01-11-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 11-04-86


अफ़ज़ल तक़दीर की तस्वीर बनाने का तरीका


आज तक़दीर बनाने वाले रब उल हक़ तमाम बच्चों की अफ़ज़ल तक़दीर की तस्वीर देख रहे हैं। तक़दीर-वान तमाम बने हैं, मगर हर एक के तक़दीर की तस्वीर की झलक अपनी-अपनी है। जैसे कोई भी तस्वीर बनाने वाले तस्वीर बनाते हैं तो कोई तस्वीर हज़ारों रुपयों के दाम की बेशकीमती होती है, कोई सादा भी होती है। यहाँ रब उल हक़ के ज़रिए मिले हुए क़िस्मत को, तक़दीर को तस्वीर में लाना यानि कि प्रैक्टिकल ज़िन्दगी में लाना है। इसमें फ़र्क हो जाता है। तक़दीर बनाने वाले ने एक ही वक्त और एक ने ही तमाम को तक़दीर बांटी। मगर तक़दीर को तस्वीर में लाने वाली दरेक रूह अलग-अलग होने के सबब जो तस्वीर बनाई है उसमें नम्बरवार दिखाई दे रहे हैं। कोई भी तस्वीर की खासियत आंख और मुस्कराहट होती है। इन दो खासियतों से ही तस्वीर की कीमत होती है। तो यहाँ भी तक़दीर के तस्वीर की यही दो खासियत हैं। आंख यानि कि रूहानी जहान फ़लाह नशीन, रहम दिल, दूसरों पर रहमत नशीन निगाह। अगर निगाह में यह खासियत हैं तो क़िस्मत की तस्वीर अफ़ज़ल है। असल बात है नज़र और मुस्कराहट, चेहरे की चमक। यह है हमेशा मुत्मइन रहने की, मुत्मइन नशीन और ख़ुशग्वार की झलक। इसी खासियतों से हमेशा चेहरे पर रूहानी चमक आती है। रूहानी मुस्कान एहसास होती है। यह दो खासियतें ही तस्वीर की कीमत बढ़ा देती हैं। तो आज यही देख रहे थे। तक़दीर की तस्वीर तो तमाम ने बनाई है। तस्वीर बनाने की कलम रब ने सबको दी है। वह कलम है - अफ़ज़ल याददाश्त, अफ़ज़ल आमालों का इल्म। अफ़ज़ल आमालों का और अफ़ज़ल इरादा यानि कि याददाश्त। इस इल्म की कलम के ज़रिए हर रूह अपनी तक़दीर की तस्वीर बना रही है, और बना भी ली है। तस्वीर तो बन गई है। नैन चैन भी बन गये हैं। अब लास्ट टचिंग है मुकम्मल नशीनी'' की। रब जैसा बनने की। डबल विदेशी तस्वीर बनाना ज़्यादा पसन्द करते हैं ना। तो रब उल हक़ भी आज तमाम की तस्वीर देख रहे हैं। हरेक अपनी तस्वीर देख सकते हैं ना कि कहाँ तक तस्वीर बेशकीमती बनी है। हमेशा अपनी इस रूहानी तस्वीर को देख इसमें मुकम्मल नशीनी लाते रहो। दुनिया की रूहों से तो अफ़ज़ल क़िस्मत नशीन करोड़ों में कोई, कोई में भी कोई बेशकीमती और अफ़ज़ल क़िस्मत नशीन तो हो ही, मगर एक हैं अफ़ज़ल, दूसरे हैं अफ़ज़ल ते अफ़ज़ल। तो अफ़ज़ल बने हैं और अफ़ज़ल ते अफ़ज़ल बने हैं? यह चेक करना है। अच्छा!

अब डबल विदेशी रेस करेंगे ना! आगे नम्बर लेना है और आगे वालों को देख ख़ुश होना है। देख-देख ख़ुश होना भी ज़रूरी है, मगर खुद पीछे होकर नहीं देखो, साथ-साथ होते दूसरों को भी देख ख़ुशग्वार हो चलो। खुद भी आगे बढ़ो और पीछे वालों को भी आगे बढ़ाओ। इसी को ही कहते हैं दूसरों पर रहमत नशीन। यह दूसरों पर रहमत नशीन बनना इसकी खासियत है - खुदगर्ज जज़्बे से हमेशा आज़ाद रहना। हर माहौल में, हर काम में हर मददगार तनज़ीम में जितना बेगर्ज पन होगा, उतना ही दूसरों पर रहमत नशीन होगें। खुद हमेशा लबरेज़ एहसास करेंगे। हमेशा दस्तयाबी खुद के रूप की सूरत ए हाल में होगी। तब दूसरों पर रहमत नशीन की लास्ट स्टेज एहसास कर और दूसरों को करा सकेंगे। जैसे आदम अलैहिस्सलाम बाप को देखा लास्ट वक़्त की सूरत ए हाल में बेनियाज़'' और दूसरों पर रहमत'' यह खासियत हमेशा देखी। खुद के वास्ते कुछ भी कबूल नहीं किया। न अज़मत कबूल की, न चीज़ कबूल की। न रहने का मुकाम कबूल किया। मैकरू और महीन हमेशा पहले बच्चे''। इसको कहते हैं दूसरों पर रहमत नशीन।। यही लबरेज़ नशीनी की और मुकम्मल नशीनी की निशानी है। समझा!
नूरानी कलेमात तो निहायत सुने। अब नूरानी कलेमात नशीन बन हमेशा नाचते और नचाते रहना है। मुरली से साँप के ज़हर को भी खत्म कर लेते हैं। तो ऐसा नूरानी कलेमात नशीन हो जो किसी का कितना भी कडुवा रवैया-आदत हो उसको भी बस कर दे यानि कि उससे आज़ाद कर नचा दे। ख़ुशहाल बना दे। अभी यह रिज़ल्ट देखेंगे कि कौन-कौन ऐसे क़ाबिल नूरानी कलेमात नशीन बनते हैं। नूरानी कलेमात से भी प्यार है, नूरानी कलेमात नशीन से भी प्यार है मगर प्यार का सबूत है, जो नूरानी कलेमात नशीन की हर बच्चे के वास्ते नेक उम्मीद है - वह प्रैक्टिकल में दिखाना। प्यार की निशानी है जो कहा वह करके दिखाना। ऐसे मास्टर नूरानी कलेमात नशीन हो ना। बनना ही है, अब नहीं बनेंगे तो कब बनेंगे। करेंगे, यह ख्याल नहीं करो। करना ही है। हर एक यही सोंचे कि हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। हमको करना ही है। बनना ही है। चक्कर की बाज़ी जीतनी ही है। तमाम चक्कर की बात है। तो फर्स्ट डिवीज़न मे आना है, यह मज़बूती इख्तियार करनी है। कोई नई बात कर रहे हो क्या? कितना बार की हुई बात को सिर्फ़ लकीर के ऊपर लकीर खींच रहे हो। ड्रामा की लकीर खींची हुई है। नई लकीर भी नहीं लगा रहे हो, जो सोचो कि मालूम नहीं सीधी होगी या नहीं। चक्कर-चक्कर की बनी हुई उजूरा को सिर्फ़ बनाते हो क्योंकि आमालों के सिले का हिसाब है। बाक़ी नई बात क्या है? यह तो निहायत पुरानी है, हुई पड़ी है। यह है पुख्ता यक़ीन। इसको मज़बूती कहते हैं, इसको इबादत नशीनी कहते हैं। हर इरादे में मज़बूती माना इबादत। अच्छा!

रब उल हक़ हाइएस्ट होस्ट भी है और गोल्डन गेस्ट भी है। होस्ट बनकर भी मिलते हैं, गेस्ट बनकर आते हैं। मगर गोल्डन गेस्ट है। चमकीला है ना। गेस्ट तो निहायत देखे- मगर गोल्डन गेस्ट नहीं देखा। जैसे चीफ़ गेस्ट को बुलाते हो तो वह थैंक्स देते हैं। तो आदम अलैहिस्सलाम बाप ने भी होस्ट बन इशारे दिये और गेस्ट बन सबको मुबारक दे रहे हैं। जिन्होंने पूरी सीज़न में खिदमत की उन सबको गोल्डन गेस्ट के रूप में मुबारकबाद दे रहे हैं। सबसे पहली मुबारक किसको? ज़रिया दादियों को। रब उल हक़,बे मुश्किल खिदमत के खात्में की मुबारक दे रहे हैं। मधुबन रिहाईश नशीनियों को भी बे मुश्किल ख़ुशहाल बन मेहमान-निवाज़ी करने की ख़ास मुबारक दे रहे हैं। अल्ल्लाह् ताला भी मेहमान बन आया तो बच्चे भी। जिसके घर में अल्ल्लाह् ताला मेहमान बनकर आवे वह कितने क़िस्मत नशीन हैं। गाड़ी को भी मुबारक हैं क्योंकि यह पार्ट बजाना भी कोई कम बात नहीं। इतनी कुव्वतों को इतना वक़्त दाखिल होने पर इख्तियार करना यह भी ख़ास पार्ट है। मगर यह समाने की कुव्वत का सिला आप सबको मिल रहा है। तो समाने की कुव्वत की खासियत से रब उल हक़ की कुव्वतों को समाना यह भी ख़ास पार्ट कहो या फ़ज़ीलत कहो। तो तमाम खिदमतगार में यह भी खिदमत का पार्ट बजाने वाली बे मुश्किल रही। इसके लिए मुबारक हो और पदमापदम थैंक्स। डबल विदेशियों को भी डबल थैंक्स क्योंकि डबल विदेशियों ने मधुबन का फज़ल कितना बेहतर कर दिया। मोमिन कुनबे के सिंगार डबल विदेशी हैं। मोमिन कुनबे में मुल्क वालों के साथ ग़ैर मुल्क वाले भी हैं तो तजवीज़ की भी मुबारक और मोमिन कुनबे का सिंगार बनने की भी मुबारक। मधुबन कुनबे की ख़ास सौगात हो इसलिए डबल विदेशियों को डबल मुबारक दे रहे हैं। चाहे कहाँ भी हैं। सामने तो थोड़े है मगर चारों ओर के हिन्दुस्तान रिहाईश नशीन बच्चों को और डबल विदेशी बच्चों को बड़ी दिल से मुबारक दे रहे हैं। हर एक ने निहायत अच्छा पार्ट बजाया। अब सिर्फ़ एक बात रही है बराबर और मुकम्मल नशीनी की।'' दादियां भी अच्छी मेहनत करती। रब उल हक़, दोनों का पार्ट जिस्मानी में बजा रही हैं इसलिए रब उल हक़ दिल से प्यार के साथ मुबारक देते हैं। सबने निहायत अच्छा पार्ट बजाया। आलराउण्ड तमाम खिदमतगार चाहे छोटी-सी सादी खिदमत है मगर वह भी अज़ीम है। हर एक ने अपना भी जमा किया और सवाब भी हासिल किया। तमाम देस-विदेस के बच्चों के पहुँचने की भी खासियत मुबारक के काबिल है। तमाम अज़ीम हस्तियों ने मिलकर खिदमत का अफ़ज़ल इरादा प्रैक्टिकल में लाया और लाते ही रहेंगे। खिदमत में जो ज़रिया है उन्हों को भी तकलीफ़ नहीं देनी चाहिए। अपने अलबेलेपन से किसको मेहनत नहीं करानी चाहिए। अपनी चीज़ों को सम्भालना यह भी नॉलेज है। याद है ना आदम अलैहिस्सलाम बाप क्या कहते थे? रुमाल खोया तो कभी खुद को भी खो देगा। हर आमाल में अफ़ज़ल और कामयाब रहना इसको कहते नॉलेजफुल। जिस्म की भी नॉलेज, रूह की भी नॉलेज। दोनों नॉलेज हर आमाल में चाहिए, जिस्म की बीमारी की भी नॉलेज चाहिए। मेरा जिस्म किस तरीक़े से दुरुस्त चल सकता है। ऐसे नहीं रूह तो कुव्वत नशीन है, जिस्म कैसा भी है। जिस्म दुरुस्त नहीं होगा तो राब्ता भी नहीं लगेगा। फिर जिस्म अपनी तरफ़ खींचता है इसलिए नॉलेजफुल में यह तमाम नॉलेज आ जाती है। अच्छा।

कुछ कुमारियों का जलसा ए निसार रब उल हक़ के सामने हुआ

रब उल हक़ तमाम ख़ास रूहों को निहायत खूबसूरत सजा-सजाया देख रहे हैं। इलाही फ़ज़ीलतों का सिंगार कितना बढ़िया, तमाम को फाज़िल बना रहा है। लाइट का ताज कितना खूबसूरत चमक रहा है। रब उल हक़ ला फ़ानी सिंगारी हुई सूरतों को देख रहे हैं। रब उल हक़ को बच्चों का यह जोश-हुल्लास का इरादा देख ख़ुशी होती है। रब उल हक़ ने तमाम को हमेशा के लिए पसन्द कर लिया। आपने भी पक्का पसन्द कर लिया है ना! मज़बूत इरादे का हथियाला बंध गया। रब उल हक़ के पास हरेक के दिल के प्यार का इरादा सबसे जल्दी पहुंचता है। अभी इरादे में भी यह अफ़ज़ल बन्दिश ढीली नहीं होगी। इतनी पक्की बांधी है ना। कितने विलादतों का वायदा किया? यह आदम अलैहिस्सलाम बाप के साथ हमेशा रिश्ते में आने का पक्का वायदा है और गैरन्टी है कि हमेशा अलग नाम, रूप, रिश्ते में 21 विलादत तक तो साथ रहेंगे ही। तो कितनी ख़ुशी है, हिसाब कर सकती हो? इसका हिसाब निकालने वाला कोई नहीं निकला है। अभी ऐसे ही हमेशा सजे सजाये रहना, हमेशा ताजनशीन रहना और हमेशा ख़ुशी में हंसते-गाते रूहानी मौज में रहना। आज तमाम ने मज़बूत इरादा किया ना - कि कदम, कदम पर रखने वाले बनेंगे। वह तो मैकरू पैर के ऊपर पैर रखते है मगर आप तमाम इरादा रूपी कदम पर कदम रखने वाले। जो रब का इरादा वह बच्चों का इरादा- ऐसा इरादा किया? एक कदम भी रब के कदम के सिवाए यहाँ वहाँ का न हो। हर इरादा काबिल करना यानि कि रब के जैसा कदम के पीछे कदम रखना। अच्छा!

विदेसी भाई-बहनों से- जैसे एरोप्लेन में उड़ते-उड़ते आये ऐसे अक्ल रूपी एरोप्लेन भी इतना ही फास्ट उड़ता रहता है ना क्योंकि वह एरोप्लेन सरकमस्टॉन्स के सबब नहीं भी मिले मगर अक्ल रूपी एरोप्लेन हमेशा साथ है और हमेशा कुव्वत नशीन है तो सेकेण्ड में जहाँ चाहें वहाँ पहुच जाएं। तो इस एरोप्लेन के मालिक हो ना। हमेशा यह अक्ल का एरोप्लेन एवररेडी हो यानि कि हमेशा अक्ल की लाइन क्लीयर हो। अक्ल हमेशा ही रब के साथ कुव्वत नशीन हो तो जब चाहेंगे तब सेकेण्ड में पहुंच जायेंगे। जिसका अक्ल का एरोप्लेन पहुंचता है, उसका वह भी एरोप्लेन चलता है। अक्ल का एरोप्लेन दुरूस्त नहीं तो वह एरोप्लेन भी नहीं चलता । अच्छा!

पार्टियों से- 1. हमेशा अपने को हकीक़ी इबादत नशीन अफ़ज़ल रूहें एहसास करते हो? हक़ीक़ी इबादत नशीन यानि कि तमाम आज़ाओं के बादशाह। बादशाह बन आज़ाओं को चलाने वाले, न कि आज़ाओं के बस चलने वाले। जो आज़ाओं के बस चलने वाले हैं उनको अवाम इबादत नशीन कहेंगे, हक़ीक़ी इबादत नशीन नहीं। जब इल्म मिल गया कि यह आज़ा मेरे गुलाम हैं, मैं मालिक हूँ, तो मालिक कभी खिदमतगार के बस नहीं हो सकता। कितनी भी कोई कोशिश करे मगर हक़ीक़ी इबादत नशीन रूहें हमेशा अफ़ज़ल रहेंगी। हमेशा सल्तनत करने की आदत अभी हक़ीक़ी इबादती ज़िन्दगी में भरनी हैं। कुछ भी हो जाए - यह टाइटिल अपना हमेशा याद रखना कि मैं हक़ीक़ी इबादत नशीन हूँ। तमाम कुव्वतों की ताक़त है, यक़ीन है तो कामयाबी हक़ के रूप में मिल जाती है। हक़ आसानी से दस्तयाब होता है, मुश्किल नहीं होता। तमाम कुव्वतों की बुनियाद से हर काम कामयाब हुआ ही पड़ा है। हमेशा फखुर रहे कि मैं दिलतख्तनीशन रूह हूँ। यह फ़खुर कई फिकरों से पार करा देता है। फ़खुर नहीं तो फिकर ही फिकर है। तो हमेशा फ़खुर में रह बरक़ाती बन बरक़ात बांटते चलो। खुद लबरेज़ बन औरों को लबरेज़ बनाना है। औरों को बनाना यानि कि जन्नत की सीट का सर्टीफिकेट देते हो। कागज का सर्टीफिकेट नहीं, हक़ का। अच्छा!

2. हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाले, अखुट ख़ज़ाने के मालिक बन गये। ऐसे ख़ुशी का एहसास करते हो! क्योंकि आजकल की दुनिया है ही धोखेबाज'। धोखेबाज दुनिया से किनारा कर लिया। धोखे वाली दुनिया से लगाव तो नहीं! खिदमत के वास्ते कनेक्शन दूसरी बात है मगर ज़हन का लगाव नहीं होना चाहिए। तो हमेशा अपने को नाचीज़ नहीं, सादा नहीं मगर अफ़ज़ल रूह हैं, हमेशा रब के प्यारे हैं, इस नशे में रहो। जैसा रब वैसे बच्चा - कदम पर कदम रखते यानि कि फालो करते चलो तो रब जैसे बन जायेंगे। बराबर बनना यानि कि लबरेज़ बनना। मोमिन ज़िन्दगी का यही तो काम है।

3. हमेशा अपने को रब के रूहानी बगीचे के रूहानी गुलाब समझते हो! सबसे खुश्बू वाला फूल गुलाब होता है। गुलाब का जल कितने कामों में लगाते हैं, रंग-रूप में भी गुलाब सबसे प्यारा है। तो आप तमाम रूहानी गुलाब हो। आपकी रूहानी खुशबू औरों को भी अपने आप कशिश करती है। कहाँ भी कोई खुशबू की चीज़ होती है तो सबका अटेन्शन अपने आप ही जाता है तो आप रूहानी गुलाबों की खुशबू दुनिया को कशिश करने वाली है, क्योंकि दुनिया को इस रूहानी खुशबू की ज़रूरत है इसलिए हमेशा याददाश्त में रहे कि मैं ला फ़ानी बगीचे का ला फ़ानी गुलाब हूँ। कभी मुरझाने वाला नहीं, हमेशा खिला हुआ। ऐसे खिले हुए रूहानी गुलाब हमेशा खिदमत में अपनेआप ही ज़रिया बन जाते हैं। याद की, कुव्वतों की, फ़ज़ीलतों की यह सब खुश्बू सबको देते रहो। खुद रब ने आकर आप फूलों को तैयार किया है तो कितने सिकीलधे हो! अच्छा।

बरक़ात:-
न्यारे और प्यारे बनने का राज़ जानकर राज़ी रहने वाले राज़ नशीन बनो।

जो बच्चे फैमिली में रहते न्यारे और प्यारे बनने का राज़ जानते हैं वह हमेशा खुद भी खूद से राज़ी रहते हैं, फैमिली को भी राज़ी रखते हैं। साथ-साथ सच्ची दिल होने के सबब साहेब भी हमेशा उन पर राज़ी रहता है। ऐसे राज़ी रहने वाले राज नशीन बच्चों को अपने वास्ते और दूसरे किसी के वास्ते किसी को क़ाज़ी बनाने की जरूरत नहीं रहती क्योंकि वह अपना फैंसला अपने आप कर लेते हैं इसलिए उन्हें किसी को काज़ी, वकील या जज बनाने की ज़रूरत ही नहीं।

स्लोगन:-
खिदमत से जो दुआयें मिलती हैं-वह दुआयें ही तन्दरूस्ती की बुनियाद हैं।

आमीन