02-10-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
यह रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर फ़लाह नशीन दौर है, इसमें ही तब्दीली होती है, तुम अदना से आला रूह बनते हो

सवाल:-
इस राह ए इल्म में कौन सी बात सोचने और बोलने से कभी भी तरक्की नहीं हो सकती?

जवाब:-
ड्रामा में होगा तो तजवीज़ कर लेंगे। ड्रामा करायेगा तो कर लेंगे। यह सोचने और बोलने वालों की तरक्की कभी नहीं हो सकती। यह कहना ही रांग है। तुम जानते हो अभी जो हम तजवीज़ कर रहे हैं, यह भी ड्रामा में नूँध है। तजवीज़ करना ही है।

नग़मा:-
यह कहानी है दीवे और तूफान की........

आमीन।
यह है इख्तिलाफी फितने के दौर के इन्सानों का नग़मा। मगर इनका मतलब वह नहीं जानते। यह तुम जानते हो। तुम हो अभी रूह ए अफ़ज़ल मिलन के दौर नशीनी। मिलन के दौर के साथ रूह ए अफ़ज़ल भी लिखना चाहिए। बच्चों को इल्म की प्वाइंट्स याद न होने के सबब फिर ऐसे-ऐसे अल्फ़ाज़ लिखना भूल जाते हैं। यह अहम है, इनका मतलब भी तुम ही समझ सकते हो। रूह ए अफ़ज़ल महीना भी होता है। यह फिर है रूह ए अफ़ज़ल मिलन का दौर। यह मिलन की भी एक मीलाद है। यह मीलाद सबसे आलातरीन है। तुम जानते हो अभी हम रूह ए अफ़ज़ल बन रहे हैं। आला ते आला रूह। आला ते आला दौलत मन्द से दौलत मन्द नम्बरवन कहेंगे आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम को। शास्त्रों में दिखाते हैं - बड़ी प्रलय हुई। फिर नम्बरवन श्रीकृष्ण पीपल के पत्ते पर सागर में आया। अभी तुम क्या कहेंगे? नम्बरवन है यह श्रीकृष्ण, जिसको ही श्याम-सुन्दर कहते हैं। दिखाते हैं - अगूंठा चूसता हुआ आया। बच्चा तो गर्भ में ही रहता है। तो पहले-पहले दरिया ए इल्म से निकली हुई आला ते आला रूह श्रीकृष्ण है। दरिया ए इल्म से जन्नत का क़याम होता है। उनमें नम्बरवन रूह ए अफ़ज़ल यह श्रीकृष्ण यानि कि आदम अलैहिस्सलाम है और यह है दरिया ए इल्म, पानी का नहीं। प्रलय भी होती नहीं। कई बच्चे नये-नये आते हैं तो रब को फिर पुरानी प्वाइंट रिपीट करनी पड़ती हैं। सतयुग-त्रेता-द्वापर-कलियुग...... यह 4 दौर तो हैं। पांचवा फिर है मिलन का दौर। इस दौर में इन्सान चेंज होते हैं। अदना से आला बनते हैं। जैसे पाक परवरदिगार को भी रूह ए अफ़ज़ल या सुप्रीम रूह कहते हैं ना। वह है ही आलातरीन रूह, सुप्रीम रूह। फिर रूहों में आलातरीन हैं यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम। इन्हों को ऐसा किसने बनाया? यह तुम बच्चे ही जानते हो। बच्चों को भी समझ में आया है। इस वक़्त हम तजवीज़ करते हैं ऐसा बनने के लिए। तजवीज़ कोई बड़ी नहीं है। मोस्ट सिम्पुल है। सीखने वाली भी हैं अबलायें कुब्जायें, जो कुछ भी पढ़ी-लिखी नहीं हैं। उन्हों के लिए कितना आसान समझाया जाता है। देखो अहमदाबाद में एक राहिब था कहता था हम कुछ खाते-पीते नहीं हैं। अच्छा कोई तमाम उम्र खाता-पीता नहीं फिर क्या? दस्तयाबी तो कुछ नहीं है ना। दरख़्त को भी खाना तो मिलता है ना। खाद पानी वगैरह नेचुरल उनको मिलता है, जिससे दरख्त इज़ाफ़े को पाता है। उसने भी कोई रिद्धि-सिद्धि पाई होगी। ऐसे निहायत हैं जो आग से, पानी से चले जाते हैं। इनसे भला फ़ायदा क्या। तुम्हारी तो इस आसान हक़ीक़ी इबादत से विलादत दर विलादत का फ़ायदा है। तुमको विलादत दर विलादत के लिए दु:खी से ख़ुशहाल बनाते हैं। रब फ़रमाते हैं - बच्चे, ड्रामा के मुताबिक़ हम तुमको गहरी बातें सुनाते हैं।
जैसे रब्बा ने समझाया है शिव और शंकर को मिलाया क्यों है? शंकर का तो इस सृष्टि में पार्ट ही नहीं है। शिव का, ब्रह्मा का, विष्णु का पार्ट है। ब्रह्मा और विष्णु का आलराउन्ड पार्ट है। पाक परवरदिगार का भी इस वक़्त पार्ट है, जो आकर इल्म देते हैं। फिर दारूल निजात में चले जाते हैं। बच्चों को ज़ायदाद देकर खुद आवाज़ से बालातर में चले जाते हैं। आवाज़ से बालातर बनना यानि कि हादी के ज़रिए आवाज़ से बालातर जाने की तजवीज़ करना। मगर वापिस तो कोई जा नहीं सकते क्योंकि ख़बासती बद उन्वान हैं। ख़बासत से विलादत तो सबका होता है। यह आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा अलैहिस्सलाम ग़ैर ख़बासती हैं, उन्हों की ख़बासत से विलादत नहीं होती है इसलिए अफ़ज़ल नशीन कहलाये जाते हैं। कुमारियां भी ग़ैर ख़बासती हैं - इसलिए उनके आगे माथा टेकते हैं। तो रब्बा ने समझाया कि यहाँ शंकर का कोई पार्ट नहीं है, बाक़ी बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम तो ज़रूर अवाम का बाप हुआ ना। पाक परवरदिगार को तो रूहों का बाप कहेंगे। वह है ला फ़ानी बाप, यह गहरी बातें अच्छी तरह इख्तियार करनी हैं। जो बड़े-बड़े फिलॉसाफर होते हैं, उनको निहायत टाइटिल मिलते हैं। श्री श्री 108 का टाइटिल भी आलिमों को मिलते हैं। बनारस के कॉलेज से पास कर टाइटिल ले आते हैं। बाबा ने गुप्ता जी को इसलिए बनारस भेजा था कि उन्हों को जाकर समझाओ कि बाप का भी टाइटिल अपने ऊपर रख बैठे हो। बाप को श्री श्री 108 जगतगुरू कहा जाता है। माला ही 108 की होती है। 8 जवाहिरात गाये जाते हैं। वह पास विद् ऑनर होते हैं इसलिए उनको जपते हैं। फिर उनसे कम 108 की पूजा करते हैं। यज्ञ जब रचते हैं तो कोई 1000 सालिग्राम बनाते हैं, कोई 10 हज़ार, कोई 50 हज़ार, कोई लाख भी बनाते हैं। मिट्टी के बनाकर फिर यज्ञ रचते हैं। जैसा-जैसा सेठ अच्छे ते अच्छा, बड़ा सेठ होगा तो लाख बनवायेंगे। बाप ने समझाया है माला तो बड़ी है ना - 16108 की माला बनाते हैं। यह तुम बच्चों को रब बैठ समझाते हैं। तुम तमाम हिन्दुस्तान की खिदमत कर रहे हो रब के साथ। रब की इबादत होती है तो बच्चों की भी इबादत होनी चाहिए, यह नहीं जानते कि रूद्र पूजा क्यों होती है। बच्चे तो तमाम पाक परवरदिगार के हैं। इस वक़्त खिल्क़त की कितनी आदमशुमारी है इसमें तमाम रूहें पाक परवरदिगार के बच्चे ठहरे ना। मगर मददगार सब नहीं होते। इस वक़्त तुम जितना याद करते हो उतना आला बनते हो। इबादत लायक़ बनते हो। ऐसे और कोई की ताक़त नहीं जो यह बात समझाये इसलिए कह देते अल्ल्लाह् ताला का आखिर कोई नहीं जानते। रब ही आकर समझाते हैं, रब को दरिया ए इल्म कहा जाता है तो ज़रूर इल्म देंगे ना। इल्हाम की तो बात होती नहीं। अल्ल्लाह् ताला कोई इल्हाम से समझाते हैं क्या। तुम जानते हो उनके पास खिल्क़त के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म है। वह फिर तुम बच्चों को सुनाते हैं। यह तो यक़ीन है - यक़ीन होते हुए भी फिर भी रब को भूल जाते हैं। रब की याद, यह है तालीम का खुलासा। याद के सफ़र से मुकम्मल नशीनी हालत को पाने में मेहनत लगती है, इसमें ही इबलीस की मुश्किलात आती हैं। तालीम में इतनी मुश्किलात नहीं आती। अब इस्राफील अलैहिस्सलाम के लिए कहते हैं, इस्राफील अलैहिस्सलाम आंख खोलते हैं तो तबाही होती है, यह कहना भी दुरूस्त नहीं है। रब फ़रमाते हैं - न मैं तबाही कराता हूँ, न वह करते हैं, यह रांग है। हूरैन थोड़े ही गुनाह करेंगे। अब पाक परवरदिगार बैठ यह बातें समझाते हैं। रूह का यह जिस्म है गाड़ी। हर एक रूह की अपनी गाड़ी पर सवारी है। रब फ़रमाते हैं मैं इनका लोन लेता हूँ, इसलिए मेरा इलाही रूहानी विलादत कही जाती है। अभी तुम्हारी अक्ल में 84 का चक्कर है। जानते हो अभी हम घर जाते हैं, फिर जन्नत में आयेंगे। रब्बा निहायत आसान करके समझाते हैं, इसमें हार्टफेल नहीं होना है। कहते हैं रब्बा हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। मुंह से कुछ निकलता नहीं। मगर ऐसा तो होता नहीं। मुंह तो ज़रूर चलता ही है। खाना खाते हो मुंह चलता है ना। आवाज़ न निकले यह तो हो नहीं सकता। रब्बा ने निहायत सिम्पुल समझाया है। कोई खामोशी में रहते हैं तो भी ऊपर में इशारा देते हैं कि उनको याद करो। दु:ख दूर करने वाला ख़ुशी देने वाला वह एक ही दाता है। अकीदत मन्दी की राह में भी दाता है तो इस वक़्त में भी दाता है फिर आवाज़ से बालातर में तो है ही सुकून। बच्चे भी दारूल सुकून में रहते हैं। पार्ट नूँधा हुआ है, जो एक्ट में आता है। अभी हमारा पार्ट है - दुनिया को नया बनाना। उनका नाम बड़ा अच्छा है - हेविनली गॉड फादर। रब खालिक है जन्नत का। रब जहन्नुम थोड़े ही तामीर करेंगे। पुरानी दुनिया कोई तामीर करते हैं क्या। मकान हमेशा नया बनाया जाता है। पाक परवरदिगार नई दुनिया तामीर करते हैं आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए। इनको पार्ट मिला हुआ है - यहाँ पुरानी दुनिया में जो भी इन्सान हैं, सब एक-दो को दु:ख देते रहते हैं।
तुम जानते हो हम हैं पाक परवरदिगार की औलाद। फिर जिस्म नशीन बाप ए अवाम आदम अलैहिस्सलाम के बच्चे हो गये एडाप्टेड। हमको इल्म सुनाने वाला है पाक परवरदिगार खालिक। जो अपने मख़लूक़ के आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर का इल्म सुनाते हैं। तुम्हारी एम ऑबजेक्ट ही है यह बनना। इन्सान देखो कितना खर्चा कर मार्बल वगैरह की बुत बनाते हैं। यह है इलाही दारूल उलूम, वर्ल्ड युनिवर्सिटी। तमाम युनिवर्स को चेंज किया जाता है। उन्हों के जो भी कैरेक्टर्स हैं तमाम शैतानी। आग़ाज़ - दरम्यान - आख़िर दु:ख देने वाले हैं। यह है इलाही युनिवर्सिटी। इलाही दारूल उलूम एक ही होता है, जो अल्ल्लाह् ताला आकर खोलते हैं, जिससे तमाम दुनिया का फ़लाह हो जाता है। तुम बच्चों को अब राइट और रांग की समझ मिलती है और कोई इन्सान नहीं जो समझता हो। राइट रांग को समझाने वाला एक ही राइटियस होता है, जिसको ट्रूथ कहते हैं। रब ही आकर हर एक को राइटियस बनाते हैं। राइटियस बनेंगे तो फिर निजात में जाकर ज़िन्दगी ए निजात में आयेंगे। ड्रामा को भी तुम बच्चे जानते हो। आग़ाज़ से लेकर आख़िर तक पार्ट बजाने नम्बरवार आते हो। यह खेल चलता ही रहता है। ड्रामा शूट होता जाता है। यह एवर न्यु है। यह ड्रामा कभी पुराना नहीं होता है, और तमाम ड्रामा वगैरह फ़ना हो जाते हैं। यह बेहद का ला फ़ानी ड्रामा है। इनमें तमाम ला फ़ानी पार्टनशीन हैं। ला फ़ानी खेल और माण्डवा देखो कितना बड़ा है। रब आकर पुरानी खिल्क़त को फिर नया बनाते हैं। वह तमाम तुमको मोजिज़ा होगा। जितना नज़दीक आयेंगे फिर तुमको ख़ुशी होगी। मोजिज़ा करेंगे। कहेंगे अब पार्ट पूरा हुआ। ड्रामा को फिर रिपीट करना है। फिर नये सिर पार्ट बजायेंगे, जो कल्प पहले बजाया है। इसमें ज़रा भी फ़र्क नहीं हो सकता है, इसलिए जितना हो सके तुम बच्चों को आला मर्तबा पाना चाहिए। तजवीज़ करना है, मूंझना नहीं है। ड्रामा को जो कराना होगा वो करायेगा - यह कहना भी रांग है। हमको तो तजवीज़ करनी ही है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-
1. तालीम का खुलासा (सार) अक्ल में रख याद के सफ़र से मुकम्मल नशीनी हालत को पाना है। आला, क़ाबिल ए एहतराम नशीन बनने के लिए रब का पूरा-पूरा मददगार बनना है।

2. हक़ीक़ी बाप के ज़रिए राइट-रांग की जो समझ मिली है, उससे राइटियस बन ज़िन्दगी ए बन्दिश से छूटना है। निजात और ज़िन्दगी ए निजात का वर्सा लेना है।

बरक़ात:-
मिलन के दौर की तमाम दस्तयाबियों को याददाश्त में रख चढ़ते फ़न का एहसास करने वाले अफ़ज़ल क़िस्मत नशीन बनो।

इलाही मिलन और इलाही इल्म की खासियत है - ला फ़ानी दस्तयाबियां होना। ऐसे नहीं कि मिलन का दौर तजवीज़ी ज़िन्दगी है और जन्नती क़िस्मत नशीन ज़िन्दगी है। मिलन के दौर की खासियत है एक कदम उठाओ और हज़ार कदम क़िस्मत में पाओ। तो सिर्फ़ तजवीज़ नशीनी नहीं मगर अफ़ज़ल क़िस्मत नशीनी हैं - इस रूप को हमेशा सामने रखो। क़िस्मत को देखकर आसान ही चढ़ते फ़न का एहसास करेंगे। पाना था सो पा लिया'' - यह नग़मा गाओ तो घुटके और झुटके खाने से बच जायेंगे।

स्लोगन:-
मोमिनों की सांस हिम्मत है, जिससे मुश्किल से मुश्किल काम भी आसान हो जाता है।

मम्मा के बेशकीमती अज़ीम कलेमात
निजात और मोक्ष
आजकल इन्सान निजात को ही मोक्ष कहते हैं, वो ऐसे समझते हैं जो निजात पाते हैं वो पैदाइश और मौत से छूट जाते हैं। वो लोग तो पैदाइश और मौत में न आना इसको ही आला मर्तबा समझते हैं, वही क़िस्मत मानते हैं। ज़िन्दगी ए निजात फिर उसको समझते हैं जो ज़िन्दगी में रहकर अच्छा आमाल करते हैं, जैसे मज़हबी लोग हैं, उन्हों को ज़िन्दगी ए निजात समझते हैं। बाक़ी बंदिश ए आमाल से निजात हो जाना वो तो करोड़ों में से कोई विरला ही समझते हैं, अब यह है उन्हों की अपनी सलाह। मगर हम तो पाक परवरदिगार के ज़रिए जान चुके हैं कि जब तक इन्सान पहले ख़बासती आमाल ए बन्दिश से आज़ाद नहीं हुआ है तब तक आग़ाज़-दरम्यान-आख़िर दु:ख से छूट नहीं सकेंगे, तो इससे छूटना यह भी एक स्टेज है। तो भी पहले जब इलाही नॉलेज को इख्तियार करे तब ही उस स्टेज पर पहुँच सके और उस स्टेज पर पहुँचाने वाला खुद पाक परवरदिगार चाहिए क्योंकि निजात ज़िन्दगी ए निजात देते वह हैं, वो भी एक ही वक्त आए सबको निजात ज़िन्दगी ए निजात दे देता है। बाक़ी पाक परवरदिगार कोई कई बार नहीं आते और न कि ऐसा समझो कि पाक परवरदिगार ही तमाम नुज़ूल इख्तियार करते हैं।

आमीन