम्हारी अक्ल देखो कितनी बदलती है फिर भी इबलीस धोखा ज़रूर देती है। इच्छा मात्रम् अविद्या यानि कि खुवाहिशात की ग़ैर मालूमात। कोई ख्वाहिशत की तो गया। वर्थ नाट ए पेनी बन जाते हैं। अच्छे-अच्छे अज़ीम सवारों को भी इबलीस कोई न कोई तरह से कभी धोखा देता रहता हैं। फिर वह दिल पर चढ़ नहीं सकते। जैसे जिस्मानी माँ-बाप के दिल पर नहीं चढ़ते हैं। कोई तो बच्चे ऐसे होते हैं जो बाप को भी ख़त्म कर देते हैं। फैमिली को ख़त्म कर देते हैं। अज़ीम ख़बीस रूहें हैं। शैतान क्या कर देते, निहायत डर्टी दुनिया है। इनसे कभी दिल नहीं लगानी चाहिए। पाकीज़ा बनने की बड़ी हिम्मत चाहिए। दुनिया की बादशाही की प्राइज़ लेने के लिए पाकीज़गी अहम है इसलिए रब को फ़रमाते हैं कि आकर पाकीज़ा बनाओ। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. इबलीस के धोखों से बचने के लिए इच्छा मात्रम् अविद्या यानि कि ख्वाहिशात की मालूमात नहीं बनना है। इस डर्टी दुनिया से दिल नहीं लगानी है।

2. पाकीज़गी का पूरा-पूरा सबूत देना है। सबसे आला कैरेक्टर ही पाकीज़गी है। अपने आप को सुधारने के लिए पाकीज़गी ज़रूर बनना है।

बरक़ात:-
अपने मुस्तकीम याफ़्ता के ज़रिए महीन कुव्वत की लीलाओं का एहसास करने वाले हवास ए बातिन बनो

मुस्तकीम की बुनियाद हवास ए बातिन है। जो हवास ए बातिन हैं वे अन्दर ही अन्दर महीन कुव्वत की लीलाओं का एहसास करते हैं। रूहों का बुलावा करना, रुहों से रूहरिहान करना, रूहों की आदत रवैये को तब्दील करना, रब से कनेक्शन जुड़वाना - ऐसे रूहों की दुनिया में रूहानी खिदमत करने के लिए मुस्तकीम की कुव्वत को बढ़ाओ, इससे तमाम तरह की मुश्किलात अपने आप खत्म हो जायेंगी।

स्लोगन:-
तमाम दस्तयाबियों को खुद में इख्तियार कर दुनिया की स्टेज पर ज़ाहिर होना ही ज़ूहूर की बुनियाद है।


ख़ास नोट:- यह जनवरी महीने मीठे साकार बाबा की याददाश्त का महीना है, खुद को काबिल बनाने के लिए ख़ास हवास ए बातिन बन महीन कुव्वतों की लीलाओं का एहसास करना है। पूरा ही मास अपनी ग़ैबी सूरत ए हाल में रहना है। ज़हन और मुंह की खामौशी रखना है।

आमीन