01-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
तुम्हें हूरैन बनना है इसलिए इबलीस की बुरी खस्लतों को हलाक करो, गुस्सा करना, मारना, तंग करना, बुरा काम करना, चोरी-चकारी करना यह सब अज़ीम गुनाह है

सवाल:-
इस इल्म में कौन-से बच्चे तीखे जा सकते हैं? घाटा किन्हें पड़ता है?

जवाब:-
जिन्हें अपना पोतामेल रखना आता है वह इस इल्म में निहायत तीखे जा सकते हैं। घाटा उनको पड़ता है जो रूहानी हवासी नहीं रहते। रब्बा फ़रमाते व्यापारी लोगों को पोतामेल निकालने की आदत होती है, वह यहाँ भी तीखे जा सकते हैं।

नग़मा:-
मुखड़ा देख ले प्राणी........

आमीन।
रूहानी पार्टनशीन बच्चों के वास्ते रब समझाते हैं क्योंकि रूह ही पार्ट बजा रही है बेहद के ड्रामा में। है तो इन्सानों का ना। बच्चे इस वक़्त तजवीज़ कर रहे हैं। भल वेद-सहीफें पढ़ते हैं, अल्ल्लाह् ताला की इबादत करते हैं मगर रब फ़रमाते हैं इनसे कोई मेरे को हासिल नहीं कर सकते क्योंकि अकीदत मन्दी है ही उतरता फ़न। इल्म से ख़ैर निजात होती है तो ज़रूर कोई से उतरते भी होंगे। यह एक खेल है, जिसको कोई भी जानते नहीं। शिवलिंग को जब पूजते हैं तो उनको ब्रह्म नहीं कहेंगे। तब कौन है जिसको पूजते हैं। उनको भी ईश्वर समझ पूजा करते हैं। तुम जब पहले-पहले अकीदत मन्दी शुरू करते हो तो शिवलिंग हीरे का बनाते हो। अभी तो ग़रीब बन गये हैं तो पत्थर का बनाते हैं। हीरे का लिंग उस वक़्त 4-5 हज़ार का होगा। इस वक़्त तो उनका दाम 5-7 लाख होगा। ऐसे हीरे अभी मुश्किल निकलते हैं। पत्थर अक्ल बन गये हैं तो पूजा भी पत्थर की करते हैं, इल्म बिगर। जब इल्म है तो तुम इबादत नहीं करते हो। ज़िन्दा सामने में है, उनको ही तुम याद करते हो। जानते हो याद से गुनाहों का ख़ात्मा होंगा। नग़में में भी कहते हैं - ए बच्चों, प्राणी कहा जाता है रूह को। जान निकल गया फिर जैसे मुर्दा है। रूह निकल जाती है। रूह है ला फ़ानी। रूह जब जिस्म में दाखिली करती है तब ज़िन्दा है। रब फ़रमाते हैं - ए रूहें, अपने अन्दर तफ़्तीश करो कहाँ तक हूरैन फ़ज़ीलत को इख्तियार किया है? कोई ख़बासत तो नहीं है? चोरी चकारी वगैरह की कोई शैतानी खस्लत तो नहीं है ना? शैतानी फराइज़ करने से फिर गिर पड़ेंगे। इतना दर्जा नहीं पा सकेंगे। ख़राब आदत को मिटाना ज़रूर है। हूरैन कभी कोई पर गुस्सा नहीं करते। यहाँ शैतानों के ज़रिए कितनी मारें खाते हैं क्योंकि तुम हूरैन फिरक़ा बनते हो तो इबलीस कितना दुश्मन बन पड़ता है। इबलीस की बुरी खस्लतें काम करती हैं। मारना, तंग करना, बुरा काम करना यह तमाम अज़ाब है। तुम बच्चों को तो निहायत खालिस रहना चाहिए। चोरी चकारी वगैरह करना तो अज़ीम गुनाह है। रब से तुम अहद करते आये हो - रब्बा मेरा तो आप एक दूसरा न कोई। हम आपको ही याद करेंगे। अकीदत मन्दी की राह में भल गाते हैं मगर उनको मालूम नहीं है कि याद से क्या होता है। वह तो रब को जानते ही नहीं। एक तरफ़ कहते हैं नाम-रूप से न्यारा है, दूसरे तरफ़ फिर लिंग की पूजा करते हैं। तुमको अच्छी तरह समझकर फिर समझाना है। रब फ़रमाते हैं यह भी जज करो कि अज़ीम रुह किसको कहा जाए? श्रीकृष्ण जो छोटा बच्चा जन्नत का प्रिन्स है, वह अज़ीम रुह है या आजकल के इख्तिलाफी फितने के दौर के इन्सान? वह ख़बासत से पैदा नहीं होता है ना। वह है ग़ैर ख़बासती दुनिया। यह है ख़बासती दुनिया। ग़ैर ख़बासती को निहायत टाइटिल दे सकते हैं। ख़बासती का क्या टाइटिल है? अफ़ज़ल नशीन तो एक रब ही बनाते हैं। वह है सबसे आला ते आला और तमाम इन्सान पार्ट नशीन हैं तो पार्ट में ज़रूर आना पड़े। सुनहरा दौर है अफ़ज़ल इन्सानों की दुनिया। जानवर वगैरह तमाम अफ़ज़ल हैं। वहाँ इबलीस शैतान ही नहीं। वहाँ ऐसे कोई स्याह रास्त जानवर होते नहीं। तुमको मालूम है - मोर-डेल है वह ख़बासत से बच्चा पैदा नहीं करते। उनको आंसू गिरता है, उसे डेल इख्तियार करती है। नेशनल बर्ड कहते हैं। सुनहरे दौर में भी ख़बासत का नाम नहीं। मोर का पंख, पहला नम्बर जो दुनिया का प्रिन्स है श्रीकृष्ण, उनके माथे में लगाते हैं। कोई तो राज़ होगा ना। तो यह सब बातें रब रिफाइन कर समझाते हैं। वहाँ बच्चे कैसे पैदा होते हैं, वह तो तुम जानते हो। वहाँ ख़बासत होती नहीं। रब फ़रमाते हैं तुमको हूरैन बनाते हैं तो अपनी तफ्तीश पूरी करो। मेहनत बिगर दुनिया का मालिक थोड़े ही बन सकेंगे।
जैसे तुम्हारी रूह बिन्दी है वैसे रब भी बिन्दी है। इसमें मूँझने की कोई दरकार नहीं है। कोई कहते हैं हम देखें। रब फ़रमाते हैं देखने वालों की तो तुमने निहायत बुतपरस्ती की। फ़ायदा कुछ भी हुआ नहीं। अब हक़ीक़ी तौर पर मैं तुमको समझाता हूँ। मेरे में तमाम पार्ट भरा हुआ है। सुप्रीम सोल हूँ ना, सुप्रीम फादर। कोई भी बच्चा अपने जिस्मानी बाप को ऐसे नहीं कहेंगे। एक को ही कहा जाता है। राहिबों को तो बच्चे हैं नहीं जो बाप कहें। यह तो तमाम रूहों का बाप है, जो वर्सा देते हैं। उन्हों का कोई घरेलू राब्ता तो ठहरा नहीं। रब बैठ समझाते हैं - तुमने ही 84 विलादत भोगे हैं। पहले-पहले तुम सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ थे फिर नीचे उतरते आये हो। अभी कोई अपने को सुप्रीम थोड़े ही कहेंगे, अभी तो नींच समझते हैं। रब बार-बार समझाते हैं असल बात कि अपने अन्दर देखो कि हमारे में कोई ख़बासत तो नहीं हैं? रात को रोज़ अपना पोतामेल निकालो। व्यापारी हमेशा पोतामेल निकालते हैं। गवर्मेन्ट सर्वेन्ट पोतामेल नहीं निकाल सकते। उन्हों को तो मुकरर तनखा मिलती है। इस इल्म की राह में भी व्यापारी तीखे जाते हैं, पढ़े-लिखे आफिसर्स इतना नहीं। व्यापार में तो आज 50 कमाया, कल 60 कमायेंगे। कभी घाटा भी हो जायेगा। गवर्मेन्ट सर्वेन्ट की फिक्स पे होती है। इस कमाई में भी अगर रूहानी हवासी नहीं होंगे तो घाटा पड़ जायेगा। मातायें तो व्यापार करती नहीं। उनके लिए फिर और ही आसान है। कन्याओं के लिए भी आसान है क्योंकि माताओं को तो सीढ़ी उतरनी पड़ती है। कुर्बानी उनकी जो इतनी मेहनत करती हैं। कन्यायें तो ख़बासत में गई ही नहीं तो छोड़े फिर क्या। मर्दों को तो मेहनत लगती है। कुनबे फैमिली की सम्भाल करनी पड़ती है। सीढ़ी जो चढ़ी है वह तमाम उतरनी पड़ती है। घड़ी-घड़ी इबलीस थप्पड़ मार गिरा देता है। अभी तुम बी.के. बने हो। कुमारियाँ पाकीज़ा ही होती हैं। सबसे जास्ती होता है खाविन्द का प्यार। तुम्हें तो खाविन्दों के खाविन्द (पाक परवरदिगार) को याद करना है और सबको भूल जाना है। माँ-बाप का बच्चों में लगाव होता है। बच्चे तो हैं ही अन्जान। शादी के बाद लगाव शुरू होता है। पहले औरत प्यारी लगती फिर ख़बासत में ढकेलने की सीढ़ी शुरू कर देते हैं। कुमारी ग़ैर ख़बासती है तो पूजी जाती। तुम्हारा नाम है बी.के.। तुम अज़मत लायक़ बन फिर इबादत लायक़ बनते हो। रब ही तुम्हारा उस्ताद भी है। तो तुम बच्चों को नशा रहना चाहिए, हम स्टूडेन्ट हैं। अल्ल्लाह् ताला ज़रूर भगवान-भगवती ही बनायेंगे। सिर्फ समझाया जाता है - अल्ल्लाह् ताला एक है। बाक़ी सब हैं भाई-भाई। दूसरा कोई कनेक्शन नहीं। बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम से मख़लूक़ होते है फिर इज़ाफ़ा होता है। रूहों का इज़ाफा नहीं कहेंगे। इज़ाफ़ा इन्सानों का होता है। रूहों का तो लिमिट नम्बर है। निहायत आते रहते हैं। जब तक वहाँ हैं, आते रहेंगे। दरख़्त बढ़ता रहेगा। ऐसे नहीं कि सूख जायेगा। इनका मवाज़ना बनेन ट्री से किया जाता है। फाउन्डेशन है नहीं। बाक़ी तमाम दरख्त खड़ा है। तुम्हारा भी ऐसे है। फाउन्डेशन है नहीं। कुछ न कुछ निशानी है। अभी तक भी मन्दिर बनाते रहते हैं। इन्सानों को थोड़े ही मालूम है कि हूरैन की सल्तनत कब थी। फिर कहाँ गई? यह नॉलेज तुम मोमिनों को ही है। इन्सानों को यह मालूम नहीं कि पाक परवरदिगार का रूप बिन्दी है। गीता में लिख दिया है कि वह अखण्ड ज्योति स्वरूप है। आगे बहुतों को मोजिज़ा होता था जज़्बात के मुताबिक। निहायत लाल-लाल हो जाते थे। बस हम नहीं बर्दाश्त कर सकते। अब वह तो मोजिज़ा था। रब फ़रमाते हैं मोजिज़े से कोई फ़लाह नहीं। यहाँ तो अहम है याद का सफ़र। जैसे पारा खिसक जाता है ना। याद भी घड़ी-घड़ी खिसक जाती है। कितना चाहते हैं रब को याद करें फिर और-और ख्याल आ जाते हैं। इसमें ही तुम्हारी रेस है। ऐसे नहीं कि फट से अज़ाब मिट जायेंगे। वक़्त लगता है। मुकम्मल हालत हो जाए तो फिर यह जिस्म ही न रहे। मगर अभी कोई मुकम्मल हालत को नहीं पा सकते हैं। फिर उनको जन्नती जिस्म चाहिए। तो अब तुम बच्चों को रब को ही याद करना है। अपने को देखते रहो - हमसे कोई बुरा काम तो नहीं होता है? पोतामेल ज़रूर रखना है। ऐसे व्यापारी झट दौलत मन्द बन सकते हैं।
रब के पास जो नॉलेज है वह दे रहे हैं। रब फ़रमाते हैं मेरी रूह में यह इल्म नूँधा हुआ है। हूबहू तुम को वही बोलेंगे जो कल्प पहले इल्म दिया था। बच्चों को ही समझायेंगे, और क्या जानें। तुम इस ख़िल्क़त के चक्कर को जानते हो, इसमें तमाम एक्टर्स का पार्ट नूँधा हुआ है। बदल सदल नहीं सकता। न कोई छुटकारा पा सकता। हाँ, बाक़ी वक़्त ए निजात मिलती है। तुम तो आलराउण्ड हो। 84 विलादत लेते हो। बाक़ी सब अपने घर में होंगे फिर पिछाड़ी में आयेंगे। निजात चाहने वाले यहाँ आयेंगे नहीं। वह फिर पिछाड़ी में चले जायेंगे। इल्म कभी सुनेंगे नहीं। मच्छरों के मुआफिक आये और गये। तुम तो ड्रामा के मुताबिक़ पढ़ते हो। जानते हो रब्बा ने 5 हज़ार साल पहले भी ऐसे हक़ीक़ी इबादत सिखायी थी। तुम फिर औरों को समझाते हो कि पाक परवरदिगार ऐसे फ़रमाते हैं। अभी तुम जानते हो हम कितने आला थे, अब कितने नींच बने हैं। फिर रब आलातरीन बनाते हैं तो ऐसी तजवीज़ करनी चाहिए ना। यहाँ तुम आते हो रिफ्रेश होने। इसका नाम ही पड़ा है मधुबन। तुम्हारे कलकत्ता और बाम्बे में थोड़े ही नूरानी कलेमात चलाते हैं। मधुबन में ही मुरली बाजे। मुरली सुनने के लिए रब के पास आना होगा रिफ्रेश होने। नई-नई प्वाइंट्स निकलती रहती हैं। सामने सुनने में तो फील करते हो, निहायत फर्क रहता है। आगे चल निहायत पार्ट देखने हैं। रब्बा पहले-पहले तमाम सुना दे तो टेस्ट निकल जाए। आहिस्ते-आहिस्ते इमर्ज होता जाता है। एक सेकण्ड न मिले दूसरे से। रब आये हैं रूहानी खिदमत करने तो बच्चों का भी फ़र्ज है रूहानी खिदमत करना। कम से कम यह तो बताओ - रब को याद करो और पाकीज़ा बनो। पाकीज़गी में ही फेल होते हैं क्योंकि याद नहीं करते हैं। तुम बच्चों को निहायत ख़ुशी होनी चाहिए। हम बेहद के रब के सामने बैठे हैं जिसको कोई भी नहीं जानते हैं। दरिया ए इल्म वह पाक परवरदिगार ही है। जिस्म नशीन से अक्ल का राब्ता निकाल देना चाहिए। पाक परवर दिगार की यह गाड़ी है। इनका रिगार्ड नहीं रखेंगे तो धर्मराज के ज़रिए निहायत डन्डे खाने पड़ेंगे। बड़ों का रिगार्ड तो रखना है ना। आदम अलैहिस्सलाम का कितना रिगार्ड रखते हैं। जड़ तस्वीर का इतना रिगार्ड है तो ज़िन्दा का कितना रखना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1) अन्दर में अपनी तफ्तीश कर हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार करनी हैं। ख़राब आदतों को निकालना है। अहद करना है - रब्बा हम कभी भी बुरा काम नहीं करेंगे।

2) मुकम्मल हालत को हासिल करने के लिए याद की रेस करनी है। रूहानी खिदमत में तैयार रहना है। बड़ों का रिगार्ड रखना है।

बरक़ात:-
सर्व खज़ानों को खुद के वास्ते और औरों के वास्ते यूज़ करने वाले मुसलसल अज़ीम सदक़ा नशीन बनो।

जैसे रब का भण्डारा हमेशा चलता रहता है, रोज़ देते हैं ऐसे आपका भी मुसलसल लंगर चलता रहे क्योंकि आपके पास इल्म का, कुव्वतों का, खुशियों का भरपूर भण्डारा है। इसे साथ में रखने और यूज़ करने में कोई भी खतरा नहीं है। यह भण्डारा खुला होगा तो चोर नहीं आयेगा। बंद रखेंगे तो चोर आ जायेंगे इसलिए रोज़ अपने मिले हुए खज़ानों को देखो और खुद के वास्ते और औरों के वास्ते यूज करो तो मुसलसल सदक़ा नशीन बन जायेंगे।

स्लोगन:-
सुने हुए को ग़ौरतलब करो, ग़ौरतलब करने से ही कुव्वत नशीन बनेंगे।

आमीन