03-01-2020 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 05-10-87


मोमिन ज़िन्दगी की ख़ुशी - इत्मीनान और मसर्रत


आज रब उल हक़ चारों ओर के अपने बेइंतहा लाडले, सिकीलधे मोमिन बच्चों में से ख़ास मोमिन ज़िन्दगी की खासियत से लबरेज़ बच्चों को देख रहे हैं। आज वक़्त ए शफ़ा रब उल हक़ तमाम मोमिन खानदान बच्चों में से उन ख़ास रूहों को चुन रहे थे जो हमेशा इत्मीनान के ज़रिए खुद भी हमेशा मुत्मइन रहे हैं और औरों को भी इत्मीनान का एहसास अपनी नज़र, कैफियत और आमाल के ज़रिए हमेशा कराते आये हैं। तो आज ऐसी इत्मीनान याफ़्ता की माला पिरो रहे थे जो हमेशा इरादे में, बोल में, तनज़ीम के रिश्ते-राब्ते में, आमाल में इत्मीनान के गोल्डन फूल रब उल हक़ के ज़रिए अपने ऊपर बरसाने का एहसास करते और तमाम के वास्ते इत्मीनान के गोल्डन फूलों की बरसात हमेशा करते रहते हैं। ऐसी मुत्मइन रूहें चारों ओर में से कोई-कोई नज़र आई। माला बड़ी नहीं बनी, छोटी-सी माला बनी। रब उल हक़ बार-बार इत्मीनान याफ़्ता की माला को देख खुशगवार हो रहे थे क्योंकि ऐसी इत्मीनान याफ़्ता ही रब उल हक़ के गले का हार बनती है, सल्तनत की हक़दार बनती है और अकीदतमंदों के यादों की माला बनती हैं।

रब उल हक़ और बच्चों को भी देख रहे थे जो कभी मुत्मइन और कभी इद्दम मुत्मइन के इरादे-बराबर छाया के अन्दर आ जाते हैं और फिर निकल आते हैं, फँस नहीं जाते। तीसरे बच्चे कभी इरादे की इद्दम मुत्मइन नशीनी, कभी खुद की खुद से इद्दम मुत्मइन नशीनी, कभी हालातों के ज़रिए इद्दम मुत्मइन नशीनी, कभी खुद की हलचल के ज़रिए इद्दम मुत्मइन नशीनी और कभी छोटी-बड़ी बातों से इद्दम मुत्मइन नशीनी - इसी चक्कर में चलते और निकलते और फिर फँसते रहते। ऐसी माला भी देखी। तो तीन मालायें तैयार हुई। मणियां तो तमाम हैं मगर इत्मीनान याफ़्ता की झलक और दूसरे दो तरह के मणियों की झलक क्या होगी, यह तो आप भी जान सकते हो। जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप बार-बार तीनों मालाओं को देखते हुए खुशगवार भी हो रहे थे, साथ-साथ कोशिश कर रहे थे कि दूसरे नम्बर की माला की मणियाँ पहली माला में आ जाएं। रूह-रिहान चल रही थी क्योंकि दूसरी माला की कोई-कोई मणि निहायत थोड़ी-सी इद्दम मुत्मइन नशीनी की छाया-बराबर के सबब पहली माला से महरूम रह गयी है, इसको तब्दील कर कैसे भी पहली माला में लावें। एक-एक की फ़ज़ीलत, खासियत, खिदमत - सबको सामने लाते बार-बार यही बोले कि इसको पहली माला में कर लें। ऐसी 25-30 के क़रीब मणियाँ थी जिनके ऊपर जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप की ख़ास रूह-रिहान चल रही थी। जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप बोले - पहले नम्बर माला में इन मणियों को भी डालना चाहिए। मगर फिर खुद ही मुस्कराते हुए यही बोले कि बाप इन्हों को ज़रूर पहली में लाकर ही दिखायेंगे। तो ऐसी ख़ास मणियाँ भी थी।

ऐसे रूह-रिहान चलते हुए एक बात निकली कि इद्दम मुत्मइन नशीनी का ख़ास सबब क्या है? जबकि मिलन के दौर की बरक़ात इत्मीनान है, फिर भी बरक़ात याफ़्ता से बरक़ात हासिल कर बरक़ाती रूहें दूसरे नम्बर की माला में क्यों आती? इत्मीनान के बीज में तमाम दस्तयाबियां हैं। इद्दम मुत्मइन नशीनी का बीज मैकरू और महीन ग़ैर दस्तयाबी है। जब मोमिनों का गायन है - ग़ैर दस्तयाब नहीं कोई चीज़ मोमिनों के ख़ज़ाने में या मोमिनों की ज़िन्दगी में', फिर इद्दम मुत्मइन नशीनी क्यों? क्या रहमतुल्आल्मीन ने बरक़ात देने में फर्क रखा या लेने वालों ने फर्क कर लिया, क्या हुआ? जब रहमतुल्आल्मीन, दाता के भण्डार लबरेज़ हैं, इतने भरपूर हैं जो आपके यानि कि अफ़जल ज़रिया रूहों के जो निहायत अरसे के आदम ज़ादा/आदम ज़ादियां बन गयी, उन्हों की 21 विलादतों की निस्ब नामा और फिर उनके अकीदत मन्द, अकीदत मन्दों की भी निस्ब नामा, वो भी उन दस्तयाबियों की बुनियाद पर चलते रहेंगे। इतनी बड़ी दस्तयाबी, फिर भी इद्दम मुत्मइन नशीनी क्यों? अखुट खज़ाना तमाम को दस्तयाब है - एक ही के ज़रिए, एक ही जैसा, एक ही वक्त, एक ही तरीके से। मगर दस्तयाब हुए ख़ज़ाने को हर वक़्त काम में नहीं लगाते यानि कि याददाश्त में नहीं रखते। चेहरे से खुश होते हैं मगर दिल से ख़ुश नहीं होते। दिमाग की ख़ुशी है, दिल की ख़ुशी नहीं। सबब? दस्तयाबियों के खज़ानों को याददाश्त याफ़्ता बन काम में नहीं लगाते। याददाश्त रहती है मगर याददाश्त याफ़्ता में नहीं आते। दस्तयाबी बेहद की है मगर उनको कहाँ-कहाँ हद की दस्तयाबी में तब्दील कर लेते हो। इस सबब हद यानि कि कलील अरसे की दस्तयाबी की खुवाहिश, बेहद की दस्तयाबी के सिला जो हमेशा इत्मीनान का एहसास हो, उससे महरूम कर देता है। हद की दस्तयाबी दिलों में हद डाल देती है इसलिए इद्दम मुत्मइन नशीनी का एहसास होता है। खिदमत में हद डाल देते हैं क्योंकि हद की खुवहिशात का सिला मन इच्छित फल नहीं हासिल होता। हद की खुवाहिशात का सिला कलील अरसे की तकमील वाला होता है इसलिए अभी-अभी इत्मीनान, अभी-अभी इद्दम मुत्मइन नशीनी हो जाती है। हद, बेहद का नशा एहसास कराने नहीं देता इसलिए, ख़ास चेक करो कि ज़हन की यानि कि खुद के इत्मीनान, तमाम का इत्मीनान एहसास होता है?

मुत्मइन नशीनी की निशानी - वह ज़हन से, दिल से, तमाम से, रब से, ड्रामा से मुत्मईन होंगे; उनके ज़हन और जिस्म में हमेशा ख़ुशी की लहर दिखाई देगी। चाहे कोई भी मुश्किलात आ जाए, चाहे कोई रूह हिसाब-किताब चुक्तू करने वाली सामना करने भी आती रहे, चाहे जिस्म का तकलीफ़ ए आमाल सामना करने आता रहे मगर हद की खुवाहिशात से आज़ाद रूह इत्मीनान के सबब हमेशा ख़ुशी की झलक में चमकता हुआ सितारा दिखाई देगा। खुशहाल कभी कोई बात में सवारियां नहीं होंगे। सवाल हैं तो ख़ुशी नहीं। ख़ुशहाल की निशानी - वह हमेशा बे गर्ज और हमेशा तमाम को मासूम एहसास करेगा; किसी और के ऊपर तोहमत नहीं रखेगा - न तक़दीर बनाने वाले के ऊपर कि मेरी तक़दीर ऐसी बनायी, न ड्रामा पर कि मेरा ड्रामा में ही पार्ट ऐसा है, न इन्सान पर कि इसकी रवैया-आदत ऐसी है, न कुदरत के ऊपर कि कुदरत का माहौल ऐसा है, न जिस्म के हिसाब-किताब पर कि मेरा जिस्म ही ऐसा है। ख़ुशहाल यानि कि हमेशा बे गर्ज, मासूम कैफियत-नज़र वाले। तो मिलन के दौर की खासियत इत्मीनान है और इत्मीनान की निशानी ख़ुशी है। यह है मोमिन ज़िन्दगी की ख़ास दस्तयाबी। इत्मीनान नहीं, ख़ुशी नहीं तो मोमिन बनने का फायदा नहीं लिया। मोमिन ज़िन्दगी की ख़ुशी है ही इत्मीनान, ख़ुशी। मोमिन ज़िन्दगी बनी और उसकी ख़ुशी हासिल नहीं की तो नामनशीन मोमिन हुए या दस्तयाबी याफ़्ता मोमिन हुए? तो रब उल हक़ तमाम मोमिन बच्चों को यही याददाश्त दिला रहे हैं - मोमिन बने, वाह री क़िस्मत! मगर मोमिन ज़िन्दगी का वर्सा, प्रोपर्टी इत्मीनान है। और मोमिन ज़िन्दगी की पर्सनाल्टी मसर्रत' है। इस एहसास से कभी महरूम नहीं रहना। हक़दार हो। जब दाता, रहमतुल्आल्मीन खुली दिल से दस्तयाबियों का खज़ाना दे रहे हैं, दे दिया है तो ख़ूब अपनी प्रापर्टी और पर्सनाल्टी को एहसास में लाओ, औरों को भी एहसास साती बनाओ। समझा? हर एक अपने से पूछे कि मैं किस नम्बर की माला में हूँ? माला में तो है ही मगर किस नम्बर की माला में हूँ। अच्छा।

आज राजस्थान और यू.पी. ग्रुप है। राजस्थान यानि कि बादशाहत आदत वाले, हर इरादे में, खुद के रूप में बादशाही आदत प्रैक्टिकल में लाने वाले यानि कि ज़ाहिर दिखाने वाले। इसको कहते हैं राजस्थान रिहाईश नशीन। ऐसे हो ना? कभी अवाम तो नहीं बन जाते हो ना? अगर बस में हो गये तो अवाम कहेंगे, मालिक हैं तो बादशाह। ऐसे नहीं कि कभी बादशाह, कभी अवाम। नहीं। हमेशा बादशाहत आदत अपने आप ही याददाश्त याफ़्ता में हों। ऐसे राजस्थान रिहाईश नशीन बच्चों की अहमियत भी है। बादशाह को हमेशा तमाम आला नज़र से देखेंगे और मुकाम भी बादशाह को आलातरीन देंगे। बादशाह हमेशा तख्त पर बैठेगा, अवाम हमेशा नीचे। तो राजस्थान के बादशाहत की आदत वाली रूहें यानि कि हमेशा आलातरीन सूरत ए हाल के मुकाम पर रहने वाले। ऐसे बन गये हो या बन रहे हो? बने हैं और लबरेज़ बनना ही है। राजस्थान की अज़मत कम नहीं है। क़याम का हेडक्वार्टर ही राजस्थान में है। तो आला हो गये ना। नाम से भी आला, काम से भी आला। ऐसे राजस्थान के बच्चे अपने घर में पहुँचे हैं। समझा?

यू.पी. की सरज़मी ख़ास पाकीज़ा-सरज़मी गाई हुई है। पाकीज़ा करने वाली अकीदत मन्दी की राह की गंगा नदी भी वहाँ है और अकीदत के हिसाब से कृष्ण की सरज़मी भी यू.पी. में ही है। सरज़मी की अज़मत निहायत है। कृष्ण लीला, विलादत सरज़मी देखनी होगी तो भी यू.पी. में ही जायेंगे। तो यू.पी. वालों की खासियत है। हमेशा पाकीज़ा बन और पाकीज़ा बनाने की खासियत से लबरेज़ हैं। जैसे रब की अज़मत है नापाक से पाक बनाने वाले... यू.पी. वालों की भी अज़मत रब जैसी है। नापाक से पाक बनाने वाली रूहें हो। तक़दीर का सितारा चमक रहा है। ऐसे तक़रीरवान मुकाम और सूरत ए हाल - दोनों की अज़मत है। हमेशा पाकीज़ा - यह है सूरत ए हाल की अज़मत। तो ऐसे तक़रीरवान अपने को समझते हो? हमेशा अपनी तक़दीर को देख ख़ुश होते खुद भी हमेशा खुशहाल और दूसरों को खुशग्वार बनाते चलो क्योंकि खुशहाल चेहरा अपने आप ही कशिश नशीन होते हैं। जैसे मैकरू नदी अपनी तरफ़ खींचती है ना, खींचकर ज़ायरीन जाते हैं। चाहे कितनी भी मुसीबत उठानी पड़े, फिर भी पाकीज़ा होने की कशिश खींच लेती है। तो यह पाकीज़ा बनाने के काम का यादगार यू.पी. में है। ऐसे ही खुशहाल और कशिश नशीन बनना है। समझा?

तीसरा ग्रुप डबल विलायतियों का भी है। डबल विलायती यानि कि हमेशा विलायती रब को कशिश करने वाले, क्योंकि बराबर हैं ना। रब भी विलायती है, आप भी विलायती हो। हम शरीक़ प्यारे होते हैं। माँ-बाप से भी फ्रैन्डस ज़्यादा प्यारे लगते हैं। तो डबल विलायती रब जैसे हमेशा इस जिस्म और जिस्म की कशिश से बालातर विलायती हैं, बे जिस्म हैं, ग़ैबी हैं। तो रब अपने जैसे बे जिस्म, ग़ैबी सूरत ए हाल वाले बच्चों को देख ख़ुश होते हैं। रेस भी अच्छी कर रहे हैं। खिदमत में अलग-अलग अस्बाब और अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ने की रेस अच्छी कर रहे हैं। तरीक़त भी अपनाते और इज़ाफ़ा भी कर रहे हैं इसलिए, रब उल हक़ चारों ओर के डबल विलायती बच्चों को खिदमत की मुबारकबाद भी देते और खुद के इज़ाफें की याददाश्त भी दिलाते हैं। खुद की तरक्की में हमेशा उड़ते फ़न के ज़रिए उड़ते चलो। खुद की तरक्की और खिदमत की तरक्की के बैलेन्स के ज़रिए हमेशा रब के ब्लैसिंग के हक़दार हैं और हमेशा रहेंगे। अच्छा।

चौथा ग्रुप है बाक़ी मधुबन रिहाईश नशीन। वह तो हमेशा हैं ही। जो दिल पर सो चुल पर, जो चुल पर सो दिल पर। सबसे ज़्यादा तरीक़े मुताबिक इलाही तब्बरूक भी मधुबन में होता। सबसे सिकीलधे भी मधुबन रिहाईश नशीन हैं। तमाम फंक्शन भी मधुबन में होते। सबसे, डायरेक्ट नूरानी कलेमात भी, ज़्यादा मधुबन वाले ही सुनते। तो मधुबन रिहाईश नशीन हमेशा अफ़जल तक़दीर के हक़दार रूहें हैं। खिदमत भी दिल से करते हैं इसलिए मधुबन रिहाईश नशीनियों को रब उल हक़ और तमाम मोमिनों की दिल से बरक़ात दस्तयाब होती रहती है। अच्छा।

चारों ओर की तमाम रब उल हक़ की खास इत्मीनान याफ़्ता को रब की ख़ास यादप्यार। साथ-साथ तमाम तक़ मोमिन ज़िन्दगी हासिल करने वाले करोड़ों में कोई, कोई में भी कोई सिकीलधी रूहों को, रब उल हक़ के खालिस इरादे को मुकम्मल करने वाली रूहों को, मिलन के दौर मोमिन ज़िन्दगी की प्रापर्टी के मुकम्मल हक़दार हासिल करने वाली रूहों को खालिक और रहमतुल्आल्मीन रब उल हक़ की बहुत-बहुत यादप्यार कबूल हो।

दादी जानकी जी और दादी चन्द्रमणि जी खिदमतों पर जाने की छुट्टी रब उल हक़ से ले रही हैं
जा रही हो या समा रही हो? जाओ या आओ मगर हमेशा समाई हुई हो। रब उल हक़ जिगरी बच्चों को कभी अलग देखते ही नहीं हैं। चाहे रूहानी में, चाहे जिस्मानी में हमेशा साथ हैं क्योंकि सिर्फ़ अज़ीम बहादुर बच्चे ही हैं जो यह वायदा निभाते हैं कि हर वक़्त साथ रहेंगे, साथ चलेंगे। निहायत थोड़े यह वायदा निभाते हैं इसलिए, ऐसे अज़ीम बहादुर बच्चे, जिगरी बच्चे जहाँ भी जाते रब को साथ ले जाते हैं और रब हमेशा वतन में भी साथ रखते हैं। हर कदम में साथ देते इसलिए जा रही हो, आ रही हो - क्या कहेंगे? इसीलिए कहा कि जा रही हो या समा रही हो। ऐसे ही साथ रहते-रहते बराबर बन समा जायेगी। घर में थोड़े वक़्त के लिए रेस्ट करेंगी, साथ रहेंगी। फिर आप सल्तनत करना और रब ऊपर से देखेंगे। मगर साथ का थोड़े वक़्त का एहसास करना। अच्छा।

(आज रब्बा आपने कमाल की माला बनाई) आप लोग भी तो माला बनाते हो ना। माला अभी तो छोटी है। अभी बड़ी बनेगी। अभी जो थोड़ा कभी-कभी बेहोश हो जाते हैं, उन्हें थोड़े वक़्त में कुदरत का या वक़्त का आवाज़ होश में ले आयेगा; फिर माला बड़ी बन जायेगी। अच्छा। जहाँ भी जाओ रब के बरक़ाती तो हो ही। आपके हर कदम से रब की बरक़ात तमाम को मिलती रहेगी। देखेंगे तो भी रब की बरक़ात नज़र से लेंगे, बोलेंगे तो बोल से बरक़ात लेंगे, आमाल से भी बरक़ात ही लेंगे। चलते-फिरते बरक़ातों की बरसात करने के लिए जा रही हो। अभी जो रूहें आ रही हैं, उनको बरक़ात की और अज़ीम सदके की ही ज़रूरत है। आप लोगों का जाना यानि कि खुले दिल से उन्हों को रब की बरक़ात मिलना। अच्छा।

बरक़ात:-
अक्ल रूपी पैर के ज़रिए इस पांच अनासरों की कशिश से बालातर रहने वाले फरिश्ता याफ़्ता बनो

फरिश्तों को हमेशा नूर का जिस्म दिखाते हैं। नूर के जिस्म वाले इस जिस्म की याददाश्त से भी बालातर रहते हैं। उनके अक्ल रूपी पैर इस पांच अनासरों की कशिश से आला यानि कि बालातर होते हैं। ऐसे फरिश्तों को इबलीस या कोई भी इबलीसी टच नहीं कर सकते। मगर यह तब होगा जब कभी किसी के गुलाम नहीं होंगे। जिस्म के भी मालिक बनकर चलना, इबलीस के भी मालिक बनना, जिस्मानी और रूहानी रिश्ते की भी गुलामी में नहीं आना।

स्लोगन:-
जिस्म को देखने की आदत है तो लाइट का जिस्म देखो, लाइट रूप में वाकेअ रहो।

आमीन