03-09-2020   नूरानी कलेमात


मीठे बच्चे
याद से सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनने के साथ- साथ तालीम से कमाई जमा करनी है, तालीम के वक़्त अक्ल इधर-उधर न भागे

सवाल:-
तुम इद्दम तशदिद, अननोन वारियर्स की कौन-सी फ़तह यक़ीनन है और क्यों?

जवाब:-
तुम बच्चे जो इबलीस पर फ़तह पाने की तजवीज़ कर रहे हो, तुम्हारा मकसद है कि हम शैतान से अपनी सल्तनत लेकर ही छोड़ेंगे....... यह भी ड्रामा में तरीक़त बनाई हुई है। तुम्हारी फ़तह यक़ीनन है क्योंकि तुम्हारे साथ खुद खुदा ताला है। तुम कुव्वत ए इबादत से फ़तह पाते हो।दिल से मुझे याद करो की अज़ीम आयत से तुम्हें बादशाहत मिलती है। तुम आधाकल्प हुकूमत करेंगे।

नग़मा:-
मुखड़ा देख ले प्राणी........

आमीन।
आमीन। मीठे-मीठे बच्चे जब सामने बैठे रहते हैं तो समझते हैं बरोबर हमारा कोई जिस्मानी टीचर नहीं है, हमको तालीम देने वाला दरिया ए इल्म रब्बा है। यह तो पक्का यक़ीन है वह हमारा बाप भी है, जब पढ़ते हैं तो पढ़ाई पर अटेन्शन रहता है। स्टूडेन्ट अपने स्कूल में बैठे होंगे तो टीचर याद आयेगा, न कि बाप क्योंकि स्कूल में बैठे हैं। तुम भी जानते हो रब्बा टीचर भी है। नाम को तो नहीं पकड़ना है ना। ख्याल में रखना है - हम रूह हैं, रब से सुन रहे हैं। यह तो कभी होता ही नहीं। न सुनहरे दौर में, न इख्तिलाफ़ी फ़ितने के दौर में होता है। सिर्फ़ एक ही बार मिलन के दौर पर होता है। तुम अपने को रूह समझते हो। हमारा बाप इस वक़्त टीचर है क्योंकि पढ़ाते हैं, दोनों काम करने पड़ते हैं। रूह पढ़ती है पाक परवरदिगार से। यह भी इबादत और तालीम हो जाती है। पढ़ती रूह है, पढ़ाते पाक परवरदिगार हैं। इसमें और ही जास्ती फ़ायदा है जबकि तुम सामने हो। निहायत बच्चे अच्छी तरह याद में रहेंगे। मुकम्मल हालत में पहुँचेंगे तो वह भी जैसे पाकीज़गी की ताक़त मिलती है। तुम जानते हो पाक परवरदिगार हमको पढ़ाते हैं। यह तुम्हारी इबादत भी है, कमाई भी है। रूह को ही सातों फ़ज़ीलतों से लबरेज़ बनना है। तुम ख़ैर रास्त भी बन रहे हो, दौलत भी ले रहे हो। अपने को रूह ज़रूर समझना है। अक्ल भागनी नहीं चाहिए। यहाँ बैठते हो तो अक्ल में यह रहे कि पाक परवरदिगार पढ़ाने के लिए टीचर रूप में आया कि आया। वही नॉलेजफुल है, हमको तालीम दे रहे हैं। रब को याद करना है। दीदार ए नफ़्स चक्कर नशीन भी हम हैं। लाइट हाउस भी हैं। एक ऑख में दारूल सुकून, एक ऑख में दारूल ज़िन्दगी ए निजात है। इन आंखों की बात नहीं है, रूह का तीसरी आंख कहा जाता है। अभी रूहें सुन रही हैं, जब जिस्म छोड़ेंगे तो रूह में यह आदत होंगी। अभी तुम रब से राब्ता क़ायम करते हो। सुनहरे दौर से लेकर तुम अलाहिदा थे यानि कि रब से राब्ता नहीं था। अभी तुम इबादत नशीन बनते हो, रब के जैसे। इबादत सिखलाने वाला है अल्ल्लाह् ताला इसलिए उनको कहा जाता है मुअब्बिद। तुम भी मुअब्बिद के बच्चे हो। उनको इबादत करना नहीं है। वह है इबादत सिखलाने वाला पाक परवरदिगार। तुम एक-एक आबिद, आबिदा बनते हो फिर हुकूमत-हुकमरान बनेंगे। वह है।इबादत सिखलाने वाला अल्ल्लाह् ताला। खुद नहीं सीखता है, सिखलाते हैं। आदम अलैहिस्सलाम की ही रूह आखि़र की विलादत में इबादत सीख फिर आदम अलैहिस्सलाम बनती है, इसलिए आदम अलैहिस्सलाम को भी मुअब्बिद कह देते हैं क्योंकि उनकी रूह अभी सीख रही है। अल्ल्लाह् ताला से इबादत सीख आदम अलैहिस्सलाम मर्तबा पाते है। इनका नाम फिर रब ने आदम अलैहिस्सलाम रखा है। पहले तो जिस्मानी नाम था फिर मरजीवा बने हैं। रूह को ही रब का बनना है। रब के बने तो मर गये ना। तुम भी रब के ज़रिए इबादत सीखते हो।इन आदतों से ही तुम जायेंगे दारूल सुकून में। फिर नया पार्ट क़िस्मत का इमर्ज होगा। वहाँ यह बातें याद नहीं रहेंगी। यह अभी रब समझाते हैं। अभी पार्ट पूरा होता है। फिर नये-सिर शुरू होगा। जैसे रब को ख्याल उठा कि मैं जाऊं तो रब फ़रमाते हैं मैं आता हूँ और मेरे कलेमात चलने शुरू हो जाते है। वहाँ तो सुकून में हैं। फिर ड्रामा के मुताबिक़ उनका पार्ट शुरू होता है। आने का तो इरादा उठता है। फिर यहाँ आकर पार्ट बजाते हैं। तुम्हारी रूहें भी सुनती हैं। नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक कल्प पहले मिसल। रोज़ ब रोज़ इज़ाफें को भी पाते जायेंगे। एक दिन तुमको बड़े रॉयल हाल भी मिलेंगे, जिसमें बड़े-बड़े लोग भी आयेंगे। तमाम इकट्ठे बैठ सुनेंगे। रोज़ ब रोज़ दौलत मन्द भी रंक होते जायेंगे, पेट पीठ से लग जायेगा। ऐसी आफतें आनी हैं, मूसलाधार बरसात पड़ेगी तो तमाम खेती वगैरह पानी में डूब जायेगी। नैचुरल कैलामिटीज़ तो आनी ही है। तबाही होनी ही है, इनको कहा जाता है कुदरती आफतें। अक्ल कहती हैं तबाही होना ज़रूर है। उस तरफ़ के लिए बॉम्बस भी तैयार हैं, नैचुरल कैलेमिटीज वगैरह फिर है यहाँ के लिए। उसमें बड़ी हिम्मत चाहिए। अंगद का भी मिसाल है ना, उनको कोई हिला न सका। यह हालत पक्की करनी है-मैं रूह हूँ, जिस्म का हवास टूटता जाए। सुनहरे दौर में तो जब ऑटोमेटिकली वक़्त पूरा होता है तो मोजिज़ा होता है। अभी हमको यह जिस्म छोड़ जाए बच्चा बनना है। एक जिस्म छोड़ जाए दूसरे में दाखिला करते हैं, सज़ायें वगैरह तो वहाँ कुछ हैं नहीं। रोज़-ब-रोज़ तुम नज़दीक आते जायेंगे। रब फ़रमाते हैं मेरे में जो पार्ट भरा हुआ है वह खुलता जायेगा। बच्चों को बताते रहेंगे। फिर रब का पार्ट पूरा होगा तो तुम्हारा भी पूरा हो जायेगा। फिर तुम्हारा सुनहरे दौर का पार्ट शुरू होगा। अभी तुमको अपनी सल्तनत लेनी है, यह ड्रामा बड़ा तरीक़े से बना हुआ है। तुम इबलीस पर फ़तह पाते हो, इसमें भी टाइम लगता है। वो लोग तो एक तरफ़ समझते हैं कि हम जन्नत में बैठे हैं, यह दारूल मसर्रत बन गया है, दूसरी तरफ़ फिर नग़में में भी हिन्दुस्तान की हालत सुनाते हैं। तुम जानते हो यह तो और ही स्याह रास्त हो गये हैं। ड्रामा के मुताबिक़ स्याह रास्त भी ज़ोर से होते जाते हैं। तुम अब ख़ैर रास्त बन रहे हो। अब नज़दीक आते जाते हो, आख़रीन फ़तह तो तुम्हारी होनी ही है। हाहाकार के बाद फिर जयजयकार होगी। घी की नदियाँ बहेंगी। वहाँ घी वगैरह खरीद करना नहीं पड़ेगा। सबके पास अपनी गायें फर्स्टक्लास होती हैं। तुम कितने आलातरीन बनते हो। तुम जानते हो वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी फिर रिपीट होती है। रब आकर वर्ल्ड की हिस्ट्री रिपीट करते हैं इसलिए रब्बा ने कहा यह भी लिख दो वर्ल्ड की हिस्ट्री-जाग्राफी कैसे रिपीट होती है, आकर समझो। जो सेन्सीबुल होगा कहेगा अभी आइरन एज है तो ज़रूर गोल्डन एज रिपीट होगी। कोई तो कहेंगे खिल्क़त का चक्कर लाखों साल का है, अभी कैसे रिपीट होगा। यहाँ खानदान ए आफ़ताबी-खानदान ए महताबी की हिस्ट्री तो है नहीं। आख़िर तक यह चक्कर कैसे रिपीट होता है। वह भी जानते नहीं कि इन्हों की सल्तनत फिर कब होगी। इलाही सल्तनत को जानते नहीं। अभी तुम्हारे साथ रब है। जिस तरफ़ खुद पाक परवरदिगार बाप है उनकी ज़रूर फ़तह होनी है। रब कोई तशदिद थोड़े ही करायेंगे। किसको मारना तशदिद है ना। सबसे बड़ी तशदिद है हवस कटारी चलाना। अभी तुम डबल इद्दम तशदिद बन रहे हो। वहाँ है ही इद्दम तशदिद आलातरीन हूर-हूरैन दीन। वहाँ न लड़ते हैं, न ख़बासत में जाते हैं। अभी तुम्हारी है कुव्वत ए इबादत,मगर इसको न समझने सबब सहीफों में शैतान और हूरैन की लड़ाई लिख दी है, इद्दम तशदिद को कोई जानते नहीं। यह तुम ही जानते हो। तुम हो इनकागनीटो वारियर्स। अननोन बट वेरी वेल नोन। तुमको कोई वारियर्स समझेंगे? तुम्हारे ज़रिए सबको दिल से मुझे याद करो का पैगाम मिलेगा। यह है अज़ीम तस्बीह। इन्सान इन बातों को समझते नहीं हैं। आला जन्नत-अदना जन्नत में यह होती नहीं। तस्बीह से तुमने सल्तनत पाई फिर दरकार नहीं। तुम जानते हो हम कैसे चक्कर लगाकर आये हैं। अभी फिर रब अज़ीम तस्बीह देते हैं। फिर आधाकल्प सल्तनत करेंगे। अब तुमको हूरैन फ़ज़ीलत इख्तियार करनी और करानी हैं। रब्बा सलाह देते हैं-अपना चार्ट रखने से निहायत मज़ा आयेगा। रजिस्टर में गुड, बेटर, बेस्ट होते हैं ना। खुद भी फील करते हैं। कोई अच्छा पढ़ते हैं, कोई का अटेन्शन नहीं रहता है तो फेल हो जाते हैं। यह फिर है बेहद की तालीम। बाप टीचर भी है,हादी भी है। इकट्ठा चलता है। यह एक ही रब है जो फ़रमाते मरजीवा बनो। तुम अपने को रूह समझ रब को याद करो। रब फ़रमाते हैं मैं तुम्हारा रब हूँ। आदम अलैहिस्सलाम के ज़रिए सल्तनत देता हूँ। यह हो गया बीच में दलाल, इनसे राब्ता नहीं क़ायम करना है। अभी तुम्हारी अक्ल लगी है उस अपने खाविन्दों का खाविन्द पाक परवरदिगार माशूक के साथ। इन ज़रिए वह तुमको अपना बनाते हैं। कहते हैं अपने को रूह समझ मुझे याद करो। हम रूह ने पार्ट पूरा किया अब रब के पास जाना है घर। अभी तो तमाम खिल्क़त स्याह रास्त है। 5 अनासर भी स्याह रास्त हैं। वहाँ सब कुछ नया होगा। यहाँ तो देखो हीरे-जवाहरात वगैरह कुछ भी नहीं हैं। जन्नत में फिर कहाँ से आते हैं? खानियाँ जो अब खाली हो गई हैं वह सब फिर से अब भरतू हो जाती है। खानियों से खोद कर ले आते हैं।ख्याल करो सब नई चीजें होंगी ना। लाइट वगैरह भी जैसे नैचुरल रहती है, साइंस से यहाँ सीखते रहते हैं। वहाँ यह भी काम में आती हैं। हेलीकाप्टर खड़े होंगे, बटन दबाया यह चला। कोई तकलीफ़ नहीं। वहाँ सब फुलप्रूफ होते हैं, कभी मशीन वगैरह ख़राब हो न सके। घर में बैठे सेकण्ड में स्कूल में और घूमने-फिरने पहुँचते हैं। अवाम के लिए फिर उनसे कम होंगे। तुम्हारे लिए वहाँ तमाम खुशियां होती हैं।बे वक़्त मौत हो नहीं सकती। तो तुम बच्चों को कितना अटेन्शन देना चाहिए। इबलीस का भी निहायत ज़ोर है। यह है इबलीस का आखिरी पाम्प। लड़ाई में देखो कितने मरते हैं। लड़ाई बन्द होती ही नहीं। कहाँ इतनी सारी दुनिया, कहाँ सिर्फ़ एक ही जन्नत होगी। वहाँ ऐसे थोड़े ही कहेंगे गंगा पतित-पावनी है। वहाँ अकीदत मन्दी की राह की कोई बात ही नहीं। यहाँ गंगा में देखो सारे शहर का किचड़ा पड़ता रहता है। बॉम्बे का सारा किचड़ा समन्दर में बह जाता है।
अकीदत मन्दी में तुम बड़े-बड़े मन्दिर बनाते हो। हीरे-जवाहरातों के तो ख़ुशी रहती है ना। पौना हिस्सा ख़ुशी है, बाक़ी क्वार्टर है दु:ख। आधा-आधा हो फिर तो मज़ा न रहे। अकीदत मन्दी की राह में भी तुम निहायत ख़ुश रहते हो। पीछे मन्दिरों वगैरह को आए दिन लूटते हैं। जन्नत में तुम कितने दौलत मन्द थे तो तुम बच्चों को निहायत ख़ुशी होनी चाहिए। एम ऑब्जेक्ट तो सामने खड़ी है। माँ-बाप की तो सर्टेन है। गाया जाता है ख़ुशी जैसी खुराक़ नहीं। इबादत से उम्र बढ़ती है।
अभी रूह को खुद का दीदार हुआ है कि हम 84 का चक्कर लगाते हैं। इतना पार्ट बजाते हैं। तमाम रूहें एक्टर्स नीचे आ जायेंगे तो रब सबको ले जायेंगे। शिव की बरात कहते हैं ना। यह सब तुम जानते हो नम्बरवार तजवीज़ के मुताबिक। जितना तुम याद में रहेंगे उतनी ख़ुशी में रहेंगे। रोज़-ब- रोज़ फील करते रहेंगे, क्योंकि सिखलाने वाला तो वह रब है ना। यह भी सिखाते रहते हैं। इनको (आदम अलैहिस्सलाम को) पूछने की दरकार नहीं रहती। पूछते तो तुम हो। यह तो सुनते ही हैं। रब रेसपान्ड देते हैं और यह भी सुनते हैं, इनकी एक्टिविटी कितनी वन्डरफुल है। यह भी याद में रहते हैं। फिर बच्चों को बयान कर सुनाते हैं। रब्बा हमको खिलाते हैं। मैं उनको अपना जिस्म देता हूँ, सवारी करते हैं तो क्यों नहीं खिलायेंगे। यह ह्यूमन घोड़े है। पाक परवरदिगार का जिस्म हूँ - यह ख्याल रहने से भी पाक परवरदिगार की याद रहेगी। याद से ही फ़ायदा है। भण्डारे में खाना बनाते हैं तो भी समझो हम पाक परवरदिगार के बच्चों के लिए बनाते हैं। खुद भी पाक परवरदिगार के बच्चे हैं तो ऐसे याद करने से भी फ़ायदा ही है। सबसे जास्ती मर्तबा उनको मिलेगा जो याद में रह मुकम्मल हालत को पाते हैं और खिदमत भी करते हैं। यह बाबा भी निहायत खिदमत करते हैं ना। इनकी बेहद की खिदमत है तुम हद की खिदमत करते हो। खिदमत से ही इनको भी मर्तबा मिलता है। पाक परवरदिगार फ़रमाते - ऐसे-ऐसे करो, इनको भी सलाह देते हैं। तूफान तो बच्चों को आते हैं, सिवाए याद के हवास बस होना मुश्किल है। याद से ही बेड़ा पार होना है, यह पाक परवरदिगार फ़रमाते हैं या आदम अलैहिस्सलाम बाबा कहते हैं, यह समझना भी मुश्किल हो जाता है। इसमें बड़ी महीन अक्ल चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों के वास्ते मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी रब की रूहानी बच्चों को सलाम।

तरीक़त के वास्ते अहम निकात:-

1) इस वक़्त पूरा-पूरा मरजीवा बनना है। तालीम अच्छी तरह पढ़नी है, अपना चार्ट और रजिस्टर रखना है। याद में रह अपनी मुकम्मल हालत बनानी है।

2) आख़िरी तबाही की सीन देखने के लिए हिम्मतवान बनना है। मैं रूह हूँ-इस प्रेक्टिस से जिस्म का हवास टूटता जाए।

बरक़ात:-
किसी भी खौफनाक मुश्किलात को ठंडा बनाने वाले मुकम्मल यक़ीनी दानिश मन्द बनो।

जैसे रब में यक़ीन है वैसे खुद में और ड्रामा में भी मुकम्मल यक़ीन हो। खुद में अगर कमज़ोरी का इरादा पैदा होता है तो कमज़ोरी की आदत बन जाती हैं, इसलिए फ़ालतू इरादे रूपी कमज़ोरी के जर्म्स अपने अन्दर दाखिल होने नहीं देना। साथ-साथ जो भी ड्रामा की सीन देखते हो, हलचल की सीन में भी फ़लाह का एहसास हो, माहौल हिलाने वाला हो, मुसीबत खौंफ नाक हो मगर हमेशा यक़ीनी दानिश मन्द फ़तहयाब बनो तो खौफनाक मुश्किलात भी ठंडी हो जायेगी।

स्लोगन:-
जिसका रब और खिदमत से प्यार है उसे कुनबे का प्यार अपने आप मिलता है।

आमीन