01-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब आये हैं तुम्हें आमाल-न्युटरल आमाल-गुनाहगार आमाल की गहरी रफ़्तार सुनाने, जब रूह और जिस्म दोनों पाकीज़ा हैं तो आमाल न्युटरल आमाल होते हैं, नापाक होने से गुनाहगार आमाल होते हैं।

सवाल:-
रूह पर कट (जंक) चढ़ने का सबब क्या है? कट चढ़ी हुई है तो उसकी निशानी क्या होगी?

जवाब:-
कट चढ़ने का सबब है - ख़बासत। नापाक बनने से ही कट चढ़ती है। अगर अभी तक कट चढ़ी हुई है तो उन्हें पुरानी दुनिया की कशिश होती रहेगी। अक्ल क्रिमिनल तरफ़ जाती रहेगी। याद में रह नहीं सकेंगे।

आमीन।
बच्चे इसका मतलब तो समझ गये हैं। आमीन कहने से ही यह यक़ीन हो जाता है कि हम रूहें यहाँ की रहवासी नहीं हैं। हम तो दारूल सुकून की रहवासी हैं। हमारा दीन ए नफ़्स सुकून है, जब घर में रहते हैं फिर यहाँ आकर पार्ट बजाते हैं, क्योंकि जिस्म के साथ आमाल करना पड़ता है। आमाल होता है एक अच्छा, दूसरा बुरा। आमाल बुरा होता है शैतानी सल्तनत में। शैतानी सल्तनत में सबके आमाल गुनाहगार आमाल बन गये हैं। एक भी इन्सान नहीं जिससे गुनाहगार आमाल न होता हो। इन्सान तो समझते हैं राहिब-वली वगैरह से गुनाहगार आमाल नहीं हो सकता क्योंकि वह पाकीज़ा रहते हैं। बेनियाज़ी की हुई है। असल में पाकीज़ा किसको कहा जाता है, यह बिल्कुल नहीं जानते। कहते भी हैं हम नापाक हैं। नापाक से पाक बनाने वाले को बुलाते हैं। जब तक वह न आये तब तक दुनिया पाकीज़ा बन नहीं सकती। यहाँ यह नापाक पुरानी दुनिया है, इसलिए पाकीज़ा दुनिया को याद करते हैं। पाकीज़ा दुनिया में जब जायेंगे तो नापाक दुनिया को याद नहीं करेंगे। वह दुनिया ही अलग है। दरेक चीज़ नई फिर पुरानी होती है ना। नई दुनिया में एक भी नापाक हो न सके। नई दुनिया का खालिक है पाक परवरदिगार, वही नापाक से पाक बनाने वाला है, उनके मख़लूक़ भी ज़रूर पाकीज़ा होना चाहिए। नापाक से पाक, पाक से नापाक, यह बातें दुनिया में किसकी अक्ल में बैठ न सकें। कल्प-कल्प रब ही आकर समझाते हैं। तुम बच्चों में भी कई यक़ीनी दानिश मन्द होकर फिर शक्की अक्ल हो जाते हैं। इबलीस एकदम हप कर लेता है। तुम अज़ीम हस्ती हो ना। अज़ीम हस्तियों को ही तक़रीर पर बुलाते हैं। मलिक ए आज़म को भी समझाना है। तुम ही पहले पाकीज़ा क़ाबिल ए एहतराम थे, अभी तो यह है ही नापाक दुनिया। पाकीज़ा दुनिया में हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन ही थे। तुम हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन अल्ल्लाह् अव्वल हूर-हूरैन दीन के डबल सिरताज मुकम्मल ग़ैर खबासती थे। अज़ीम हस्तियों को तो ऐसे समझाना होगा ना। इस नशे से समझाना होता है। अल्ल्लाह् ताला फ़रमाते हैं-हवस की आग पर बैठ स्याह बन जाते हैं फिर इल्म की आग पर बैठने से हसीन बनेंगे। अब जो भी समझाते हैं वह तो हवस की आग पर बैठ न सकें। मगर ऐसे भी हैं जो औरों को समझाते-समझाते हवस की आग पर बैठ जाते हैं। आज यह समझाते कल ख़बासत में गिर पड़ते। इबलीस बड़ा ज़बरदस्त है। बात मत पूछो। औरों को समझाने वाले खुद हवस की आग पर बैठ जाते हैं। फिर पछताते हैं-यह क्या हुआ? बॉक्सिंग है ना। औरत को देखा और कशिश आई, काला मुँह कर दिया। इबलीस बड़ा दुश्तर है। अहद कर और फिर गिरते हैं तो कितना सौ ज़रब जुर्माना पड़ जाता है। वह तो जैसे यज़ीद जैसे नापाक हो गया। गाया भी हुआ है- आब ए हयात पीकर फिर बाहर में जाए दूसरों को सताते थे। गंद करते थे। ताली दो हाथ से बजती है। एक से तो बज न सके। दोनों ख़राब हो जाते। फिर कोई तो ख़बर देते हैं, कोई फिर शर्म के मारे ख़बर ही नहीं देते। समझते हैं कहाँ मोमिन खानदान में नाम बदनाम न हो जाए। जंग में कोई हारते हैं तो हाहाकार हो जाता है। अरे इतने बड़े पहलवान को भी गिरा दिया! ऐसे निहायत एक्सीडेंट होते हैं। इबलीस थप्पड़ मारता है, निहायत बड़ी मंजिल है ना।
अब तुम बच्चे समझाते हो जो सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ हसीन थे, वही हवस की आग पर बैठने से काले स्याह रास्त बने हैं। राम को भी काला बनाते हैं। तस्वीर तो निहायतों के काले बनाते हैं। मगर अहम की बात समझाई जाती है। यहाँ भी रामचन्द्र का काली तस्वीर है, उनसे पूछना चाहिए-काला क्यों बनाया है? कह देंगे यह तो अल्ल्लाह् ताला की मर्जी। यह तो चलता आता है। क्यों होता, क्या होता - यह कुछ नहीं जानते। अब तुमको रब समझाते हैं हवस की आग पर बैठने से नापाक दु:खी वर्थ नाट ए पेनी बन जाते हैं। वह है ग़ैर खबासती दुनिया। यह है ख़बासती दुनिया। तो ऐसे-ऐसे समझाना चाहिए। यह खानदान ए आफ़ताबी, यह खानदान ए महताबी फिर खानदान ए कारोबारी बनना ही है।उल्टी राह में आने से फिर वह हूरैन नहीं कहलाते। जगत नाथ के मन्दिर में ऊपर में हूरैन का खानदान दिखाते हैं। ड्रेस हूरैन की है, एक्टिविटी बड़ी गन्दी दिखाते हैं। रब जिन बातों पर अटेन्शन खिंचवाते हैं, तवज्जों देना चाहिए। मन्दिरों में निहायत खिदमत हो सकती है। श्री नाथ द्वारे में भी समझा सकते हैं। पूछना चाहिए इनको काला क्यों बनाया है? यह समझाना तो निहायत अच्छा है। वह है गोल्डन एज, यह है आइरन एज। कट चढ़ जाती है ना। अभी तुम्हारी कट उतर रही है। जो याद ही नहीं करते तो कट भी नहीं उतरती। निहायत कट चढ़ी हुई होगी तो उसे पुरानी दुनिया की कशिश होती रहेगी। सबसे बड़ी कट चढ़ती ही है ख़बासतों से। नापाक भी उनसे बने हैं। अपनी तफ़्तीश करनी है - हमारी अक्ल क्रिमिनल तरफ़ तो नहीं जाती। अच्छे-अच्छे फर्स्टक्लास बच्चे भी फेल हो पड़ते हैं। अभी तुम बच्चों को यह समझ मिली है। अहम बात है ही पाकीज़गी की। शुरू से लेकर इस पर ही झगड़े चलते आये हैं। रब ने ही यह तरीक़त की-तमाम कहते थे हम आब ए हयात पीने जाते हैं। इल्म आब ए हयात है ही दरिया ए इल्म के पास। सहीफ़ा पढ़ने से तो कोई नापाक से पाक बन नहीं सकते। पाकीज़ा बन फिर पाकीज़ा दुनिया में जाना है। यहाँ पाकीज़ा बन फिर कहाँ जायेंगे? लोग समझते हैं फलाने ने निजात को पाया। उनको क्या मालूम, अगर निजात को पा लिया फिर तो उनका क्रियाकर्म वगैरह भी नहीं कर सकते। यहाँ ज्योत वगैरह जगाते हैं कि उनको कोई तकलीफ़ न हो। अंधियारे में ठोकरें न खायें। रूह तो एक जिस्म छोड़ दूसरा जाकर लेती है, एक सेकण्ड की बात है। अंधियारा फिर कहाँ से आया? यह रस्म चली आती है, तुम भी करते थे, अब कुछ नहीं करते हो। तुम जानते हो जिस्म तो मिट्टी हो गया। वहाँ ऐसी रस्म-रिवाज होती नहीं। आजकल रिद्धि-सिद्धि की बातों में कुछ रखा नहीं है। समझो कोई को पंख आ जाते हैं, उड़ने लगते हैं - फिर क्या, उससे फ़ायदा क्या मिलेगा? रब तो फ़रमाते हैं मुझे याद करो तो गुनाहों का ख़ात्मा होंगा। यह इबादत ए आग है, जिससे नापाक से पाक बनेंगे। नॉलेज से दौलत मिलती है। इबादत से एवर हेल्दी पाकीज़ा, इल्म से एवर वेल्दी दौलत मन्द बनते हैं। नमाज़ी की उम्र हमेशा बड़ी होती है। अय्याश की कम। कृष्ण को योगेश्वर कहते हैं। अल्ल्लाह् ताला की याद से कृष्ण बना है, उनको जन्नत में योगेश्वर नहीं कहेंगे। वह तो प्रिन्स है। पास्ट विलादत में ऐसे आमाल किये है, जिससे यह बना है। आमाल-न्युटरल आमाल-गुनाहग़ार आमाल की रफ्तार भी रब ने समझाया है। आधाकल्प है इलाही सल्तनत, आधाकल्प है शैतानी सल्तनत। ख़बासत में जाना - यह है सबसे बड़ा गुनाह। सब भाई-बहन हैं ना। रूहें तमाम भाई-भाई हैं। अल्ल्लाह् ताला की औलाद होकर फिर क्रिमिनल एसाल्ट कैसे करते हैं। हम बी.के. ख़बासत में जा नहीं सकते। इस तरीक़े से ही पाकीज़ा रह सकते हैं। तुम जानते हो अभी शैतानी सल्तनत ख़त्म होती है फिर दरेक रूह पाकीज़ा बन जाती है। उसको कहा जाता है - घर-घर में सोझरा। तुम्हारी ज्योत जगी हुई है।इल्म का तीसरी आंख मिली है। जन्नत में तमाम पाकीज़ा ही रहते हैं। यह भी तुम अभी समझते हो। दूसरों को समझाने की बच्चों में नम्बरवार ताक़त रहती है। नम्बरवार याद में रहते हैं। दारूल हुकूमत कैसे क़ायम होती है, कोई की अक्ल में यह नहीं होगा। तुम फौज हो ना। जानते हो याद की कुव्वत से पाकीज़ा बन हम राजा रानी बन रहे हैं। फिर दूसरी विलादत में गोल्डन स्पून इन माउथ होगी। बड़ा इम्तहान पास करने वाले मर्तबा भी बड़ा पाते हैं। फ़र्क पड़ता है ना, जितनी तालीम उतनी ख़ुशी। यह तो अल्ल्लाह् ताला पढ़ाते हैं। यह नशा चढ़ा हुआ रहना चाहिए। चोबचीनी (ताक़त का माल) मिलता है। अल्ल्लाह् ताला बिगर ऐसा भगवान-भगवती कौन बनायेंगे। तुम अभी नापाक से पाक बन रहे हो फिर विलादत दर विलादत के वास्ते ख़ुशहाल बन जायेंगे। आला मर्तबा पायेंगे। पढ़ते-पढ़ते फिर गन्दे बन जाते हैं। जिस्मानी तकब्बुर में आने से फिर इल्म की तीसरी आंख बन्द हो जाती है। इबलीस बड़ा ज़बरदस्त है। रब खुद फ़रमाते हैं बड़ी मेहनत है। मैं कितनी मेहनत करता हूँ - आदम अलैहिस्सलाम के जिस्म में आकर। मगर समझकर फिर भी कह देते ऐसे थोड़े ही हो सकता है, पाक परवरदिगार आकर तालीम देते हैं - हम नहीं मानते। यह चालाकी है। ऐसे भी बोल देते हैं। बादशाहत तो क़ायम हो ही जायेगी। कहते हैं ना सच की बेड़ी हिलती है मगर डूबती नहीं। कितनी मुश्किलात पड़ती हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे नूरे रत्न,स्याह से खूबसूरत बनने वाली रूहों के वास्ते मात-पिता बापदादा का दिल व जान, सिक और मोहब्बत से याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-

1. इबादत की आग से ख़बासतों की कट (जंक) को उतारना है। अपनी तफ़्तीश करनी है कि हमारी अक्ल क्रिमिनल तरफ़ तो नहीं जाती है?

2. यक़ीनी दानिश मन्द बनने के बाद फिर कभी किसी भी बात में शक नहीं उठाना है। गुनाहों से बचने के वास्ते कोई भी आमाल अपने दीन ए नफ़्स में वाक़ेअ होकर रब की याद में करना है।

बरक़ात:-
तमाम दस्तयाबियों के एहसास के ज़रिए पाॅवरफुल बनने वाले हमेशा कामयाबी नशीन बनो

जो तमाम दस्तयाबियों के एहसाससाती हैं वही पाॅवरफुल हैं, ऐसी पाॅवरफुल तमाम दस्तयाबियों की तजुर्बे दार रूहें ही बन सकती हैं क्योंकि अभी तमाम रूहें तलाशेंगी कि ख़ुशी-सुकून के मास्टर दाता कहाँ हैं। तो जब आपके पास तमाम कुव्वतों का स्टॉक होगा तब तो तमाम को मुत्मइन कर सकेंगे। जैसे आजकल एक ही स्टोर से तमाम चीज़ें मिल जाती हैं, ऐसे आपको भी बनना है। ऐसे नहीं बर्दाश्त की कुव्वत हो सामना करने की नहीं। तमाम कुव्वतों का स्टॉक चाहिए तब कामयाबी नशीन बन सकेंगे।

स्लोगन:-
वक़ार ही मोमिन ज़िन्दगी के कदम हैं, कदम पर कदम रखना माना मंजिल के नज़दीक पहुंचना।


मम्मा के बेशकीमती कलेमात
"तजवीज़ और क़िस्मत का बना हुआ अबदी ड्रामा''
मम्मा: तजवीज़ और क़िस्मत दो चीज़ें हैं, तजवीज़ से क़िस्मत बनती है। यह अबदी खिल्क़त का चक्कर फिरता रहता है, जो अल्ल्लाह् अव्वल दीनी हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन क़ाबिल ए एहतराम थे, वही फिर नाक़ाबिल बनें फिर वही नाकाबिल तजवीज़ कर क़ाबिल ए एहतराम बनेंगे, यह उतरना और चढ़ना अबदी ड्रामा का खेल बना हुआ है।

मुतजिस: मम्मा, मेरा भी यह सवाल उठता है कि जब यह ड्रामा ऐसा बना हुआ है तो फिर अगर ऊपर चढ़ना होगा तो आपे ही चढ़ेंगे फिर तजवीज़ करने का फ़ायदा ही क्या हुआ? जो चढ़ेंगे फिर भी गिरेंगे फिर इतना तजवीज़ ही क्यों करें? मम्मा, आपका कहना है कि यह ड्रामा हूबहू रिपीट होता है तो क्या आॅलमाइटी पाक परवरदिगार हमेशा ऐसे खेल को देख खुद थकता नहीं है? जैसे 4 मौसम में सर्दी, गर्मी वगैरह का फर्क रहता है तो क्या इस खेल में फर्क नहीं पड़ेगा?

मम्मा: बस, यही तो ख़ूबी है इस ड्रामा की, हूबहू रिपीट होता है और इस ड्रामा में और भी ख़ूबी है जो रिपीट होते हुए भी हमेशा नया लगता है। पहले तो अपने को भी यह इल्म नहीं था, मगर जब नॉलेज मिली है तो जो जो भी सेकेण्ड बाय सेकेण्ड चलता है, भल हूबहू कल्प पहले वाला चलता है मगर जब उनको साक्षी समझ देखते हैं तो हमेशा नया समझते हैं। अभी ख़ुशी ग़म दोनों की पहचान मिल गयी इसलिए ऐसे नहीं समझना अगर फेल होना ही है तो फिर पढ़े ही क्यों? नहीं, फिर तो ऐसे भी समझें अगर खाना मिलना होगा तो आपे ही मिलेगा, फिर इतनी मेहनत कर कमाते ही क्यों हो? वैसे हम भी देख रहे हैं अब चढ़ते फ़न का वक्त आया है, वही हूरैन घराना क़ायम हो रहा है तो क्यों न अभी ही वो ख़ुशी ले लेवें। जैसे देखो अब कोई जज बनना चाहता है तो जब तजवीज़ करेगा तब उस डिग्री को हांसिल करेंगे ना। अगर उसमें फेल हो गया तो मेहनत ही बरबाद हो जाती है,मगर इस ला फ़ानी इल्म में फिर ऐसा नहीं होता, ज़रा भी इस ला फ़ानी इल्म का खात्मा नहीं होता। करके इतनी तजवीज़ न कर हूरैन रॉयल घराने में न भी आवे मगर अगर कम तजवीज़ किया तो भी उस सुनहरे दौर में हूरैन अवाम में आ सकते हैं। मगर तजवीज़ करना लाज़िमी है क्योंकि तजवीज़ से ही क़िस्मत बनेगी, निसार नशीनी तजवीज़ की ही गाई हुई है।

"यह इलाही नॉलेज तमाम इन्सानी रूहों के वास्ते है''
पहले-पहले तो अपने को एक अहम प्वाइन्ट ख्याल में ज़रूर रखनी है, जब इस इन्सानी ख़िल्क़त के दरख्त का बीज रूप पाक परवरदिगार है तो उस पाक परवरदिगार के ज़रिए जो नॉलेज हासिल हो रही है वो तमाम इन्सानों के वास्ते ज़रुरी है। तमाम मज़हब वालों को यह नॉलेज लेने का हक़ है। भल दरेक मज़हब की नॉलेज अपनी-अपनी है, दरेक के सहीफें अपने-अपने है, दरेक की राय अपनी-अपनी है, दरेक की आदत अपनी-अपनी है मगर यह नॉलेज सबके वास्ते हैं। भल वो इस इल्म को न भी उठा सके, हमारे घराने में भी न आवे मगर सबका बाप होने सबब उनसे राब्ता लगाने से फिर भी पाकीज़ा लाज़िम बनेंगे। इस पाकीज़गी के सबब अपने ही सेक्शन में मर्तबा ज़रूर पायेंगे क्योंकि इबादत को तो तमाम इन्सान मानते हैं, निहायत इन्सान ऐसे कहते हैं हमें भी निजात चाहिए, मगर सज़ाओं से छूट निजात होने की कुव्वत भी इस इबादत के ज़रिए मिल सकती है। अच्छा

आमीन