01-09-2021   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे - जान बचाने वाला जान ए जिगर रब आये है, तुम बच्चों को इल्म की मीठी नूरानी कलेमात सुनाकर जान बचाने

सवाल:-
कौन सा यक़ीन तकदीरवान बच्चों को ही होता है?

जवाब:-
हमारी अफ़ज़ल तक़दीर बनाने खुद रब आये हैं। रब से हमें अकीदत का सिला मिल रहा है। इबलीस ने जो पंख काट दिये हैं - वह पंख देने, अपने साथ वापिस ले जाने के लिए रब आये हैं। यह यक़ीन तक़दीर वान बच्चों को ही होता है।

नग़मा:-
यह कौन आज आया सवेरे......

आमीन।
सवेरे-सवेरे यह कौन आकर नूरानी कलेमात बजाते हैं? दुनिया तो बिल्कुल ही घोर अन्धियारे में है। तुम अभी नूरानी कलेमात सुन रहे हो - दरिया ए इल्म, नापाक से पाक बनाने वाले जान ए जिगर रब से। वह है जान बचाने वाला जान ए जिगर। कहते हैं ना हे अल्लाह ताला इस ग़म से बचाओ। वह हद की मदद मांगते हैं। अभी तुम बच्चों को मिलती है - बेहद की मदद क्योंकि बेहद का रब है ना। तुम जानते हो रूह बातिन है, रब भी बातिन है। जब बच्चे का जिस्म ज़ाहिर है तो रब भी ज़ाहिर है। रूह बातिन है तो रब भी बातिन है। तुम जानते हो रब आया हुआ है, हमको बेहद का वर्सा देने। उनकी है सिरात ए मुस्तकीम। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी गीता मशहूर है सिर्फ़ उनमें नाम बदली कर दिया है। अब तुम जानते हो सिरात ए मुस्तकीम अल्लाह ताला फ़रमाते है ना। यह भी समझ गये - बद उन्वानी को अफ़ज़ल नशीन बनाने वाला एक ही रब है। वही हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनाते हैं। रिवायत भी हक़ीक़ी अफ़ज़ल हज़रात की है। गाया जाता है रिवायत ए हयात, आलम ए हयात का मालिक बनने और हज़रात से अफ़ज़ल हज़रात बनने की है। बात एक ही है। यह है आलम ए मौत। हिन्दुस्तान ही आलम ए हयात था - यह किसको मालूम नहीं है। यहाँ भी हयाती रब्बा ने हिन्दुस्तान रिहाईश नशीनियों को सुनाया है। एक पार्वती और एक द्रोपदी नहीं है। यह तो निहायत बच्चे सुन रहे हैं। रहमतुल्आल्मीन सुनाते हैं जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए। रब फ़रमाते हैं मैं जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए मीठी-मीठी रूहों को समझाता हूँ। रब ने समझाया है बच्चों को रूहानी हवासी ज़रूर बनना है। रब ही बना सकते हैं। दुनिया में एक भी इन्सान नहीं जिसको रूह का इल्म हो।रूह का ही इल्म नहीं है तो पाक परवरदिगार का इल्म कैसे हो सकता है। कह देते रूह सो रब। कितनी भारी भूल में तमाम दुनिया फँसी हुई है। इस वक़्त इन्सानों की अक्ल कोई काम की नहीं है। अपनी ही तबाही के लिए तैयारी कर रहे हैं। तुम बच्चों के लिए यह कोई नई बात नहीं है। जानते हो ड्रामा के मुताबिक उन्हों का भी पार्ट है। ड्रामा की बन्दिश में बांधे हुए हैं। आजकल दुनिया में हंगामा निहायत है। अभी तुम बच्चे हो तबाही के वक़्त प्यारी अक्ल, जो रब से उल्टी अक्ल हैं, उनके लिए फ़ना गाया हुआ है। अभी इस दुनिया को बदलना है। यह भी जानते हो बरोबर क़यामत जंग लगी थी, रब ने सल्तनत ए इबादत सिखायी थी। सहीफों में तो टोटल तबाही लिख दी है। मगर टोटल तबाही तो होना नहीं है फिर तो प्रलय हो जाए। इन्सान कोई भी न रहें सिर्फ़ 5 अनासर रह जाएं। ऐसे तो हो नहीं सकता। प्रलय हो जाए तो फिर इन्सान कहाँ से आये। दिखाते हैं कृष्ण अंगूठा चूसता हुआ पीपल के पत्ते पर सागर में आया। बालक ऐसे आ कैसे सकता। सहीफों में ऐसी-ऐसी बातें लिख दी हैं जो बात मत पूछो। अभी तुम कुमारियों के ज़रिए इन दानिशमंद, भीष्म पितामह वगैरह को भी इल्म के तीर लगने हैं। वह भी आगे चलकर आयेंगे। जितनी-जितनी तुम खिदमत में ज़ोर भरेंगे, रब का तारूफ सबको देते रहेंगे उतना तुम्हारा असर पड़ेगा। हाँ, मुश्किलात भी पड़ेंगी। यह भी गायी हुई है, शैतानी फिरके के इस इल्य यज्ञ में निहायत मुश्किलात पड़ती हैं। तुम सिखला नहीं सकेंगे। इल्म और इबादत रब ही सिखला रहे हैं। ख़ैर निजात दिलाने वाला एक ही रब है। वही नापाको को पाकीज़ा बनाते हैं तो ज़रूर नापाक को ही इल्म देंगे ना। रब को कब सब तरफ़ मौजूद माना जा सकता है क्या! तुम बच्चे समझते हो हम पारस अक्ल बन आलम ए पारस बनते हैं। इन्सानों ने मन्दिर कितने बेइंतहा बनाये हैं। मगर वह कौन है, क्या करके गये हैं, मतलब नहीं समझते हैं। पारसनाथ का भी मन्दिर है। हिन्दुस्तान आलम ए पारस था। सोने, हीरे, जवाहरात के महल थे। कल की बात है। वह तो लाखों साल कह देते हैं सिर्फ़ एक सुनहरे दौर को। और रब फ़रमाते हैं तमाम ड्रामा ही 5 हज़ार साल का है इसलिए कहा जाता है आज हिन्दुस्तान क्या है, कल का हिन्दुस्तान क्या था। लाखों साल की तो किसको याददाश्त रह न सके। तुम बच्चों को अब याददाश्त मिली है। जानते हो 5 हज़ार साल की बात है। रब्बा फ़रमाते इबादत में बैठो। अपने को रूह समझ रब को याद करो। यह इल्म हुआ ना। वह तो हैं हठयोगी। टाँग-टाँग पर चढ़ाकर बैठते हैं। क्या-क्या करते हैं। तुम मातायें तो ऐसे कर नहीं सकती। बैठ भी न सको। कितने बे इंतेहा अकीदत मन्दी की राह के हैं। रब फ़रमाते हैं मीठे बच्चे यह कुछ करने की तुमको दरकार नहीं है। स्कूल में स्टूडेन्ट कायदेसिर तो बैठते हैं। रब वह भी नहीं कहते। जैसे चाहो वैसे बैठो। बैठकर थक जाओ तो अच्छा लेट जाओ। रब्बा कोई बात में मना नहीं करते हैं। यह तो बिल्कुल आसान समझने की बात है, इसमें कोई तकलीफ़ की बात नहीं। भल कितना भी बीमार हो, हो सकता है सुनते-सुनते रहमतुल्आल्मीन की याद में रहते-रहते जान जिस्म से निकल जाएं। गाया जाता है ना - गंगा जल मुंह में हो... तब जान जिस्म से निकले। वह तो तमाम हैं अकीदत मन्दी की राह की बातें। असल में हैं यह इल्म के आब ए हयात की बातें। तुम जानते हो सचमुच ऐसे ही जान जिस्म से निकलनी हैं। तुम बच्चे आते हो तो हमको छोड़कर जाते हो। रब फ़रमाते हैं हम तो तुम बच्चों को साथ ले जाऊंगा। मैं आया ही हूँ - तुम बच्चों को घर ले जाने के लिए। तुमको न अपने घर का मालूम है, न रूह का मालूम है। इबलीस ने बिल्कुल ही पंख काट डाले हैं इसलिए रूह उड़ नहीं सकती है क्योंकि स्याह रास्त है। जब तक ख़ैर रास्त न बनें तब तक दारूल सुकून में जा कैसे सकती। यह भी जानते हैं - ड्रामा प्लैन के मुताबिक सबको स्याह रास्त बनना ही है। इस वक़्त तमाम दरख्त जड़ जड़ीभूत हो गया है। यहाँ किसकी ख़ैर रास्त हालत हो न सके। यहाँ रूह पाकीज़ा बन जाए तो फिर यहाँ ठहरे नहीं, एकदम भाग जाए। तमाम अकीदत करते ही हैं निजात के लिए। मगर कोई भी वापिस जा नहीं सकते हैं। लॉ नहीं कहता। रब यह तमाम राज़ बैठ समझाते हैं - इख्तियार करने के लिए। फिर भी अहम बात है रब को याद करना, दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन बनना। बीज को याद करने से तमाम दरख्त अक्ल में आ जायेगा। तुम एक सेकेण्ड में तमाम जान लेते हो। दुनिया में किसको भी मालूम नहीं - इन्सानी खिल्क़त का बीजरूप तमाम का एक रब है। कृष्ण भगवान नहीं है। कृष्ण को ही श्याम सुन्दर कहते हैं। ऐसे नहीं कि कोई तक्षक सांप ने डसा तब काला हुआ। यह तो ज़िना की आग पर चढ़ने से इन्सान काला होता है। राम को भी काला दिखाते हैं, उनको भला किसने डसा! कुछ भी समझते नहीं। फिर भी जिनकी तक़दीर में है, यक़ीन है तो ज़रूर रब से वर्सा लेंगे। यक़ीन नहीं होगा तो कभी भी नहीं समझेंगे। तक़दीर में नहीं है तो तदवीर भी क्या करेंगे। तकदीर में नहीं है तो फिर वह बैठते ही ऐसे हैं जैसे कुछ भी नहीं समझते हैं। इतना भी यक़ीन नहीं कि रब आये हैं बेहद का वर्सा देने। जैसे कोई नया आदमी मेडिकल कॉलेज में जाकर बैठे तो क्या समझेंगे, कुछ भी नही। यहाँ भी ऐसे आकर बैठते हैं। इस ला फ़ानी इल्म का फ़ना नहीं होता है। वह फिर क्या आकर करेंगे। दारूल हुकूमत क़याम होती है तो नौकर चाकर अवाम, अवाम के भी नौकर चाकर तमाम चाहिए ना। आगे चल कुछ पढ़ने की कोशिश करेंगे मगर है मुश्किल क्योंकि उस वक़्त निहायत हंगामा होगा। रोज़ ब रोज़ तूफान बढ़ते जाते हैं। इतने सेन्टर्स हैं, कई आकर अच्छी तरह समझेंगे भी। यह भी लिखा हुआ है - जिब्राइल अलैहिस्सलाम के ज़रिए क़याम। तबाही भी सामने खड़ी है। तबाही तो होनी ही है। कहते हैं विलादत कम हो। मगर दरख्त का इज़ाफा तो होना ही है। जब तक रब है, तब तक तमाम मज़हबों की रूहों को यहाँ आना ही है। जब जाने का वक़्त होगा तब रूहों का आना बन्द होगा। अभी तो सबको आना ही है, मगर यह बातें कोई समझते नहीं। कहते भी हैं अकीदत मन्दों का हाफ़िज़ अल्लाह ताला। तो ज़रूर अकीदत मन्दी पर आफ़तें आती है। शैतानी सल्तनत में बिल्कुल ही तमाम ख़बीस रूह बन पड़े हैं। शैतानी सल्तनत है इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर के आखिर में, इलाही सल्तनत है सुनहरे दौर वगैरह में। इस वक़्त तमाम यज़ीदी शैतानी फिरक़ा हैं ना। कहते हैं फलाना जहन्नुम रिहाईश नशीन हुआ, तो इसका मतलब यह जहन्नुम रिहाईश नशीन है ना। जन्नत रिहाईश नशीन हुआ तो अच्छा नाम है। यहाँ तब क्या था, ज़रूर जहन्नुम रिहाईश नशीन थे। यह भी समझते नहीं कि हम जहन्नुम रिहाईश नशीन हैं। अब तुम समझते हो रब ही आकर जन्नत रिहाईश नशीन बनायेंगे। गाया भी जाता है हेविनली गॉड फादर। वही आकर हेविन क़ायम करेंगे। तमाम गाते रहते हैं पतित पावन सीताराम। हम नापाक हैं, पाकीज़ा बनाने वाले आप हो। वह तमाम हैं अकीदत मन्दी की राह की सीतायें। रब है राम। किसको सीधा कहो तो मानते नहीं। राम को बुलाते हैं। अभी तुम बच्चों को रब ने तीसरी आंख दी है। तुम जैसे कि अलग दुनिया के हो गये हो।

रब समझाते हैं अभी सबको स्याह रास्त भी ज़रूर बनना है तब तो रब ने आकर सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनाये। रब कितना अच्छी तरह बैठ समझाते हैं। कहते हैं भल तुम बच्चे खिदमत भी अपनी करते हो सिर्फ़ एक बात याद रखो - रब को याद करो। सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनने का और कोई रास्ता बता न सके। तमाम का रूहानी सर्जन एक ही है। वही आकर रूहों को इन्जेक्शन लगाते हैं क्योंकि रूह ही स्याह रास्त बनी है। रब को ला फ़ानी सर्जन कहा जाता है। रूह ला फ़ानी है, पाक परवरदिगार बाप भी ला फ़ानी है। अभी रूह सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ से बुरी खस्लतों से आरास्ता बनी है, उनको इन्जेक्शन चाहिए। रब फ़रमाते हैं बच्चे अपने को रूह यक़ीन करो और अपने रब को याद करो। अक्ल का राब्ता ऊपर में लगाओ तो स्वीट होम में चले जायेंगे। तुम्हारी अक्ल में है अभी हमें अपने स्वीट साइलेन्स होम में जाना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) इल्म और इबादत से अक्ल को पारस बनाना है। कितना भी बीमार हो, तकलीफ़ हो, उसमें भी एक रब की याद रहे।

2) अपनी आला तक़दीर बनाने के लिए पूरा-पूरा यक़ीनी दानिश मन्द बनना है। अक्ल का राब्ता अपने स्वीट साइलेन्स होम में लगाना है।

बरक़ात:-
हमेशा कम्बाइण्ड याफ़्ता की याददाश्त के ज़रिए मुश्किल काम को आसान बनाने वाले डबल लाइट बनो।

जो बच्चे मुसलसल याद में रहते हैं वे हमेशा साथ का एहसास करते हैं। उनके सामने कोई भी मुसीबत आयेगी तो अपने को कम्बाइंड एहसास करेंगे, घबरायेंगे नहीं। ये कम्बाइन्ड याफ़्ता की याददाश्त कोई भी मुश्किल काम को आसान बना देती है। कभी कोई बड़ी बात सामने आये तो अपना बोझ रब के ऊपर रख खुद डबल लाइट हो जाओ। तो फरिश्ते बराबर दिन-रात ख़ुशी में ज़हन से डांस करते रहेंगे।

स्लोगन:-
किसी भी सबब का हल कर मुत्मइन रहने और करने वाले ही इत्मीनान याफ़्ता हैं।


मम्मा के बेशकीमती कलेमात - इल्म और इबादत का कॉन्ट्रास्ट
इबादत और इल्म दो अल्फाज़ हैं, इबादत कहा जाता है पाक परवरदिगार की याद को। और कोई की याद के रिश्ते में इबादत अल्फ़ाज़ नहीं आता। रहबर लोग जो भी इबादत सिखलाते हैं, वह भी पाक परवरदिगार की तरफ़ ही लगाते हैं, मगर उन्हों को सिर्फ़ पाक परवरदिगार का पूरा तारूफ नहीं है इसलिए इबादत की पूरी सिद्धि नहीं मिलती। इबादत और इल्म दोनों कुव्वत हैं, जिस दोनों की तजवीज़ से माइट मिलती है और हम गुनाहगार फ़तहयाब बन अफ़ज़ल ज़िन्दगी बनाते हैं। इबादत अल्फ़ाज़ तो तमाम कहते हैं मगर जिससे इबादत लगायी जाती है उनका पहले तारूफ चाहिए। अब यह पाक परवरदिगार का तारूफ भी हमें पाक परवरदिगार के ज़रिए ही मिलता है, उस तारूफ से इबादत लगाने से मुकम्मल सिद्धि मिलती है। इबादत से हम पास्ट गुनाहों का बोझा ख़ाक करते हैं और इल्म से भी मालूम पड़ता है कि आगे के लिये हमको कौन-सा आमाल करना है और क्यों? ज़िन्दगी की जड़ हैं आदत, रूह भी अब्दी आदतों से बनी हुई है मगर आमाल से वो आदत बदलती रहती हैं। इबादत और इल्म से रूह में अफ़ज़ल नशीनी आती है और ज़िन्दगी में कुव्वत आती है, मगर यह दोनों चीज़ मिलती हैं पाक परवरदिगार से। बन्दिश ए आमाल से छुड़ाने का रास्ता भी हमें पाक परवरदिगार से दस्तयाब होता है। हमने जो गुनाहों से बन्दिश ए आमाल बनाये हैं उनसे आज़ाद हो और आगे के लिये हमारे आमाल गुनाह न बनें तो इन दोनों की कुव्वत पाक परवरदिगार के सिवाए कोई दे नहीं सकता। इबादत और इल्म दोनों ही चीज़ पाक परवरदिगार ले आता है, इबादत की आतिश से किये हुए गुनाह ख़ाक कराते हैं और इल्म से मुस्तकबिल के लिये अफ़ज़ल आमाल सिखलाते हैं, जिससे आमाल, न्युट्रल आमाल होता है तभी तो पाक परवरदिगार ने कहा है कि इस आमाल-न्युटरल आमाल-गुनाहग़ार आमाल की रफ्तार निहायत गहरी है। अब तो हम रूहों को डायरेक्ट पाक परवरदिगार की कुव्वत चाहिए,सहीफों के ज़रिए यह इबादत और इल्म की कुव्वत नहीं मिल सकती मगर उस तमाम कुव्वत नशीन ताकतवर के ज़रिए ही ताक़त मिलती है। अब हमको अपनी ज़िंदगी की जड़ (आदत) ऐसी बनानी हैं जिससे ज़िन्दगी में ख़ुशी मिले। तो पाक परवरदिगार आए ज़िन्दगी की जड़ में खालिस आदतों का बीज डालता है, जिन खालिस आदतों की बुनियाद पर हम आधा चक्कर ज़िंदगी ए आज़ाद बनेंगे। अच्छा - आमीन।

आमीन