04-04-2021 ग़ैबी नूरानी कलेमात रिवाइज: 06-12-87


तकमील की बुनियाद अफ़ज़ल कैफियत


आज रब उल हक़ अपने चारों ओर के होलीहंसों की मजलिस को देख रहे हैं। हर एक होलीहंस अपनी अफ़ज़ल सूरत ए हाल के तख्त पर मुकीम है। तमाम तख्त नशीन होलीहंसों की मजलिस तमाम चक्कर में रूहानी और न्यारी है। हर एक होलीहंस अपनी खासियतों से बेइंतहा खूबसूरत सजा हुआ है। खासियत अफ़ज़ल सिंगार हैं। सजे सजाये होलीहंस कितने प्यारे लगते हैं? रब उल हक़ हर एक की खासियतों का सिंगार देख खुशगवार होते हैं। सिंगारे हुए तमाम हैं क्योंकि रब उल हक़ ने मोमिन विलादत देते ही बचपन से ही ख़ास रूह बनो' की बरक़ात दी। नम्बरवार होते भी लास्ट नम्बर भी ख़ास रूह है। मोमिन ज़िन्दगी में आना यानि कि ख़ास रूह में आ ही गये। मोमिन फैमिली में चाहे लास्ट नम्बर हो मगर दुनिया की कई रूहों के मुकाबले में वह भी ख़ास गाये जाते, इसलिए करोड़ों में कोई, कोई में भी कोई गाया हुआ है। तो मोमिनों की मजलिस यानि कि ख़ास रूहों की मजलिस।

आज रब उल हक़ देख रहे थे कि खासियतों का सिंगार रब ने तो तमाम को बराबर एक जैसा ही कराया है मगर कोई उस सिंगार को इख्तियार कर वक़्त के मुताबिक काम में लगाते हैं और कोई या तो इख्तियारात नहीं कर सकते या कोई वक़्त मुताबिक काम में नहीं लगा सकते। जैसे आजकल की रॉयल फैमिली वाले वक्त मुताबिक सिंगार करते हैं तो कितना अच्छा लगता है! जैसा वक़्त वैसा सिंगार, इसको कहा जाता है नॉलेजफुल। आजकल सिंगार के अलग-अलग सेट रखते है ना। तो रब उल हक़ ने कई खासियतों के, कई अफ़ज़ल फ़ज़ीलतों के कितने वैराइटी सेट दिये हैं! चाहे कितना भी बेशकीमती सिंगार हो मगर वक़्त मुताबिक़ अगर नहीं हो तो क्या लगेगा? ऐसे खासियतों के, फ़ज़ीलतों के, कुव्वतों के, जवाहिरात ए इल्मों के कई सिंगार रब ने तमाम को दिये हैं मगर वक़्त पर काम में लगाने में नम्बर बन जाते हैं। भल यह तमाम सिंगार हैं भी मगर हर एक खासियत और फ़ज़ीलत का अहमियत वक़्त पर होती है। होते हुए भी वक़्त पर काम में नहीं लगाते तो बेशकीमती होते हुए भी उसकी क़ीमत नहीं होती। जिस वक़्त जो खासियत इख्तियारात करने का काम है उसी खासियत की ही कीमत है। जैसे हंस कंकड़ और जवाहिरात -दोनों को परख अलग-अलग कर इख्तियार करता है। कंकड़ को छोड़ देता है, बाक़ी जवाहिरात-मोती इख्तियार करता है। ऐसे होलीहंस यानि कि वक़्त मुताबिक़ खासियत और फ़ज़ीलत को परख कर वही वक़्त पर यूज़ करे। इसको कहते हैं परखने की कुव्वत, फैसला करने की कुव्वत वाला होलीहंस। तो परखना और फैसला करना - यही दोनों कुव्वतें नम्बर आगे ले जाती हैं। जब यह दोनों कुव्वतें इख्तियारात हो जाती तब वक़्त मुताबिक उसी खासियत से काम ले सकते। तो हर एक होलीहंस अपनी इन दोनों कुव्वतों को चेक करो। दोनों कुववतें वक़्त पर धोखा तो नहीं देती? वक़्त बीत जाने के बाद अगर परख भी लिया, फैसला कर भी लिया मगर वक़्त तो वह बीत गया ना। जो नम्बरवन होलीहंस हैं, उन्हों की यह दोनों कुव्वतें हमेशा वक़्त के मुताबिक काम करती हैं। अगर वक़्त के बाद यह कुव्वतें काम करती तो सेकण्ड नम्बर में आ जाते! थर्ड नम्बर की तो बात ही छोड़ो। और वक़्त पर वही हंस काम कर सकता जिसकी हमेशा अक्ल होली (पाकीज़ा) है।

होली का मतलब सुनाया था ना। एक होली यानि कि पाकीज़ा और हिन्दी में हो ली यानि कि बीती सो बीती। तो जिनकी अक्ल होली यानि कि साफ़ है और हमेशा ही जो सेकण्ड, जो हालत बीत गई वह हो ली - यह प्रेक्टिस है, ऐसी अक्ल वाले हमेशा होली यानि कि रूहानी रंग में रंगे हुए रहते हैं, हमेशा ही रब की सोहबत के रंग में रंगे हुए हैं। तो एक ही होली अल्फ़ाज़ तीन रूप से यूज़ होता है। जिसमें यह तीनों ही मतलब की खासियत हैं यानि कि जिन हंसों को यह तरीक़ा आता है, वह हर वक़्त तकमील को दस्तयाब होते हैं। तो आज रब उल हक़ होलीहंसों की‌ खासियत में तमाम होलीहंसों की यह खासियत देख रहे हैं। चाहे मैकरू काम यानि कि रूहानी काम हो मगर दोनों में कामयाबी की बुनियाद परखने और फैसला करने की कुव्वत है। किसी के भी राब्ते में आते हो, जब तक उसके जज़्बे और जज़्बात को परख नहीं सकते और परखने के बाद हक़ीक़ी तौर पर फैसला नहीं कर पाते, तो दोनों काम में कामयाबी नहीं दस्तयाब होती - चाहे इन्सान हो और मुश्किलात हो क्योंकि इन्सान के रिश्ते में भी आना पड़ता है और मुश्किलात को भी पार करना पड़ता है। ज़िन्दगी में यह दोनों ही बातें आती हैं। तो नम्बरवन होलीहंस यानि कि दोनों खासियत में लबरेज़। यह हुआ आज की इस मजलिस की ख़बर। यह मजलिस यानि कि सिर्फ़ सामने बैठे हुए नहीं। रब उल हक़ के सामने तो आपके साथ-साथ चारों ओर के बच्चे भी इमर्ज होते हैं। बेहद की फैमिली के दरम्यान रब उल हक़ मिलन मनाते और रूहरिहान करते हैं। तमाम मोमिन रूहें अपनी याद की कुव्वत से खुद भी मधुबन में हाज़िर होती हैं। और रब उल हक़ यह भी ख़ास बात देख रहे हैं कि हर एक बच्चे के तरीक़े की लाइन और तकमील की लाइन, यह दोनों लक़ीरें कितनी साफ़ हैं, शुरुआत से अब तक तरीक़ा कैसा रहा है और तरीक़े के सिला याफ़्ता तकमील कितनी दस्तयाब की है, दोनों लक़ीरें कितनी साफ़ हैं और कितनी लम्बी यानि कि तरीक़ा और तकमील का खाता कितना हक़ीक़ी तौर पर जमा है? तरीक़े की बुनियाद है अफ़ज़ल कैफियत। अगर अफ़ज़ल कैफियत है तो हक़ीक़ी तौर पर तरीक़ा भी है और हक़ीक़ी तौर पर है तो तकमील अफ़ज़ल है ही है। तो तरीक़ा और तकमील का बीज कैफियत है। अफ़ज़ल कैफियत हमेशा भाई-भाई की रूहानी कैफियत हो। यह तो अहम बात है ही मगर साथ-साथ राब्ते में आते दरेक रूह के वास्ते फ़लाह की, प्यार की, इमदाद की, बे गर्ज़ की मुस्तकीम कैफियत हो, ग़ैर फ़ालतू-इरादा कैफियत हो। कई बार किसी भी रूह के वास्ते फ़ालतू इरादा और मुस्तकीम कैफियत होती है तो जैसी कैफियत नज़र वैसी ही उस रूह के फ़र्ज़,आमाल की खिल्क़त दिखाई देगी। कभी-कभी बच्चों का सुनते भी हैं और देखते भी हैं। कैफियत के सबब बयान भी करते हैं, चाहे वह कितना भी अच्छा काम करे मगर कैफियत फ़ालतू होने के सबब हमेशा ही उस रूह के वास्ते बोल भी ऐसे ही निकलते कि यह तो है ही ऐसा, होता ही ऐसा है। तो यह कैफियत उनकी आमाल रूपी खिल्क़त वैसी ही एहसास कराती है। जैसे आप लोग इस दुनिया में आंखों की नज़र के चश्मे की रिवायत बताते हैं; जिस रंग का चश्मा पहनेंगे वही दिखाई देगा। ऐसे यह जैसी कैफियत होती है, तो कैफियत नज़र को बदलती है, नज़र ख़िल्क़त को बदलती है। अगर कैफियत का बीज हमेशा ही अफ़ज़ल है तो तरीक़ा और तकमील कामयाबी नशीन है ही। तो पहले कैफियत के फाउन्डेशन को चेक करो। उसको अफ़ज़ल कैफियत कही जाती है। अगर किसी रिश्ते राब्ते में अफ़ज़ल कैफियत के बजाए मिक्स है तो भल कितनी भी तरीक़त अपनाओ मगर तकमील नहीं होगी क्योंकि बीज है कैफियत और दरख्त है तरीक़त और सिला है तकमील। अगर बीज कमज़ोर है तो दरख्त चाहे कितना भी तफ्सील वाला हो मगर तकमील रूपी सिला नहीं होगा। इसी कैफियत और तरीक़त के ऊपर रब उल हक़ बच्चों के वास्ते एक ख़ास रूहरिहान कर रहे थे।

अपनी तरक्की के वास्ते और खिदमत की कामयाबी के वास्ते एक मज़हिया स्लोगन रूहरिहान में बता रहे थे। आप तमाम यह स्लोगन एक दो में कहते भी हो, हर काम में पहले आप' - यह स्लोगन याद है ना? एक है पहले आप', दूसरा है पहले मैं'। दोनों स्लोगन पहले आप'' और पहले मैं' - दोनों ज़रूरी हैं। मगर रब उल हक़ रूहरिहान करते मुस्करा रहे थे। जहाँ पहले मैं' होना चाहिए वहाँ पहले आप' कर देते, जहाँ पहले आप' करना चाहिए वहाँ पहले मैं' कर देते। बदली कर देते हैं। जब कोई अपनी तब्दीली की बात आती है तो कहते हो पहले आप', यह बदले तो मैं बदलूँ। तो पहले आप हुआ ना। और जब कोई खिदमत की या कोई ऐसी मुश्किलात को सामना करने का चांस बनता है तो कोशिश करते हैं - पहले मैं, मैं भी तो कुछ हूँ, मुझे भी कुछ मिलना चाहिए। तो जहाँ पहले आप' कहना चाहिए, वहाँ मैं' कह देते। हमेशा शान ए नफ़्स में वाक़ेअ हो दूसरे को इज़्ज़त देना यानि कि पहले आप' करना। सिर्फ़ मुंह से कहो पहले आप' और आमाल में फ़र्क हो - यह नहीं। शान ए नफ़्स में वाक़ेअ हो शान ए नफ़्स देना है। शान ए नफ़्स देना और शान ए नफ़्स में वाक़ेअ होना, उसकी निशानी क्या होगी? उसमें दो बातें हमेशा चेक करो -

एक होती है तकब्बुर की कैफियत, दूसरी है बेइज्जती की कैफियत। जो शान ए नफ़्स में वाक़ेअ होता है और दूसरे को शान ए नफ़्स देने वाला सादिक़ होता, उसमें यह दोनों कैफियत नहीं होगी - न तकब्बुर की, न बेइज्जती की। यह तो करता ही ऐसा है, यह होता ही ऐसा है, तो यह भी रॉयल रूप का उस रूह की बेइज्जती है। शान ए नफ़्स में वाक़ेअ होकर शान ए नफ़्स देना इसको कहते हैं पहले आप' करना। समझा? और जो भी खुद की तरक्की की बात हो उसमें हमेशा पहले मैं' का स्लोगन याद हो तो क्या रिज़ल्ट होगी? पहले मैं यानि कि जो ओटे सो अर्जुन। अर्जुन यानि कि ख़ास रूह, न्यारी रूह, इलाही रूह, इलाही ख़ास रूह। जैसे जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप हमेशा पहले मैं' के स्लोगन से जो ओटे सो अर्जुन बना ना यानि कि नम्बरवन रूह। नम्बरवन का सुनाया - नम्बरवन डिवीज़न। वैसे नम्बरवन तो एक ही होगा ना। तो स्लोगन हैं दोनों ज़रूरी। मगर सुनाया ना - नम्बर किस बुनियाद पर बनते। जो वक़्त मुताबिक कोई भी खासियत को काम में नहीं लगाते तो नम्बर आगे पीछे हो जाता। वक़्त पर जो काम में लगाता है, वह विन करता है यानि कि वन हो जाता। तो यह चेक करो क्योंकि इस साल खुद की चेकिंग की बातें सुना रहे हैं। अलग-अलग बातें सुनाई हैं ना? तो आज इन बातों को चेक करना - आप' के बजाए मैं', मैं' के बजाए आप' तो नहीं कर देते हो? इसको कहते हैं हक़ीक़ी तौर। जहाँ हक़ीक़ी तरीक़ा है वहाँ तकमील है ही। और इस क़ैफियत की तरीक़ा सुनाया - दो बातों की चेकिंग करना - न तकब्बुर की कैफियत हो, न बेइज्जती की। जहाँ यह दोनों की ग़ैर दस्तयाबी है वहाँ ही शान ए नफ़्स की दस्तयाबी है। आप कहो न कहो, सोचो न सोचो मगर इन्सान, कुदरत - दोनों ही हमेशा अपने आप ही शान ए नफ़्स देते रहेंगे। इरादे-बराबर भी शान ए नफ़्स के दस्तयाबी की खुवाहिशात से शान ए नफ़्स नहीं मिलेगा। हलीम बनना यानि कि पहले आप' कहना। हलीमी सूरत ए हाल अपने आप ही शान ए नफ़्स दिलायेगी। शान ए नफ़्स की मुश्किलात में पहले आप' कहना यानि कि रब जैसा बनना। जैसे जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप ने हमेशा ही शान ए नफ़्स देने में पहले जगत् अम्बा पहले सरस्वती माँ, पीछे जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप रखा। जिब्राइल अलैहिस्सलाम बाप होते हुए भी शान ए नफ़्स देने के मतलब मम्मा को आगे रखा। दरेक काम में बच्चों को आगे रखा और तजवीज़ की सूरत ए हाल में हमेशा ख़ुद को पहले मैं' इंजन के रूप में देखा। इंजन आगे होता है ना। हमेशा यह जिस्मानी ज़िन्दगी में देखा कि जो मैं करूँगा मुझे देख तमाम करेंगे। तो तरीक़त में, खुद की तरक्की में और तेज़ तजवीज़ की लाइन में हमेशा पहले मैं' रखा। तो आज तरीक़त और तकमील की लक़ीर चेक कर रहे थे। समझा? तो बदली नहीं कर देना। यह बदली करना माना क़िस्मत को बदली करना। हमेशा होलीहंस बन फैसला की कुव्वत, परखने की कुव्वत को वक़्त पर काम में लगाने वाले बेहद अक्ल बनो और हमेशा कैफियत रूपी बीज को अफ़ज़ल बनाए तरीक़त और तकमील हमेशा अफ़ज़ल एहसास करते चलो।

पहले भी सुनाया था कि रब उल हक़ का बच्चों से प्यार है। प्यार की निशानी क्या होती है? प्यार वाला प्यार की कमी को देख नहीं सकता, हमेशा खुद को और प्यारी रूह को लबरेज़ बराबर देखना चाहता है। समझा? तो बार-बार अटेन्शन खिंचवाते, चेकिंग कराते - यही लबरेज़ बनाने का सच्चा प्यार है। अच्छा।

अभी सब तरफ़ से पुराने बच्चे मैजारिटी में हैं। पुराना किसको कहते हैं, मतलब जानते हो ना? रब उल हक़ पुरानों को कहते हैं -तमाम बातों में पक्के। पुराने यानि कि पक्के। एहसास भी पक्का बनाता है। ऐसा कच्चा नहीं जो ज़रा-सी इबलीस बिल्ली आवे और घबरा जावें। तमाम पुराने - पक्के आये हो ना? मिलने का चांस लेने के लिए तमाम पहले मैं' किया तो कोई हर्जा नहीं। मगर दरेक काम में कायदा और फ़ायदा तो है ही। ऐसे भी नहीं पहले मैं' तो इसका मतलब एक हज़ार आ जाएं। जिस्मानी ख़िल्क़त में कायदा भी है, फ़ायदा भी है। ग़ैबी वतन में कायदे की बात नहीं, कायदा बनाना नहीं पड़ता। ग़ैबी मिलन के लिए मेहनत लगती है, जिस्मानी मिलन आसान लगता है, इसलिए भाग आते हो। मगर वक़्त मुताबिक जितना कायदा उतना फ़ायदा होता है। रब उल हक़ थोड़ा भी ईशारा देते हैं तो समझते हैं - अब मालूम नहीं क्या होने वाला है? अगर कुछ होना भी होगा तो बताकर नहीं होगा। जिस्मानी बाप ग़ैबी हुए तो बताकर गये क्या? जो अचानक होता है वह रूहानी प्यारा होता है, इसलिए रब उल हक़ फ़रमाते हैं हमेशा एवररेडी रहो। जो होगा वह अच्छे ते अच्छा होगा। समझा? अच्छा।

तमाम होलीहंसों को, तमाम बेहद अक्ल, अफ़ज़ल खालिस अक्ल इख्तियारात करने वाले दानिश मन्द बच्चों को, तमाम कुव्वतों को, तमाम खासियतों को वक़्त के मुताबिक काम में लाने वाले इल्मी तू रूहें, आबिद तू रूहें बच्चों को, हमेशा रब जैसा लबरेज़ बनने के जोश हुल्लास में रहने वाले लबरेज़ बच्चों को रब उल हक़ का यादप्यार और सलाम।

बरक़ात:-
मालिकपन की याददाश्त के ज़रिए हाइएस्ट अथॉरिटी का एहसास करने वाले कम्बाइन्ड दीदार ए नफ़्स याफ़्ता बनो

पहले अपने जिस्म और रूह के कम्बाइंड रूप को याददाश्त में रखो। जिस्म मख़लूक़ है, रूह खालिक है। इससे मालिकपन अपने आप याददाश्त में रहेगा। मालिकपन की याददाश्त से खुद को हाइएस्ट अथॉरिटी एहसास करेंगे। जिस्म को चलाने वाले होंगे। दूसरा - रब और बच्चा (रहमतुल् आल्मीन कुव्वत) के कम्बाइन्ड दीदार ए नफ़्स की याददाश्त से इबलीस की मुश्किलात को अथॉरिटी से पार कर लेंगे।

स्लोगन:-
तफ्सील को सेकण्ड में समाकर इल्म के खुलासा का एहसास करो और कराओ।

आमीन