02-01-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
रब की सिरात ए मुस्तकीम का रिगार्ड रखना माना नूरानी कलेमात कभी भी मिस नहीं करना, दरेक फरमान की ताबेदारी करना

सवाल:-
अगर तुम बच्चों से कोई पूछे राज़ी-खुशी हो? तो तुम्हें कौन-सा जवाब फ़लक से देना चाहिए?

जवाब:-
बोलो - परवाह थी बालातर आलम ए अरवाह में रहने वाले की, वह मिल गया, बाक़ी क्या चाहिए। पाना था सो पा लिया.....। तुम इलाही बच्चों को किसी बात की परवाह नहीं। तुम्हें रब ने अपना बनाया, तुम्हारे पर ताज रखा फिर परवाह किस बात की।

आमीन।
रब समझाते हैं बच्चों की अक्ल में ज़रूर होगा कि रब्बा - बाप भी है, उस्ताद भी है, सुप्रीम हादी भी है, इसी याद में ज़रूर होंगे। यह याद कभी कोई सिखला भी नहीं सकते। रब ही चक्कर-चक्कर आकर सिखलाते हैं। वही दरिया ए इल्म नापाक से पाक बनाने वाले भी है। वह बाप भी है, उस्ताद भी है, हादी भी है। यह अब समझा जाता है,जबकि इल्म की तीसरी आंख मिली है। बच्चे भल समझते तो होंगे मगर बाप को ही भूल जाते हैं तो उस्ताद हादी फिर कैसे याद आयेगा। इबलीस निहायत ही ग़ालिब है जो तीन रूप में अज़मत होते हुए भी तीनों को भुला देता है, इतना तमाम कुव्वत नशीन है। बच्चे भी लिखते हैं रब्बा हम भूल जाते हैं। इबलीस ऐसा ग़ालिब है। ड्रामा के मुताबिक है निहायत आसान। बच्चे समझते हैं ऐसा कभी कोई हो नहीं सकता। वही बाप उस्ताद हक़ीक़ी हादी है - सच-सच, इसमें गपोड़े वगैरह की कोई बात नहीं। अन्दर में समझना चाहिए ना! मगर इबलीस भुला देता है। कहते हैं हम हार खा लेते हैं, तो कदम-कदम में पद्म कैसे होंगे! हूरैन को ही पद्म की निशानी देते हैं। सबको तो नहीं दे सकते। अल्ल्लाह् ताला की यह तालीम है,इन्सान की नहीं। इन्सान की यह तालीम कभी हो नहीं सकती। भल हूरैन की अज़मत की जाती है मगर फिर भी आला ते आला एक रब है। बाक़ी उनकी बड़ाई क्या है, आज गदाई कल राजाई। अभी तुम तजवीज़ कर रहे हो ऐसा (आदम अलैहिस्सलाम-हव्वा अलैहिस्सलाम) बनने की। जानते हो इस तजवीज़ में निहायत फेल होते हैं। पढ़ते फिर भी इतने हैं जितने चक्कर पहले पास हुए थे। असल में इल्म है भी निहायत आसान मगर इबलीस भुला देता है। रब फ़रमाते हैं अपना चार्ट लिखो मगर लिख नहीं पाते हैं। कहाँ तक बैठ लिखें। अगर लिखते भी हैं तो तफ्तीश करते हैं - दो घण्टा याद में रहे? फिर वह भी उन्हों को मालूम पड़ता है, जो रब की सिरात ए मुस्तकीम को अमल में लाते हैं। रब तो समझेंगे इन बिचारों को शर्म आती होगी। नहीं तो सिरात ए मुस्तकीम अमल में लानी चाहिए। मगर दो परसेन्ट मुश्किल चार्ट लिखते हैं। बच्चों को सिरात ए मुस्तकीम का इतना रिगार्ड नहीं है। नूरानी कलेमात मिलते हुए भी पढ़ते नहीं हैं। दिल में लगता ज़रूर होगा - रब्बा फ़रमाते तो सच हैं, हम नूरानी कलेमात ही नहीं पढ़ते तो बाक़ी औरों को समझायेंगे क्या? (याद का सफ़र)
आमीन। रूहानी रब रूहानी बच्चों को समझाते हैं, यह तो बच्चे समझते हैं बरोबर हम रूह हैं, हमको पाक परवरदिगार पढ़ा रहे हैं। और क्या कहते हैं? मुझे याद करो तो तुम जन्नत के मालिक बनो। इसमें बाप भी आ गया, पढ़ाई और पढ़ाने वाला भी आ गया। ख़ैर निजात दिलाने वाला भी आ गया। थोड़े अल्फ़ाज़ में तमाम इल्म आ जाता है। यहाँ तुम आते ही हो इसको रिवाइज करने लिए। रब भी यही समझाते हैं क्योंकि तुम खुद कहते हो हम भूल जाते हैं इसलिए यहाँ आते हैं रिवाइज़ करने। भल कोई यहाँ रहते हैं तो भी रिवाइज़ नहीं होता है। तक़दीर में नहीं है। तदबीर तो रब कराते ही हैं। तदबीर कराने वाला एक रब ही है। इसमें कोई की पास खातिरी भी नहीं हो सकती है। न स्पेशल पढ़ाई है। उस पढ़ाई में स्पेशल पढ़ने लिए टीचर को बुलाते हैं। यह तो तक़दीर बनाने लिए सबको पढ़ाते हैं। एक-एक को अलग कहाँ तक पढ़ायेंगे। कितने बेहिसाब बच्चे हैं। उस तालीम में कोई बड़े आदमी के बच्चे होते हैं तो उन्हों को स्पेशल पढ़ाते हैं। टीचर जानते हैं कि यह डल है इसलिए उनको स्कालरशिप लायक़ बनाते हैं। यह बाप ऐसे नहीं करते हैं। यह तो एकरस सबको पढ़ाते हैं। वह हुआ टीचर का एक्स्ट्रा तजवीज़ कराना। यह तो एक्स्ट्रा तजवीज़ किसको अलग से कराते नहीं। एक्स्ट्रा तजवीज़ माना ही मास्टर कुछ रहमत करते हैं। ऐसे तो भल पैसे लेते हैं, ख़ास टाइम दे पढ़ाते हैं जिससे वह जास्ती पढ़कर होशियार होते हैं। यहाँ तो जास्ती कुछ पढ़ने की बात है ही नहीं। इनकी तो बात ही नई है। एक ही अज़ीम आयत फरमाते हैं - दिल से मुझे याद करो''। याद से क्या होता है, यह तो समझते हो रब ही नापाक से पाक बनाने वाला है। जानते हो उनको याद करने से ही पाकीज़ा बनेंगे।

अब तुम बच्चों को इल्म है, जितना याद करेंगे उतना पाकीज़ा बनेंगे। कम याद करेंगे तो कम पाकीज़ा बनेंगे। यह तुम बच्चों की तजवीज़ पर है। बेहद के रब को याद करने से हमको यह (आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम) बनना है। उन्हों की अज़मत तो हर एक जानते हैं। कहते भी हैं आप नफ़ीस रूह हो, हम ख़बीस रूह हैं। निहायत मन्दिर बने हुए हैं। वहाँ तमाम क्या करने जाते हैं? दीदार से फ़ायदा तो कुछ भी नहीं। एक-दो को देख चले जाते हैं। बस दीदार करने जाते हैं। फलाना सफ़र पर जाता है, हम भी जावें। इससे क्या होगा? कुछ भी नहीं। तुम बच्चों ने भी सफरें की हैं। जैसे और त्योहार मनाते हैं, वैसे सफ़र भी एक त्योहार समझते हैं। अभी तुम याद के सफ़र भी एक त्योहार समझते हो। तुम याद के सफ़र में रहते हो। अल्फ़ाज़ ही एक है दिल से मुझे याद करो। यह तुम्हारा सफ़र अबदी है। वह भी कहते हैं - वह सफ़र हम अबदी करते आए हैं। मगर तुम अभी इल्म के साथ कहते हो हम चक्कर-चक्कर यह सफ़र करते हैं। रब ही आकर यह सफ़र सिखलाते हैं। वह चारों धाम विलादत बाय विलादत सफ़र करते हैं। यह तो बेहद के रब फ़रमाते हैं - मुझे याद करो तो तुम पाकीज़ा बन जायेंगे। ऐसे तो और कोई कभी नहीं कहते कि सफ़र से तुम पाकीज़ा बनेंगे। इन्सान सफ़र पर जाते हैं तो वह उस वक़्त पाकीज़ा रहते हैं, आजकल तो वहाँ भी गन्द लगा पड़ा है, पाकीज़ा नहीं रहते। इस रूहानी सफ़र का तो किसको मालूम नहीं है। तुमको अभी रब ने बताया है - यह याद का सफ़र है सच्चा। वह सफ़र का चक्कर लगाने जाते हैं फिर भी वैसे का वैसा बन जाते हैं। चक्कर लगाते रहते हैं। जैसे वास्कोडिगामा ने खिल्क़त का चक्कर लगाया। यह भी चक्कर लगाते हैं ना। नग़मा भी है ना - चारों तरफ़ लगाये फेरे..... फिर भी हरदम दूर रहे।अकीदत मन्दी में तो कोई मिला नहीं सकते। अल्ल्लाह् ताला कोई को मिला नहीं। अल्ल्लाह् ताला से दूर ही रहे। फेरे लगाकर फिर भी घर में आकर 5 ख़बासत में फंसते हैं। वह तमाम सफ़रें हैं झूठी। अभी तुम बच्चे जानते हो यह है रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर, जबकि रब आये हैं। एक दिन तमाम जान जायेंगे रब आया हुआ है। अल्ल्लाह् ताला आखरीन मिलेगा, मगर कैसे? यह तो कोई भी जानते नहीं। यह तो मीठे-मीठे बच्चे जानते हैं कि हम सिरात ए मुस्तकीम पर इस हिन्दुस्तान को फिर से जन्नत बना रहे हैं। हिन्दुस्तान का ही तुम नाम लेंगे। उस वक़्त और कोई मज़हब होता नहीं। तमाम दुनिया पाकीज़ा बन जाती है। अभी तो बेइंतहा मज़हब हैं। रब आकर तुमको तमाम दरख्त का नॉलेज सुनाते हैं। तुमको याद दिलाते हैं। तुम सो हूरैन थे, फिर सो जंग जू, सो कारोबारी, सो यज़ीद बने। अभी तुम सो मोमिन बने हो। यह हम सो का मतलब रब कितना आसानी से समझाते हैं। ओम् यानि कि मैं रूह फिर हम रूह ऐसे चक्कर लगाती हैं। वह तो कह देते हम रूह सो रब, पाक परवरदिगार सो हम रूह। एक भी नहीं जिसको हम सो का मतलब हक़ीक़ी तौर पर मालूम हो। तो रब फ़रमाते हैं यह जो आयत है यह हरदम याद रखनी चाहिए। चक्कर अक्ल में नहीं होगा तो चक्कर नशीन बादशाह कैसे बनेंगे? अभी हम रूह मोमिन हैं, फिर हम सो हूरैन बनेंगे। यह तुम कोई से भी जाकर पूछो, कोई नहीं बतायेंगे। वह तो 84 का मतलब भी नहीं समझते। हिन्दुस्तान का उरूज और ज़वाल गाया हुआ है। यह दुरूस्त है। सातों फज़ीलतों से लबरेज़, सतो, रजो, तमो, खानदान ए आफ़ताबी, खानदान ए महताबी, खानदान ए कारोबारी.... अभी तुम बच्चों को तमाम मालूम पड़ गया है। बीज रूप रब को ही दरिया ए इल्म कहा जाता है। वह इस चक्कर में नहीं आते हैं। ऐसे नहीं, हम ज़िन्दा रूह सो रब बन जाते हैं। नहीं, रब अपने जैसा नॉलेजफुल बनाते हैं। अपने जैसा गॉड नहीं बनाते हैं। इन बातों को निहायत अच्छी तरह समझना है, तब अक्ल में चक्कर चल सकता है, जिसका नाम दीदार ए नफ़्स चक्कर रखा है। तुम अक्ल से समझ सकते हो - हम कैसे इस 84 के चक्कर में आते हैं। इसमें सब आ जाता है। वक़्त भी आता है, फिरके भी आ जाती हैं, निस्बनामा भी आ जाता है।

अब तुम बच्चों की अक्ल में यह तमाम इल्म होना चाहिए। नॉलेज से ही आला मर्तबा मिलता है। नॉलेज होगी तो औरों को भी देंगे। यहाँ तुमसे कोई पेपर वगैरह नहीं भराये जाते हैं। उन स्कूलों में जब इम्तहान होते हैं तो पेपर्स विलायत से आते हैं। जो विलायत में पढ़ते होंगे उन्हों की तो वहाँ ही रिज़ल्ट निकालते होंगे। उनमें भी कोई बड़ा एज्युकेशन अथॉरिटी होगा जो तफ्तीश करते होंगे पेपर्स की। तुम्हारे पेपर्स की तफ़्तीश कौन करेंगे? तुम खुद ही करेंगे। खुद को जो चाहो सो बनाओ। तफ्तीश से जो चाहे सो मर्तबा रब से ले लो। नुमाइश वगैरह में बच्चे पूछते हैं ना - क्या बनेंगे? हूरैन बनेंगे, बैरिस्टर बनेंगे.... क्या बनेंगे? जितना रब को याद करेंगे, खिदमत करेंगे उतना सिला मिलेगा। जो अच्छी तरह रब को याद करते हैं वह समझते हैं हमको खिदमत भी करनी है। अवाम बनानी है ना! यह दारूल हुकूमत क़ायम हो रही है। तो उसमें तमाम चाहिए। वहाँ वज़ीर होते नहीं। वज़ीर की दरकार उनको रहती जिसको अक्ल कम होती है। तुमको वहाँ राय की दरकार नहीं रहती है। रब्बा के पास राय लेने आते हैं -मैकरू बातों की राय लेते हैं, पैसे का क्या करें? धन्धा कैसे करें? रब्बा फ़रमाते हैं यह दुनियावी बातें रब के पास नहीं ले आओ। हाँ, कहाँ दिलशिकस्त बन न जाएं तो कुछ न कुछ आथत देकर बता देते हैं। यह कोई मेरा धन्धा नहीं है। मेरा तो इलही धन्धा है तुमको रास्ता बताने का। तुम जहान का मालिक कैसे बनो? तुमको मिली है सिरात ए मुस्तकीम। बाक़ी तमाम हैं शैतानी राय। सुनहरे दौर में कहेंगे सिरात ए मुस्तकीम। इख्तिलफ़ी फ़ितने के दौर में शैतानी राय। वह है ही दारूल मसर्रत। वहाँ ऐसे भी नहीं कहेंगे कि राज़ी-खुशी हो? तबियत दुरुस्त है? यह अल्फ़ाज़ वहाँ होते नहीं। यह यहाँ पूछा जाता है। कोई तकलीफ़ तो नहीं है? राज़ी-खुशी हो? इसमें भी तमाम बातें आ जाती हैं। वहाँ दु:ख है ही नहीं, जो पूछा जाए। यह है ही दु:ख की दुनिया। असल में तुमसे कोई पूछ नहीं सकता। भल इबलीस गिराने वाली है तो भी रब मिला है ना। तुम कहेंगे - क्या तुम खुश-खैराफत पूछते हो! हम अल्ल्लाह् ताला के बच्चे हैं, हमसे क्या खुश-खैराफत पूछते हो। परवाह थी बालातर आलम ए अरवाह में रहने वाले रब की, वह मिल गया, फिर किसकी परवाह! यह हमेशा याद करना चाहिए - हम किसके बच्चे हैं! यह भी अक्ल में इल्म है - कि जब हम पाकीज़ा बन जायेंगे तो फिर लड़ाई शुरू हो जायेगी। तो जब भी तुमसे कोई पूछे कि तुम ख़ुश राज़ी हो? तो बोलो हम तो हमेशा खुशराज़ी हैं। बीमार भी हो तो भी रब की याद में हो। तुम जन्नत से भी जास्ती यहाँ खुश-राज़ी हो। जबकि जन्नत की बादशाही देने वाला रब मिला है, जो हमको इतना लायक़ बनाते हैं तो हमको क्या परवाह रखी है! अल्ल्लाह् ताला के बच्चों को क्या परवाह! वहाँ हूरैन को भी परवाह नहीं। हूरैन के ऊपर तो है अल्ल्लाह् ताला। तो अल्ल्लाह् ताला के बच्चों को क्या परवाह हो सकती है। रब्बा हमको पढ़ाते हैं। रब्बा हमारा उस्ताद, हक़ीक़ी हादी है। रब्बा हमारे ऊपर ताज रख रहे हैं, हम ताज नशीन बन रहे हैं। तुम जानते हो हमको दुनिया का ताज कैसे मिलता है। रब नहीं ताज रखते। यह भी तुम जानते हो सुनहरे दौर में रब अपना ताज अपने बच्चों पर रखते हैं, जिसको इंग्लिश में कहते हैं क्राउन प्रिन्स। यहाँ जब तक बाप का ताज बच्चे को मिले तब तक बच्चे को पुर जोश रहेगा - कहाँ बाप मरे तो ताज हमारे सिर पर आवे। आस होगी प्रिन्स से महाराजा बनूँ। वहाँ तो ऐसी बात नहीं होती। अपने वक़्त पर कायदे मुजीब बाप बच्चों को ताज देकर फिर किनारा कर लेते हैं। वहाँ बुज़ुर्ग की चर्चा होती नहीं। बच्चों को महल वगैरह बनाकर देते हैं, उम्मीद तमाम पूरी हो जाती हैं। तुम समझ सकते हो सुनहरे दौर में ख़ुशी ही ख़ुशी है। प्रैक्टिकल में तमाम ख़ुशी तब पायेंगे जब वहाँ जायेंगे। वह तो तुम ही जानो, जन्नत में क्या होगा? एक जिस्म छोड़ फिर कहाँ जायेंगे? अभी तुम्हें प्रैक्टिकल में रब पढ़ा रहे हैं। तुम जानते हो हम सच-सच जन्नत में जायेंगे। वह तो कह देते हम जन्नत में जाते हैं, मालूम भी नहीं है जन्नत किसको कहा जाता है। विलादत दर विलादत यह बे इल्मी की बातें सुनते आये, अभी रब तुमको हक़ीक़ी बातें सुनाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. हमेशा राज़ी-खुशी रहने के लिए रब की याद में रहना है। तालीम से अपने ऊपर बादशाहत का ताज रखना है।

2. सिरात ए मुस्तकीम पर हिन्दुस्तान को जन्नत बनाने की खिदमत करनी है। हमेशा सिरात ए मुस्तकीम का रिगार्ड रखना है।

बरक़ात:-
कनेक्शन और रिलेशन के ज़रिए ज़हनी कुव्वत का ज़ाहिर सबूत देने वाले महीन खिदमतगार बनो।

जैसे आवाज़ की कुव्वत और आमाल की कुव्वत का ज़ाहिर सबूत दिखाई देता है वैसे सबसे पाॅवरफुल साइलेन्स कुव्वत का ज़ाहिर सबूत देखने के लिए रब उल हक़ के साथ मुसलसल क्लीयर कनेक्शन और रिलेशन हो, इसे ही कुव्वत ए इबादत कहा जाता है। ऐसी कुव्वत ए इबादत वाली रूहें मैकरू में दूर रहने वाली रूह को सामने का एहसास करा सकती हैं। रूहों का बुलावा कर उन्हें तब्दील कर सकती हैं। यही महीन खिदमत है, इसके लिए मुस्तहकिम रहने की कुव्वत को बढ़ाओ।

स्लोगन:-
अपने तमाम खज़ानों को कामयाब करने वाले ही अज़ीम सदक़ा नशीन रूह हैं।

आमीन